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SM-1 Hindi

Site: School of Open Learning
Course: Nutrition & Health Education
Book: SM-1 Hindi
Printed by: Guest user
Date: Sunday, 24 March 2019, 10:20 AM

1 अनुक्रम

अनुक्रम

बी. ए. प्रथम वर्ष हिन्दी

अध्ययन सामग्री 1(1-7)

मुक्त शिक्षा विधालय

(मुक्त शिक्षा परिसर)

दिल्ली विश्वविधालय

                                                     

स्नातक पाठयक्रम

अनुक्रम

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पाठ 1 : समाज में स्वास्थ्य एवं पोषण की धारणा

पाठ 2 : पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान 

पाठ 3 :पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान 

पाठ 4 : पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान 

पाठ 5 ; भोजन के कार्य, खाध.वर्ग व संतुलित आहार की परिकल्पना

पाठ 6 : आहार आयोजन

पाठ 7 : किशोरों, व्यस्कों और वृद्धों के लिए आहार आयोजन

संपादक :

डा. प्रीति गोयल       


2 पाठ 1 समाज में स्वास्थ्य एवं पोषण की धारणा

पाठ 1

समाज में स्वास्थ्य एवं पोषण की धारणा

(Concept of Health & Nutrition in Community)


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पोषण आहार-तत्त्व सम्बन्धी विज्ञान है। यह एक नर्इ विचारधारा है, जिसका जन्म मूलत: शरीर विज्ञान तथा रसायन विज्ञान से हुआ है। आहार तत्त्वों द्वारा मनुष्य के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अèययन एवं विश्लेषण इसका मुख्य विषय है। दूसरे शब्दों में शरीर आहार सम्बन्धी सभी प्रक्रियाओं का नाम ही पोषण है।

मूलरूप से पोषण की परिभाषा इस तरह से दे सकते हैं, ष्आहार, पोषण तत्त्व व अन्य तत्त्व उनका प्रभाव और प्रतिक्रिया तथा स्वास्थ्य व बीमारी से उसका सम्बन्ध व संतुलन का विज्ञान ही पोषण है। यह उस क्रिया को बताता है जिसके द्वारा कोर्इ जीव भोजन ग्रहण कर, पचाकर, अवशोषित कर शरीर में उसका वितरण कर उसे शरीर में समावेशित करता है तथा अपचित भोजन को शरीर से बाहर निकालता है। इतना ही नहीं पोषण का सम्बन्ध भोजन व उस भोजन के सामाजिक, आर्थिक व मनोवैज्ञानिक प्रभावों से भी है।श्श्

पोषक तत्त्व - भोजन के वे सभी तत्त्व जो शरीर में आवश्यक कार्य करते हैं, उन्हें पोषण तत्त्व कहते हैं। यदि ये पोषण तत्त्व हमारे भोजन में उचित मात्राा में विधमान न हों, तो शरीर अस्वस्थ हो जाएगा। कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण व पानी प्रमुख पोषण तत्त्व हैं। हमारे भोजन में कुछ ऐसे तत्त्व भी होते हैं, जो पोषण तत्त्व नहीं होते, जैसे रंग व खुशबू देने वाले रासायनिक पदार्थ या प्राÑतिक पदार्थ।

ये आवश्यक तत्त्व जब (सही अनुपात में) हमारे शरीर की आवश्यकता अनुसार उपसिथत होते हैं, तब उस अवस्था को सर्वोत्तम पोषण या समुचित पोषण की संज्ञा दी जाती है। यह सर्वोत्तम पोषण स्वस्थ शरीर के लिए नितान्त आवश्यक है। कुपोषण उस सिथति का नाम है जिसमें पोषक तत्त्व शरीर में सही अनुपात में विधमान नहीं होते हैं अथवा उनके बीच में असंतुलन होता है। अत: हम कह सकते हैं कि कुपोषण अधिक पोषण व कम पोषण दोनों को कहते हैं। कम पोषण का अर्थ है किसी एक या एक से अधिक पोषण तत्त्वों का आहार में कमी होना। उदाहरण - ृविटामिन एश् की कमी या प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण। अधिक पोषण से अर्थ है एक या अधिक पोषक तत्त्वों की भोजन में अधिकता होना। उदाहरण, जब व्यकित एक दिन में ऊर्जा खपत से अधिक ऊर्जा ग्रहण करता है, तो वह वसा के रूप में शरीर में एकत्रा रहती है और उससे व्यकित मोटापे का शिकार हो जाता है।

आहार और स्वास्थ्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है। रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और अन्य वैज्ञानिकों ने सदियों लम्बे अèययन और अनुसंधान के बाद यह तथ्य स्थापित किए हैं। शरीर के पोषण पर अनेक बातों का प्रभाव पड़ता है; जिनमें भोजन की आदतें, मान्यताएं, मन:सिथति, जातीय, भौगोलिक, धार्मिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आहार और उसका उत्पादन राष्ट्रीय व अंत: आहार सम्बन्धी नीतियां जैसे मछलीकरण, वितरण, शिक्षा इत्यादि।

अधिकांश सभ्यताओं में स्वास्थ्य का महत्त्व समान है। वास्तव में हर समाज में स्वास्थ्य के विषय में उनकी अपनी विशेष धारणा है। आमतौर पर स्वास्थ्य को बीमारी का न होना मानते हैं। व्यकितगत तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि स्वास्थ्य का महत्त्व सबसे अधिक है क्योंकि अक्सर इसका महत्त्व आवश्यकतानुसार बदलता रहता है। व्यकितगत तौर पर अक्सर दूसरी आवश्यकताएं जैसे कि धन, बल, विधा, सुरक्षा एवं प्रतिष्ठा इत्यादि स्वास्थ्य के महत्त्व को कम महत्त्व देती है और स्वास्थ्य को निशिचत मानकर हम उसकी ओर विशेष èयान तब तक नहीं देते जब तक कि उसे खो न दे।

स्वास्थ्य की परिभाषा ;क्मपिदपजपवद व भिमंसजीद्ध - स्वास्थ्य उन कठिन परिभाषिक शब्दों में से एक है जिसका अधिकतर लोग पूरी तरह अर्थ जानते हुए भी उसकी परिभाषा पूर्ण रूप से नहीं दे पाते। समय-समय पर स्वास्थ्य की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी गर्इ हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं।

A. The condition of being sound in body mind and spirit especially freedom from physical disease or pain – “Webster”

(क) निरोगी अथवा दर्द रहित शरीर, मसितष्क और आत्मा की उचित अवस्था ही स्वास्थ्य है

B. “Soundness of body or mind, that conditions in which its function are duly and efficiently discharged” –“Oxford”

 (ख) शरीर या मसितष्क का स्वस्थ होना उस व्यवस्था का नाम है जिसमें इसके कार्य पूर्णतया एवं कुशलतापूर्वक हो रहे हों।

C. A condition or quality of human organism expressing the adejuate functioning of organism given conditions genetic and environmental.

(ग) मानव शरीरतन्त्रा की वह सिथति अथवा गुण जो वंशगत और परिवेशगत प्रदत्त परिसिथतियों में शरीर तन्त्रा की उचित कार्य प्रणाली को अभिव्यक्त करता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)द्वारा दी परिभाषा

सबसे अधिक प्रचलित परिभाषा वि. स्वा. सं. ने 1948 में दी। इसके अनुसार ष्स्वास्थ्य रोग का न होना या अशक्तता मात्रा नहीं, बलिक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तन्दुरुस्ती की सिथति है।

पिछले कर्इ वषो± से इस परिभाषा का विस्तार हुआ जिसमें सामाजिक व आर्थिक रूप से गुणकारी जीवन व्यतीत करने की क्षमता को समिमलित किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रमुख तीन मापदण्डों पर विचार किया है और बहुत से मापदण्डों पर विचार कर सकते हैं जैसे आतिमक, भावात्मक, राजनीतिक व व्यवसायिक मापदण्ड।

1. शारीरिक मापदण्ड (Physical Dimension) - यह समझना बहुत सरल है कि शारीरिक स्वास्थ्य की सिथति ष्सम्पूर्ण क्रियाष् के विचार में निहित है। व्यकित में अच्छे स्वास्थ्य के संकेत हैं - अच्छा रंग, अच्छे बाल, चमकती आंखें, स्वच्छ त्वचा, अच्छी सांस, तन्दुरुस्त शरीर, गाढ़ी नींद, अच्छी भूख, अच्छी पाचन शकित, सरल सहायक, शारीरिक गतिविधियाँ, शरीर के सभी अव्यव जो कि सामान्य आकार कार्य वाले हैं - सम्पूर्ण चेतना, नाड़ी की गति, रक्तचाप व सहनशीलता; ये सभी व्यकित की आयु व लिंग के अनुसार सामान्यता की सिथति में आते हैं। यह सामान्यता की सिथति एक विस्तृत सीमा लिए हुए है।

यह सामान्य सिथति अप्रभावित स्वस्थ लोगों के (जो कि किसी भी बीमारी से पीडि़त नहीं हैं) निरीक्षण के पश्चात स्थापित की गर्इ है।

2. मानसिक मापदण्ड (Mental Dimension) - मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य एक दूसरे से जुड़े हैं। यह केवल मानसिक बीमारी की अनुपसिथति नहीं है। अच्छा मानसिक स्वास्थ्य जीवन के बहुत से अनुभवों को बताने की योग्यता रखता है। निम्न मानसिक स्वास्थ्य अच्छे शरीर को तो प्रभावित करता है; इसके अतिरिक्त मानसिक कारक भी विचारपूर्ण है जो कि अति-रक्तचाप, अस्थमा, शारीरिक अव्यवस्थाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

3. सामाजिक मापदण्ड (Social Dimension) - अच्छी व्यवहारकुशलता निहित है एकरूपता और एकीÑत व्यकित में, व्यकित और समाज में, व्यकित और विश्व में, जिसमें कि वह रहता है। एक समुदाय का सामाजिक स्वास्थ्य उन्नति, चिंतन, विचारों और दूसरों के प्रति सहानुभूति जैसे कारकों पर निर्भर करता है। इसके अलावा यह शिक्षा, उत्पादन, स्वास्थ्य व व्यकितयों की सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है।

4. आèयातिमक मापदण्ड (Spiritual Dimension) - आधुनिक जीवन पर तनाव व दबाव होने से स्वास्थ्य के मापदण्ड पर विचार करना अनिवार्य है। विश्व के साथ शानित सम्बन्ध बनाने से पहले यह अनिवार्य है कि व्यकित स्वयं आतिमक शानित को प्राप्त हो। आèयातिमक स्वास्थ्य नैतिक मूल्यों, संहिताओं, अभ्यासों व चिंतन इत्यादि के माèयम से प्राप्त किया जा सकता है।

5. व्यवसायिक मापदण्ड (Professional Dimension)- व्यवसायिक मापदण्ड स्वास्थ्य का नया मापदण्ड है। इसका महत्त्व ज्यादा तब है, जब अचानक किसी व्यकित की नौकरी छूट जाती है या उसे सेवा-निवृत्ति लेनी पड़ती है। हो सकता है कुछ व्यकितयों के लिए ये केवल आय का एक ज़रिया हो, लेकिन कुछ के लिए जिन्दगी के सभी मापदण्डों के द्वारा जो सफलता मिलती है, यह उसे प्रदर्शित करता है।


स्वास्थ्य का निर्धारण (Determination of Health)

स्वास्थ्य अकेले में नहीं रहता। कुछ कारक होते हैं जो कि स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं फिर चाहे व्यकित अकेले में हो या फिर बाá समाज में जिसमें कि वह रहता है, यह कारक अंतरक्रिया करते हैं। यह अंतरक्रिया स्वास्थ्य को बढ़ावा अथवा उसे आघात पहुंचा सकती है। व्यकित का स्वास्थ्य और सम्पूर्ण समाज ऐसी बहुत सी अंतरक्रियाओं का परिणाम हो सकता है।        स्वास्थ्य का निर्धारण इस प्रकार किया जा सकता है -

1.अनुवांशिकता

2. वातावरण

3. जीवन पद्धति

4. सामाजिक आर्थिक सिथतियां

5. स्वास्थ्य व परिवार कल्याण संवाद

6. अन्य

1. अनुवांशिकता (Heredity) - प्रत्येक व्यकित के शारीरिक व मानसिक गुण कुछ हद तक उसके गुण सुत्राों की प्रÑति से निशिचत होते हैं जो कि उसके अभिभावकों के गुणसुत्राों से निशिचत होती है और ये गुणसुत्रा उसे उसके अभिभावकों के संयोग ;ब्वदबमचजपवदद्ध से मिलते हैं। गुणसूत्राों की संरचना बाद में परिवर्तित नहीं हो सकती। गुणसूत्राों की खराबी बहुत सी बीमारियों को उत्पन्न करती है जैसे सिकल सैल एनीमिया, हीमोफीलिया, चयापचयय की कुछ खराबी इत्यादि।

अत: स्वास्थ्य की सिथति गुणसूत्राों की संरचना पर निर्भर करती है।

2. वातावरण (Environment) - Hipporates पहला विचारक था जिसने बीमारियों को वातावरण से जोड़ा जैसे कि मौसम, जल, भोजन, हवा आदि। सर्दियों के बाद Pattenkofer ने (जर्मनी में) ष्बीमारी और वातावरणष् के सम्बन्ध के विषय को नया जीवन प्रदान किया।

बाहय वातावरण उन चीजों से बना है जिससे व्यकित जनन के बाद सम्पर्क में आता है। इसे तीन घटकों में विभाजित किया जा सकता है।

1.शारीरिक घटक

2. जीव वैज्ञानिक घटक

3.मानसिक व सामाजिक घटक

ये सभी अथवा कोर्इ एक व्यकित के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं और इसका सीधा प्रभाव होता है। यदि वातावरण किसी व्यकित के अनुकूल है तो वह अपनी शारीरिक व मानसिक क्षमताओं का भरपूर प्रयोग कर सकता है।

3. जीवन पद्धति (Life Style) - जीवन पद्धति का अर्थ है लोगों के ृरहन-सहन का तरीकाश् और यह सामाजिक मूल्यों, व्यवहारों और गतिविधियों को प्रतिबिमिबत करता है। यह सांस्Ñतिक और व्यवहारिक आदशो± और जीवन की लम्बी आदतों से बनती है। जीवन पद्धति विभिन्न सामाजिक अन्तर-प्रक्रिया द्वारा विकसित होता है जैसे अभिभावक, समूहों, दोस्तों, भार्इ-बहन, स्कूल और (Mass Media) द्वारा अन्तत क्रिया।

स्वस्थ जीवन पद्धति स्वास्थ्य की जरूरत है। उदाहरण के लिए पौषिटकता, पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधियां आदि। स्वास्थ्य में प्रत्येक की जीवन पद्धति और इसे निशिचत करने वाले कारक दोनों चीजें शामिल हैं। वर्तमान दिनों में स्वास्थ्य समस्याओं को विशेषतया विकासशील देशों में परिवर्तित जीवन पद्धति के साथ जोड़ा गया है। भारत जैसे विकासशील देशों में जहां पर परम्परागत जीवन पद्धति अभी भी जारी है, स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी की वजह से बीमारी के खतरे से मृत्यु मानवीय आदत, परम्परा का परिणाम है।

अत: अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ जीवन पद्धति को अपनाना अनिवार्य है।

4. सामाजिक आर्थिक सिथति (Socio-Economic Conditions)- सामाजिक-आर्थिक सिथति व्यकित के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। कुछ महत्त्वपूर्ण कारण जो कि सामाजिक-आर्थिक सिथतियों को निशिचत करते हैं-

1. आर्थिक स्तर

2. शिक्षा

3. व्यवसाय  

 1. आर्थिक स्तर (Economic Status) - सामान्य आर्थिक संपादन का मापदण्ड ;च्मतबंचजपवदद्ध ळछच् (प्रति व्यकित कुल राष्ट्रीय उत्पादन) है। व्यकित की क्रयक्षमता, रहन-सहन स्तर, जीवन-गुणता, परिवार का आकार इत्यादि उसके आर्थिक स्तर पर निर्भर करते हैं। स्वास्थ्य की देखरेख में आर्थिक स्तर एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। परन्तु एक विडम्बना यह है कि उच्च-स्तरीय जीवन भी बीमारी को बढ़ा देता है जैसे कि हृदय, शक्कर आदि बीमारियों जो अधिकांशत: उच्च-स्तरीय समाज में पार्इ जाती है।

2. शिक्षा (Education) - आर्थिक स्तर के अलावा शिक्षा भी स्वास्थ्य देखदेख के स्तर को प्रभावित करती है। (विशेषतया नारी शिक्षा) असाक्षरता विश्व मानचित्रा में जहां भी दृषिटगत होती है, वहां पर गरीबी, निम्न स्वास्थ्य, उच्च शिशु जन्मदर व मृत्युदर व कुपोषण दृषिटगत होता है। अèययनों से पता चलता है कि शिक्षा कुछ हद तक स्वास्थ्य पर गरीबी के प्रभाव को कम करती है। (चाहे स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं अपूर्ण हो) भारत में 1984 की जनगणना के अनुसार केरल एक ऐसा उदाहरण है वहां पर शिशु मृत्युदर 29 है जो कि सम्पूर्ण भारत में 104 है और उसका एक महत्त्वपूर्ण कारण नारी शिक्षा की दर है जो की 65ण्7: है; सम्पूर्ण भारत में यह दर 24ण्8: है।

3. व्यवसाय - बेरोजगारी बीमारी व मृत्यु को बढ़ावा देती है। अधिकांशत: कार्य-हानि आय व स्तर ही प्रभावित नहीं करती अपितु यह एक मानसिक व सामाजिक आघात भी पहुंचाती है।

5. राजनैतिक व्यवस्था (Political System) - स्वास्थ्य राष्ट्र की राजनैतिक व्यवस्था से भी सम्बनिधत है। प्राय: स्वास्थ्य तकनीकों को कार्यानिवत करने के मार्ग में मुख्य बाधा तकनीकी की अपेक्षा राजनैतिक है। साधनों के बंटवारे, मैनपावर नीति, तकनीक के चयन एवं स्वास्थ्य सेवाओं का वह क्रय जिसमें ये सेवाएं समाज के विभिन्न भागों में सुगमता से उपलब्ध हो इनसे सम्बनिधत निर्णय राजनैतिक व्यवस्था के तरीकों के उदाहरण हैं, जिनसे सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं का गठन किया जा सकता है।

6. स्वास्थ्य सेवाएं (Political System) - स्वास्थ्य सेवाओं का लक्ष्य लोगों का स्वास्थ्य स्तर सुधारना है। ृपरिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण सेवाश् पद व्यकितगत व सामुदायिक सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला को समाहित करता है। ये सेवाएं बीमारी के इलाज, बीमारी को रोकथाम और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने हेतु होती हैं। बच्चों के प्रतिरक्षण से किसी विशेष बीमारी के खतरे को रोका जा सकता है। स्वच्छ पानी के प्रबंध से जल से उत्पन्न होने वाली बीमारियों के फैलाव व उनसे होने वाली मृत्यु से सुरक्षा की जा सकती है। गर्भवती महिलाओं व बच्चों की देखभाल बच्चों एवं माता की अस्वस्थता और मृत्युदर में कमी लाने में योगदान देगा। ये सभी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के अंग हंै। ये भी उसके घटक हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के प्रयास (मार्ग) के रूप में देखा जाता है।

7. अन्य तथ्य (Other) - अन्य तथ्य जो स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, वे औपचारिक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था से परे हैं। इसमें रोजगार के अवसर, बढ़ी हुर्इ आय तैयार किए हुए आयुर्विज्ञान कार्यक्रम और परिवार आश्रय (सहारा) व्यवस्था (सपोर्ट सिस्टम) शामिल होंगे।

संक्षिप्त में चिकित्सा लोगों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए अकेले उत्तरदायी नहीं है। अन्य प्रयास में एक दूसरे के क्षेत्रा में आने वाले कार्यक्रमों से ृसमुदाय के स्वास्थ्यश् की बढ़ोत्तरी का भी पंजीÑत (प्रमाणित) योगदान है।


3 पाठ 2 पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान- (I)

पाठ 2

पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान- (I)

Elementary Knowledge of Nutrients – (I)

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सुपोषण स्वास्थ्य का मूल अंग-संगठन है। सामान्य वृद्धि और विकास के लिए तथा जीवन-स्तर का अनुरक्षण करने के लिए, इसका विशेष महत्त्व है। वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भ में, विटामिनों की खोज के फलस्वरूप, पोषण विज्ञान का पुन: आविष्कार हुआ है। उस समय से पोषण के क्षेत्रा में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुर्इ है। दो विश्व महायुद्धों के बीच, इस दिशा के अनुसंधान-कार्य मुख्यत: विटामिनों पर ही केनिद्रत थे। द्वितीय विश्व महायुद्ध के पश्चात प्रोटीन सम्बन्धी अनुसंधानों की गति में विशेष वृद्धि हुर्इ। सत्तर के दशक में ऐथिरोकोठिन्य (ऐथिरोस्क्लोरोसिस) आदि रोगों को संप्रापित (विÑति जननता) और इसकी जटिलताओं के विषय में तथा मुख्यत: विपथी âदयधमनी सम्बन्धी रोगों के बारे में, दैनिक आहार की भूमिका को सुनिशिचत करने में रुचि ली गर्इ है। पिछले दो दशकों से मानव स्वास्थ्य और रोगों की संप्रापित में श्वसन-अनुज्ञापक अवयवों (तत्त्वों) और आहारीय फोक ;पिइतमद्ध की भूमिका के अध्ययन ने भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है।

परिभाषाएँ

पोषण (Nutrition) - यह आहार, इसके पोषक तत्त्वों, इसमें निहित अन्य पदार्थों इसकी क्रियाओं, प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य तथा रोगों के साथ इसके संतुलन का विज्ञान है।

आहार (Food) - कोर्इ भी ठोस या तरल पदार्थ, जिसका शरीर में अतग्र्रहण करके पाचन किया जाता है और शरीर में समिमलित किया जाता है तथा जो शरीर को स्वस्थ रखता है आहार कहलाता है। भोजन को मुख्यत: अनाज, दालें, सबिजयां, फल, दूध, अण्डा, मांस, वसा व शर्करा में विभाजित किया गया है।

पोषक तत्त्व (Nutrients) - पोषक तत्त्व आहार के वे सभी संघटक होते हैं, जिनका शरीर में उपयुक्त मात्राा में संभरण किया जाना चाहिए। ये प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, कारबोज, पानी और विटामिन हैं।

पोषण स्तर (Nutritional Status) - पोषण स्तर को इस रूप में परिभाषित किया जाता है कि प्रचलित आहार प्रणाली शरीर की आवश्यकताओं को किस सीमा तक पूरा किया करती है। दूसरे शब्दों में, यह भोजन के बाद की शरीर की सिथति को सूचित करता है। किसी व्यकित का स्वास्थ्य पोषक तत्त्वों के शरीर में समिमलित होने के कारण होता है। इसका आंकलन आहारीय परीक्षण, शारीरिक मापदण्ड व प्रयोगशाला में परीक्षण द्वारा किया जा सकता है। भोजन में विभिन्न पोषक तत्त्वों की जानकारी व महत्त्व आगे पृष्ठों पर दी गर्इ है।

ऊर्जा की आवश्यकता

(Energy Requirement)

ऊर्जा (Energy) - कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। यह शरीर में उत्पन्न उष्मा होती है, जिसका उपयोग देहताप के अनुरक्षण और शरीर के नये घटकों के संश्लेषण करने सम्बन्धी ऐचिछक एवं अनैचिछक क्रियाओं को सम्पन्न करने में किया जाता है।

आधारी चयापचय दर (Basal Metabolic Rate)- बिना किसी चेतन प्रयास के शरीर में कर्इ प्रकार की प्रक्रियाएं उस समय भी होती हैं, जबकि व्यकित पूर्ण विश्रानित में होता है और कोर्इ भी कार्य नहीं कर रहा होता है। इनमें ऐसी अनैचिछक प्रक्रियाएं भी हैं। जैसे दिल का धड़कना और रक्त संचरण। इन प्रक्रियाओं को ही चयापचय (उपापचय) प्रक्रिया कहते हैं। इन प्रक्रियाओं को करने में प्रयुक्त शकित को आधारी चयापचय दर कहते हैं जिसे संक्षिप्तीकृत रूप में

आ.च.द. (बीएमआर) कहा जाता है। अधिकतम लोगों में आधारी शकित की आवश्यकता, कुल शकित की आवश्यकता के आधे भाग से ज्यादा होती है।

ऊर्जा की इकार्इ (Unit of Energy) - आहार का ऊर्जा मान किलो कैलोरी (कि. कैल.) के रूप में दर्शाया जाता है। एक किलोग्राम पानी का ताप एक डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ाने के लिए वांछित उष्मा की मात्राा को एक किलो कैलोरी माना जाता है। मीटर प्रणाली में, किलो कैलोरी के स्थान पर अन्तर्राष्ट्रीय इकार्इ किलोजूल का प्रयोग किया जाता है। एक किलो जूल, न्यूटन के शकित सिद्धान्त के प्रयोग द्वारा, एक किलोग्राम मात्रा के ठोस पदार्थ को एक मीटर दूर हटाने लायक विस्तारित  ऊर्जा होती है।

1 कैलोरी = 4.148 जूल

1 किलो कैलोरी =4.184 किलो जूल

1000 किलो कैलोरी = 4.184 एम जूल

1 किलो जूल = 0.239 किलो कैलोरी

1 एम जूल = 239 कैलोरी

कुल ऊर्जा आवश्यकता को प्रभावित करने वाले कारक

(Factors Influencing the Total Energy Requirement)

आयु, लिंग, शरीर का आकार, जलवायु, अन्त:स्रावी ग्रंथियों (एण्डोक्राइम) ग्लैण्ड का स्राव, स्वास्थ्य स्तर, गर्भावस्था और दुग्धपान कराने की अवस्था में परिवर्तित शारीरिक सिथति, आहार का प्रभाव और शारीरिक क्रियाओं की मात्राा आदि घटक तत्त्व ऊर्जा आवश्यकता को प्रभावित करते हैं।

1. आयु (Age) - वृद्धिकाल चयापचय में आधारी दर बहुत ज्यादा होती है। इसलिए शैशव काल में प्रतिकिलो शरीर भार ऊर्जा आवश्यकताएँ, व्यस्कावस्था की ऊर्जा आवश्यकताओं की अपेक्षा अधिक होती है। इसी प्रकार प्रारमिभक वयस्कावस्था के बाद चयापचय आधारी दर में सतत गिरावट के कारण ऊर्जा आवश्यकताएँ भी उत्तरोत्तर कम होती जाती हैं। शैशव काल में चयापचय की दर अधिक होती है और अधिकतम 1ऋ2 वर्ष के बच्चे की होती है। दो से पांच वर्ष के दौरान चयापचय की दर में गिरावट आती है और इसके पश्चात उसके वयस्क होने तक ये दर कम होती रहती है।

2. लिंग (Sex) - किशोर लड़कियों और वयस्क सित्रायों की अपेक्षा किशोर लड़कों और वयस्क पुरुषों में आधारी चयापचय दर ऊंची होती है यह लिंग भेद से प्रत्यक्ष प्रभाव के कारण नहीं, बलिक शारीरिक बनावट की भिन्नता के कारण होती है। पुरुषों में ज्यादा मांसपेशियां और ग्रन्थीय ऊतक होते हैं, जो चयापचय में ज्यादा सक्रिय होते हैं और सित्रायों में वसामय ऊतक ज्यादा होते हैं, जो चयापचय में कम सक्रिय होते हैं। इसी कारण पुरुषों में सित्रायों की अपेक्षा, ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है।

3. शरीर का आकार (Body Size) - ऊर्जा आवश्यकताओं पर शरीर के आकार का विशेष प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बड़े शरीर में ज्यादा मांसपेशियां और ज्यादा ग्रन्थीय ऊतक होते हैं, जिनका अनुरक्षण करना पड़ता है, इसलिए ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती है। हमारे शरीर से त्वचा द्वारा लगातार ऊष्मा का निकास होता है। अत: शरीर का आकार जितना बड़ा होगा, ऊष्मा का निष्कासन उतना अधिक होगा। एक पतले, लम्बे, व्यकित का शरीर सतह एक छोटे, मोटे व्यकित की अपेक्षा अधिक होता है; अत: उसकी चयापचय दर अधिक होगी।

4. जलवायु (Climate) - यह सर्वविदित है कि चयापचय आधार दर शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्राों की अपेक्षा उष्ण

कटिबन्धीय क्षेत्राों में कम होती है। इसलिए यदि तापमान 14व् सेन्टीग्रेड से कम होता है, तो कार्य में ऊर्जा व्यय कुछ ज्यादा होने लगता है। फिर भी, यह अनुभव किया गया है कि भारत में तापमान के लिए किसी प्रकार के समायोजन की आवश्यकता नहीं है।

5. अन्त:स्त्राावी ग्रनिथयों का स्राव (Secretion of Endocrine Glands) - ऊर्जा आवश्यकता पर विशेष रूप से अवटुग्रनिथ (थायोरोइड ग्लैण्ड) का अच्छा खासा प्रभाव पड़ता है। यदि यह अतिसक्रिय (अवटु अतिक्रियता) होती है तो आधारी चयापचय.दर बढ़ जाती है, और यदि इसकी क्रियाशीलता कम होती है (अवटु अल्पक्रियता), तो आधारी चयापचय-दर भी घट जाती है। इसी कारण ऊर्जा आवश्यकता भी बढ़ती-घटती रहती है।

6. स्वास्थ्य का स्तर (Status of Health) - बुखार के कारण तथा इसी प्रकार कुपोषण के कारण व्यकित की आधारी चयापचय दर प्रभावित होती है।

शरीर का तापमान बढ़ाने वाली अस्वस्थता के कारण ऊर्जा उत्पादन आधार काफी बढ़ जाता है और इसी कारण आधारी चयापचय दर भी बढ़ जाती है। साथ ही ऊर्जा आवश्यकता भी बढ़ जाती है।

7. शारीरिक सिथति में परिवर्तन (Altered Physiological States) - गर्भावस्था में तथा स्तनपान कराने की अवस्था में आधारी चयापचय दर में वृद्धि के कारण, ऊर्जा आवश्यकताएँ भी बढ़ जाती हैं। गर्भावस्था में भ्रूण और मातृ ऊत्तकों की वृद्धि के संभरण के कारण अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। स्तनपान कराने की अवस्था में दूध के निर्माण के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

8. आहार का प्रभाव (Effect of food)- भोजन के पचाने में, आत्मसात्करण में, ऊतकों तक पहुंचाने में तथा इसके उपयोग में कार्य की पर्याप्त मात्राा उत्सर्जित हो जाती है। भोजन के अतग्र्रहण के कारण वृद्धित ऊर्जा उत्पादन को भोजन की विशिष्ट गत्यात्मक क्रिया (Specific Dynamic Action) के रूप में जाना जाता है। अकेले प्रोटीन के अन्तग्र्रहण से चयापचय-दर (Metabolic Rate) 30 प्रति शत बढ़ जाती है। मिश्रित आहार के आधार पर, जो प्राय: अन्तर ग्रहण किया जाता है, भोजन की विशिष्ट गत्यात्मक क्रिया, ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 10 प्रतिशत होती है।

9. शारीरिक क्रिया की मात्राा (Extent of Physical Activity) - किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रिया से ऊर्जा खपत, ऊर्जा आवश्यकता के आधार बिन्दु से ज्यादा बढ़ जाती है। ऊर्जा खपत की मात्राा में, सभी प्रकार की शारीरिक क्रियाओं के लिए ऊर्जा का स्थान, आधारी चयापचय से दूसरा है। नींद के समय हमारी चयापचय दर 10: कम होती है। कुल मिलाकर चयापचय दर पर इसका प्रभाव नींद के घण्टों व नींद के प्रकार पर निर्भर करता है।

ऊर्जा आवश्यकता का निर्धारण शारीरिक क्रिया की प्रकृति तथा समयावधि के आधार पर किया जाता है। कार्यालय, बही-खाता, टंकण, अध्यापन आदि अभ्रमणशील हल्के कार्यों में, उपचर्या, गृहसज्जा और बागवानी जैसे सक्रिय और मध्यम श्रम कार्यों की अपेक्षा कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। गडढे खोदने, सामान ढ़ोने जैसे भारी शारीरिक श्रम के कार्यों में लगे श्रमिकों के लिए ऊर्जा की और भी अधिक मात्राा की आवश्यकता होती है।


चित्रा : 1 आयु, व्यवसाय व शारीरिक सिथति के कारण ऊर्जा आवश्यकता पर प्रभाव प्रस्तावित ऊर्जा की आवश्यकता (Recommended Daily Allowance)

(अ) ऊर्जा की आवश्यकता आधारीय चयापचय दर के रूप में दी गरइ है F.A.O. 1980 द्वारा प्रस्तावित शारीरिक भार से निकाली गर्इ है भारतीयों के लिए, उनके कम चयापचय दर को ध्यान में रखते हुए, इस प्रस्तावित मात्राा में 5: की कमी की गर्इ है।

(आ) बच्चों व किशोरों की आवश्यकता साधारणतया वृद्धि करते भारतीय बच्चों की आवश्यकता हैं। आवश्यकताएँ आयु के अनुसार दी गर्इ हैं तथा शारीरिक भार के लिए कुछ परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है।

      सारणी - 1

प्रोटीन

(Protein)

प्रोटीन शब्द का अर्थ है - ष्पहला स्थान लेना।ष् 1938 में डच औषधकार मुल्डर ने बताया था, कि सभी जीवित प्राणियों, पौधों और पशुओं में कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जिनके बिना जीवित रहना असम्भव है और इन तत्त्वों को ही प्रोटीन नाम से जाना जाता है। शरीर-संचरना में प्रोटीन का स्थान जल के बाद दूसरा है। वास्तव में, मानव पोषण में प्रोटीन का अत्यधिक महत्त्व है।

इनमें कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन और गंधक का संशिलष्ट जैविक समिमश्रण होता है। कुछ प्रोटीनों में फास्फोरस, लौह, आयोडीन, ताम्र और अन्य अजैविक तत्त्व होते हैं। प्रोटीन में नाइट्रोजन होती है, अत: ये कारबोज और वसा से भिन्न होते हैं। प्रोटीन ऐमीनो अम्ल नामक छोटी-छोटी इकाइयों से बने होते हैं।

कार्य (Functions)

प्रोटीन जीवन-प्रक्रिया के लिए बहुत ही आवश्यक है। ऐसी शायद ही कोर्इ महत्त्वपूर्ण शारीरिक कार्य होगी, जिसमें प्रोटीन की सहभागिता न होती हो। प्रोटीन के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं -

1. शरीर निर्माण (Body Building) - यह प्रोटीन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है। प्रोटीन देह ऊत्तकों का प्रमुख संरचनात्मक संघटक होता है। वस्तुत:, प्रत्येक सजीव कोशिका में प्रोटीन होते हैं। इसलिए वृद्धि और विकास के लिए तथा कोशिका प्रोटीन के निरन्तर प्रतिस्थापन के लिए आवश्यक सामग्री की आपूर्ति करना, प्रोटीन की प्रथम आवश्यकता है।

2. शरीर नियामक(Body Regulatory) - शारीरिक क्रियाओं के नियमन में कर्इ प्रोटीन विशिष्ट कार्य करते हैं। शरीर में सभी रसायनिक प्रतिक्रियाएं किण्वकों (एन्जाइम) के द्वारा होती हैं, जो प्रÑति से प्रोटीन ही होते हैं। प्रोटीन भी हीमोग्लोबीन का एक घटक है। फेफड़ाें से ऊतकों तक आक्सीजन ले जाने और वापस कार्बन डार्इआक्साइड लाने में, हीमोग्लोबीन बहुत ही आवश्यक है। शरीर की प्रतिक्रियाओं पर हारमोन-नियन्त्राण करते हैं, ये सभी प्रोटीन तत्त्व ही होते हैं। शरीर में जल सन्तुलन के अनुरक्षण का मूल कार्य प्लाविका प्रोटीन (प्लाज़्मा) करते है। शरीर अम्लीय आधार संतुलन बनाए रखने में रक्त प्रोटीन सहायता करते हैं।

3. शरीर संरक्षण (Body Protection) - गामा ग्लोब्यूलिन नामक प्रोटीन में आक्रामक जीवों से लड़ने की सामथ्र्य होती है। रोगों के प्रति शारीरिक प्रतिरोध का आंशिक अनुरक्षण रोग प्रतिकारकों द्वारा किया जाता है, जो प्रकृति से प्रोटीन ही होते हैं।

4. ऊर्जा प्रदायक (Energy Giving) - शरीर की ऊर्जा आवश्यकताओं को अन्य आवश्यकताओं की अपेक्षा प्राथमिकता मिलती है, और यदि आहार में कारबोज और वसा से पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलती तो आहार की प्रोटीन तथा ऊतकों की प्रोटीन, ऊर्जा प्रदान करने के कारण जल्दी खर्च हो जाएगी। एक ग्राम प्रोटीन से 4 कैलोरी मिलती है।

5.शारीरिक ताप पर नियन्त्राण (Maintenance of Body Temperature) - प्रोटीन के चयापचय के दौरान, अतिरिक्त ऊर्जा निकलती है जिसका इस्तेमाल शारीरिक ताप के अनुरक्षण में किया जाता है।

स्रोत (Sources)

प्रोटीन के आहार स्रोत दो प्रकार के होते हैं - 1. पशु स्रोत - दूध व दूध के अन्य उत्पाद (मक्खन तथा घी को छोड़कर) अण्डा, मांस, मछली और मुर्गा। 2. वनस्पति स्रोत - दालें जैसे सोयाबीन, चना, अरहर, मूंग, उड़द, अन्न जैसे गेहूं, मक्का, चावल, जौ, ज्वार, बाजरा और मेवे जैसे मूंगफली, बादाम, काजू आदि। सब्जी और फलों से कम प्रोटीन मिलते हैं।

प्रोटीन गुणवत्ता (Protein Quality)

प्रोटीन की केवल मात्राा ही नहीं, अपितु गुणवत्ता भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह गुणवत्ता, विशिष्ट प्रोटीन में पाए जाने वाले विशेष एमिनो अम्ल की मात्राा और प्रकार के ऊपर मुख्यत: निर्भर करती है।

कुल मिलाकर मनुष्य के शरीर के लिए 22 प्रकार के ऐमिनो अम्ल की आवश्यकता होती है। इनमें से आठ ृअनिवार्यश् होते हैं, क्योंकि शरीर में इनका संश्लेषण नहीं किया जा सकता है। इसलिए हम इन्हें आहार से प्राप्त करते हैं। बाकी ऐमिनो अम्ल ृआवश्यक नहींश् नाम से जाने जाते हैं क्योंकि इनका संश्लेषण शरीर में किया जा सकता है।

      आइसोल्यूसीन, ल्युसीन, लार्इसिन, मिथओनिन, फिनाइलएलानिन, थि्रयोनीन, टि्रप्टोफेन और वैलीन आदि ऐमिनो अम्ल अनिवार्य और परमावश्यक होते हैं। इनके अतिरिक्त शिशुओं को वृद्धि के लिए हिस्टीडीन की भी आवश्यकता होती है।

प्रोटीन गुणवत्ता के आधार पर इसके तीन भाग किए जा सकते हैं-

1. पूर्ण प्रोटीन (प्रथम वर्ग)

2. अंशत: प्रोटीन (द्वितीय वर्ग)

3. अपूर्ण प्रोटीन (तृतीय वर्ग)

1. पूर्ण प्रोटीन (Complete Protein)- इनमें सभी अनिवार्य ऐमिनो अम्ल पर्याप्त मात्राा में होते हैं, जिसमें शरीर की सामान्य वृद्धि का अनुरक्षण किया जाता है। मुख्यत: पशु-स्रोत से मिलने वाले प्रोटीन इसी वर्ग में होते हैं, जैसे

दूध, मांस, अण्डा, मछली और मुर्गा। अंकुरित अन्न (बीजांकुर) और सूखे खमीर में वैदिक मूल्यवत्ता होती है, जो पशु स्रोतों से प्राप्त प्रोटीनों जैसी ही होती है।

2.अंशत: पूर्ण प्रोटीन (Partially Complete Protein)- इनके जीवन का अनुरक्षण तो किया जा सकता है, परन्तु इनमें वृ़िद्ध के लिए आवश्यक कुछ एमिनो अम्लों की पर्याप्त मात्राा नहीं होती। वनस्पति स्रोतों जैसे दाल, गेहूं और गिरी आदि से प्राप्य प्रोटीन इसी श्रेणी में होते हैं।

3. अपूर्ण प्रोटीन (Incomplete Protein) - ये न तो वृ़िद्ध हैं और न ही जीवन का अनुरक्षण करते हैं, क्योंकि इनमें कितने ही ऐमिनो अम्ल नहीं होते, और यदि होते भी हैं तो काफी कम मात्राा में होते हैं। उदाहरणार्थ जिलेटिन ओर जीन जो मक्का में पाए जाते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं।

प्रोटीन की पूरक गुणवत्ता (Supplementary Value of Proteins) - एक प्रकार के प्रोटीन की कमी को दूसरे प्रकार के प्रोटीन से पूरा करने को प्रोटीन की पूरक गुणवत्ता कहते हैं। संसार भर के लोगों के लिए आहार में प्रोटीन का मुख्य स्रोत वनस्पति है। वानस्पतिक भोज्य पदार्थ अकेले खाए जाने पर उनमें सभी प्रकार के आवश्यक ऐमिनो अम्ल नहीं मिलते। इस कारण इनको प्रोटीन स्त्राोतो के रूप में तिरस्कृत करने में कोर्इ औचित्य नहीं है। फिर भी प्रोटीन की गुणवत्ता को बढ़ाने की चार संभावनाएँ हैं।

पहली संभावना है कि कुछ पशु स्रोत का भोजन अर्थात पूर्ण प्रोटीन वाला भोजन खाया जाए और साथ में दूसरी या तीसरी श्रेणी प्रोटीन भी खाए जाएं, उदाहरण के लिए प्रत्येक आहार में कुछ मात्राा पशु स्रोत से प्राप्त प्रोटीन की मिला ली जाए।

दूसरी संभावना है कि कर्इ सबिजयों के मिश्रण से प्राप्य प्रोटीन खाएं जाए ताकि एक-दूसरे के अभाव को पूरा किया जा सके, उदाहरण के लिए अनाज और दाल का मिश्रण।

तीसरी संभावना यह है कि उन ऐमिनो अम्लों को जिनकी हमारे आहार में कमी है, उन्हें कृत्रिम (संश्लेषित) रूप में मिला लिया जाए।

चौथी संभावना यह है कि अंकुरण अथवा खमीर (किण्वन, उत्क्षोभण) कर लिया जाए, जैसे कि दालों या अनाजों को अंकुरित करके खाया जाए।

एक दूसरे के साथ मिलाकर प्रोटीन के अभाव को पूरा करने के लिए, उपयर्ुक्त पहले दो ढंगों को ष्प्रोटीन अनुपूरणष् कहा जाता है।

दैनिक आहारीय आवश्यकता(Recommended Dietary Allowance)

प्रोटीन की आवश्यकता भारतीयों की आहार में मिली-जुली वनस्पति प्रोटीन के रूप में दी गर्इ है। वयस्कों के लिए 1 ग्रामकिलो प्रोटीन की आवश्यकता होती है। भारतीयों के कद को देखते हुए पुरुषों का शारीरिक भार 60 कि. ग्राम व सित्रायों का शारीरिक भार 50 कि.ग्राम. प्रस्तावित किया गया है। विभिन्न आयु वर्गों की प्रोटीन आवश्यकता सारणी 2 में दी गइ है।

     

कमी (Deficiency)

प्रोटीन के अन्तर्ग्रहण में कमी अथवा निम्न स्तर प्रोटीन वाले आहार को लम्बे समय तक खाने से ऊतक संचिति में नि:शेषण होने लगता है और फिर रक्त प्रोटीन के स्तर में भी गिरावट आ जाती है। प्रोटीन अभावग्रस्तता प्राय: शैशवावस्था, प्रारमिभक बाल्यावस्था, गर्भावस्था अथवा स्तनपान कराने की अवस्था में होती है।

          

      चित्र : 2 मरास्मस से पीडि़त शिशु            चित्र:  3 क्वाशिओरकोर से पीडि़त शिशु

                                         

बच्चों में प्रोटीन की कमी से मरास्मस (सूखा रोग) और क्वाशिओरकोर (Kwashiorkor) हो जाता है। इससे वृद्धि अवरोध, जलजमाव और अतिसार आदि रोग हो जाते हैं। वयस्कों में प्रोटीन की कमी से शरीर भार में कमी, कमजोरी और रोग-प्रतिरोधक शकित में क्षीणता आ जाती है।       


कारबोज (Carbohydrates)

कारबोज साधारण चीनी होती है अथवा वे पदार्थ होते हैं, जिन्हें जल अपघटन द्वारा चीनी में परिवर्तित किया जा सकता है। ये कार्बन, हाइड्रोजन और आक्सीजन से मिलकर बनते हैं, जिनमें अंतिम दो आनुपातिक मिश्रण से जल बनाया जा सकता है और इसलिए इन्हें कार्बोहाइड्रेट कहा जाता है। इसका सामान्य सूत्रा Cn H2n On होता है।

कार्य (Functions)

कारबोज के प्रमुख कार्य -

1. ऊर्जा प्रदायक (Energy Giving) - कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा के बहुत ही सस्ते स्रोत हैं। एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट से चार कैलोरी मिलती हैं। ग्लूकोज़ ऊर्जा का मुख्य स्रोत हैं, इसलिए शरीर में सभी प्रकार के कार्बोहाइड्रेटों को ग्लूकोज़ में परिवर्तित किया जाता है और ऊत्तकाें की तात्कालिक आवश्यकताओं के लिए उपयोग किया जाता है। इसका थोड़ा भाग ग्लाइकोज़न के रूप में यकृत तथा मांसपेशियों में संग्रहीत किया जाता है और कुछ भाग ऊतकाें में वसा के रूप में संगृहीत किया जाता है।

2. प्रोटीन बचाने वाले कार्य (Protein Sparing Action) - शरीर में ऊर्जा के स्रोत के रूप में कार्बोहाइड्रेट का उपभोग अधिमानिक रूप में किया जाता है जबकि आहार में इनकी संपूर्ति समुचित रूप में की जाती है। इससे ऊत्तक निर्माण के लिए प्रोटीन की बचत होती है।

3. भोजन में स्वाद (Provide Taste to the Food) - अधिकांश कारबोज प्रकृति से मीठे होते हैं, इससे भोजन का स्वाद बढ़ जाता है।

4. वसा का पूर्ण उपचयन (For Complete Oxidation of Fats) - प्रत्येक आहार में कार्बोहाइड्रेट की कुल मात्राा अनिवार्य है, ताकि वसा का उपचयन सामान्य रूप में हो सके। यदि कार्बोहाइड्रेट को तीव्रता से प्रतिबनिधत कर दिया जाए, तो वसा का चयापचय तेजी से होने लगेगा और शरीर में इसके मध्यवर्ती उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो जाएगी जिसके परिणामस्वरूप केटोसिस की सिथति हो जाएगी।

5. लेक्टोस (Lactose)- अन्य चीनी पदार्थों की अपेक्षा यह कम घुलनशील होती है और इसलिए आंतों में यह पर्याप्त देर तक रहती है। इससे उन वांछित जीवाणुआें में वृद्धि होती है, जो विटामिन-बी काम्पलैक्स के संश्लेषण में सहायक होते हैं। ये कैलिशयम के उपयोग और अवशेषण में भी सहायता करते हैं।

6. आहार को परिमाण प्रदान करना (Provide bulk to the Diet) - यधपि सैलूलोज, हेमिसेलूलोज और पैकिटन शरीर को कोर्इ पोषक तत्त्व प्रदान नहीं करते, परन्तु इनके तन्तु आहार को परिमाण और आयतन प्रदान करने में सहायक होते हैं। ये अपचनीय पदार्थ अमाशय तथा आंतों के मार्गों की पुरस्सरण क्रियाओं को उत्तेजित करके आंतों में अवशिष्ट, उचिछष्ट पदार्थों के निष्कासन को सुसाध्य बनाते हैं और उनमें पानी को सोखने की गुणधर्मिता भी होती है, जिससे आंतों की अन्तर्वस्तु का आयतन बढ़ जाता है। आहार में फोक ;पिइतमद्ध की मात्राा बढ़ाने से शर्करा व कोलेस्ट्रोल कम होने के परिणाम मिले हैं। साबुत अनाज, दालों, हरी पत्तेदार सबिजयों व फल में प्रचुर मात्राा में फोक ;पिइतमद्ध मिलता है।

स्रोत (Food Source)

कार्बोहाइड्रेट के निम्न तीन स्रोत हैं -

1. वेतसार

2. चीनी

3.  सेलूलोज़।

1.  वेतसार(Starches) - चावल, गेहूँ, मक्का, साबूदाना आदि अनाजों, सभी बेकरी उत्पादनों, दाल, टमाटर, साबूदाना, रतालू और सूखे मेवों में मिलता है।

2.  चीनी - गन्ने, गुड़, शहद, जै़ली, सूखे मेवे, मिठार्इ और अंगूर आदि ताजे फलों में मिलती है।

3. सेलूलोज़ - अनाजों, फलों और सबिजयों के अस्तर में रेशेवाला गूदा होता है।         

प्रस्तावित दैनिक आहारीय आवश्यकता (Recommended Daily Dietary Allowance)

कार्बोहाइड्रेट के लिए किसी निशिचत मात्राा की प्रस्तावना नहीं की गर्इ है। फिर भी इससे कुल ऊर्जा का 60-70 प्रति शत मिलना चाहिए। एक वयस्क व्यकित के दैनिक आहार में 40 ग्राम फोक (fibre) अवश्य होना चाहिए। आहार में फोक (fibre) की कमी से कब्ज़ व आंत का कैंसर हो सकता है।

कमी (Deficiency)

यदि आहार में कार्बोहाइड्रट की कमी होती है तो ऊर्जा आवश्यकताओं की संपूर्ति नहीं होती। इससे व्यकित कमजोरी महसूस करता है। मनुष्य की कार्यक्षमता घट जाती है। मनुष्य का शरीर भार भी मानक भार से कम हो जाता है। बच्चों में वृद्धि धीमे होती है। इससे केटोसिस (Ketosis) रोग के लक्षण भी विकसित होने लगते हैं।

अधिकता (Excess)

यदि ज्यादा कारबोज खायें तो वे शरीर में वसा के रूप में संचित हो जाते हैं, जिससे मोटापा, मधुमेह तथा हृदय रोग हो जाते हैं।       

 वसा या लिपिड (Fats & Lipids)

वसा हमारे आहार का मुख्य घटक है और शरीर में अनेक कार्य करता है। इन्हें कार्बन, हाइड्रेजन और आक्सीजन का जैविक यौगिक कहा जाता है। ये कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होते हैं, क्योंकि इनमें आक्सीजन का अनुपात बहुत कम होता है और कार्बन तथा आक्सीजन का अनुपात बहुत ज्यादा होता है। वसा का संघटन वसा अम्लों तथा गिलसरोल से होता है। इन वसात्मक अम्लों को संतृप्त और असंतृप्त रूप में वर्गीकृत किया जाता है। असंतृप्त वसाअम्ल कमरे के तापमान में तरल होते हैं। सामान्यत: वनस्पति तेलों में असंतृप्त वसा अम्लों का और पशु वसा में संतृप्त अम्लों का आधिक्य होता है।

आहार में वसा दो प्रकार की होती है : दृश्य वसा व अदृश्य वसा। पशुजन्य स्रोत से मिलने वाली वसा जैसे मक्खन, घी व वनस्पति स्रोत से मिलने वाली वसा जैसे वनस्पति तेल (मूंगफली, सरसों इत्यादि का तेल) दृश्य वसा का उदाहरण है।

अदृश्य वसा सभी भोज्य पदार्थों में थोड़ी मात्राा में उपलब्ध रहती है। जैसे दाल, अनाज, सूखे मेवे, दूध, अण्डा, मांस इत्यादि। कुल वसा दृश्य वसा व अदृश्य वसा को मिलाकर बतार्इ जाती है और हमें आवश्यक वसा-अम्ल प्रदान करती है।

अनिवार्य वसा अम्ल(Essential Fatty Acids)

कुछ वसा अम्लों का आहार में होना अनिवार्य है, क्योंकि इन्हें शरीर में संश्लेषित नहीं किया जा सकता। ये बहु-असंतृप्त वसा अम्ल हैं, लिनोलेइक, लिनोलेनिक और अराकिडोनिक अम्ल, और इनका वर्गीकरण ''अनिवार्य वसा अम्ल के रूप में किया जाता है। चयापचय तथा त्वचा के सामान्य स्वास्थ्य के अनुरक्षण के लिए इनकी आवश्यकता होती है।

इसलिए समुचित प्रकार के वसा पदार्थ जिनमें अनिवार्य वसा अम्लों का आधिक्य हो, जैसे मूंगफली, बिनौला, मक्का और सूरजमुखी के तेल, हमारे आहार में अवश्य होनी चाहिए। पशु वसा में अनिवार्य वसा अम्ल बहुत कम होते हैं।

वास्तव में हमें केवल लिनोलेइक अम्ल की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि दूसरे दो अम्लों को शरीर में उसी से अर्थात लिनोलेइक अम्ल से ही संश्लेषित किया जा सकता है।

कार्य(Functions)

वसा के कार्य निम्न प्रकार हैं -

1. शकितप्रदायक - वसा शकित का सांदि्रत स्रोत है। एक ग्राम वसा से 9 कैलोरी मिलती है। कारबोज की तुलना में इससे ऊर्जा ज्यादा मात्राा में ही नहीं मिलती, बलिक तीव्र गति से भी मिलती है।

2. वसा प्रोटीन को बचाकर रखने का कार्य भी उसी प्रकार करता है, जैसे कार्बोहाइड्रेट करते हैं।

3. शरीर की आवश्यकताआें के लिए ऊर्जा का भंडारण - वास्तव में वसा ऊतकों में केवल वसा का भंडारण उसी रूप में नहीं होता, बलिक तत्काल उपयोग न किए गए ग्लूकोज और ऐमीनों अम्ल की कुछ मात्राा का भी शरीर में वसा के रूप में संश्लेषण और भंडारण किया जाता है। इसी से वसा ऊतकाें के भंडार से ऊर्जा निरन्तर उपलब्ध होती रहती है।

4. रोधन और विस्तृति - वसा की अवस्त्वक परत एक प्रभावी रोधक है, और यह सर्दियों में शरीर के तापमान के क्षय को कम करती है। इस प्रकार यह शरीर के तापमान को नियमित करती हैं। शरीरांगों की वसा की भरार्इ से महत्त्वपूर्ण अंगों जैसे कि गुदो± को किसी प्रकार की शारीरिक क्षति से रक्षा करने में भी इससे सहायता मिलती है।

5.आवश्यक वसा अम्लों का संभरण - वसा कुछ वसा अम्लों का स्रोत भी है जो चयापचय तथा सामान्य त्वचा के अनुरक्षण के लिए आवश्यक है।

6. वसा से शरीर में वसात्मक घुलनशील विटामिनों के अवशोषण और परिवहन में भी सहायता मिलती है।

7. वसा शरीर के विभिन्न अंगों के लिए विशेष रूप से पाचन संस्थान मार्ग के अंगों के लिए स्नेहक का भी कार्य करती है।

8. संतृपित मूल्यवत्ता - वसा अमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के स्राव को कम करती है। इससे आहार वहां ज्यादा देर तक रहता है और भूख की इच्छा में देर होती है।

9. वसा से आहार के स्वाद में भी वृद्धि होती है इससे पकाए गए भोजन में स्वाद बढ़ जाता है।    

 स्रोत (Food Sources)

आहार वसा दो स्रोतों से मिलती है -

1. पशु स्रोत - इसमें मक्खन, घी, चर्बी, संपूर्ण दूघ और इसके उत्पादन, मांस, मछली, मुर्गी और अण्डा समिमलित है।

2. वनस्पति स्रोत - इनमें वनस्पति तेल-मूंगफली, अदरक, सरसों, बिनौला, सूरजमुखी (Sunflower) और गोले आदि के तेल समिमलित हैं। इनमें जमी हुर्इ वसा, कृत्रिम मक्खन, गिरी और काजू, अखरोट, मूंगफली, बादाम, अदरक और सरसों आदि तिलहनों के बीज भी समिमलित हैं।

प्रस्तावित दैनिक आहारीय आवश्यकता (Recmmended Daily Dietary Allowances)

वसा की आवश्यकता मनुष्य की ऊर्जा की आवश्यकता पर निर्भर होती है। शारीरिक दृषिटकोण से वसा अन्तर्ग्रहण में पर्याप्त भिन्नता हो सकती है, और फिर भी अच्छा स्वास्थ्य अनुरक्षित किया जा सकता है। सामान्यत: कुल ऊर्जा का 15-20 प्रतिशत वसा के द्वारा मिलना चाहिए।

कमी (Deficiency)

कार्बोहाइड्रेट के अभाव की भांति ही, ऊर्जा आवश्यकताओं की तब तक संपूर्ति नहीं होगी, जब तक आहार में वसा पदार्थों की कमी है। इसी कारण भारन्यूनता, कमजोरी तथा कार्यक्षमता में कमी होती है। इसके अतिरिक्त घुलनशील वसा विटामिन और अनिवार्य वसा अम्लों में भी कमी आ जाएगी। इसकी कमी से त्वचा, आंख और हडिडयों से

सम्बनिधत रोग होते हैं। वसा की कमी से आवश्यक वसाअम्ल की भी कमी हो जाती है। ये वसा अम्ल हमारे शरीर की अनेक चयापचयी गतिविधियों में सहायक होते हैं। इसकी कमी से त्वचा मोटी और खुरदरी हो जाती है तथा शरीर पर सुर्इ के आकार के दाने उभर जाते हैं।

अधिकता (Excess)

यदि ज्यादा वसा का अन्तग्र्रहण किया जाएगा तो इससे मोटापा, पाचन संस्थान अव्यवस्था और मधुमेह तथा हृदय-रोगों की प्रवृत्ति में वृद्धि होगी। वसा की मात्राा अधिक लेने से रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्राा बढ़ जाती है। यह कोलेस्ट्रोल धीरे-धीरे रक्त धमनियों में जम जाता है। रक्त धमनियां संकरी हो जाती हैं और हृदय सम्बन्धी रोग होने का भय रहता है।

सहायक पुस्तके

1.आहार एवं पोषण विज्ञान, एजुकेशन, प्लानिंग ग्रुप द्वारा।

2. पोषण एवं आहार विज्ञान के मूल सिद्धान्त, श्रीमती एस.पी. सुखिया।

3.Normal and Therapeutic Nutrition; Robinson and Lawler.

4. आहार एवं पोषाहार डा. सत्यदेव आर्या।


4 पाठ 3 पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान – (II)


पाठ 3

पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान – (II)

(Elementary Knowledge of Nutrients – II)

विटामिन

(Vitamins)

Audio

'विटामिन' शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन शब्द ृवाइटल अमीनश् से हुर्इ है। वाइटल अमीन ;टपजंस ंउपदमद्ध शब्द का अर्थ है आवश्यक नाइट्रोजनी मिश्रण। इस पारिभाषिक शब्द का निर्माण 'फंक' नामक वैज्ञानिक ने किया था, जो पौलैंड का निवासी था। इसने यह नाम उस पदार्थ को दिया था, जो ृबेरी-बेरीश् तत्त्व का प्रतिरोधक होता है। बाद मे अंग्रेजी का अनितम अक्षर 'इ' निकाल दिया और 'विटामिन' शब्द का सृजन हुआ। लेकिन वैज्ञानिकों को जब अधिक विटामिनों का पता लगा, तब यह अनुभव किया गया कि हालांकि सभी विटामिन नाइट्रोजनी मिश्रण नहीं होते हं', लेकिन ये सभी विटामिन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक तत्त्व हैं।

विटामिन अनेक रासायनिक पदाथोर्ं का मिश्रण होते हंै। हमारे शरीर को इनकी जरूरत बहुत थोड़ी मात्राा में होती है। ये हमारे शरीर में ऊर्जा उत्पन्न नहीं करते हैं। किन्तु ये हमारे शरीर की विभिन्न प्रक्रियाआें के लिए उत्प्रेरक का कार्य करते है। चूंकि ये शरीर में पर्याप्त मात्राा में नहीं तैयार किये जा सकते, अत: इनकी पूत्र्ति आहार के

माध्यम से करनी आवश्यक होती है। मोटे तौर पर विटामिनों को दो वगोर्ं में बांटा जा सकता है।

1.वसा में घुलनशील जैसे विटामिन 'ए'  'डी' 'इ' और 'के' विटामिन

2.जल में घुलनशील जैसे विटामिन 'बी'  और 'सी' वर्ग के विटामिन


4.1 विटामिन 'ए'

विटामिन 'ए'


विटामिन 'ए' का पता उन्नीसवीं शताब्दी के आरमिभक वर्षों में डा. मैक कालम और डेविस ने लगाया था। डा. मैक कालम ने अपने प्रयोग चूहों पर किए, और उन्हें यह पता लगा कि जब कुछ चूहों को मक्खन और अंडे की जर्दी मिले हुए खाने पर रखा जाता है, तब ये चूहे उन चूहों की तुलना में काफी अधिक âष्ट-पुष्ट होते हंै, जिन्हें केवल सूअर की चर्बी और सब्जी पर रखा गया था। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला, कि मक्खन और अंडे की जर्दी में ऐसे खाध तत्त्व होते हंै, जो सूअर की चर्बी और सबिजयों में नहीं होते हैं, उन्होंने वर्ष 1913 में मक्खन और अंडे की जर्दी से विटामिन'ए' को ढूंढ निकाला।

रासायनिक विश्लेषण (Chemistry)

विटामिन'ए' कर्इ रूपाें में जैसे रेटिनोल (Retinol) रोटिनाल(Retinal) और रेटिनोइक एसिड (Retinoic acid) ंबपकद्ध आदि रूपों में मिलता है। इन सभी रूपों को विटामिन ृएश् कहा जा सकता है। विटामिन ृएश् अपने शु़द्ध रूप मेे रवेदार मिश्रण होता है, जिसका रंग हल्का-पीला होता है। यह सहज रूप में जानवरों में पाया जाता है। यह वसा में या वसायुä घुलनशील मिश्रण में तो घुल सकता है, लेकिन पानी में नहीं घुल सकता। यह ताप, अम्ल, व क्षार मे अपेक्षाÑत सिथर रहता है। यह आसानी से आक्सीÑत हो जाता है, तथा परा-बैंगनी विकिरण द्वारा शीघ्रता से नष्ट हो जाता है।

सभी प्रकार के विटामिन'ए' का मूलस्रोत कैरोटीन है, जो पौधो में संश्लेषित होता है। पशु और मनुष्य दोनों ही अपने भोजन से कुछ न कुछ विटामिन ृएश् प्राप्त करते है। कैरोटीन भी रवेदार होते हैं, लेकिन इनका रंग गहरा लाल होता है। इन्हें विटामिन ृएश् का प्रारंमिभक रूप कहते हैं। पौषिटक आहार में कैरोटिन के एल्फा, बीटा व गामा अणुओं का बड़ा महत्त्व होता है। बीटा कैरोटीन विटामिन'ए' के दो अणुओं का उत्पादन करता है।

कार्य (Function)

1. कम रोशनी में आसानी से देखने के लिए विटामिन ृएश् जरूरी होता है। रेटिना में दो प्रकार की कोशिकाएं होती हंै- राडस व कोन्स, जिसमें से रोडस कम रोशनी देखने में सहायक होता है वे कोन्स तेज रोशनी में। रोडस में उपसिथत रोडापिसन एक प्रकार के प्रोटीन व विटामिन'ए' के संयोजन से बनता है। रोडोपिसन तेज रोशनी में इन तत्त्वों में विघटित हो जाता है व कम रोशनी में ये तत्त्व-विटामिन'ए' व प्रोटीन दोबारा संघटित होकर रोडोपिसन बनाते है। यह रोडोपिसन हमें कम रोशनी में देखने में मदद करता है।

2. शरीर में श्लेषिमक झिल्ली (इपिथेलियम) को एक रूप में बनाए रखने, खासतौर से उस झिल्ली को एकसम बनाए  रखने के लिए विटामिन ृएश् जरूरी होता है। जो हमारी आंखाें, मुंह, श्वसन, पाचन संस्थान और जननेनिæय तंत्रा में होती है। इस झिल्ली के होने से शरीर जीवाणुओं मे प्रवेश से बचे रहते हैं।

3. विटामिन ृएश् हमारे शरीर के ढ़ांचे और हमारे दांंतों के विकास केे लिए जरूरी होता है।

4. विटामिन ृएश् हमारे शरीर को विभिन्न रोगों से बचाये रखने में भी सहायता करता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

विटामिन ृएश् मुख्यत: जीवाें से मिलने वाले भोजन से मिलता है जैसे - ताजा मछली, तेल आदि। यह दूध मक्खन, पनीर, कलेजी और अंडे की जर्दी में भी पर्याप्त मात्राा में मिलता है।

विटामिन ृएश् वनस्पतियों में मिलने वाले भोजन में नहीं होता लेकिन इसका प्र्रारमिभक रूप, कैरोटीन खाध पदार्थों में मिल जाता है, जो शरीर में विटामिन ृएश् बन जाता है। कैरोटीन ऐसे सभी पौधों में होता है जिनकी पत्तियों तथा फलों का रंग हरा व पीला होता है। पौधों की पत्ती की हरियाली उसमें प्राप्त कैरोटीन की मात्राा पर निर्भर करती है।

हरी पत्ती वाली सबिजयां-पालक, शलगम की पत्तियां चुकन्दर की पत्तियां, धनिया मीठा नीम आदि।

पीले रंग की सबिजयां- गाजर, शकरकंद, सीताफल।

पीले रंग का फल - पपीता, आम, खुमानी, आड़ू।

प्रस्तावित दैनिक आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowances)

वयस्कों के लिए विटामिन ृएश् (रेटिनाल) की प्रस्तावित मात्राा 600 माइक्रो ग्रा. है। बीटा कैरोटीन के रूप में यह आवश्यकता 2400 माइक्रो ग्रा. है। बीटा कैरोटीन और रेटिनाल को परस्पर परिवर्तित करने के लिए निम्न फामर्ूला प्रयोग मेें लाया जाता है।

1 माइक्रो ग्राम बीटा कैरोटीन = 0.25 माइक्रो ग्रा. रेटिनाल

यदि आहार मे रेटिनाल और बीटा कैरोटीन दोनो हैं तो विटामिन ृएश् की मात्राा निम्न तरीके से निकाली जाती है।

(अ) रेटिनाल मात्राा (माइक्रो ग्रा.) = माइक्रो ग्रा. रेटिनाल+माइक्रो ग्रा. वीटा कैरोटीन ´ 0.25

(यदि वीटा कैरोटीन और रेटीनाल दोनों माइक्रो ग्रा. में दिये हैैं)

           

      कमी (Deficiency)

(1) विटामिन ृएश् की कमी से आंख मे होने वाले परिवर्तनों को जीरोप्थलमिया ;ग्मतवचीजींसउपंद्ध कहते हैं। जीरोप्थलमिया के कारण अंधापन हमारे देश में एक प्रमुख सामाजिक स्वास्थ्य समस्या है।

विटामिन ृएश् की कमी का सबसे बड़ा लक्षण रतौंधी ;छपहीज इसपदकदमेेद्ध है, जिससे व्यä किे शाम के बाद या कम रोशनी में दिखार्इ देना बंद हो जाता है। इसके पश्चात कनजक्टाइवल जिंरोसिस ;ब्वदरमबजपअंस गमतवेपेद्ध हो जाता है जिसमे ब्वदरमबजपअं सूख जाती है। (चित्रा 1) इसके अतिरिä ब्वदरमबजपअं में सूखे झाग जैसे तिकोने धब्बे नज़र आते है, जिन्हें बाइटांट स्पाट कहते हैं ;ठपजवजेचवजेद्ध (चित्रा-2) तत्पश्चात कार्निया सूखा, चमकदार जैसा दिखार्इ देता है। इस सिथति को कार्निया जि़रोसिस ;ब्वतदमंस गमतवेपेद्ध कहते हैं (चित्रा-3)। अंत में किरेटोमलेशिया ;ज्ञमतंजवउंसंबपंद्ध (चित्रा-4) की सिथति उत्पन्न हो जाती है, जिसमें कार्निया नरम पड़ जाता है और गल जाता है। इस सिथति के पश्चात उपचार से भी व्यä किी आंख को नहीं बचाया जा सकता है और व्यä अिन्धा हो जाता है।

(2) विटामिन ृएश् की कमी से श्लेषिमक झिल्ली की कार्यक्षमता कम और केराटीनीकरण हो जाता है। इससे आंखों, नासिका, रंध्र, मध्य कर्ण, फेरिंक्स, मुंह, श्वास मार्ग, फेफड़ा और जननेनिæय मे संक्रामक रोग होने की भी संभावना बढ़ जाती है।

(3) इस विटामिन की कमी होने का सबसे खास लक्षण त्वचा का सूखना तथा धब्बेदार होना है। इस प्रकार की त्वचा को टोड त्वचा ;ज्वंक ैापदद्ध कहते हैं।


4.2 विटामिन डी

विटामिन डी


शुद्ध विटामिन डी को रवेदार पदार्थ के रूप में सन 1930 मे ढंढ़ निकाला गया था। इसे कैल्सीफेरोल कहते है। इसे रिकेटस विरोधीश् विटामिन भी कहा जाता था।

रासायनिक विश्लेषण (Chemistry & Characteristics)

विटामिन डी स्टेरोल मिश्रण का एक समूह है, जिसमें रेकीटिक प्रतिरोधी तत्त्व होते हैं। इनमें से केवल दो का

संबंध पोषण विज्ञान से है (1) विटामिन डी2 या एर्गोकैल्सीफेरोल - यह पौधों में मिलता है और (2) विटामिन डी3 या कोलेेकैल्सीफेरोल - यह पशुओं की कोशिकाओं में मिलता है तथा पराबैंगनी प्रकाश के परिमाणस्वरूप त्वचा में उत्पन्न होता है। शुद्ध विटामिन डी श्वेत रवेदार मिश्रण होता है। यह वसा तथा वसा विलायकों में घुलनशील है, लेकिन यह पानी में नहीं घुल सकता। यह ताप, क्षार, और आक्सीजन में सिथर रहते हैं।

कार्य (Function)

1. विटामिन डी से हमारी अंतडि़याें से कैलिशयम और फास्फोरस का अवशोषण नियंत्रित होता है। इससे हमारी हडिडयाँ और दांत मजबूूत बनते है। अनुमान किया जाता है कि यह विटामिन हमारी अंतडि़यों की झिल्ली को प्रभावित करती है, जिससे कैलिशयम और फास्फोरस का अवशोषण अधिक होता है। इस प्रकार हमारी हडिडयों व दांतो के विकास के लिए विटामिन डी की जरूरत होती है।

2. विटामिन डी क्षारीय फास्फोरस के एंजाइम को नियंत्रित करता है, जिससे हमारे शरीर मे फास्फेट निस्सरण नियंत्रित होता है।

खाध स्त्रात (Food Sources)

विटामिन डी केवल पशुजन्य खाध पदाथोर्ं में मिलता है। यह सबसे अधिक मछली के तेल में मिलता है। यह कलेजी, अंडे तथा मक्खन में भी पर्याप्त मात्राा में मिलता है। यह थोड़े बहुत ताजे दूध से बने पदाथोर्ं में भी मिलता है।

विटामिन डी का दूसरा स्त्राोत है सूरज की रोशनी। सूरज की रोशनी की परा बैंगनी किरणों से विटामिन ृडीश् का आधा स्वरूप जो हमारी त्वचा में पहले से ही मौजूद होता है (7-डिहाइड्रोकोलेस्ट्राल), सक्रिय हो उठता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowances)

हमारे शरीर का कितनी मात्राा मे विटामिन डी आवश्यक है, यह अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं हो सकता। फिलहाल विटामिन डी की 200 आर्इ यू, मात्राा शरीर के लिए आवश्यक मानी जाती है। अगर हम अपने शरीर को थोड़े देर धूप में दिखाये, तब इस विटामिन की कमी को पूरा किया जा सकता है।

           

 चित्र:  5 रिकेटी रोसरी              

                                         

  चित्र 6 : मुड़े टखने         

      कमी (Deficiency)

बच्चों को विटामिन ृडीश् की कमी होने से रिकेटस ;त्पबामजमेद्ध रोग हो जाता है। यह एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें कैलिशयम और फास्फोरस की मात्राा में हमेशा कमी रहती है। इससे हडिडयों का बनना बंद हो जाता है, और जो हडिडयां बन गर्इ होती है, उनमें खनिजतत्त्व क्षीण होना शुरू हो जाते हैं। इससे हमारे अंगों का रूप विकृत होने लगता है, उनमें सूजन आ जाती है, और पसलियां मुड़ने लगती हैं। इस सिथति को ृरेकोटिक रोजरीश् (चित्रा 5) कहते हैं। जो हडिडयाँ लम्बी होती हैं वे किनारे से चौड़ी होने लगती हैं और सीधी रहने के बजाय मुड़ जाती हैं। इससे घुटने मुड़ जाते हैं, टखने झुक जाते हैं। (चित्रा 6) रीढ़ की हडडी झुककर धनुषाकार हो जाती है। इस विटामिन की कमी होने का एक और लक्षण यह है कि, खासतौर पर शिशुओं की खोपड़ी की हडडी मुलायम पड़ने लगती है और फोन्टनेला की हडिडयों में खाली जगह का भरना रूक जाता है।

वयस्कों में इस विटामिन की कमी से असिथ मृदता ;वेजमवउंसंबपंद्ध नामक रोग हो जाता है, जिससे हडिडयाँ जर्जर हो जाती हैं तथा आसानी से टूट जाती हैं।


4.3 विटामिन इ

विटामिन इ


र्इवान और बिशप ने यह प्रतिपादित किया है, कि चूहों में प्रजनन शä किे लिए वसा में घुलनशील एक पदार्थ का होना आवश्यक होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि इस तत्त्व का अर्थात ृविटामिन र्इश् का अभाव होने पर चूहों में प्रजनन की शä सिमाप्त हो जाती है।

रासायनिक विश्लेषण (Chemistry)

विटामिन र्इ कुछ विशेष रासायनिक तत्त्वों में होता है, जिन्हें ृटोकोफेरोल्सश् कहते हैं। अल्फा टोकोफेरोल एक ऐसा मिश्रण होता है। जिसमें सबसे अधिक विटामिन ृर्इश् पाया जाता है। यह विटामिन उच्च ताप और क्षार में तो नष्ट नहीं होता, लेकिन खटटी वसा, सीसा, लौह लवणों की उपसिथति में यह आक्सीकृत होने लगता है। इसी प्रकार बैंगनी प्रकाश, क्षार और आक्सीजन की उपसिथति में इसका विघटन होने लगता है।

कार्य (Function)

(1) विटामिन इ का मुख्य कार्य आक्सीजन में प्रेरक के रूप में कार्य करना है। यह आक्सीजन के साथ घुल-मिलकर अंतडि़यों में विटामिन ए आक्सीकरण नहीं होने देता, और विटामिन ए बना रहता है।

(2) विटामिन इ असंतृप्त वसा अम्लों का कम से कम आक्सीकरण होने देता है और इस प्रकार की झिलिलयों को यथावत बनाए रखता है।

(3) विटामिन इ हडिडयों की भुजा में लाल रä कणिकाओं के सृजन में सहायक होता है।

(4) यह Q नामक सह-एंजाइम के संश्लेषण में कार्बोहाइड्रेड और वसा से ऊर्जा के प्राप्त होने में सहायक होता है।

(5) कुछ पशुओं में उनकी प्रजनन शä बिनाए रखने के लिए विटामिन इ आवश्यक पाया गया है।

प्रापित साधन (Food Sources)

विटामिन इ चौकर ;ीमंज हमतउद्ध के तेल और बिनौले के तेल में बहुत अधिक मात्राा में मिलता है। गहरे रंग की पत्तियों, गिरीदार फलों, फलियों और दालों में भी विटामिन ृर्इश् पर्याप्त मात्राा में मिलता है। हालांकि पशुजन्य खाध पदाथो± में विटामिन ृर्इश् कम मात्राा में मिलता है, लेकिन कलेजी, जिगर, दूध, अंडे में यह काफी मात्राा में मिलता है। बच्चों को अपनी मां के दूध में विटामिन ृर्इश् पर्याप्त मात्राा में मिलता है, लेकिन गाय के दूध मेें यह कम मात्राा में होता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

0.8 मि.ग्राम विटामिन ृर्इश् प्रति ग्राम बहुअसंतृप्त वसा अम्ल के अनुसार आवश्यकता तय की जा सकती है। वनस्पतियों, तेल व वनस्पतियों को भोजन में लेने से हमारे शरीर को विटामिन ृर्इश् की पर्याप्त मात्राा मिल जाती है और सामान्यतया इसकी कमी नहीं रहती है।  

      कमी (Deficiency)

विटामिन ृर्इश् की कमी होने से हमारे रä में लाल कणिकाओं के अधिक टूटने से संख्या कम हो जाती है, तथा हम ृअनीमियाश् नामक रोग के शिकार हो जाते हैं। समय से पूर्व पैदा हुए बच्चों में टोकोफेरोल की मात्राा कम रहती है। पशुओं की कुछ किस्में ऐसी होती हैं जिनमें विटामिन ृर्इश् की कमी होने से उनकी प्रजनन शä सिमाप्त हो जाती है। मनुष्यों मेें विटामिन ृर्इश् की कमी सामान्यतया कम देखी जाती है।



4.4 विटामिन के

विटामिन के


डा. डाम ;1935द्ध ने यह खोज की कि चूहों को भारी रäसाव होने पर मरने से तभी बचाया जा सकता है, जब उसके खून में सामान्य रूप से जमने के गुण अधिक से अधिक रहें।

प्रÑति में विटामिन के दो रूपों में मिलता है के1 अल्फा अल्फा में और के2 सूक्ष्म जीवाणुओं के संश्लेषण में मिलता है। ये वसा मेंं घुल जाते हैं। ये ताप से नष्ट नहीं होते लेकिन क्षार, तेज अम्ल, आक्सीकरण और प्रकाश में टिक नहीं पाते।

कार्य (Function)

(1) विटामिन के की जरूरत प्रोथ्रोमिबन और जमने वाले अन्य प्रोटीनों के संबंध में जिगर की होती है।

(2) विटामिन के संभवत: उत्तकों में आक्सीकारक फास्फेटेशन में भी सहायक होता है।

प्रापित साधन (Food Sources)

विटामिन के मुख्यत: पौधों में मिलता है। यह पालक, बन्दगोभी, फूलगो़भी जैसी सबिजयों के पत्तों में यह प्रचुर मात्राा में मिलता है। अनाज, फलों और अन्य सबिजयों में यह कम मात्राा में मिलता है। पशुजन्य खाध पदार्थों में सूअर का जिगर ही प्रमुख साधन है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

अंतडि़यों में संश्लेषित होने और भोजन मे विविधता के कारण इसकी दैनिक मात्राा के बारे में कुछ भी प्रस्तावित करना संभव नहीं है। भोजन में विटामिन ृकेश् की कमी की कोर्इ समस्या नहीं है।

कमी (Deficiency)

इस विटामिन की कमी अधिकतर दोषपूर्ण अवशोषण के कारण, या जिगर की खराबी से होता है, जिससे प्रोथ्रोमिबन का संश्लेषण प्रभावित होता है। भोजन मेें कमी से ये शायद ही होता है। रä में प्रोथ्रोमिबन की कम मात्राा और खून न जमने के अन्य कारणों के परिमाणस्वरूप अधिक रäसाव होने लगता है। समय से पूर्व जन्मे बच्चों, या जिन बच्चों के शरीर में आक्सीजन की मात्राा पर्याप्त नहीं रहती, उनमें और ऐसी माताओं में जो एंटीकोएगुलेंट ;ंदजपबवंहनसंदजद्ध दवाइयां लेती है, इस विटामिन की कमी सबसे अधिक रहती है।

विटामिन ृबीश् समूह (Vitamin B-Complex)

सन 1911 के फंक ने विटामिन नाम ऐसे तत्त्व को दिया, जिसे उसने समझा कि, इसमें बेरी-बेरी रोग का निवारण किया जा सकता है। मैôालम और डेविस ने पानी में घुलनशील ृबीश् विटामिन, ऐसे सार तत्त्वों को दिया जो बेरी-बेरी रोग को ठीक करता है।

लेकिन इस बात की जानकारी जल्दी ही हो गर्इ कि विटामिन ृबीश् कोर्इ एक तत्त्व नहीं है, बलिक अनेक तत्त्वों का समूह होता है। इसलिए, हम आज इसे विटामिन बी-समूह नाम से पुकारते हैं। इनमें से कुछ का परिचय इसी अध्याय में दिया गया है।


4.5 थायमिन या विटामिन बी1

थायमिन या विटामिन बी1

(Thiamine or Vitamin B1)

रासायनिक विश्लेषण और लक्षण (Chemistry and Characteristics)

थायमिन हाइड्रोक्लोराइड सफेद रवेदार तत्त्व होता है। इसमें खमीर की हल्की सी गंध होती है, और नमकीन गिरी जैसी स्वाद होता है। यह पानी में जल्दी ही घुल जाता है, लेकिन यह वसा या वसायुä तत्त्वों मेंं नहीं घुल पाता। यह सामान्य या क्षारीय घोल के ताप से जल्दी ही नष्ट हो जाता है। अम्लीय माध्यम में यह 120व् से. की गर्मी में बना रह सकता है।

कार्य (Function)

थायमिन एक एंजाइम के साथ मिलकर सह-एन्जाइम का रूप धारण कर लेता है। यह सह-एन्जाइम आक्सीकरण की प्रक्रिया के रूप में काम करता है।

(1) यह शरीर में कार्बोहाइड्रेड के उपयोग के लिए आवश्यक होता है। इसकी कमी होने पर ऊतकों और शरीर के जल में पाइरूविक अम्ल ;च्लतनअपब ंबपकद्ध और लैकिटक अम्ल ;स्ंबजपब ंबपकद्ध का संचय होने लगता है।

(2) अच्छी भूख और पाचनशä किे लिए थायमिन की भी आवश्यकता होती है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

थायमिन थोड़ा बहुत, सभी प्रकार के खाध पदाथो± में मिलता है। यह मुख्यत: सूखे खमीर, सभी प्रकार के अनाज और दालों, तिलहन और गिरी वाली खाध पदार्थों, विशेषकर मूंगफली में मिलता है। यह मछली, अंडे, सब्जी और फलों में अपेक्षाÑत कम मिलता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

यह प्रतिदिन 0. 5 मिलीग्राम/ 1000 किलो कैलोरी आवश्यक है।

कमी (Deficiency)

थायमिन की कमी होने से बेरी-बेरी (Beri-Beri) और वरनिकस एनसेफेलोपेथी (Wernicks Encephalopathy) नामक रोग हो जाता है। बेरी-बेरी तीन रूपों में पाया जाता है, सूखी, आर्æ और शैशव बेरी-बेरी। थोड़ी सी कमी होने पर भूख खत्म हो जाती है, टखने और घुटने के मुड़ने से कष्ट होने लगता है तथा सनसनाहट पैदा हो जाती है।


4.6 रार्इबोफलेविन या विटामिन बी2

रार्इबोफलेविन या विटामिन बी2

(Riboflavin or Vitamin B2)

रासायनिक विश्लेषण और लक्षण (Chemistry and characteristics)

संक्षेप में यह विटामिन स्वाद में खटटा, नारंगी, रंग और गन्धहीन होता है, तथा इसके रवे सुर्इ की तरह नुकीले होते हैं। यह पानी में कुछ कम घुलता है तथा इसमें से हरा तत्त्व लिए पीली आभा दिखार्इ देने लगती है। यह अम्ल में उबालने पर यथावत रहता है, किंतु यदि इसे क्षार के घोल में डाल, ताप पर रखा जाए, तब ये शीघ्र ही विघटित होने लगता है। यह रोशनी में भी नष्ट हो जाता है।

कार्य (Function)

थायमिन की तरह राइबोफलेविन भी एन्जाइम से संयुक्त हो जाता है, तथा ऊर्जा के उत्पन्न होने के लिए ऊत्तकों के आक्सीकरण में सहायक होता है। इस प्रकार यह प्रोटीन, वसा, व कार्बोहाइड्रेड के चयापचय में सहायक होता है।

प्रापित साधन (Food Sources)

यह सूखे हुए खमीर में सबसे अधिक मिलता है। यह दूध, कलेजी, मांस, अंडे, हरी पत्ती वाली सबिजयोें में भी अच्छी मात्राा में मिलता है। अनाज और फलों मेंं यह अधिक नही मिलता, लेकिन चूंकि हम काफी मात्राा में अनाज और फलों का भोजन करते है, इसलिए यह विटामिन इसी प्रकार के भारतीय भोजन में मिल जाता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा(Recommended Daily Dietary Allowances)

यह प्रतिदिन 0.6 मिलीग्राम/ 1000 किलो कैलोरी हमारे लिए आवश्यक होता है।

कमी (Deficiency)

इसकी कमी होने से जो बिमारियाँ होती हैं उनमें एराइबोफलेवीनोसिस (Ariboflavinosis)नामक बीमारी ऐसी है जो प्राय: देखी गइ है। इसकी कमी होने के कोइ विशिष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन कुछ ऐसे लक्षण हैं जिससे इनकी कमी का पता लग जाता है। इनमें कुछ ये हैं: (1) मुंह के कोनों का फटना (Angular Stomatitis), होंठों का फटकर लाल होना (2) काइलोसिस (Chielosis), (3) जीभ का लाल पड़ना (Stomatitis) (4) आंख का लाल हो जाना तथा इनमें जलन का अनुभव होना (5) गुप्तांगों की त्वचा का सूजन (Soortal or vulva determines)


4.7 निआसिन अथवा निकोटिनिक अम्ल

निआसिन अथवा निकोटिनिक अम्ल

(Niacin or Nicotinic acid)


रासायनिक विश्लेषण और लक्षण (Chemistry and Characteristics)

यह सफेद रूर्इ की नोक जैसे, तीखे स्वाद वाले रवे के रूप में मिलता है। यह गरम पानी में सामान्यतया: घुल जाता है, लेकिन ठंडे पानी में थोड़ी ही मात्राा में ही घुलता है। यह ताप, क्षार, अम्ल, प्रकाश और आक्सीकरण में सिथर रहता है। वस्तुत: यह सबसे स्थार्इ विटामिन है। निआसिन दो रूपोंं में मिलता है, निआसिन और पूर्वगामी निआसिन अर्थात टि्रप्टोफेन ;ज्तलचजवचींदद्ध। मनुष्य के शरीर में 50-60 मिलीग्राम टि्रप्टोफेन से 1.0 मिलीग्राम विटामिन प्राप्त होता है। अत: यदि किसी भोजन में अधिक मात्राा में ट्राप्टोफेन हो, तब उस भोजन में पर्याप्त मात्राा में निआसिन प्राप्त होता है, चाहे उस भोजन में निआसिन कितना ही कम क्यों न हो।

कार्य (Function)

1.निआसिन शरीर में जल्दी ही निकोटिनामाइड (Nicotinamide) बन जाता है, जो सहएंजाइम का संघटन होता है। ये सहएंजाइम कार्बोहाइड्रेड, वसा और प्रोटीन के चयापचय के लिए आवश्यक होते हैं।

2. यह त्वचा, अंतडि़यों और स्नायुतन्त्रा के ठीक रूप में कार्य करने के लिए भी आवश्यक है।

प्रापित साधन (Food Sources)

यह अंडे, मांस, और मछली में पर्याप्त रूप में मिलता है। यह मंूगफली में भी पर्याप्त रूप में मिलता है। यह अनाज में भी मिलता है। यह आलू, फलियां और कुछ पत्तों वाली सबिजयों में मिलता है, लेकिन अधिकतर फलों और सबिजयों में यह नही मिलता है। अंकुर निकली या खमीर उठे खाध पदाथो± में निआसिन की मात्राा बढ़ जाती है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowances)

इसकी प्रतिदिन की आवश्यकता मात्राा 6.6 मिलीग्राम/ 1000 किलो कैलोरी तक है।

कमी (Deficiency)

निआसिन की कमी से प्लैगरा ;च्मससंहतंद्ध नामक रोग हो जाता हैै इसके प्रारमिभक लक्षण है; थकावट, सिरदर्द, कमर दर्द, वजन कम होना, व भूख न लगना। इस रोग के तीन प्रमुख लक्षण होते है-त्वचाशोध, अतिसार, और मनोभ्रंश। (1) त्वचाशोध बीमारी शरीर के उस भाग मेें होती है जो खुले रहता है, जैसे हाथ का पृष्ठ भाग, निचली, टांगेें, चेहरा व गला (2) मनुष्य उत्साहहीन रहता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और संज्ञाहीन हो जाता है। मनोभ्रंश का यदि निदान नहीं किया जाए तो मृत्यु भी हो सकती है।     


4.8 पिरोडाक्सीन अथवा विटामिन बी6

पिरोडाक्सीन अथवा विटामिन बी6

      

रासायनिक विश्लेषण तथा लक्षण (Chemical & Characteristics)

विटामिन बी6 अथवा पायरीडाक्सीन पिरीेडीन के तीन रूपों के समूह को कहते है-पिरीडाक्सीन, पिरीडाक्सील व पिरीडाक्स्माइन। यह पानी में घुलनशील है तथा अपेक्षाÑत ताप व वसा में नष्ट नहीं होता।

कार्य (Function)

यह विटामिन अनेक एन्जाइम के साथ सह-एन्जाइम के रूप में कार्य करता है और कर्इ परिवर्तनों में सहायक है जैसे (अ) टि्रप्टोफेन से नायसिन (ब) लिनोलिक अम्ल से आरक्डोनिक अम्ल, (स) अन्य अमीनो अम्लों का पारस्परिक परिवर्तन।

प्रापित साधन (Food Sources)

यह विटामिन मांस, मछली व अंडे में मिलता है। यह थोड़ी बहुत मात्राा में आलू व शकरकंद में भी होता है। यह सभी प्रकार के साबुत अनाजों में भी मिलता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowances)

वयस्कों में इसकी प्रतिदिन 1.5 मि.ग्राम आवश्यकता होती है।

कमी (Deficiency)

इस विटामिन की कमी से चक्कर आते हैं, मतली होती है। अन्य लक्षण है किलांसिस और पेट में दर्द।


4.9 फोलिक अम्ल वर्ग (Folic Acid Group)

फोलिक अम्ल वर्ग

(Folic Acid Group)

यह वर्ग सक्रिय रूप में फोलासिन, टीरोर्र्इग्लूटामिक अम्ल ;च्जलतवमहसनजंउपब ंबपकद्ध, ट्रार्इ और हेप्टा-टीरोर्र्इग्लूटामिक अम्ल और फोलिनिक अम्ल है। यह दानेदार, चमकदार, पीले रवे जैसा लगता है, और पानी में थोड़ा घुल सकता है। फोलिक अ्रम्ल को एस्कार्बिन अम्ल की सहायता से फोलोनिक अम्ल में परिवर्तित किया जा सकता है, जो अधिक सक्रिय होता है।

कार्य (Function)

(1) यह डी.एन.ए. ;क्ण्छण्।ण्द्ध के संश्लेषण के लिए आवश्यक होता है।

(2) यह असिथ मज्जा में लाल रक्त कोशिकाओ के सामान्य उत्पादन के लिए भी आवश्यक होता है।

(3) यह अमीनो अम्ल फिनाइल-ऐलानीन को टाइरोसिन में आक्सीकृत किए जाने में आवश्यक होता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह विटामिन प्राÑतिक और मिश्रित दोनों प्रकार के खाध पदार्थों में मिलता है। यह कलेजी, गुर्दे, गहरे हरे रंग की पत्तियों वाली सब्जी में अच्छी मात्राा में मिलता है। यह गेहंू व अन्य प्रकार के अनाज में मिलता है। यह सबिजयों, दूध के बने पदार्थ, सुअर का मांस, हल्के रंग वाली सबिजयों में बहुत कम मिलता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की 1990 की विशेषज्ञ समिति ने प्रतिदिन इस विटामिन की जितनी मात्राा आवश्यक बतार्इ है, उसे सारणी संख्या में 2 में दिखाया गया है। फोलिक एसिड की आवश्यकता 3 माइक्रो ग्राम प्रति किलो शारीरिक भार के हिसाब से भी निकाली जा सकती है।   

           

      सारणी 2

मूल फोलिक अम्ल की प्रतिदिन की आवश्यक मात्राा

वर्ग                 मात्रा (माइक्रोग्राम)

वयस्क                            100

गर्भवती स्त्राी                  400

स्तन्यकाल                      150

शिशु                               25

बच्चे                              30 से 100

कमी (Deficiency)

फोलिक अम्ल की कमी होने से मेगालोब्लासिटक अनीमिया (Megaloblastic Anaemia) व अमाशय विकार हो जाते है। यदि इसकी बिलकुल कमी हो जाए, तब प्रजननशीलता कम होने के साथ-साथ पूरी तरह नष्ट हो जाती है।


4.10 सायनोकोबालामीन अथवा विटामिन बी12

सायनोकोबालामीन अथवा विटामिन बी12

(Cyanocobalamine or Vitamin B12)

यह एक ही विटामिन है, जिसमें कोबाल्ट होता है, जो कि स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य होता है, यह देखने में गहरे लाल रंग के सुर्इदार रवादाने जैसा होता है, जो पानी में थोड़ा घुल जाता है। यह विटामिन केवल बड़ी आंत से अवशोषित होता है। इसका अवशोषण म्यूको-प्रोटीन एन्जाइम के रहने पर निर्भर करता है, जो आंत श्लेषिमका से उत्पन्न होता है। यह एंजाइम महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में जाना जाता है।

कार्य (Function)

1. न्यूक्लीय अम्ल और न्यूक्लीय प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक होता है।

2. यह हडिडयों की भुजा में लाल रä कणिकाओं के परिपक्व होने के लिए आवश्यक है।

3. यह स्नायु संबंधी ऊतकों के चयापचय के लिए भी आवश्यक होता है।

प्रापित साधन (Food Sources)

यह पशुओं से मिलने वाले भोजन में भी मिलता है। यह सबसे अधिक कलेजी, मांस व दूध में मिलता है। यह वनस्पतियों से मिलने वाले भोजन में उपलब्ध नहीं होता है।

प्रस्तावित दैनिक आहारीय मात्राा (Recommended Daily Allowance)

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (1990) ने प्रतिदिन के लिए इस विटामिन की जितनी मात्राा आवश्यक निर्धारित की है उसे सारिणी मे दिखाया गया है।

सारणी 3

विटामिन बी 12 की दैनिक प्रस्तावित मात्रा

वर्ग                                 विटामिन बी12 (माइक्रोग्राम)

वयस्क                                     1

गर्भवती स्त्राी                           1.0

स्तन्यकाल                               1.5

शिशु                                        0.2

बच्चे                                       0.2 से 1.0

कमी (Deficiency)

इस विटामिन की कमी होने से परनीशियस अनीमिया ;च्मतदपबपवने ।दंमउपंद्ध हो जाता है। यह अभाव अनुवांशिक विकार होने के परिमाणस्वरूप होता है। अनुवांशिक विकार से इंटि्रजिक फैक्टर के निर्माण पर असर पड़ता है। मैक्रोसिटिक अनीमिया और स्नायु तंत्रा के हारमोन परिवर्तन होते हैं। प्राय: यह देखा गया है, शाकाहारी भोजन मेें विटामिन बी12 का अभाव होता है, उससे विकास तो रूक जाता है, लेकिन अनीमिया नामक रोग नहीं होता है।



4.11 एसकार्बिक अम्ल अथवा विटामिन सी

एसकार्बिक अम्ल अथवा विटामिन सी


(Ascorbic acid or Vitamin C)

रासायनिक विश्लेषण और लक्षण (Chemistry and Characteristics)

विटामिन सी सफेद रंग का रवेदार मिश्रण होता है। इसकी सरंचना अपेक्षाÑत सरल होती है और मोनोसैकेराइड शर्करा से इसका घनिष्ठ संबंध है। यह कम कीमत पर ग्लूकोज से संशिलष्ट कर, तैयार किया जाता है।

विटामिन सी अन्य विटामिनों की अपेक्षा जल्दी नष्ट हो जाता है। यह पानी में, रोशनी, क्षार, आक्सीकृत एंजाइम से जल्दी ही नष्ट हो जाता है। यह भंडार में रखने, प्रोसेस करने व पकाने में अक्सर नष्ट हो जाता है।

कार्य (Function)

(1) यह कालेजन नामक प्रोटीन के निर्माण और आरक्षण के लिए आवश्यक होता है, जो हमारे सारे शरीर में व्याप्त रहता है। कोलेजन एक ऐसा संश्लेषक पदार्थ है, जो हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं को आपस मे बांधे रखता है।

(2) आपरेशन के बाद ऊतकों के उत्पादन में विटामिन ृसीश् अत्यन्त आवश्यक है।

(3) यह अमीनो अम्ल के सामान्य चयापचय में महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

(4) यह फेरिक आयन को फेरस आयन मेें रूपांतरित करता है, जिससे आंत के लौह तत्त्व का अवशोषण सरलतापूर्वक सम्पन्न होता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह विटामिन मुख्यत: फलों व सबिजयों में मिलता है। यह नींबू जाति के फल (नारंगी) अंगूर, फल, तरबूज और नींबू, बेरी, तरबूज, अनानास, अमरूद, नाशपती, केला, हरी सब्जी, हरी मिर्च, आंवला में प्रचुर मात्राा में मिलता है। यह सूखी फलियों में बिलकुल नहीं होता, लेकिन जब अंकुर निकल आते है, तब यह सात गुणा अधिक मिलता है। दूध, अंडे, मांस और चूूजों में यह बिलकुल नहीं होता। पशुओंं के दूध की अपेक्षा माता के दूध में एसकार्बिक अम्ल चार से छह गुणा तक होता हैै, जिससे स्कर्वी रोग से शिशु की रक्षा होती है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्रा (Recommended Daily Dietary Allowances)

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की विशेष समिति (1990) ने प्रतिदिन के लिए इस विटामिन की जितनी आवश्यकता बतार्इ है, उसे सारिणी 4 में दिखाया गया है।

सारणी 4

विटामिन सी की दैनिक प्रस्तावित मात्रा

वर्ग                         मात्रा (मि.ग्रा.)

वयस्क                         40

गर्भवती स्त्राी                40

स्तन्यकाल                     80

शिशु                              25

बच्चे                              40

कमी (Deficiency)

एस्कार्बिक एसिड की कमी होने से कोलेजन ;ब्वससंहमदद्ध नामक तत्त्व का बनना रूक जाता है, जो संश्लेषक पदार्थ होता है। इसकी कमी होने के कुछ लक्षण और भी है जैसे- जोड़ों में हल्का-हल्का दर्द होना, चिड़चिड़ापन, शिशुओं और बच्चों की वृद्धि रूक जाना, एनीमिया, सांस लेनेे मे कठिनार्इ रोगाक्रांत रहना और घावों का देर से भरना।

एस्कार्बिक एसिड की अधिक कमी हो जाने की वजह से स्कर्वी ;ैबनतमलद्ध नामक रोग हो जाता है। इस रोग में मसूड़े फूल जाते है, तथा उनमें से खून आने लगता है। कर्इ जगह रäòाव होता है, अनीमिया और कमजोरी आ जाती है।  आजकल पूर्ण स्कर्वी नामक रोग इतना अधिक नहीं मिलता, लेकिन एस्कार्बिक एसिड की कमी प्राय: देखने में आती है।

सहायक पुस्तके

1. आहार एवं पोषण विज्ञान, एजुकेशन प्लानिंग ग्रुप द्वारा

2. पोषण एवं आहार एवं विज्ञान के मूल सिद्धांत, श्रीमती एस.पी. मुखिया।

3. Normal and Therapeuic Nutrition, Robinson and Lawler.

4. आहार एवं पोषाहार, डा. सत्यदेव आर्या


4.12 पाठ 4 पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान – (III)

पाठ 4

पोषक तत्त्वों का प्रारमिभक ज्ञान – (III)

(Elementary Knowledge of Nutrients – III)

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पिछले अध्याय में परिवार के लिए ऊर्जा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेटस, वसा और विटामिन सम्बन्धी आवश्यकताओं के बारे में चर्चा की गर्इ। आइए, यहां हम ऐसे ही कुछ तत्त्वों पर भी विचार करें, जो मनुष्य के पोषण के लिए आवश्यक हैं। ये हैं - खनिज लवण तथा जल।

खनिज लवण (Minerals)

खनिज लवण उन तत्त्वों को कहते हैं, जो पौधे और पशुओं के उत्तकों के जल जाने पर प्राय: भस्म के रूप में बचे रहते हैं। मनुष्य के शरीर में 19 से अधिक खनिज लवण पाए जाते हैं। उन तत्त्वों को भोजन से व्युतपन्न किया जाता है। हमारे शरीर में लगभग 4 प्रतिशत अंश खनिज लवण का होता है। हमारे शरीर में मौजूद कुछ प्रमुख खनिज लवण हैं - कैलिशयम, फास्फोरस, लोहा, आयोडीन, सोडियम, पोटेशियम, जिंक, क्लोरीन इत्यादि। ये सभी खनिज लवण हमें भोजन से प्राप्त होते हैं। इनमें से कैलिशयम, फास्फोरस, सोडियम, पोटेशियम, क्लोरीन और मैग्नीशियम की आवश्कता हमें अधिक मात्राा में होती है। हमारे शरीर में जितने खनिज लवण होते हैं, उनमें तीन चौथार्इ अंश कैलिशयम और फास्फोरस का होता है। बाकी अंश में मुख्यत: पांच अन्य खनिज लवण होते हैं। इनमें से अधिकांश तत्त्व इतनी कम मात्राा में रहते हैं, कि इन्हें विरल तत्त्व अथवा अणु पोषक तत्त्व (माइको-न्यूटि्रयेन्ट) कहा जाता है।

सारणी 1

खनिज लवण

आवश्यकता अधिक मात्रा में           आवश्यकता कम मात्रा में

 कैलिशयम                                                  लोहा

फास्फोरस                                                   आयोडीन

 पोटेशियम                                                   जिंक

 क्लोरीन                                                      तांबा

 मैगनीशियम

हमारे शरीर में खनिज लवणों का महत्त्व विभिन्न प्रकार से है। ये खनिज लवण विभिन्न कार्बनिक यौगिक जैसे फास्फोप्रोटीन, फास्फोलिपिड, हिमोग्लोबीन और थायराक्सीन आदि के निर्माण के लिए आवश्यक होते हैंं। हमारे शरीर की कठोर हडिडयों के निर्माण कैलिशयम, फास्फोरस और मैग्नीशियम जैसे तत्त्वों से, और मृदु ऊत्तकों का निर्माण पोटेशियम की अपेक्षाकृत अधिक मात्राा होने के कारण होता है। एंजाइमों के निर्माण के लिए भी खनिज तत्त्व आवश्यक होते हैं। इसी प्रकार यह तत्त्व भीतरी और बाहरी कोशिकाओं के बीच रसाकर्षण दाब और जल संतुलन को बनाए रखने, स्नायु तन्त्रा को समुचित रूप से कार्य करने तथा मांसपेशियों के संकुचन आदि के लिए भी आवश्यक होते हैं।

कैलिशयम

एक वयस्क व्यकित के शरीर में लगभग 1200 ग्राम कैलिशयम मिलता है इसमें से 99 प्रतिशत हडिडयों और दांतों में तथा बाकी एक प्रतिशत शरीर के विभिन्न भागों में तरल रूप में रहता है; जहां यह विभिन्न कार्य करता है।

कार्य (Functions)

1.फास्फोरस और अन्य तत्त्वों के साथ मिलकर, कैलिशयम हडिडयाँ और दांतों को दृढ़ता प्रदान करता है। इस विशिष्ट गुण के कारण ही हडिडयाँ शरीर को थामें रखती हैं। हडिडयाँ हमारे शरीर के महत्त्वपूर्ण अंगों के लिए कवच के रूप में बनी होती हैं जिसमें ये अंग सुरक्षित रहते हैं। जैसे हमारी छाती की हडिडयों में हमारा हृदय और फेफड़े और कपाल में मसितष्क रहता है।

2. कैलिशयम प्रोथ्राम्बीन को थ्राम्बीन के रूप में परिवर्तित होने में उत्प्रेरक का काम करता है। हमारे रक्त के जमाने का जो गुण है, उस तक पहुंचने में जो विभिन्न प्रक्रियाएं होती हैं, यह उन्हीं में से एक है।

3.यह कोशिकाओं की झिल्ली की पारगम्यता (Permeability) को सक्रिय बनाए रखता है तथा कोशिकाओं में घुलनशील द्रव्यों के आवागमन को नियंत्रित करता है।

4. यह अनेक एन्जाइमों को सक्रिय रखता है। इनमें से कुछ एन्जाइम हैं : लाइपेस, एडीनोसिन, ट्राइफास्फेटस और कुछ प्रोटिओलिटिक एन्जाइम।

5. यह स्नायविक आवेग के संचारण में भी सहायता करता है।

6. मांसपेशियों के संकुचन के साथ इसका सीधा सम्बन्ध होता है। कैलिशयम का अभाव होने पर मांसपेशियां संकुचनशील नहीं रह जाती हैं।

7. यह बड़ी आंत से विटामिन बी12 के अवशोषण में सहायक है।

खाध स्त्राोत(Food Sources)

यह दूध और दूध से बने पदाथो± में अधिक मात्राा में रहता है। यह हरी सरसों, हरी शलगम, पोदीना, पालक, गोभी की पत्तियों में, दूध तथा दूध से बने पदार्थों की अपेक्षा कम मिलता है। नींबू जाति के फलों, सबिजयों, मांस, अनाज और गिरी वाले फलों में यह अपेक्षाÑत कम मात्राा में मिलता है।

प्रस्तावित दैनिक आहारीय मात्राा (Recommended Daily Allowance)

भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद ;1989द्ध ने प्रतिदिन के लिए इसकी जितनी मात्राा निशिचत की है, उसे नीचे सारणी 2 में दिखाया गया है।

सारणी 2

कैलिशयम और फास्फोरस की प्रतिदिन आवश्यक प्रस्तावित आहारीय मात्रा

आयु वर्ग               कैलिशयम (मि.ग्रा.)             फास्फोरस (मि.ग्रा.)

वयस्क                          400                               400

गर्भवती स्त्राी                 1000                            1000

स्तन्यकाल                     1000                             1000

शिशु                              500                               750

बालक (1ऋ9 वर्ष)            400                               400

किशोर (10ऋ15 वर्ष)       600                               600

किशोर (16ऋ19 वर्ष)       500                               500

कमी (Deficiency)

भोजन और कैलिशयम की कमी से बच्चों की हडिडयों और दांतो में कैलसीकरण की क्रिया कम हो जाती है। कैलिशयम की कमी होने से हडिडयाँ मुड़ने लगती हैं, और टखने और कलार्इ बढ़ जाती हैं। कैलिशयम की कमी से बच्चों में रिकेटस और वयस्कों में आसिटयोमलेशिया (असिथ मृदुता) नामक रोग हो जाता है। बार-बार गर्भधारण करने और उचित मात्राा में भोजन न लेने से भी कैलिशयम की कमी हो जाती है।

फास्फोरस

हमारे शरीर में फास्फोरस कुल भार का एक प्रतिशत होता है, अर्थात हमारे शरीर में फास्फोरस की मात्राा कुल खनिज लवणों की तुलना में एक चौथार्इ होती है। हडिडयाें और दांतों में यह कैलिशयम के साथ मिले रूप में लगभग 85 प्रतिशत होता है। नरम ऊतकों में फास्फोरस की मात्राा कैलिशयम की अपेक्षा अधिक होती है। और यह प्राय: कार्बनिक रूप में होती है।

कार्य (Functions)

फास्फोरस एकमात्रा ऐसा खनिज है, जो अनेक कार्य करता है, जो एक दूसरे से काफी भिन्न होते हैं।

1. यह कैलिशयम के साथ मिलकर अघुलनशील æव्य बन जाता है। इसे कैलिशयम फास्फेट कहते हैंं यह हडिडयों को शकित और दृढ़ता देता है।

2. फास्फोरस मिश्रित वसा-प्रोटीन से हमारे शरीर में वसा का संचरण होता है।

3. फास्फोरस न्यूकिलयों-प्रोटीन का एक अंश होता है। यह तत्त्व हमारी अनुवंशिकता को नियंत्रित रखता है।

4.कोशिकाओं की झिलिलयों में फास्फोलिपिड मिला होता है। यह कोशिकाओं से घुलनशील æव्यों के आवागमन को नियनित्रात रखता है।

5.अधिकांश उपापचय प्रक्रियाओं में मुख्य प्रतिक्रिया फास्फोरिलीकरण की होती है।

6. ऊर्जा के नियन्त्राण और निस्सरण के लिए फास्फोरस आवश्यक होते हैं।

7. शरीर को उदासीन बनाने में अकार्बनिक फास्फोरस, प्रतिरोधक का कार्य करता है। यह हमारे शरीर के तरल पदार्थों में रहता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह प्राय: हमारे हर प्रकार के भोजन में मिलता है, लेकिन यह सबसे अधिक दूध और उससे बने पदार्थ में होता है। यह साबुत अनाज और आटे में बारीक पिसे अनाज और आटे की अपेक्षा अधिक होता है। यह सबिजयों और फलों में बहुत थोड़ी मात्राा में पाया जाता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद ;1990द्ध के अनुसार प्रतिदिन के लिए इसकी मात्राा सारणी 2 में दी गर्इ है।

कमी (Defeciency)

मनुष्यों में फास्फोरस की कमी प्राय: देखने में नहीं मिलती है। इसका कारण यह है कि हमारा भोजन अनाज से बनता है और अनाज में यह पर्याप्त मात्राा में मिलता है।

मैग्नीशियम

हमारे शरीर में मैग्नीशियम की मात्राा कैलिशयम और फास्फोरस की तुलना में काफी कम होती है। वयस्क व्यकित के शरीर में 20 से 35 ग्राम में से लगभग 60 प्रतिशत कार्बोनेट और फास्फेट के रूप में हडिडयों की सतह पर मिलता है। बाकी मैग्नीशियम कोशिकाओं के भीतर मिलता है।

कार्य (Functions)

1. यह अनेक जैविक प्रतिक्रियाओं के लिए आवश्यक होता है, जो ऊर्जा के विस्सरण से संबंधित होती है।

2. यह हडिडयों का एक संघटक होता है और हडिडयों में खनिज मात्राा को बढ़ाता है।

3. यह कैलिशयम और फास्फोरस के सामान्य उपापचय के लिए आवश्यक होता है।

4. यह हमारी कोशिकाओं के बाहय तरल रूप में रहता है, जिससे नाड़ी-तन्त्रा संवेदनाओं के संचारण में सहायता मिलती है।

5. यह एन्जाइम को सक्रिय करता है, जिससे ग्लाइकोजन का विघटन होता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह मक्खन को छोड़कर दूध के सभी बाकी पदार्थों में पर्याप्त रूप में मिलता है। आटा और अनाज से बनी खाध वस्तुएं, सूखी सेम, सोयाबीन, मटर और मेवे में यह अच्छी मात्राा में मिलता है। इसका कारण यह भी है कि यह क्लोरोफिल का अंश होता है।

कमी (Defeciency)

सामान्य रूप से स्वस्थ शरीर और सामान्य भोजन में मैग्नेशियम की कमी की संभावना प्राय: नहीं रहती है। इसकी कमी अपर्याप्त अवशोषण, शराब पीने की लत पड़ने, गर्भ हेतुक रूधिर विषाक्तता या डाइयूरेटिक्स ;क्पनतमजपबेद्ध लेने से हो सकती है। मैग्नीशियम की कमी होने से तंत्रिका पेशी उत्तेजनशीलता, टैटनी, और ऐंठन होती है। इसकी अधिक कमी होने से अत्यधिक प्यास, शरीर में बहुत अधिक गर्मी लगती है तथा तंत्रिका पेशियाें में संचालन कम हो जाता है।

पोटेशियम

हमारे शरीर में 250 ग्रा0 पोटेशियम की मात्राा होती है, जिसमें से 97 प्रतिशत ऊत्तकों की कोशिकाओं में, और बाकी कोशिकाओं के बाहर तरल में रहती है।     

 कार्य (Functions)

1. यह कोशिकाओं में रस-कर्षी दाब और जल के सन्तुलन को बनाए रखता है।

2.यह प्रोटीन के संश्लेषण में काम आता है।

3.यह एन्ज़ाइमी प्रतिक्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है, जो कोशिकाओं में होती है। कुछ पोटेशियम फास्फेट से भी संयुक्त रहता है तथा ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में परिवर्तित करने के लिए उत्पे्ररित करता है।

4. यह नाड़ी तंत्रा संवेदनाओं के संचरण और मांसपेशियों के संकुचन के लिए जरूरी होता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह भोजन में व्यापक रूप से रहता है। यह भोजन, अंडे व मछलियों में अधिक होता है। फल, सबिजयों और साबुत अनाज में पोटेशियम की मात्राा अधिक होती है यह केले, आलू, टमाटर, गोभी, नारंगी तथा अंगूर के जूस में अधिक होता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

पोटेशियम हमारे शरीर में कितना होना चाहिए, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं है। सामान्यत: यह प्रत्येक भोजन में पर्याप्त मात्राा में मिलता है।

कमी (Defeciency)

इसकी कमी भोजन के कारण नहीं होती है। भूख की कमी, अत्यधिक कुपोषण, शराब की लत और जल जाने से, कभी-कभी अम्ल क्षार की मूल मात्राा असन्तुलित हो जाती है और रसकर्षी दाब कम हो जाता है।

सोडियम

हमारे शरीर में 120 ग्रा. सोडियम पाया जाता है, जिसकी 50 प्रतिशत मात्राा कोशिकाओं के बाहय तरल रूप में मिलती है। इसकी 40 प्रतिशत मात्राा हमारी हडिडयों में और 10 प्रतिशत या उससे कुछ कम प्रतिशत कोशिकाओं में सिथत तरल में रहती है।

कार्य (Functions)

1. यह सामान्य रसकर्षी दाब और सन्तुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है।

2.यह अमाशियकयन्त्रा स्राव में अम्लीय माध्यम बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है।

3.यह कोशिकाओं की झिल्ली की पारगम्यता को बनाए रखने के लिए भी जरूरी होता है।

4. कोशिकाओं के भीतरी व बाहरी तरल विभागों में इलैक्ट्रोलाइट अन्तर ;म्समबजतवसलजम कपमितमदबमद्ध को बनाए रखने में सोडियम ृपम्पश् सहायक होता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह भोजन में हमें मुख्य रूप से नमक से मिलता है जो सामान्यत: भोजन तैयार करने के काम में आता है।

यह भोज्य पदाथो± को दीर्घकाल तक परिरक्षित रखने में भी काम आता है - भोज्य पदार्थों के परिरक्षण और उन्हें तैयार करने में सोडियम नमक के अनेक मिश्रण प्रयोग में लाए जाते हैं। ये हैं - बेकिंग सोडा, बेकिंग पाउडर, सोडियम प्रोपियोनेट, सोडियम साइट्रेट।

पशुओं से मिलने वाले भोजन जैसे दूध, अंडा, मांस और मछली आदि और कुछ सबिजयों जैसे पालक, चुकन्दर के पत्ते और अनाज, मेवे में सामान्यत: सोडियम कम मिलता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

सामान्य रूप से प्रत्येक वयस्क व्यकित के लिए 5 से 10 ग्राम नमक पर्याप्त होता है। लेकिन जो लोग शारीरिक श्रम करते हैं, उन्हें अधिक मात्राा में नमक लेना चाहिए।

कमी (Defeciency)

जब हमारे शरीर के ऊतकों में कोशिकाओं के बाहर तरल में सोडियम की मात्राा कम हो जाती है, तब रसाकर्षी दाब और पी एच ;चभ्द्ध पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है। जब हमारे ऊत्तकों में सोडियम एकत्रित हो जाता है, तब जल जमाव हो जाता है। गर्मी के मौसम में सोडियम का अधिक निष्कासन होता है, जिसके परिणामस्वरूप कमजोरी, थकान, उल्टी और भूख कम हो जाती है। इन परिसिथतियों में थोड़ी मात्राा में नमक तरल पदार्थ में मिलाकर लिया जा सकता है।  

      क्लोरीन

हमारे शरीर में क्लोरीन पूर्ण रूप से क्लोराइड आयन के रूप में रहता है। लगभग 100 ग्राम क्लोराइड आयन हमारे शरीर के कोशिकाओं के बाहर तरल रूप में, कुछ मात्रााएं रक्त की लाल कोशिकाओं में और थोड़ी मात्राा में अन्य कोशिकाओं में भी रहता है।

कार्य (Functions)

1. यह रसाकर्षी दाब, जल सन्तुलन और अम्लक्षार के सन्तुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है।

2. अमाशय तंत्रा के एन्जाइम और पेट की पाचनशकित को सक्रिय रखता है।

3. यह लार में पाये जाने वाले एमाइलेस के सक्रिय कारकों में से है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

इसकी आवश्यकता का ठीक-ठीक निर्धारण नहीं हुआ है, लेकिन अगर सोडियम क्लोराइड सामान्यत: लिया जाता रहे, तो इससे शरीर को पर्याप्त मात्राा में क्लोराइड भी मिल जाता है।

कमी (Defeciency)

अत्यधिक वमन, पतले दस्त होने से क्लोराइड का निष्कासन अधिक होता है। अत: एल्कलोसिस ;ंसांसवेपेद्ध जो कि क्लोराइड के स्थान पर बाइकार्बोनेट के आ जाने से होता है, हो सकता है।

गन्धक

यह हमारे शरीर में कुल भार का 0ण्25 प्रतिशत अथवा प्रत्येक व्यकित में लगभग 17ण्5 ग्राम होता है और यह शरीर की सभी कोशिकाओं में रहता है। यह हमारे शरीर में सल्फर युक्त एमिनो एसिड में रहता है। इसके अलावा यह थायमीन और बायोटीन में भी रहता है। यह दो विटामिन हमारे भोजन में अवश्य रहने चाहिए। यह जोड़ने वाले ऊतकों, त्वचा, नाखूनों और बाल में प्रचुर मात्राा में रहता है।

कार्य (Functions)

1. यह दो अनिवार्य विटामिनों का संघटक होता है (थायमीन और बायोटीन)।

2. कोनड्रोटीन आदि म्यूकोपोलिसैकैराइडस सल्फेट का महत्त्वपूर्ण अंश होता है, जो कोमल असिथयों, नसों, हडिडयों, त्वचा और âदय के वाल्व ;टंसअमद्ध में पाया जाता है। सल्फर युक्त वसा (सल्फोलिपिड) जिगर, गुर्दे, लार ग्रंथियों में और श्वेत æव्य मसितष्क में पाया जाता है।

3.आक्सीकरण प्रतिक्रियाओं में सल्फर के तत्त्वों की आवश्यकता होती है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह विशेष रूप से मांस, दूध, अंडे और सेम में मिलता है। यह अनाज में भी मिलता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

उसकी प्रतिदिन की आवश्यक मात्राा का निर्धारण अभी तक नहीं हुआ। लेकिन जिस भोजन में मिथियोनिन और सिस्टीन (अमीनो अम्ल) हैं, वह हमारे शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है।

लोहा

हमारे शरीर के लिए जो विरल तत्त्व आवश्यक समझे जाते हैं, लोहा उनमें से प्रमुख है। यह वयस्क पुरूष में लगभग तीन से पांच ग्राम और वयस्क स्त्राी में 2 से 3 ग्राम तक होता है। लोहे की अधिकांश मात्राा हमारे रक्त में लाल अणुओं में हीमोग्लोबीन में होती है। मांसपेशियों में ऊतकाें में यह लगभग तीन प्रतिशत मायाग्लोबीन के रूप में होती है। बाकी अंश गुदे±, तिल्ली और हडडी की भुजा में होता है, जो फैरीटिन (Feritin), हैइमोसिडरीन (Haemosiderin) और सिडरोफिलीन (Sidrophilin)के रूप में होती है।

कार्य (Functions)

1. रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं में पाये जाने वाले हीमोग्लोबिन में लोहा होता है। हीमोग्लोबीन शरीर के भिन्न ऊतकों व कोशिकाओं तक आक्सीजन पहुंचाता है और फिर भिन्न ऊतकों व कोशिकाओं से कार्बन-डार्इआक्साइड एकत्रा कर फेफड़ों के द्वारा बाहर निकालने में मदद करता है।

2. लौह तत्त्व हमारी पेशियों में पार्इ जाने वाला मायोग्लोबीन में भी होता है जहां मायोग्लोबीन आक्सीजन एकत्रा रखती है। हमारी पेशियों के तेजी से कार्य करने के समय आक्सीजन का यह संग्रह काम आता है।

3. कोशिकाओं में प्रोटीन, कार्बोज व वसा के सम्पूर्ण आक्सीकरण में भी लौह तत्त्व मदद करता है।

4. हमारे मसितष्क के तुरन्त कार्य जैसे कुछ याद रखना या ृध्यान देनाश् में भी लौह तत्त्व लाभदायक है।

5. लौह तत्त्व कुछ एन्जाइम और अन्य तत्त्वों का अभिन्न अंग है।

6. लौह तत्त्व संक्रमण से बचाव में भी लाभकारी है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

यह पिण्डलियों के मांस, यह हरे रंग की पत्तेदार सब्जी और साबुत अनाज में अच्छी मात्राा में मिलता है। यह अंडे की जर्दी और अवयवों के मांस में भी अच्छी मात्राा में मिलता है। लोहे का सर्वोत्तम स्रोत जिगर होता है। अन्य सबिजयों और फलों में भी यह मिलता है। यह दूध, पनीर और आइसक्रीम में कम मिलता है। यह गुड़ में अच्छी मात्राा में मिलता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

लोहे की आवश्यकता निकालने के लिए पुरुषाें के लिए लोहे की सामान्य ;इेंंसद्ध हानि, सित्रायों के लिए सामान्य हानि+मासिक स्राव में हानि; तथा बच्चों के लिए सामान्य हानि+वृद्धि के लिए गणना में ली जाती है। लोहे का अवशोषण चावल, मिले-जुले अनाज (चावल+गेहूं), तथा पूरा गेहूं पर क्रमश: 5:, 3: व 2: लिया गया है।

हमारे शरीर को लोहे की आवश्यकता कम होती है लेकिन चूंकि यह हमारे शरीर में कम अवशोषित होता है, इसलिए

शरीर के लिए अधिक मात्राा में आवश्यक हो जाता है। शाकाहारी भोजन से केवल 10 प्रतिशत ही लोहा अवशोषित होता है। मिश्रित भोजन से 15ऋ20 प्रतिशत तक लोहा अवशोषित होता है। इस सिथति को ध्यान में रखकर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने इसकी जितनी मात्राा आवश्यक बतार्इ है, उसे सारणी संख्या 3 में दिखाया गया है -

सारणी 3

लोहे की दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्रा

आयु वर्ग                         लोहा (मि.ग्रा.दिन)

वयस्क पुरूष                            28

वयस्क स्त्राी                           30

गर्भवती स्त्राी                         38

स्तन्यकाल                             30

शिशु                                      1.0 मि.ग्रा/कि.ग्रा. शरीर भार

बच्चे 1-9 वर्ष                         12-16

किशोर लड़के (10-18 वर्ष)        34-50

किशोर लड़कियां (10-18 वर्ष)   19-30

कमी (Defeciency)

शरीर में लोहे की कमी, भोजन में लोहे की कमी होने, रक्त में लोहे की पर्याप्त अवशोषण न होने, या कम रक्त बनने के कारण होती है। इसकी कमी के कारण मनुष्य रक्तता (अनीमिया) नामक रोग से ग्रस्त हो जाता है। वह पीला और कमजोर दिखार्इ पड़ने लगता है। शरीर में हीमोग्लोबीन की मात्राा कम हो जाने के परिणामस्वरूप आक्सीजन थोड़ी मात्राा में मिलने के कारण, वह हमेशा थका हुआ और क्लान्त दिखार्इ पड़ता है। इसके अलावा व्यकित का शरीर पीला पड़ जाता है व नींद कम आना, सांस फूलना व भूख न लगना जैसी शिकायत भी रहती है। व्यकित की जीभ, आंख का सफेद भाग ;ब्वदरमबजपअंद्ध और नाखून में भी पीलापन आ जाता है।

लौह तत्त्व की अधिक कमी होने पर नाखून टूटने लगते हैं व चम्मच के आकार के हो जाते हैं। अधिक कमी बढ़ती जाए, तब व्यकित की मृत्यु भी हो सकती है।

आयोडीन

वयस्क व्यकित के शरीर में आयोडीन लगभग 25 से 30 मिलीग्राम तक मिलता है, जिसमें से इसकी एक तिहार्इ मात्राा थायोराइड ग्रंथि में होती है। थायोराइड के ऊतक में आयोडीन अन्य ऊतकों की तुलना में 2500 गुना होती है।

कार्य (Functions)

आयोडीन का केवल एक ही कार्य है, अर्थात यह थायरोग्लोबुलीन (थायरायड हारमोन) का संघटक होता है। थायरोग्लोबुलीन अनेक आयोडीन वाले समिमश्रणों का प्रोटीनयुक्त तत्त्व होता है। थायरोइड हारमोन कोशिकाओं में आक्सीकरण की गति को नियंत्रित रखता है, और ऐसा करने से वह शारीरिक व मानसिक विकार, नाड़ी तथा मांसपेशियों के ऊतकाें, रक्त संचरण और सभी प्रकार के पोषाहार के चयापचय को नियंत्रित करता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

आयोडीन भोजन और जल से प्राप्त होता है। भोजन और जल में आयोडीन की मात्राा उस मिटटी पर निर्भर करती है, जहां से यह हमें प्राप्त होता है। तटीय क्षेत्राों में रहने वाले और स्थानीय रूप से पैदा होने वाले खाध का भोजन करने वालो लोगों को अपनी आवश्यकता के अनुसार आयोडीन मिल जाता है। पर्वतीय क्षेत्राों में वहां के भोजन, और जल में आयोडीन थोड़ी मात्राा में ही होता है। उन क्षेत्राों में नमक का आयोडीनीकरण एकमात्रा ऐसी तकनीक है जिससे इसकी कमी को दूर किया जा सकता है और गलगंड नामक बीमारी को नियंत्रित रखा जा सकता है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्राा (Recommended Daily Dietary Allowance)

वयस्क पुरुष के लिए प्रतिदिन 0.14 मिलीग्राम और वयस्क स्त्राी के लिए 0.10 मिलीग्राम आयोडीन आवश्यक होता है। बच्चों को अपनी विकासावस्था, गर्भवती महिलाओं और स्तन्यपान कराने वाली महिलाओं को इसकी और अधिक अनावश्यकता होती है।

कमी (Defeciency)

इसकी कमी होने से विश्व के अनेक भागों में गलगंड नामक बीमारी, महामारी की तरह फैलती देखी गर्इ है, जहां की मिटटी में आयोडीन की मात्राा बहुत कम होती है। भारत में यह बीमारी हिमालय के निचले क्षेत्राों में समस्या बनी हुर्इ है। ऐसा ही महाराष्ट्र और विंध्याचल के निचले क्षेत्राों में है, जहां लगभग आधी जनसंख्या इस रोग से पीडि़त रहती है।

गलगंड बीमारी में थायोराइड नामक ग्रंथी सूज जाती है। (चित्रा 1)      

                             

                 

      चित्र 1: गलगंड                   

   

      मैंगनीज

मैंगनीज एक विरल खनिज है, जो भोजन में थोड़ी मात्राा में आवश्यक होता है। मैंगनीज अनेक एन्जाइमों, विशेषकर एंगानेज ;ंदहंदेंमद्ध को सक्रिय करता है जो यूरिया के निर्माण में सहायता करता है। यह पेपिटडेज ;चमचजपकेंमद्ध नामक एंजाइम का भी निर्माण करता है, जिससे आंतो में प्रोटीन का विघटीकरण होता है। मैंगनीज कंकाल के विकास, वसा के उपापचय और स्नायविक उत्तेजनशीलता के नियन्त्राण से भी संबंद्ध होता है। मैंगनीज पौधों से मिलता है। यह पौधों से मिलने वाले भोजन और मेवे, फलों, सेम, अनाज आदि में मिलता है। यह पशुओं में बहुत कम मिलता है।

एक वयस्क के लिए दैनिक आहारीय 65 माइक्रो ग्रा. प्रस्तावित की गइ है।

तांबा (Copper)

मनुष्य के शरीर के लगभग 75 से 150 मिलीग्राम तक तांबा होता है। तांबे के कण सभी ऊत्तकों में मिलते हैं, लेकिन यह सबसे अधिक जिगर और मसितष्क में मिलते हैं।

कार्य (Functions)

1. तांबे की आवश्यकता विभिन्न कायो± के लिए पड़ती है, जिसमें मेलानिन वर्ण का निर्माण भी शामिल है।

2. यह इलेक्ट्रान के संचरण में भी आवश्यक होता है।

3. यह माइलिन की झिल्ली को एक सम बनाए रखने के लिए भी आवश्यक होता है।

4.यह फास्फोलिपिड के संश्लेषण, हडिडयों के विकास के लिए भी जरूरी होता है।

5. तांबे से हीमोग्लोबिन के अणु के निर्माण में सहायता मिलती है।

6. यह अनेक एंजाइमों के संघटक के रूप में देखा गया है।

दैनिक प्रस्तावित आहारीय मात्रा (Recommended Daily Dietary Allowance)

अनुमान है कि प्रत्येक वयस्क को प्रतिदिन 2 मि.ग्रा. तांबा आवश्यक होता है।

खाध स्त्राोत ;थ्ववक ैवनतबमेद्ध

भोजन में तांबे के तत्त्व मिटटी के तत्त्व पर निर्भर करते हैं। यह अवयवों के मांस, कवच लिए मछली, साबुत अनाज, सेम और मेवाें में भी प्रचुर मात्राा में मिलता है।

कमी (Defeciency)

तांबे की कमी बहुत कम मिलती है, किन्तु कुपोषण होने, नेफ्रोटिक सिंड्रोम ;छमचीतवजपब ैलदकतवउमद्ध और स्प्रू ;ैचतनद्ध में देखी गर्इ है।

फ्लोरीन

फ्लोरीन, सामान्यत: शरीर में हडिडयों और दातों में, कैलिशयम के यौगिक के रूप में रहता है। यह जीवन के लिए आवश्यक नहीं होता, लेकिन फ्ल्यूराइड थोड़ी बहुत मात्राा में लेने से, दातों के Ðास को रोकने में अभूतपूर्व सहायता मिल जाती है।

कार्य (Functions)

दांतों के Ðास को रोकने के लिए, फ्लोरीन का उचित मात्राा में लेना अत्यन्त आवश्यक है यह सामान्यत:, हडिडयों के खनिजीकरण के लिए आवश्यक होता है।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

इसका मुख्य स्रोत पीने का पानी होता है यह विरल रूप में अनेक प्रकार के भोजन में, और पर्याप्त रूप से समुद्र की मछली और पनीर में मिलता है।

कमी व अधिकता (Deficiency and Excess)

फ्लोरिन दांतो पर फ्ल्यूराइड के एकत्रा होते खनिजाें को घुलने से रोकने, और अम्ल बनाने वाले बैक्टीरिया को समाप्त करने के लिए आवश्यक होता है अगर विकास की अवधि में फ्लोरिन की कमी हो जाए, तब दांतों का सड़न और उनका क्षय होने लगता है।

लेकिन अगर यह अधिक मात्राा में लिया जाए, तब इससे दातों और हडिडयों, दोनों को क्षति होती है दातों की कलर्इ की चमक समाप्त हो जाती है, दांत धब्बेदार हो जाते हैं, उनका रंग सफेद मिटटी जैसा हो जाता है, और उनकी सतह पर गडढे से दिखार्इ पड़ने लगते हैं। इस सिथति को ष्डेंटल फ्ल्यूरोसिस (Dental Flurosis) कहते हैं।

जस्ता (Zinc)

यह हमारे शरीर के सभी ऊत्तकों में पाया जाता है। हमारे शरीर में दो से तीन ग्राम तक जस्ता होता है। यह हमारे शरीर में इनसुलिन तथा कर्इ अन्य इंजाइमों का संघटक होता है। जस्ते की कमी होने से हमारा विकास रूक जाता है, किशोरावस्था में यौन सम्बन्धी शिशुता हो जाती है, स्वाद समाप्त हो जाता है व घाव को भरने में देर लगती है। हमारे सभी प्रकार के भोजन में जस्ता पाया जाता है। चाहे वह पशुओं से प्राप्त होता हो या वनस्पति से। लेकिन वनस्पति से मिलने वाले भोजन में यह कम होता है। पशुओं से मिलने वाले भोजन जैसे मांस, दूध, मछली में यह पर्याप्त होता है प्रत्येक वयस्क के लिए इसकी आवश्यक मात्रा 15ण्5 मिलीग्राम बतार्इ गर्इ है। बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए यह अधिक मात्राा में चाहिए। मनुष्यों के अधिकांश भोजन में यह मिलता है।

पानी (Water)

आक्सीजन के बाद शरीर के लिए सबसे अधिक आवश्यक पानी होता है। हम कर्इ सप्ताह तक भोजन के बिना रह सकते हैं, लेकिन यदि हमें पानी कुछ दिनों तक नहीं मिले तब हम जीवित नहीं रह सकते। लेकिन शरीर में से 10 प्रतिशत पानी की कमी हो जाए तब गंभीर खतरा हो सकता है। सामान्यत: 20 प्रतिशत पानी की क्षति हो जाने पर, मनुष्य मर जाता है। हमारे शरीर के ऊत्तकों में पानी रहता है, लेकिन उनकी मात्राा अलग-अलग रहती है। हमारे शरीर में पानी दो रूपों में रहता है। कोशिकाओं में प्राप्त जल हमारे शरीर के भार के लगभग 45 प्रतिशत तक होता है। कोशिकाओं के बाहर प्राप्त जल कोशिकाओं के भीतर नहीं हो कर बाहर रहता है। कोशिकाओं के बाहर प्राप्त जल के उदाहरण ये हैं - प्लाज्मा, अंतडि़यों में प्राप्त तरल, लसीका, अग्नाशय से निस्सरण जिगर और आमाशयान्त्रा श्लेष्य।

कार्य (Functions)

1. पानी संरचनात्मक संघटक है, और यह सभी कोशिकाओं के नीचे गडढे के रूप में रहता है।

2.पानी शरीर में प्राप्त सभी तरल पदाथो± का समन्वय होता है। ये पदार्थ हैं; पाचक रस, लसिका, रक्त, पेशाब और सीना आदि।

3. पानी अनेक आवश्यक प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है जैसे पाचन के दौरान टूट-फूट।

4. पाचन के बाद सभी उत्पादन होने वाले æव्यों को पानी घुला देता है। इसके कारण ही यह तत्त्व घुलकर दीवारों से गुजरकर अवशोषित होता है।

5. यह पोषाहार के साथ-साथ जल को प्रभावित करता है।

6. पानी से हमारे शरीर का ताप उचित स्तर पर बना रहता हैं यह गर्मी को सारे शरीर में निसरित कर देता है।

7. पानी शरीर के स्नेहक के रूप में आवश्यक है। उदाहरणत: लार से भोजन को निगलने में मदद मिलती है। विभिन्न अंगों जैसे पाचक नली, श्वास नली, जनन-मूत्रा नाल से निकलने वाले तरल, जोड़ों में पाया जाने वाला तरल इत्यादि।

खाध स्त्राोत (Food Sources)

शरीर के पानी सम्बन्धी जरूरत पीने वाले जल, व अन्य तरल पदाथो± से पूरी होती है। इसी प्रकार यह भोजन और भोजन के आक्सीजन से प्राप्त होता है। पेशाब व पसीना निकलने से, हमारे शरीर का अधिकांश जल नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार कुछ अंश उस वायु से भी निकल जाता है, जब हम सांस बाहर फेंकते हैं। इस क्षति को पूरा करने के लिए प्रतिदिन डेढ़ लीटर जल पर्याप्त है। गर्म जलवायु में पसीने के द्वारा निष्कासित होने वाले जल की पूर्ति करने के लिए और अधिक जल लेना जरूरी होता है। सारणी 5 में पानी के ग्रहण और शरीर से पानी की क्षति का तुलनात्मक विवरण दिया गया है।     

      सारणी 5

सामान्य जल सन्तुलन

(Normal Water Balance)

उपलब्ध जल             ग्राम                निस्सृत जल                 ग्राम

गृहीत जल                   1100                          मूत्र के द्वारा                  1000

भोजन में जल               900                            मल के द्वारा                  200

आक्सीकरण                 200                           वाष्प के द्वारा

                                                                   (त्वचा और फेफड़ों के द्वारा) 1000

योग                           2200                                                             2200


सहायक-पुस्तकें

1. आहार एवं पोषण विज्ञान, एजुकेशन प्लानिंग ग्रुप द्वारा

2. पोषण एवं आहार विज्ञान के मूल सिद्धान्त, श्रीमती एस.पी. सुखिया

3. Normal And Therapeutic Nutirition, Robinson and Lawler.

4. आहार एवं पोषाहार, डा. सत्यदेव आर्या


5 पाठ 5 भोजन के कार्य, खाध-वर्ग व संतुलित आहार की परिकल्पना

पाठ 5

भोजन के कार्य, खाध-वर्ग व संतुलित आहार की परिकल्पना

(Functions of Food, Food Groups and Concept of a Balanced Diet)

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भोजन हमारे जीवन का मूल आधार है। वायु और जल के पश्चात हमारे लिए भोजन ही सबसे आवश्यक है। मनुष्य के स्वास्थ्य को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला तथ्य ही है कि वह किस प्रकार का भोजन कितनी मात्राा में ग्रहण करता है। सदियों से भोजन हमारे प्यार, मैत्राी और सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीक भी रहा है। इस प्रकार भोजन के महत्त्व को देखते हुए, आइए पहले यह जानें कि भोजन क्या है ?

भोजन (Food)

ष्भोजन वह पदार्थ है जिसे ग्रहण करने परपाचक रस उस पर क्रिया कर सके और उसके पश्चात वह अवशोषित हो कर शरीर के विभिन्न कायो± के लिए प्रयोग में लाया जा सके।

अत: किसी भी पदार्थ को स्पष्ट तौर पर ष्खाध-पदार्थष् तभी कहा जा सकता है जबकि वह ऊपर दी गर्इ परिभाषा के अनुसार

- ग्रहण किया जा सके,

- पचाया जा सके,

- अवशोषित हो कर शारीरिक कायो± के लिए प्रयोग में लाया जा सके,

- ग्रहण करने का अर्थ है, कि वह पदार्थ चबाने योग्य और स्वादिष्ट होना चाहिए ताकि वह हमारे पाचन संस्थान में प्रवेश पा सके,

- ग्रहण करने के पश्चात जब यह पदार्थ पाचन संस्थान से गुजरता है तो अन्य शारीरिक क्रियाओं की सहायता से इसे सरल और छोटी इकार्इया में परिवर्तित किया जा सके, अर्थात इसे पचाया जा सके,

- पचाने के पश्चात ये सरल र्इकाइयाँ शरीर में अवशोषित हो सकें।

उदाहरणतया - सेब एक खाध पदार्थ है, क्योंकि हम इसे ग्रहण कर सकते हैं और शरीर में इसका पाचन होने पर इससे मिलने वाले पौषिटक तत्त्व अवशोषित कर लिए जाते हैं।

भोजन हमारे शरीर को विभिन्न पौषिटक तत्त्व प्रदान करता है, जो हमारा स्वास्थ्य और पोषण स्तर बनाए रखने में सहायता करते हैं। भोजन से मिलने वाले विभिन्न पौषिटक तत्त्व हैं - कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज-लवण, विटामिन्स और जल। ये सभी पौषिटक तत्त्व शरीर में विभिन्न कार्य करके हमारा पोषण-स्तर सही रखते हैं। इस मुख्य कार्य के अतिरिक्त भोजन कुछ अन्य कार्य भी करता है। आइए जाने, भोजन हमारे शरीर में क्या-क्या करता है ?

भोजन के कार्य (Functions of Food)

भोजन के कायो± को मुख्यत: तीन भागों में बांटा जा सकता है -

(1) भोजन का शारीरिक कार्य

(2) भोजन का मानसिक कार्य

(3) भोजन का सामाजिक कार्य

 (1) भोजन का शारीरिक कार्य (Physiological function) - भोजन के इस कार्य को आगे तीन भागों में बांटा जा सकता है, जो कि निम्नलिखित हैं-

(क) ऊर्जा प्रदान करना,

(ख) शारीरिक तन्तुओं का निर्माण करना,

(ग) बीमारियों से बचाव और शरीर को सुचारु रूप से चलाना।

(क) ऊर्जा देना (Energy giving) - हमारे शरीर को ऊर्जा की लगातार आवश्यकता रहती है। यह ऊर्जा शरीर की आंतरिक क्रियाओं के लिए आवश्यक है, जो कि जीवन को बनाए रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं, जैसे-श्वास क्रिया, रक्त का प्रवाह, दिल की धड़कनें आदि। ये क्रियाएं हमारे शरीर में हर समय होती रहती है और हमें इनका पता भी नहीं लगता। परन्तु इनके लिए ऊर्जा काफी मात्राा में चाहिए होती है। इन आंतरिक क्रियाओं के अतिरिक्त शरीर को बाहय कार्य करने के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है ये क्रियाएं हैं-चलना, दौड़ना, खेलना या फिर अन्य कोर्इ भी शारीरिक कार्य करना। ये क्रियाएं भी हर मनुष्य के दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। इन आंतरिक व बाहय क्रियाओं के अतिरिक्त शरीर को ऊर्जा का कुछ हिस्सा हमारे भोजन को पचाने, उसे अवशोषित करके तन्तुओं तक पहुंचाने व उनके चयापचय के लिए भी चाहिए होता है और इस क्रिया के दौरान मुक्त हुर्इ ऊष्मा हमारे शरीर का तापमान बनाए रखने में सहायक है।

ऊर्जा हमारे शरीर को मुख्यत: भोजन में उपसिथत कार्बोज व वसा से प्राप्त होती है। कार्बोज के अच्छे स्रोत हैं - अनाज, चीनी, गुड़, शहद, आलू इत्यादि। वसा के अच्छे स्रोत हैं - घी, तेल, मेवे आदि। ऊर्जा देने वाले ये सभी खाध-पदार्थ हमारे दैनिक आहार का एक मुख्य हिस्सा है।

(ख) शारीरिक तन्तुओं का निर्माण करना(Body Building)- हम जो भोजन ग्रहण करते हैं, वह हमारे शरीर का एक हिस्सा बन जाता है। अत: भोजन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है-शारीरिक तन्तुओं का निर्माण करना। एक नवजात शिशु जिसका कि शारीरिक वजन 2ण्7 से 3ण्7 किलो होता है अपने वयस्क होने पर 55 से 70 किलो होने की क्षमता रखता है, यदि वह जन्म से वयस्क तक सही प्रकार का भोजन उचित मात्राा में ग्रहण करता रहे। वयस्क होने के पश्चात भी प्रतिदिन ग्रहण किया गया भोजन हमारे शरीर के ढांचे को बनाए रखने में सहायता करता है। और शरीर में दिन-प्रतिदिन टूटने वाले तन्तुओं की मरम्मत करता है। नए तन्तुओं का निर्माण बढ़ते हुए बच्चों और गर्भावस्था में तो विशेष महत्त्व रखता है। अत: इन अवस्थाओं में तन्तु निर्माण के लिए आवश्यक पौषिटक तत्त्व अधिक मात्राा में चाहिए होते हैं। इन शारीरिक निर्माण की अवस्थाओं के अतिरिक्त भी हमारे शरीर में हर आयु में पुराने तन्तु टूटते रहते हैं और उनके स्थान पर नए तन्तु बनते रहते हैं। अत: जीवन की किसी भी अवस्था में शारीरिक निर्माण के लिए आवश्यक पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकता बनी रहती है।

शारीरिक निर्माण के इस कार्य के लिए मुख्य पौषिटक-तत्त्व हैं - प्रोटीन, खनिज-लवण और जल। प्रोटीन हमें मुख्यत: दूध व दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली, अण्डा, दालें, मेवे, सोयाबीन आदि से मिलती है। खनिज-लवण हमें इन खाध पदाथो± के अतिरिक्त फल व सबिजयों से भी मिलते हैं।

(ग) बीमारियों से बचाव व शरीर को सुचारु रूप से चलाना (Regulatory and Protective Function) - भोजन का तीसरा शारीरिक कार्य है, शरीर की क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाना और शरीर को बीमारियों से बचाव करना। शरीर की विभिन्न क्रियाएं जैसे - दिल का धड़कना, शारीरिक तापमान

                                      

  शारीरिक तन्तुओं का निर्माण करने वाले    ऊर्जा देने वाले भोज्य पदार्थ                   बीमारियों से बचाव करने वाले भोज्य पदार्थ  

           

      सिथर रखना, मांस-पेशियों का संकुचन, जल व इल्क्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखना, शरीर से बेकार पदार्थों का निकास करना इत्यादि। इस सभी क्रियाओं के लिए किसी न किसी पौषिटक तत्त्व की आवश्यकता होती है। उदाहरणतया - बी गुट के विटामिन्स हमारे शरीर के एन्जाइम्स का एक मुख्य अंग हैं, जो कि भोजन के चयापचय के लिए जिम्मेदार हैं और इस प्रकार शरीर में ऊर्जा की उत्त्पति करते हैं। इसी प्रकार शरीर से किसी भी कारण रक्त का प्रवाह होने पर उसे रोकने लिए वहां पर रक्त का एक थक्का सा जम जाता है और इस कार्य के लिए विटामिन ृकेश् का होना अतिआवश्यक है।

शारीरिक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के अतिरिक्त भोजन हमें विभिन्न बीमारियों से बचने की शकित भी देता है उदाहरणतया विटामिन ृएश् और विटामिन ृसीश् युक्त खाध-पदाथो± के सेवन से हमारे शरीर में विभिन्न रोगों के कीटाणुओं से लड़ने की क्षमता पैदा होती है।

भोजन के इस कार्य के लिए मुख्य तौर से जिम्मेदार पौषिटक तत्त्व हैं - प्रोटीन, विटामिन्स, खनिज-लवण, जल और फोक ;पिइतमद्ध। हालांकि ये पौषिटक तत्त्व हमारे शरीर को थोड़ी ही मात्राा में चाहिए होते हैं, फिर भी इनका हमारे आहार में पाया जाना अतिआवश्यक है। इन पौषिटक तत्त्वों के मुख्य स्रोत हैं -हरी पत्तेदार सबिजयां, दूध, मांस-मछली व ताजे फल-सबिजयां।

(2) भोजन का मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological function of food) - यह भोजन का दूसरा प्रमुख मनोवैज्ञानिक कार्य है जो अतिआवश्यक है। हर व्यकित अपनी एक संस्Ñति में पलता व बड़ा होता है और इसी संस्कृति की भोजन सम्बन्धी आदतें सीखता है। उसे अपनी जाति और संस्Ñति के लोगों द्वारा खाये जाने वाले भोजन ग्रहण करने से एक प्रकार की मानसिक सन्तुषिट और सुरक्षा की भावना का अनुभव होता है। रोजाना खाए जाने वाले भोजन हमें अधिक मानसिक संतोष देते हंैं। कर्इ बार पौषिटकता की दृषिट से एक संतुलित आहार भी किसी व्यकित को मानसिक सन्तुषिट नहीं दे पाता; यदि उसमें समिमलित किए गए खाध-पदार्थ नए हैं या उसके स्वाद के अनुसार नहीं हैं।

अपने मित्राों के साथ हम कर्इ बार नए खाध पदार्थ खाने की कोशिश करते हैं ताकि हम अपनी भोजन सम्बन्धी आदतों का विस्तार कर सकें। धीरे-धीरे ये ही नए भोज्य पदार्थ हमें अच्छे लगने लगते हैं और इस प्रकार ये नए स्वाद के खाध पदार्थ भी हमें मानसिक सन्तुषिट देने लगते हैं-हालांकि ऐसा करने में समय लगता है। उदाहरणतया - कोर्इ व्यकित जिसे भारतीय खाना खाने की आदत है उसे विदेश जाने पर चाइनीज या पाश्चात्य संस्Ñति के व्यंजन खाने की आदत डालने में काफी समय लगेगा परन्तु; उसे अपना भारतीय भोजन मिलने पर ही एक मानसिक सन्तुषिट का अनुभव होगा।

(3) भोजन का सामाजिक कार्य (Social Function of food) - भोजन हमारे सामाजिक जीवन का भी एक चिहन है। भोजन व उसे खाने का अपना सामाजिक महत्त्व है। किसी व्यकित के साथ भोजन करने का अर्थ है उसे दूसरे व्यकित की सामाजिक स्वीÑति, मित्राता और आदर मिलना। पहले समाज में एक सा स्थान रखने वाले व्यकित ही एक साथ खाते थे। अपने से नीचे सामाजिक स्तर के व्यकित के साथ भोजन नहीं करते थे। भोजन के माध्यम से हम अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हैं, उदाहरणतया - जीवन चक्र के विभिन्न चरणों पर दावतों का आयोजन किया जाता है, जैसे - जन्म के समय, मुन्डन पर, जन्मदिन और फिर शादी के अवसर पर। त्यौहारों आदि के मौकों पर मिठार्इ का आदान-प्रदान भी किया जाता है जैसे - दीवाली, र्इद आदि। किसी भी पार्टी, मीटिंग आदि में भोजन एक कड़ी का काम करता है, जिसके कारण लोग ऐसे सामाजिक अवसरों पर आते हैं। यहां तक कि औपचारिक मीटिंग में भी हल्का चाय-नाश्ता अवश्य दिया जाता है, जिससे उस समय पर एक ऐसा तनावरहित वातावरण बन जाता है कि लोग एक-दूसरे से खुलकर बातचीत कर सकें। ऐसे समय पर परोसे जाने वाले व्यंजन इस प्रकार के होने चाहिए कि सब लोग इकटठे हो सकें, न कि अलग-अलग हो जाएंं। भोजन आपसी मैत्राी को मजबूत करने में भी सहायक होता है - उदाहरणतया हम अपने मित्राों और रिश्तेदारों को भोजन पर आमंत्रित करके अपनी मैत्राी का परिचय देते हैं। धर्म के संदर्भ में भी भोजन का महत्त्व है। मनिदर में भगवान की मूर्ति के समक्ष नारियल, फल, मिठार्इ इत्यादि चढ़ार्इ जाती है। मनिदरों व गुरूद्वारों में प्रसाद के रूप में मिठार्इ बनार्इ जाती है। इसी तरह से किसी एक धर्म से जुड़े लोगों की खान-पान की आदतें मिलती हैं क्योंकि उनके धर्म ग्रन्थों में कुछ खाध पदार्थों की स्वीकृति है और कुछ वर्जित हैंं। अत:, हम कह सकते हैं कि भोजन सामाजिक व धार्मिक दोनों कार्य करता है।

अत: यह कहा जा सकता है कि भोजन कर्इ महत्त्वपूर्ण कार्य करता है - हमारी भूख मिटाने से लेकर आपसी मैत्राी बढ़ाने तक और सबसे जरूरी कार्य यानि हमारा स्वास्थ्य और पोषण स्तर ठीक रखना।   

      खाध वर्ग (Food group)

भोजन से अधिक से अधिक लाभ पाने के लिए यह जरूरी है कि हम ऐसा भोजन ग्रहण करें जिसमें सभी पौषिटक तत्त्व उचित मात्राा में उपसिथत हों ताकि वह हमारे शरीर में सारे कार्य कर सके। अक्सर देखा गया है कि अधिकतर खाध-पदाथोर्ं में कुछ पौषिटक तत्त्व अधिक मात्राा में और कुछ कम मात्राा में पाये जाते हैं। अत: सभी पौषिटक तत्त्व उचित मात्राा में प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आहार में अलग-अलग प्रकार के खाध-पदार्थ समिमलित करें, परन्तु यह भी मुमकिन नहीं है कि एक समय के आहार में हर प्रकार के खाध-पदार्थ को स्थान दे सकें। अत: इस मुशिकल को हल करने के लिए एक जैसे पौषिटक तत्त्व प्रदान करने वाले खाध-पदार्थों को इकटठा करके एक गुट सा बना दिया गया है, जिसे ृखाध वर्गश् का नाम दिया गया है।

खाध-वर्ग बनाने के लिए समय-समय पर अलग-अलग तरीकों का प्रयोग किया गया है। हाल ही में ष्इनिडयन कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्चष् (I.C.M.R.) ने विभिन्न खाध-पदार्थों को निम्नलिखित पांच खाध-वर्गोंं में विभाजित किया है -

(1) अनाज और शर्करा युक्त जड़ वाली सबिजयाँ

(2) दालें, मेवे व तिलहन

(3) दूध, मांस, मछली व उनसे बने पदार्थ

(4) फल व सबिजयां

(5) वसा व चीनी

इस वर्गीकरण में एक प्रकार के पौषिटक तत्त्व प्रदान करने वाले खाध-पदार्थ इकटठे एक वर्ग में डाले गए हैं। ये पांच खाध-वर्ग व उनसे मिलने वालै पौषिटक तत्त्व सारणी 1 में दिए हैं।

(1) अनाज और शर्करा युक्त जड़ वाली सबिजयां(Cereals, roots & tubers)

इस वर्ग को आगे दो भागों में बांटा गया है -

      (क) अनाज व उससे बने पदार्थ (Cereal & cereal products) - इस वर्ग में आने वाले खाध-पदार्थ हैं -गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, डबलरोटी, मैदा आदि। ये सभी खाध-पदार्थ ऊर्जा ही प्रदान करते हैं। अनाज हमारे हर भोजन का एक अभिन्न अंग है और ऊर्जा का सबसे सस्ता साधन है। कार्बोज के अतिरिक्त इनमें प्रोटीन भी पार्इ जाती है और चूंकि ये खाध-पदार्थ हमारे दैनिक आहार में काफी मात्राा में समिमलित किए जाते हैंै अत: हम इनसे काफी मात्राा में प्रोटीन प्राप्त करते हैं। अनाज में लाइसिन नामक अमीनों अम्ल की कमी होती हैं परन्तु मिथायोनीन की मात्राा काफी होती है। दालों में मिथायोनीन की मात्राा कम व लार्इसिन प्रचुर मात्राा में पाया जाता है। यदि अनाज व दालों को साथ में लिया जाए तो दोनों की कमी (मिथायोनीन व लार्इसिन) एक-दूसरे से पूरी हो जाती है व प्रोटीन की गुणवत्ता बढ़ जाती है।

अनाजों को छिलके सहित ग्रहण करने से बी गुट के विटामिन्स भी अच्छी मात्राा में ग्रहण किए जा सकते हैं, क्योंकि ये विटामिन्स अनाजों की बाहरी परतों में ही अत्याधिक मात्राा में पाए जाते हैं। इसी कारण मैदा में ये विटामिन्स नहीं पाए जाते। साबुत अनाजों में लोहा भी अच्छी मात्राा में पाया जाता है, और बाजरा तो इसका उत्तम साधन है। रागी ही एक ऐसा अनाज है, जिसमें कैलिशयम काफी मात्राा में पाया जाता है।

अनाजों में विटामिन ृएश् और विटामिन ृसीश् करीब न के बराबर ही होता है। यदि अनाजों को अंकुरित करके या खमीराकरण के पश्चात प्रयोग किया जाए, तो इससे विटामिन ृसीश् और ृबीश् गुट के विटामिन्स की मात्राा काफी बढ़ जाती है।

(ख) शर्करा युक्त जड़ वाली सबिजयां(Roots and Tubers) - इसके अन्तर्गत आने वाली सबिजयां हैं - आलू, शकरकन्द, जिमीकन्द, अरबी, कचालू आदि। ये सबिजयां मुख्यत: कार्बोज की अच्छी स्रोत हैं, यानि ऊर्जा की अच्छी साधन हैं; और इसी कारण इन्हें अनाज के गुट में ही डाला गया है। इन सबिजयों से हमें प्रोटीन तो प्राप्त नहीं होती, जबकि अनाजों से हमेें दिन भर के आहार में काफी मात्राा में प्रोटीन मिल जाती है। अत: ऊर्जा प्रापित के लिए इन्हें अनाजों के स्थान पर लम्बे समय के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए; अपितु ऊर्जा प्रापित के लिए इन्हें अनाजों के साथ प्रयोग करना चाहिए।

(2) दालें, मेवे और तिलहन (Pulses, Nuts & Oil Seeds)- इस खाध-वर्ग में आने वाले पदार्थ हैं- विभिन्न दालें जैसे - मूंग, चना, अरहर आदि। मेवे व तिलहन जैसे-मूंगफली, तिल, काजू, बादाम आदि। ये सभी खाध-पदार्थ हमारे दैनिक आहार में प्रोटीन का एक बड़ा हिस्सा प्रदान करते हैं, विशेषकर शाकाहारी लोगों के लिए, क्योंकि दालें प्रोटीन का एक बहुत अच्छा साधन हैं। इन खाध-पदार्थों से मिलने वाली प्रोटीन भी द्वितीय श्रेणी की ही होती है। दालों में अमीनो-अम्ल ृमिथायोनीनश् सीमित मात्राा में पाया जाता है परन्तु इनमें ृलाइसिनश् (अमीनो अम्ल) काफी मात्राा में पाया जाता है, जो कि अनाजों में सीमित मात्राा में पाया जाता है। इसी प्रकार अनाजों में ृमिथायोनीनश् काफी मात्राा में पार्इ जाती है। अत: जब अनाज और दालों का मिश्रित प्रयोग किया जाए तो ये आपस की कमीबेशी पूरा कर देते हैं और इन दोनों की प्रोटीन बेहतर किस्म की हो जाती है अर्थात शरीर में बेहतर प्रयोग में लार्इ जा सकती है। इसीलिए हमे इनका साथ-साथ प्रयोग करना चाहिए।

दालें विटामिन्स और खनिज लवण की भी अच्छी स्त्राोत हैं। इनमें ृबीश् गुट के विटामिन्स अच्छी मात्राा में पाये जाते हैं, विशेषकर ृथायामिनश्। दालों में विटामिन ृसीश् वैसे तो न के बराबर ही होती है परन्तु अंकुरित करने से ये विटामिन का भी बहुत अच्छा

साधन बन जाती है। आमतौर पर दालें ृलोहेश् का भी अच्छा साधन हैंं और अंकुरित करने पर इनसे प्राप्त होने वाले लोहे की मात्राा की उपलबिध और भी बढ़ जाती है।

मेवों में प्रोटीन के अतिरिक्त वसा भी काफी मात्राा में पार्इ जाती है, अत: ये ऊर्जा के भी अच्छे साधन हो जाते हैं।

तिलहन जैसे मूंगफली, तिल, सरसों के बीज आदि में भी अच्छी मात्राा में प्रोटीन पार्इ जाती है। इनका तेल निकालने के पश्चात जो खली बच जाती है, वह प्रोटीन का काफी अच्छा साधन है। अत: हम अपने आहार में इसका प्रयोग कर सकते हैं परन्तु इसे प्रोटीन के दूसरे साधनों के साथ प्रयोग करना चाहिए ताकि प्रोटीन की किस्म बेहतर हो जाए और शरीर में भली-भांति प्रयोग में लार्इ जा सके।

(3) दूध, मांस, मछली व उनसे बने पदार्थ(Milk, Meat, Fish and their Products)- इस खाध-वर्ग में आने वाले खाध पदार्थ हैं।

(क) दूध व दूध से बने पदार्थ

(ख) मांस, मछली, मुर्गी, अंडा इत्यादि

ये सभी खाध पदार्थ हमें प्रथम श्रेणी का प्रोटीन प्रदान करते हैं, अर्थात इनकी प्रोटीन में सभी आवश्यक अमीनों अम्ल उपयुक्त मात्राा में पाए जाते हैं। अत: इन सबसे मिलने वाली प्रोटीन शरीर में तन्तु निर्माण के कार्य के लिए पूर्णतया प्रयोग में लार्इ जा सकती है।     

(क) दूध व दूध से बने खाध पदार्थ (Milk and its products) - दूध व उससे बने पदार्थ जैसे - दही, पनीर आदि प्रथम श्रेणी की प्रोटीन के उत्तम साधन हैं; प्रोटीन के साथ-साथ दूध से हमें कैलिशयम, फास्फोरस, विटामिन ृएश् और राइबोफ्लेविन भी काफी मात्राा में प्राप्त होती हैं बढ़ते हुए बच्चों के लिए तो यह एक आवश्यक खाध-पदार्थ है - क्योंकि इससे उन्हें उत्तम किस्म की प्रोटीन मिलती है। छोटे शिशु के लिए तो केवल दूध ही ऐसा आहार है जिसे वह आसानी से ग्रहण और हजम कर सकते हैं और यह उनकी शारीरिक जरूरतें भी काफी हद तक पूरी करता है।

(ख) मांस, मछली, मुर्गी, अंडा आदि (Meat, Fish, Egg and products) - ये सब खाध-पदार्थ भी प्रथम श्रेणी की प्रोटीन के उत्तम साधन हैं, जो कि शारीरिक निर्माण के लिए पूर्णतया प्रयोग में लार्इ जा सकती है। इन खाध-पदार्थों में ृबीश् गुट की विटामिन्स भी अच्छी मात्राा में पार्इ जाती है। इन सब में से कलेजी-विटामिन ृएश् और विटामिन ृबीश् का एक उत्तम साधन है। अंडे में अधिकतर पौषिटक तत्त्व पाए जाते हैं परन्तु ये विशेषतौर पर प्रोटीन, वसा, विटामिन ृएश्, विटामिन ृडीश्, लोहा, कैलिशयम और फास्फोरस के अच्छे साधन हैं।

(4) फल व सबिजयां (Vegetables and fruits) - इस खाध-वर्ग के अन्तर्गत ताजे फल व सबिजयाँ आती हैं, जो हमारे शरीर को मुख्यत: विटामिन्स और खनिज-लवण प्रदान करते हैंं। इसमें विभिन्न सबिजयां जैसे- पालक, मेथी, बन्दगोभी, फूलगोभी, गाजर, भिण्डी आदि और फल, जैसे-पपीता, आम, सेब, टमाटर, संतरा, अमरूद आदि आते हैंं।

हरी पत्तेदार सबिजयां और पीले और नारंगी रंग के फल व सबिजयां हमें मुख्यत: कैरोटीन (विटामिन ृएश् का पूर्वगामी पदार्थ) प्रदान करती हैं, जबकि खटटे रसदार फलों से हमें विटामिन ृसीश् की प्रापित होती है। हरी पत्तेदार सबिजयों में बी गु्रप के विटामिन भी पाए जाते हैं। कुछ फल जैसे - आड़ू, अनानास, किशमिश और सबिजयां, जैसे-मैथी सरसों का साग, चने का साग आदि लोहे के अच्छे साधन हैं, जबकि कैलिशयम तो अधिकतर हरी पत्तेदार सबिजयों से ही मिलता है।

इन सब पौषिटक तत्त्वों के अतिरिक्त फल व सबिजयों से हमें फोक ;पिइतमद्ध भी काफी मात्राा में प्राप्त होता है, जो कि इनके रेशों में पाया जाता है। फोक ;पिइतमद्ध का हमारे शरीर में पाचन तो नहीं होता परन्तु आहार में इसका पाया जाना अतिआवश्यक है, क्याेंकि यह शरीर से गन्दगी को मल के रूप में बाहर निकालने में सहायता करता है।

(5) वसा व चीनी (Fats/oil and Sugar/Jaggery) - वसामय पदार्थ जैसे-तेल, वनस्पति घी, मक्खन व देसी घी सभी ऊर्जा के अमूल्य साधन हंै। हर वसामय पदार्थ हमारे शरीर को 9 किलो कैलोरी ग्राम प्रदान करता है। इनका प्रयोग मुख्यत: खाना पकाने के लिए किया जाता है, अत: ये हमारे आहार का एक अभिन्न अंग हैं। ये खाने को स्वादिष्ट बनाने में भी मदद करते हैं।

चीनी, गुड़, शहद आदि भी हमारे शरीर को ऊर्जा ही प्रदान करते हैं जो कि कार्बोज के रूप में होती है। अत: प्रति ग्राम चार किलो कैलोरी प्रदान करते हैं। चीनी से तो केवल कार्बोज ही मिलता है, जबकि गुड़ से कार्बोज के साथ-साथ कुछ मात्राा में लोहा भी प्राप्त होता है।

हालांकि अधिकतर खाध-पदार्थ तो इन पांच खाध वर्गों के अन्तर्गत आ जाते हैं, फिर भी कुछ आमतौर पर प्रयोग में लाए जाने वाले पदार्थ किसी भी खाध-वर्ग में नहीं आते जैसे-मसाले इत्यादि। मसालों का प्रयोग मुख्यत: हमारे भोजन को स्वादिष्ट और आकर्षक बनाने के लिए किया जाता है। हालांकि इन में कुछ पौषिटक तत्त्व काफी मात्राा में पाए जाते हैं। परन्तु इनका हमारे आहार में इतनी कम मात्राा में प्रयोग किया जाता है, कि हमे इनमें कुछ खास मात्राा में कोर्इ भी पौषिटक-तत्त्व नहीं प्राप्त होता।

इस प्रकार इनिडयन ष्कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्चष् द्वारा किए गए इस वर्गीकरण में एक प्रकार की पौषिटकता देने वाले खाध-पदार्थों को एक खाध-वर्ग में रखा गया है। इस प्रकार हर खाध वर्ग की गुणवत्ता को प्राप्त करने के लिए हमें अपने हर आहार में शकित देने वाले खाध-वर्गोंं (अर्थात अनाज व जड़ वाली सबिजयां तथा चीनी व गुड़) और शरीर में तन्तु निर्माण करने वाले खाध-वर्गोंं (अर्थात दूध, मांस, मछली तथा दालें व तिलहन) में से कुछ न कुछ खाध-पदार्थ अवश्य समिमलित करने चाहिए। हमें ष्शकित देने वालेष्, ष्शरीर में तन्तु निर्माण करने वालेष् तथा ष्शरीर को बीमारियों से बचाने और सुचारू रूप से चलाने वालेष् सभी खाध-पदार्थ प्राप्त हो जाएंगे।

आहार-आयोजन को और भी सरल बनाने के लिए, खाध-पदार्थों का उनके कार्यों के आधार पर भी वर्गीकरण किया गया है। अत: भोजन को तीन शारीरिक कार्यों के अनुसार खाध-पदार्थों को निम्नलिखित तीन खाध-वर्गों में बांटा गया है -

(1) ऊर्जा देने वाला खाध-वर्ग

(2) शारीरिक निर्माण करने वाला खाध-वर्ग

(3) शारीरिक बचाव व गतिविधियों को सुचारू रखने वाला खाध-वर्ग         

(1) ऊर्जा देने वाला खाध-वर्ग (Fats/oil and Sugar/Jaggery) - इस खाध-वर्ग के अन्तर्गत आने वाले खाध-पदार्थ हैं - विभिन्न प्रकार के अनाज, शर्करा युक्त जड़ वाली सबिजयां, जैसे- आलू, शकरकन्द, अरबी आदि वसा व चीनी गुड़ आदि। ये सभी खाध-पदार्थ या तो कार्बोज के अच्छे साधन हैं या फिर हमें वसा प्रदान करते हैं, अत: ये सभी हमें ऊर्जा देते हैं। यह ऊर्जा शरीर के विभिन्न आन्तरिक क्रियाओं के लिए तथा शारीरिक कार्य करने के लिए प्रयोग में लार्इ जाती है।

(2) शारीरिक निर्माण करने वाला खाध-वर्ग (Body Building food products) - इस खाध-वर्ग में समिमलित किए जाने वाले खाध-पदार्थ हैं- दूध व दूध से बने पदार्थ, अंडा, मांस, मछली, दालें, मेवे, सोयाबीन आदि। इस वर्ग में आने वाले खाध-पदार्थ विशेषतया प्रोटीन के अच्छे साधन हैं, हालांकि इनसे हमें कुछ विटामिन और खनिज लवण भी प्राप्त होते हैं। अत: ये सभी खाध-पदार्थ बढ़ते हुए शरीर में नए तन्तु निर्माण और वयस्क शरीर में पुराने तन्तुओं की टूट-फूट होने पर उनके स्थान पर नए तन्तु बनाने के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं।

(3) शारीरिक बचाव व गतिविधियों को सुचारू रखने वाला खाध-वर्ग (Food for Protective and regulatory function)

निदबजपवदद्ध - इस खाध-वर्ग में फल, हरी पत्तेदार सबिजयाँ व अन्य सभी सबिजयाँ समिमलित हैं। इन खाध-पदार्थों से हमें मुख्यत: विटामिन्स और खनिज लवण की प्रापित होती है। ये सभी पौषिटक तत्त्व शरीर की विभिन्न क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने में सहायक हैं और साथ ही हमारे शरीर को विभिन्न बीमारियों के कीटाणुओं से लड़ने की क्षमता भी प्रदान करते हैं।

इस प्रकार शारीरिक कायो± के अनुसार किए गए इस वर्गीकरण के आधार पर बने तीनों खाध-वर्गों में से यदि हम कुछ-न-कुछ खाध पदार्थ अपने हर आहार में समिमलित करें, तो वह पूर्ण आहार होगा। अपने आहार को ृपूर्णश् बनाने के लिए यह जरूरी नहीं कि हम तरह-तरह के व्यजन बनाएं, परन्तु यदि हम खाध-पदार्थों का सावधानी से चुनाव करें तो हम आसानी से एक ृपूर्णश् और ृसंतुलितश् आहार पा सकते हैं। उदाहरणतया - किसी भी सब्जी के परांठे बनाकर दही के साथ खाना इसी प्रकार मिस्सी रोटी, यानि आटे और बेसन से मिली रोटी में ही हरी पत्तेदार सब्जी मिलाकर और भी आसानी से संतुलित आहार की प्रापित की जा सकती है। ृपूर्ण आहारश् के अन्य उदाहरण हैं - दाल, रोटी और सब्जी, इडली व सांभर, दही के साथ सबिजयों का पुलाव, सबिजयाँ व पनीर के सैंडविच आदि।

इस प्रकार ृपूर्ण आहारश् ृसंतुलित आहारश् का ही एक अंग है।

संतुलित आहार (Balanced Diet) - ष्विभिन्न खाध-पदार्थों के मिश्रण से बना वह आहार जो हमारे शरीर को सभी पौषिटक तत्त्व हमारी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार उचित मात्राा में और साथ ही शरीर के संचय कोष के लिए भी कुछ मात्राा में पौषिटक तत्त्व प्रदान करता है ृसंतुलित आहारश् कहलाता है।ष् शरीर के संचय कोष में जमा पौषिटक-तत्त्व किसी भी कठिनार्इ के समय शरीर में प्रयोग में लाए जा सकते हैं।

अत: हमारा आहार संतुलित तभी कहलाएगा जब हम उचित मात्राा में भोजन करें जो कि हमारे शरीर के सभी पौषिटक आवश्यकताओं को पूरा कर सके और जरूरत पड़ने पर, जैसे कि बीमार होने पर, हमें आवश्यक पौषिटक तत्त्व प्रदान कर सके।

अत: हमें ऐसा संतुलित आहार प्राप्त करने के लिए ऐसे सभी खाध-पदार्थ ग्रहण करने चाहिए, जिससे हमें ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन्स व खनिज-लवण सभी उचित मात्राा में प्राप्त हो सके। ऐसा करना इसलिए आवश्यक है ताकि हम भोजन के तीनों शारीरिक कायो± का अधिकतम लाभ उठा सकें।

हालांकि एक संतुलित आहार की संरचना किसी भी व्यकित की आयु, लिंग, शारीरिक कार्य, व शारीरिक अवस्था पर निर्भर करती है, जिसकी चर्चा अगले अध्याय में की जाएगी। फिर भी, उदाहरण के तौर पर मध्यम आय वर्ग के एक वयस्क व्यकित के लिए एक दिन की आहार-तालिका नीचे दी गइ है -


6 पाठ 6 आहार आयोजन

पाठ 6

आहार आयोजन

(Meal Planning)

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आहार आयोजन का अर्थ है ऐसी योजना बनाना, जिससे सभी पोषक तत्त्व उचित मात्राा व संतुलन में प्राप्त हाें, अर्थात पर्याप्त पोषण। क्योंकि एक परिवार का स्वास्थ्य व तंदुरुस्ती इस बात पर निर्भर करती है कि, वह किस तरह का भोजन कर रहा है। अत: यह प्रत्येक आहार-आयोजक के लिए है, और उसी कार्य को भली प्रकार से करने पर उसे पुरस्कार के रूप में खुशी मिलती है। इतना ही नहीं, कुछ अन्य कारण जैसे भोजन का पाचन, परिवार के धार्मिक व सामाजिक मान्यताएं, भोजन से जुड़े अन्धविश्वास इत्यादि भी निर्धारित करते हंै, कि क्या वास्तव में ऐसा भोजन व्यä यिदि चाहे तो लेकर ग्रहण कर सकता है।

एक अच्छे आहार आयोजन के क्या लक्षण हैंै ? सबसे पहले तो इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि पौषिटक होने से पहले भोजन को खाने लायक आकर्षक होना चाहिए, क्योंकि चाहे भोजन की पौषिटकता कितनी ही क्यों न हो कोर्इ भी व्यä एिेसा भोजन नहीं खायेगा, जो उसे पसन्द न हो। खाना खाने की इ़च्छा का सम्बन्ध केवल भूख की पूर्ति से नहीं है, अपितु, उसके स्वाद से, खुशबू से रंग से, आसपास के वातावरण, मन की सिथति व अच्छा भोजन खाने की खुशी से भी है।

अत: आहार आयोजन एक कला भी है और विज्ञान भी। कलात्मक-दृषिट से विभिन्न रंग, रूप व सुगन्धों का मिश्रण और वैज्ञानिक दृषिट से ऐसे खाध पदाथो± का चयन करना, जिनसे पर्याप्त पोषण प्राप्त हो तथा जिसे आसानी से पचाया जा सके।

आहार आयोजन का महत्त्व (Importance of Meal Planning)

आहार आयोजन से विभिन्न साधनों जैसे भौतिक पदार्थ, समय, ऊर्जा व मुæा का सदुपयोग किया जा सकता है, जिससे व्यकित व परिवार की भौतिक, सामाजिक, व मानसिक आवश्यकताओं की पूत्र्ति हो सके। परिवार के विभिन्न सदस्यों की पोषक आवश्यकताओं की पूत्र्ति के लिए, आहार का आयोजन करना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। ऐसा, उन्हें âष्ट-पुष्ट, स्वस्थ रोगों से मुä व कुपोषण से बचाये रखने के लिए आवश्यक है।

समय, ऊर्जा व इ±धन की बचत के लिए, आहार आयोजन का अत्यन्त महत्त्व है। आहार आयोजन करते समय भोजन पकाने की ऐसी विधियों के बारे में सोचा जा सकता है, जिससे पोषक तत्त्वों का अधिकाधिक सरंक्षण किया जा सके, व कम से कम निकासी।

आहार का ऐसा आयोजन किया जा सकता है, जो पारिवारिक आय के अनुरूप हो। इस तरह से धन की बचत भी की जा सकती है और धन सही तरीके से खर्च भी किया जा सकता है। अधिक धन व्यय किये बिना ही, एक भरपूर पौषिटक आहार का आयोजन किया जा सकता है। अत: आहार आयोजन पारिवारिक आय के अनुरूप योजना बनाने के लिए प्रेरित करता है।

आहार आयोजन करने से, एक खाध वर्ग मेंं से विभिन्न प्रकार के खाध पदार्थों को चुना जा सकता है, जिससे भोजन में विभिन्नता आ सके। इतना ही नहीं अलग-अलग तरह के खाध पदाथो± का उपयोग करना, पोषण की दृषिट से भी आवश्यक है। आहार आयोजन की पूरकता, विभिन्न खाध पदाथो± की खरीद, उनका स्तर, मूल्य संंंंग्रह तथा बनाने की विधि को दर्शाता है।

आहार आयोजन के सिद्धान्त (Objectives of Meal Planning)

1. परिवार की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करना।

2. खर्चा परिवार के खाध-बजट में सीमित रखना।

3. परिवार के विभिन्न सदस्यों की पसन्द-नापसन्द का ध्यान रखना।

4. भोजन पकाने की ऐसी विधियों का प्रयोग करना, जिससे अधिकाधिक पोषक तत्त्व बचाया जा सके।

5. समय, इ±धन व ऊर्जा की बचत करना।

6.आकर्षक व खाने को लालयित करता परोसा गया भोजन।

आहार आयोजन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Meal Planning)

आहार आयोजन चाहे एक परिवार का साधारण भोजन हो या किसी कंंपनी का भव्य भोजन समारोह, कुछ कारकों को

ध्यान में रखना पड़ता है। ये हैं -

1. पौषिटक पूर्णता (Nutritional adequacy)- आहार ऐसा होना चाहिए, जो परिवार के सभी सदस्यों की पौषिटक आवश्यकताओं की पूत्र्ति कर सके। एक व्यä सिे दूसरे व्यä किी आवश्यकताओं में विभिन्नता होती है, जो कि, उसी की आयु, लिंग, कार्य और शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। अत: परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकता का ध्यान रखना चाहिए। आहार संतुलित रखने का सबसे अच्छा तरीका है, कि सभी पांच खाध वर्गों से भोजन का चुनाव हो।

परिवार के विभिन्न सदस्यों की पौषिटक आवश्यकता में भिन्नता का अर्थ ये नहीं है कि सभी के लिए भोजन अलग से पकाया जाए, बलिक आहार का ऐसा आयोजन करना चाहिए जिससे कि एक ही तरह के भोजन को पकाते हुए, सभी सदस्यों की पौषिटक आवश्यकताओं की पूत्र्ति हो सके। उदाहरणत: कुछ खाध पदार्थों की मात्राा में कमी या बढ़ोत्तरी, वृद्धि के दौरान अधिक प्रोटीन-युä खाध पदाथो± का चयन। इस तरह से एक ही सलाद, एक हल्के वजन वाले और भारी वजन वाले व्यä किे दिया जा सकता है, यदि दूसरे व्यä कि सलाद बिना ड्रेसिंग के दें।

2. मितव्ययिता (Economy) - आहार आयोजन इस बात पर भी निर्भर करता है कि भोजन के लिए कितना व्यय किया जा सकता है, जो कि व्यä किे सामाजिक-आर्थिक स्तर पर निर्भर करेगा। आहार का एक बड़ा भाग आहार पर व्यय किया जाता है, इसलिए पैसे को मितव्ययितापूर्वक व्यय करके अधिकतम उपयोग लेना चाहिए। हांलाकि एक मध्य वर्ग का परिवार बहुत महंगे खाध पदार्थ नहीं खरीद सकता, पर फिर भी कुछ हद तक अपनी पसन्द से चुनाव करके, भोजन में विभिन्नता लार्इ जा सकती है। निम्न आय वर्ग के परिवारों में अपनी पसन्द से भोजन का चुनाव न के बराबर होता है और उनके लिए यह अधिकाधिक आवश्यक हो जाता है, कि अनाज से बने खाध पदार्थ ही भोजन का मूल रूप हों। इस समय ऐसे खाध पदाथो± को चुनने की कठिनार्इ आती है, जिसे अनाज के साथ लेकर, आहार को संतुलित बनाया जा सके। हांंंंंंलाकि यह कार्य मुशिकल है, पर असम्भव नहीं। अच्छी मात्राा में पोषक तत्त्व प्रदान करने वाले सस्ते खाध पदार्थों को, महंंगे खाध पदाथो± की अपेक्षा विकल्प के रूप में जानना आवश्यक है। ऐसी विधियों व खाध पदार्थ आहार आयोजन में समिमलित करनी चाहिए, जैसे अनाज दाल का मिश्रण उदाहरणत: खिचड़ी, पौषिटक रोटी, मौसमी सबिजयों, मठठा, गुड़़, अचार व चटनी।

3. उपलब्ध सुविधाएं व सहायता (The facilities and help available)- पकाने पर व्यय, दूसरी उपलब्ध सुविधाओं व सहायता पर निर्भर करता है। उदाहरणत: नौकर से सहायता, पके पकाये भोजन, समय बचाऊ यंत्रा इत्यादि। फिर भी, समय का धन की तरह से सदुपयोग करना आवश्यक है। भोजन पकाने मेें समय का आयोजन उस गृहणी के लिए और भी आवश्यक है, जो घर के बाहर काम पर जाती है।

4. क्षुधा संतुषिट (Satiety Value) - एक व्यä किे लिए भोजन ऐसा होना चाहिए जो भूख की संतुषिट करे, जिससे अगले भोजन के समय तक भूख न लगे। कार्बोज की अपेक्षा वसा व प्रोटीन में भूख मिटाने की अधिक क्षमता है, क्याेंकि यह देर से पचते हैं। उदाहरण के लिए नाश्ते व चाय में लिए हुए टोस्ट से, दोपहर के भोजन तक इतनी क्षुधा संतुष्ट नहीं होगी, जितनी ऐसे नाश्ते से जिसमेंं दूध, अनाज, अंडे व फल हों।

5.  व्यäगित पसन्द नापसन्द (Personal likes and dislikes) - हांलाकि प्रत्येक खाध वर्ग से प्रस्तावित आहारीय मात्राा लेनी चाहिए, परन्तु फिर भी एक ही खाध वर्ग में विभिन्न खाध पदार्थों के लिए व्यäगित चुनाव की गुंंंजाइश हैं। कुछ लोग अपनी पसन्द नापसन्द को आधार रखकर खाध पदार्थाेंंंं का चयन करते हैं - जैसे दूध को आहार में न लेना सामान्यतया देखा जाता है। एक खाध पदार्थ को बिल्कुल आहार में समिमलित न करने से अच्छा है, उसका रूप बदलकर लेना। उदाहरण के लिए दूध को दही, कस्टर्ड, पनीर या मीठे व्यंजन के रूप में लिया जा सकता है। इसी तरह से सोयाबीन के आटे को, गेहूं के आटे में मिलाकर चपाती बनार्इ जा सकती है।

6. धार्मिक व सामाजिक मान्यताएं (Religion, Tradition and Customs) - इस बात को तय करने के लिए, कि किसको कौन सा खाध पदार्थ, किस आहार में देना है, आहार किस तरह का देना है, या कौन-सा व्यंजन परिवार के किस व्यä कि देना है, इन मान्यताओं को जानना जरूरी है। जैसे कि मुसलमान सूअर का मांस नही खाते व हिन्दू गाय का मांस नहीं लेते। त्योहारा व शादियों मेंं चावल बनाना शुभ माना जाता है। बंगाल में विधवाओं को मछली नहीं परोसी जाती। अत: धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए ही, परिवार के लिए आहार का आयोजन करना चाहिए।

7. भोजन सम्बनिधत धारणायें (Food fads and fallacies) - पोषण सूचना की अपेक्षा अन्ध-विश्वासों को कर्इ बार ज्यादा प्रचार मिलता है। जैसे इस समय यह नही खाना, उस दिन वह नही इत्यादि। अत: आहार आयोजन करते समय, इन धारणाओं को दूर कर पौषिटक भोजन प्रदान करना चाहिए।

8. खाध पदाथो± की उपलबिध एवं मौसम (Availability of food stuffs and climate)- पुराने समय में भोजन सम्बन्धी आदतें, उस क्षेत्रा या समाज में उत्पादित खाध पदाथो± पर निर्भर करती थीं। परन्तु आजकल बेहतर आहार सरंंंंक्षण व वितरण से जल्द से जल्द खराब होने वाले खाध पदार्थ भी काफी जगह उपलब्ध रहता है। खाने के तौर तरीको में संसार भर में, जो इतनी विभिन्नताएं दिखार्इ पड़ती हैं, वो अधिकतर खाध पदाथो± की उपलबिध पर निर्भर करती हैं, जो फिर मौसम पर निर्भर करती है। अत:

      मौसमी खाध पदाथो± का ही चयन करना चाहिए। इसी तरह से मौसम के अनुसार व्यंंंंजन चुनने चाहिए, जैसे सर्दियों में गर्म सूप देना व गर्मियों में ठंडे जूस व ठंडे सलाद।

9.  विभिन्नता (Variety) - यह बहुत ही अनिवार्य है, क्योंकि कोर्इ भी व्यä अिपनी कितनी ही पसन्द का पकवान क्योें न हो, रोज-रोज खाना पसन्द नहीं करता। अत: विभिन्नता लाने के लिए एक खाध पदार्थ को दो बार दिन के भोजन मेेंंंंंंंं समिमलित नहीं करना चाहिए। कुल मिलाकर, विभिन्नता, खाध पदाथोर्ं के विभिन्न रंंंगों के योग से, नरम व कुरकुरे स्वाद से तीखी खुश्बू से व गर्म व ठंडे व्यंंजनों से लार्इ जा सकती है। इससे पोषण में भी सुधार होता है, व भोजन की अच्छी, आकर्षक विभिन्नता (रंग रूप व खुश्बू के रूप में) से भूख को बढ़ाया जा सकता है जो, स्वाद में भी अच्छी लगती है। विभिन्न पकाने की विधियाें से भी विभिन्नता लार्इ जा सकती है - जैसे एक भोजन में तंदूरी रोटी, दाल, मौसमी हरी पत्तेदार सब्जी व सख्त सलाद देकर।

10. भोजन का समय (Meal times) - आहार आयोजन का यह आवश्यक कारक है। आहार, आहार के अनुसार आयोजित करना चाहिए। जैसे की सुबह का नाश्ता, दोपहर या रात्रि का भोजन। सामान्यतया, इस बात का ध्यान रखा जाता है, कि पूरे दिन की एक तिहार्इ पौषिटक आवश्यकताएं दोपहर के भोजन द्वारा, एक तिहार्इ रात्रि के भोजन के द्वारा व एक तिहार्इ सुबह के नाश्ते व शाम की चाय द्वारा पूरी होनी चाहिए। यह कोर्इ सख्त नियम नही है, और व्यäगित आवश्यकताओं के कारण से बदला जा सकता है, यदि पूरे दिन की आवश्यकता की पूत्र्ति हो रही हो।

11. अवसर (Occasion) - रोज के भोजन के लिए पौषिटक आवश्यकताओं को महत्ता दी जाती है। पर विशेष अवसर के लिए, रंग, रूप व खुश्बू को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसका तात्पर्य ये नहीं कि पौषिटक आवश्यकताओं की और बिल्कुल ध्यान न दिया जाए। इसी तरह से विभिन्न त्योहारों पर भी विशेष व्यंंजन बनाए जाते हैं जैसे दिवाली पर मिठाइयां, क्रिसमस पर केेक, इत्यादि।

विभिन्न समय के भोजन के लिए आहार आयोजन ;डमंस च्संददपदह वित कपमितमदज डमंसे पद ं क्ंलद्ध

1. सुबह का नाश्ता - यह एक बहुत ही आवश्यक आहार है, क्योंकि यह रात्रि के भोजन के 10-12 घण्टे बाद अगले दिन लिया जाता है। आहार सुयोजित, पौषिटक, आकर्षक होना चाहिए तथा पूरे दिन की एक तिहार्इ से एक चौथार्इ पौषिटक आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए। पर इतनी अधिक भारी भी नहीं होना चाहिए, कि उसे ग्रहण कर, व्यä सिुस्त हो जाए। स्कूल जाने वाले बच्चे, अधिकतर सुबह का नाश्ता नहीं लेते, जिससे वे कुछ समय बाद पढ़ार्इ पर ध्यान नहीं दे पाते।

सुबह के नाश्ते में निम्न खाध पदार्थ लेने चाहिए -

1. फल या फलों का जूस

2.अनाज के व्यंजन - परांठे, पूरी, टोस्ट, खीर

3.प्रोटीन से बने पदार्थ - अंडे, दूध, सासेज

4. पेय पदार्थ - चाय, काफी, मट्टा, दूध, लस्सी

निम्न आय वर्ग के लिए मीनू -

1.केला (मौसमी फल)

2.अनाज व प्रोटीन का व्यंजन - मिस्सी रोटी

3. चाय, लस्सी, दूध

मध्यम आय वर्ग के लिए मीनू -

1. सेब

2.पराठा (भरवां) व दही या लस्सीचाय और अचार

या

पूरी सब्जी और एक गिलास दूध

उच्च आय वर्ग के लिए मीनूपद्धति पर आधारित मीनू -

1.फलों का जूस (संतरा, अन्नानास)

2. दलिया (कार्नफलेक्स, चिड़वा, जौं, दलिया इत्यादि) दूध के साथ

3. तले अंडे और सासेजपनीर की सब्जी

4. मक्खन लगी डबलरोटी

5. काफीचाय

2. दोपहर का भोजन

यह दिन का प्रमुख भोजन है, अत: बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। पूरे दिन की एक तिहार्इ पौषिटक आवश्यकताएंं, इसी भोजन से पूर्ण होती है। परिवार के जो सदस्य घर पर इस भोजन को नहीं करते, उन्हेंं बंधा हुआ, ऐसा टिफिन देना चाहिए, जो पौषिटक, आकर्षक आसानी से ले जाने वाला व विभिन्नतापूर्ण हो।

टिफिन का मीनू (स्कूली बच्चों के लिए)

1. पनीरदाल के भरवा परांठे

2. फल जैसा संतरा

3. केक का टुकड़ा

या

1. सैंडविच; पनीर अंडा फलियां

2. मीठा व्यंजन (मूंगफली की चिकी) बेसन लडडू हलवा बर्फी

बच्चों के लिए टिफिन आकर्षक, आसानी से ले जाने वाला, विभिन्नतापूर्ण होना चाहिए।

1. परांठाचपाती

2. सूखी सब्जी

3. सूखी दाल

4. सलादफल

छुटटी वाले दिन, जब परिवार के सभी सदस्य घर पर हों सामान्यत: दूसरा मीनू तैयार किया जाता है।

सामान्य दोपहर का भोजन (छुटटी के दिन के लिए)

1.सूप

2. अनाज का व्यंंजन-चावलपुलावचपातीपरांठापूरी

3.मीटअंडे की सब्जीकाबुली चनादाल

4. सब्जी-गाजर, मटर की सब्जीकोफतें

5. दही का व्यंंंजन

6. सलाद

7. मीठा व्यंजनफल-कस्टर्डखीरगाजर का हलवासूफले फ्रूट सलादफ्रूट क्रीम

खाध पदाथो± का चुनाव और व्यंजनों की संख्या, परिवार की सामाजिक-आर्थिक सिथति के अनुसार होती है। तरी वाले व्यंजन, दही इत्यादि, जो टिफिन में नहीं ले जाये जा सकते, उन्हें इस भोजन में समिमलित करना चाहिए।

उदाहरण-

1. साबुत मूंग, बैंगन का भर्ता, चावलचपातीदही, फल

2.भरवां तंदूरी परांठा, दही, आलू-मटर की तरल सब्जी, सलाद

3. चपाती, मटर-पनीर की तरल सब्जी, सीताफल की सब्जी, फल

4. चावल, सांभर, मीठी दही फलाें के साथ

3. शाम की चाय

ये अधिकतर हल्का भोजन है, तथा इनमें पकोड़ा, कटलेटस, मिठाइयां, मठरी जैसे अल्पहार व चायकाफीजूस जैसे पेय पदार्थ समिमलित किये जा सकते हैं।

बच्चों के लिए अल्पाहार देना चाहिए जैसे सैंडविच, लडडू, बर्फी, केक इत्यादि।   

 यदि किसी विशेष अवसर की चाय हो, तो 3ऋ4 अल्पाहार समिमलित किये जा सकते हैं।

सामान्य शाम की चाय का मीनू

1. पकोड़े, चाय

2. टमाटर का सैंडविच, चाय

3. मठरी, लडडू, चाय

4. बिस्कुट, बड़े, चाय

5. जलेबी, वेफर्स, चाय

विशेष अवसर के लिए, शाम की चाय का मीनू

1. तिरंगा सैंडविच, नारियल के रोल्स, तले हुए काजू, चाय

2. कटलेटस, रसगुल्ले, चिड़वा, बिस्कुट, चाय

3. चाकलेट बर्फी, समोसा, पेस्ट्री, वेफर्स, चाय

4.नारियल की बर्फी, खाण्डवी, गुलाब जामुन, दाल-मोठ, चाय

5. काजू की बर्फी, मंूगफली के कटलेटस, चाकलेट का केक, चिड़वा, चाय

3. रात्रि का भोजन

यह भी दिन का प्रमुख भोजन है और इससे दिन की एक तिहार्इ पौषिटक आवश्यकता पूर्ण होनी चाहिए। जो कमी पूरे दिन के भोजन मेंंंंंंंं रह गर्इ हो उसे, इसी भोजन में पूरा करना चाहिए जैसे दोपहर में यदि दही न दी हो, तो रात्रि के भोजन में समिमलित करना चाहिए।

जब किसी मेहमान को बुलाया जाता है, तो मीनू लम्बा व भिन्न होता है, अन्यथा दोपहर के भोजन जैसा होता है। त्योहारों इत्यादि पर, उस त्योहार के हिसाब से व्यंंंंजन बनने चाहिए, जैसे दिवाली पर मिठाइयां, क्रिसमस पर केक, र्इद पर सेवइयां, होली पर गुझिया इत्यादि।

आहार आयोजन करते समय कुछ सुझाव

1. पूरे दिन को एक इकार्इ समझना चाहिए, एक आहार को नहीं।

2. पूरे दिन में प्रोटीन, वसा व कार्बोज को बांट देना चाहिए, जिससे किसी एक समय के भोजन में, एक तरह के पोषक तत्त्व की अधिकता न हों।

3. मौसमी खाध पदाथो± का प्रयोग करना चाहिए, क्याेंकि वे सस्ते व खुश्बू में अच्छे होते हैं। फिर भी एक ही खाध पदार्थ बार-बार नहीं देना चाहिए। खासकर एक ही आहार मेें जैसे- टमाटर का सूप, टमाटर, मेकरोनी व टमाटर की सलाद। परन्तु पूरे दिन में, कुछ खाध पदार्थ दोबारा दिये जाते हैं जैसे अनाज, दूध, मक्खन।

4. रंग, खुशबू व बने हुए व्यंजन की प्रÑति की और ध्यान देना चाहिए उदाहरण विभिन्न रंगो का मिश्रण देकर, बने हुए व्यंजनों को ऊपर से सजाकर अधिक आकर्षक बनाये जा सकते हैं। विभिन्न व्यंंंंजनो की प्रÑति एक जैसी नहीं होनी चाहिए जैसे कुछ मुलायम और कुछ कुरकुरे स्वाद वाले पदार्थ देने चाहिए जैसे कि सूप में टोस्ट की हुर्इ ब्रेड दी जाती है।

5. विभिन्न व्यजंनो में संतुलन होना चाहिए, जैसे कुछ व्यंजन हल्के व कुछ भारी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए भारी सूप के साथ हल्का भोजन या इसके विपरीत दिया जाना चाहिए।

6. परिवार के मन-पसन्द व्यंजन, विभिन्न आहार के समय देने चाहिए, परन्तु इसका अर्थ ये नहीं, कि यही सीमित व्यंजन देने चाहिए, बलिक नए व्यंजन देकर खाध आदतों को बढ़ाना चाहिए।

7. भोजन पर धन की बचत निम्न तरीकों से की जा सकती हैं :

(अ) खरीदने से पहले मूल्य की तुलना कर लेनी चाहिए।

(आ) बड़े पैकेट खरीदना।

(इ) थोक बाजार फुटकर बाजार से सस्ते होते हैं।

(इ) जितनी आवश्यकता होे उतना ही पकाएं यदि भोजन बच जाए तो अन्य व्यजंन बनाने में उसकी मदद लें।   

(उ) मौसमी फलों व सबिजयों का प्रयोग करें।

(ऊ) हिसाब किताब रखें।

8. समय की बचत निम्न तरीको से की जा सकती हैं -

(अ) कर्इ दिनों का आहार आयोजन, एक ही समय में कर लें।

(आ) सूखे खाध पदार्थ, कम से कम एक महीने के लिए एक ही बार खरीद लें।

(इ) भीड़ के समय बाजार जाने से बचें।

(र्इ) रसोइघर में चीजों को व्यवसिथत रखें, जिससे काम करते हुऐ समय की बचत हो।

(उ) प्रैशर-कुकर का इस्तेमाल करें।

(ऊ) काम करते हुए, समय का व्यवस्थापन करें।

(ए) यदि धन की दृषिट से संभव हो, तो ृसमय बचाउश् यंत्राों का उपयोग करें, जैसे मिक्सी।

आहार की योजना किस प्रकार बनार्इ जाए

अभी जिन पहलुओं पर विचार किया गया है, उन्हें ध्यान में रखते हुए, पूरे दिन का मीनू, विशेष व्यकित के लिये तैयार किया जाता है।

आहार की पौषिटक पूर्णता को जांचने के लिए, इन तत्त्वों की गणना की जाती है। इस कार्य के लिए आहार तालिका (भारतीय आहार तालिका की पौषिटक गणना एन. आर्इ. एन.; आर्इ. सी. एम. आर.) का प्रयोग किया जाता है, जिसमें विभिन्न खाध पदार्थ की प्रति 100 ग्राम में पौषिटक मात्राा दी गर्इ है। अधिकतर, पोषक तत्त्वों की यह गणना, तीन तत्त्वों के लिए की जाती है- पहली ऊर्जा की, दूसरी प्रोटीन की व तीसरी उस विशेष व्यकित की आवश्यकता पर निर्भर करती है, जिसके आहार की योजना बनानी है।

नीचे दिया उदाहरण आहार योजना व पोषक तत्त्वों की गणना को दर्शाता है।

उददेश्य - एक 28 वर्षीय पुरूष, जो मध्यम श्रम करता है और मध्यम आय वर्ग से है, के लिए आहार योजना बनाएं।

सामान्य सूचना

आयु - 28 वर्ष लिंग - पुरुष

आय वर्ग - मध्यम कार्य - मध्यम श्रम

प्रस्तावित दैनिक पौषिटक आवश्यकता

ऊर्जा - 2875 कि. कैलरीज थायमीन - 1ण्4 मि. ग्रा.

प्रोटीन - 60 ग्रा.

ध्यान देने योग्य बातें

1. व्यकित मध्य श्रम का कार्य करता है और उसकी प्रस्तावित आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, आहार सन्तुलित होना चाहिए।

2. उसकी धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

3.उसकी पसन्द-नापसन्द को भी देखना चाहिए।

4. तीसरा पोषक तत्त्व, थायमीन चुना है, क्योंकि थायमीन की आवश्यकता ऊर्जा की आवश्यकता पर निर्भर करती है, अर्थात कार्बोज का उपयोग।

5.आहार में विभिन्नता आवश्यक है, जो भोजन रंग, रूप व खुशबू के रूप में दी जानी चाहिए।

6. व्यकित की आर्थिक सिथति का ध्यान रखना चाहिए। खाध पदार्थ मध्य आय वर्ग के अनुसार खरीदने चाहिए, तथा मौसमी सब्जी-फलों का प्रयोग करना चाहिए।

7. आयोजित आहार ऐसा होना चाहिए, जिससे क्षुधा संतुषिट हो सके।

8.आयोजित आहार मौसम के अनुकूल होना चाहिए, तथा खाध पदाथो± की उपलबिध को ध्यान रखना चाहिए।

9. आहार शांत वातावरण में परोसना चाहिए।   

      मीनू

1. सुबह का नाश्ता

-बेसन का परांठा

- दही

-काफी

2. दोपहर का भोजन

- चपाती

- पालक-पनीर की सब्जी

- सलाद

- केला

3.शाम की चाय

- टिककी, चटनी के साथ

- चाय

4. रात्रि का भोजन

- चावल (तले हुए)

- सांभर

- चपाती

- अन्नानास, नींबू की आइसक्रीम

सहायक पुस्तकें

1.आहार एवं पोषण विज्ञान, एजुकेशन प्लेनिंग गु्रप द्वारा

2.आहार एवं पोषाहार, डा. सत्यदेव आर्या

3. पोषण एवं आहार विज्ञान के मूल सिद्धान्त, श्रीमती एस. पी. सुखिया



7 पाठ 7 किशोरों, वयस्कों और वृद्धों के लिए आहार आयोजन

पाठ 7

किशोरों, वयस्कों और वृद्धों के लिए आहार आयोजन

(Planning Diets for Adolescents, Adults and During Old Age)

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किशोरावस्था तेजी से विकास और बढ़त की आयु है। यह अवस्था लगभग दस वर्ष तक रहती है। इस समूह में व्यकितयों के विकास की गति बहुत अधिक भिन्न हो सकती है। इसी आयु में, शरीर में, मन में कर्इ प्रकार के परिवर्तन होते हैं। लड़कियां 11 और 14 वर्ष की आयु के बीच और लड़के 13 और 16 वर्ष की आयु के बीच परिपक्वता को प्राप्त होते हैं। शरीर में पानी की मात्राा, शरीर के आयाम, और हडिडयों और वसा की दृषिट से लड़कों और लड़कियों में बहुत अधिक अन्तर होता है।

यह स्वाभाविक ही है कि विकास की इस अवधि में पौषिटक आहार की आवश्यकता बहुत अधिक होती है। जिस व्यकित ने भी किशोरों को भोजन करते हुए देखा हो, वह यह बता सकते हैं कि इस आयु में कितनी भूख लगती है। यदि भोजन पर्याप्त मात्राा में उपलब्ध हो तो लड़के तो खाते ही चले जाते हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यदि भोजन में पौष्टक तत्त्वों की पर्याप्त मात्राा न हो तो भी किशोर अपनी क्षुधा मिटाने के लिए उसे खा लेंगे लेकिन, उससे उन्हें वे पौषिटक तत्त्व नहीं मिलेंगे जो विकास के लिए आवश्यक हैं। इसी आयु में पौषिटक आहार पाने वाले और उससे वंचित किशोरों के बीच अन्तर स्पष्ट हो जाता है। सामान्यतया घटिया भोजन वह है, जिसमें न तो कैलारी की पर्याप्त मात्राा होती है और न कैलिशयम की। लेकिन किशोर लड़के में कैलिशयम की कमी स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं पड़ती, क्योंकि, उसकी कमी के कारण उसका विकास उतना नहीं होता जितना होना चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि भोजन में कैलिशयम की मात्राा पर्याप्त न हो तो बच्चा पर्याप्त भोजन भी नहीं कर पाता और इससे उसका विकास अवरूद्ध हो जाता है। कर्इ बार ऐसा भी होता है कि तेजी से बढ़ते हुए किशोर को समुचित कैलोरियां तो मिल जाती हैं लेकिन, कैलिशयम की कमी रहती है। उसके शरीर का ढांचा मजबूत नहीं बनता और उसकी चाल भी अनियमित हो जाती है। ऐसी अवस्था में इस आयु में टांगे टेढ़ी हो सकती हैं या पैर बिल्कुल चपटे हो जाते हैं। गुजरात के अभावग्रस्त क्षेत्राों में यह देखा गया है कि, जब किशोरावस्था के लड़कों को दोपहर में पौषिटक भोजन दिया गया तो उनके वजन में चार से छ: किलोग्राम तक की वृद्धि हुर्इ। लेकिन कम आयु के बच्चों में यह वृद्धि एक से दो किलोग्राम तक की थी। यदि भारतीयों का कद-काठ पशिचमी देशों के नागरिकों की तुलना में कम होता है तो उसका कारण मुख्य रूप से यह है कि किशोरावस्था में भारतीयों के विकास की दर कम हो जाती है।

पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकताएं (Nutritional Needs)

किशोरों को जिन पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकता है, उनका ब्यौरा नीचे दिया गया है और उसे सारिणी 1 में सारिणीबद्ध किया गया है।

किशोरावस्था में लड़कों की तुलना में लड़कियों का विकास पहले होता है इसलिए 13 से 15 वर्ष की आयु की लड़कियों के लिए 16 से 18 वर्ष तक के लड़कों के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। किशोर लड़कियों और लड़कों के लिए आवश्यकता ऊर्जा में अन्तर का एक कारण यह है कि लड़कियों में चयापचय की दर (मैटाबालिक रेट) लड़कों की तुलना में कम होती है। 13 से 15 वर्ष के लड़कों को प्रतिदिन 2450 कैलरी की आवश्यकता पड़ी है और 16 से 18 वर्ष की आयु के बीच 2640 कैलरी प्रतिदिन। लड़कियों को 13 से 18 वर्ष की आयु के बीच प्रति दिन 2060 कैलरी की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की आवश्यकता लड़कों को लड़कियों की अपेक्षा अधिक होती है, क्योंकि उनका कद-काठ अधिक होता है। विकास की अवधि के बाद लड़कों के शरीर का आकार और परिमाण लड़कियों की तुलना में डेढ़ गुना होता है। लड़कियों के शरीर में वसा

अधिक होती है। लड़कों को 13 से 15 वर्ष की आयु में प्रतिदिन 70 ग्राम और 16 से 18 वर्ष के बीच 78 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। उनकी तुलना में लड़कियों को 13 से 15 वर्ष की आयु के बीच प्रति दिन 65 ग्राम और 16 से 18 वर्ष की आयु में 63 ग्राम प्रोटीन की प्रति दिन आवश्यकता होती है।

हडिडयों का आकार बढ़ जाता है और उनमें खनिज पदाथो± की आवश्यकता कद-काठ पूरा होने के बाद भी बनी रहती है, इसलिए विकास की अवधि में कैलिशयम की आवश्यकता अधिक होती है और उसके बाद कम हो जाती है। यह बात लड़कों और लड़कियों, दोनों पर लागू होती है। दोनों को 13 से 18 वर्ष के बीच 600 मि.ग्राम कैलिशयम प्रति दिन मिलना चाहिए।

लौह तत्व : रक्त के परिमाण में लगातार होने वाली वृद्धि के कारण लौह की आवश्यकता शैशवावस्था की तुलना में किशोरावस्था में अधिक होती है। किशोर लड़कों को 13 से 18 वर्ष की आयु के बीच प्रतिदिन लगभग 41-50 मिलिग्राम लौह की आवश्यकता होती है। और लड़कियों को 28-30 मि. ग्राम की आवश्यकता होती है।

विटामिन ए की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। 13 से 18 वर्ष की आयु के बीच लड़कों और लड़कियों, दोनों को प्रति

     

                      

      दिन 600 माइकोग्राम रैटीनोल की आवश्यकता होती है। भोजन में बढ़ी हुर्इ कैलरियों के अनुरूप थायमीन, रिबोप्लाविन और निकोटीनिक एसिड की आवश्यकताओं का सुझाव दिया जाता है। लड़कों को इन विटामिनों की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें ऊर्जा की अधिक आवश्यकता पड़ती है। विटामिन सी की आवश्यकता उतनी ही रहती है जितनी कि बचपन में होती है, अर्थात 40 मिलिग्राम प्रति दिन। सभी आयु के किशोरों के लिए भोजन में विटामिन डी की मात्राा 200 अन्तर्राष्ट्रीय इकार्इ निर्धारित की गर्इ है। इस कारण फोलिक एसिड की आवश्यकता सौ माइक्रोग्राम है। यह सिफारिश इस कारण की गर्इ है कि भोजन में जो फौलेट होते हैं उनके Ðास की प्रवृत्ति रहती है। विटामिन B12 केवल मांस में मिलता है और भारत में अधिकतर लोग शाकाहारी

है इसलिए, यह सिफारिश की गर्इ है कि भोजन में कम से कम एक मिलिग्राम विटामिन B12 प्रति दिन होना चाहिए। इसका कारण यह है कि खाना पकाने में यह विटामिन किसी हद तक नष्ट हो जाता है और फिर यह भी निशिचत नहीं है कि भोजन में मिलने वाला यह विटामिन किस हद तक शरीर का अंग बन सकता है। ऐसा विश्वास है कि विटामिन B6 की आवश्यकता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रोटीन कितनी मात्राा में ली जा रही है। किशोरों को प्रति दिन दो मिलिग्राम विटामिन B6 की आवश्यकता हाती है।

पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकताएं

(Factors to be considered while Planning Diets)

1. योजनाबद्ध भोजन का संतुलन इस प्रकार करना चाहिए कि कैलिशयम अधिक हो। उसके लिए यदि संभव हो तो दूध की मात्राा बढ.ा दी जाए। जो किशोर कम आय वर्ग के हों उनके भोजन में अधिक कैलिशयम वाले खाध पदार्थ होने चाहिए, जैसे भुना हुआ अनाज, दूसरे अनाज, दालें और पत्तेदार हरी सबिजयां। उनके भोजन में ऊर्जा देने वाले तत्त्वों को भी शामिल करना चाहिए। लड़कियों में अनीमिया की प्रवृति होती है, क्योंकि उनकी लौह की आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं। उन्हें पूरा करने के लिए पत्तों वाली हरी सबिजयां, अनाज और दालें, और यदि सम्भव हो, अण्डे, मांस, कलेजी और मछली उनके भोजन में शामिल की जानी चाहिए।

2. इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि व्यकित को कौन-सा व्यंजन पसन्द है। उसके भोजन के साथ-साथ चाय और काफी भी होनी चाहिए।

3. इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि परिवार की सामाजिक-आर्थिक सिथति कैसी है। यह संभव है कि गरीब परिवार का किशोर अपने अमीर समवयस्कों की नकल करके अधिक महंगी वस्तुएं खाना चाहे। इसलिए उन्हें सस्ते लेकिन पौषिटक और आकर्षक पदार्थ खाने के लिए देने चाहिए।

4. भोजन नाना प्रकार के रंग और स्वाद वाला होना चाहिए। किशोर, विशेषकर लड़कियां घर पर खाने के मामले में तनिक नकचढ़ी होती हैं। यदि उन्हें आकर्षक प्रकार का भोजन दिया जाए तो वे घर पर भरपूर भोजन कर पाएंगी।

5. यदि उन्हें स्कूल साथ ले जाने के लिए खाना दिया जाए तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें पौषिटक तत्त्व हों और वह संतुलित भोजन हो, विशेषकर उस दशा में जब दोपहर का पूरा खाना उन्हें दिया जा रहा हो।

6. मौसम के अनुसार ठण्डे पेय या चाय काफी भी देनी चाहिए जिससे कि उनका भोजन अधिक रुचिकर हो।

7. इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भोजन संतोषप्रद हो। यह बात लड़कों पर अधिक लागू होती है। यदि खाने से उनका पेट न भरे तो उन्हें सलाद अधिक मात्राा में दी जा सकती है।

8. किशोरों में अल्पाहार लेने की प्रवृत्ति होती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ऐसे अल्पाहार केवल ऊर्जा के स्रोत न हों, अपितु अन्य पौषिटक तत्त्व भी प्रदान करें।

9. भोजन सुखद वातावरण में खाना चाहिए।

16 वर्ष की किशोरी के लिए एक दिन की आहार तालिका

दैनिक पौषिटक                      आवश्यकता

ऊर्जा                                           2060 कैलरी

प्रोटीन                                          63 ग्रा.

कैलिशयम                                    500 मि.ग्रा.

लौह                                            30 मि.ग्रा.       

वयस्क

(Adults)

वयस्कता व्यकित के जीवन में ऐसी सिथर अवस्था होती है जब, शरीर का पूर्णरूपेण विकास हो चुका होता है। इस आयु में शरीर के विकास या बहुत अधिक परिश्रम के लिए पौषिटक तत्त्वों की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती। उनकी आवश्यकता इस कारण होती है कि, शरीर की क्रियाएं बनी रहें। वयस्कों में उतनी ही ऊर्जा की आवश्यकता होती है जिससे उनका सामान्य कार्यकलाप जारी रहे। इस आयु में व्यकित निर्माण कार्य में लगता है, अर्थात अपने निर्वाह के लिए किसी काम में लग जाता है। इस कारण उसको पौषिटक आहार की आवश्यकता होती है, जिससे कि वह अपनी सामथ्र्य के अनुसार काम-काज करता रहे। अच्छे भोजन से वह परिश्रम कर सकता है और बुढ़ापे को, जहां तक हो सके, टाल सकता है। यदि जीवन के प्रारंभिक वर्षों में उसके भोजन में कुछ पौषिटक तत्त्वों का अभाव रहा हो और इस आयु में भी वह अभाव बना रहे, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए उसे समुचित पौषिटक आहार मिलना चाहिए और इस बात पर भी बल देना चाहिए कि उसे ऐसी आदतें पड़ें कि उसका स्वास्थ्य बना रहे।

वयस्कों की पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकता

(Nutritional Needs of Adults)

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, पौषिटक आहार की आवश्यकता मुख्य रूप से इस कारण होती है कि, व्यकित अपने शरीर की क्रियाओं को बनाए रखे और अपना काम-काज करता रहे। दैनिक पौषिटक आवश्यकताएं वयस्कों के लिए अलग-अलग नहीं दी जा सकती। अत: भारतीय चिकित्सा अनुसंधान पारिषद ;प्ब्डत्द्ध ने प्रस्तावित पौषिटक आवश्यकताएं भारतीय पुरुष व भारतीय स्त्राी के लिए दी है।

संदर्भ भारतीय पुरूष ष्एक ऐसा वयस्क पुरूष है जिसकी आयु 20-39 वर्ष है व वजन 60 कि.ग्रा. है।ष् यह वयस्क शारीरिक रूप से स्वस्थ व बीमारी से दूर है। यह प्रतिदिन अपने व्यवसाय में 8 घण्टे मध्यम श्रम का कार्य करता है। जब यह कार्य नहीं करता, तब 8 घण्टे सोता है, चार घण्टे उठने, घूमने के हल्के कार्य करता है व दो घण्टे घूमना, खेलना व अधिक श्रम वाले गृह कार्य करता है। प्ब्डत् के अनुसार ऐसे व्यकित की लम्बार्इ 163 से.मी. है।

संदर्भ भारतीय महिला ष्ऐसी महिला है जो 20-39 वर्ष की है व वजन 50 कि.ग्रा. है। यह प्रतिदिन आठ घण्टे अपने घर के कार्य व व्यावसायिक कार्य करती है जो मध्यम श्रेणी के हैंं इसके अतिरिक्त यह आठ घण्टे सोती है, चार घण्टे घूमने, खेलने या अन्य अधिक श्रम के कार्य करती है।ष् प्ब्डत् ने ऐसी महिला की लम्बार्इ 151 से.मी. बतार्इ है। विभिन्न पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकताओं का ब्यौरा सारिणी-2 में दिया गया है।

ऊर्जा : वयस्कों में ऊर्जा की आवश्यकता इस कारण होती है कि उनके शरीर की क्रियायें बनी रहें और वे अपना काम-काज करते रहें। लेकिन, उनके लिए भोजन की योजना बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे किस प्रकार के काम में लगे हैं और उस काम के लिए कितनी ऊर्जा की आवश्यकता है। वयस्कों के काम-काज सामान्यतया निम्न प्रकार के होते हैं :

हल्का श्रम

पुरुष दफ्तरों में काम करने वाले, वकील, डाक्टर, लेखापाल, अध्यापक और वास्तुकलाविदव।

स्त्री दफ्तरों में काम करने वाली और वे गृहणियां जिनके पास घर का काम करने के लिए उपकरण या नौकर हों, अध्यापिकाएं और अन्य वृत्तिभोगी महिलाएं।

मध्यम श्रम

पुरुष हल्के उधोग में काम करने वाले अधिकतर पुरुष, निर्माण कार्य में लगे, जिनमें कठोर परिश्रम करने वाले शामिल नहीं हैं, खेतों में हल्का काम करने वाले और दुकानदार

स्त्री हल्के उधोगों में काम करने वाली सित्रायां, गृहणियां जिनके घरों में काम-काज के लिए कोर्इ उपकरण या नौकर न हो, दुकानों में काम करने वाली सित्रायां

कठोर परिश्रम

पुरुष खेत मजदूर, दूसरे मजदूर, सैनिक, खानों और इस्पात कारखानों के मज़दूर, खिलाड़ी

स्त्री खेतों में काम करने वाली सित्रायां, नर्तकियां और खिलाड़ी।

शारीरिक श्रम और अन्य कार्यकलाप के अलावा, जिसका व्यकित के पेशे से कोर्इ सम्बन्ध न हो, व्यकितयों की ऊर्जा की आवश्यकताएं अन्य कर्इ बातों पर निर्भर करती है, जैसे कि उसका कद-काठ, आयु, जलवायु और लिंग। कोर्इ व्यकित कितनी ऊर्जा का व्यय करता है, वह इस बात पर निर्भर है कि जब वह काम नहीं कर रहा होता तो उसका चयापचय, अर्थात मैटाबोलिजम, कैसा होता है, उसे चलने-फिरने, खड़े रहने आदि में कितना श्रम करना पड़ता है; इसके साथ ही किसी व्यकित का शारीरिक कार्यकलाप इस बात से भी प्रभावित होता है कि उसके शरीर में वसा कितनी है। पुरुषों की तुलना में सित्रायों की ऊर्जा की आवश्यकता कम होती है क्योंकि, उनके शरीर में वसा की मात्राा अधिक होती है। वयस्कों की ऊर्जा की खपत आयु के साथ बदलती है, क्योंकि उनके शरीर का वजन और उसके गठन में परिवर्तन हो जाता है। यह परिवर्तन बुढ़ापे में अधिक दिखायी पड़ता है। इस बात को सभी स्वीकार  

                                         

    

करते हैं कि ऊष्ण प्रदेशों की तुलना में ठण्डे प्रदेशों में ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है।

प्रोटीन : एक साधारण वयस्क को अपने शरीर को बनाए रखने और कार्यकलाप में प्रयुक्त हुए प्रोटीन की कमी पूरी करने के लिए इस तत्त्व की आवश्यकता होती है। सामान्यतया शरीर के वजन के अनुसार प्रति किलोग्राम के पीछे एक ग्राम प्रोटीन प्रति दिन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार औसत भारतीय पुरुष के लिए जिसका वजन 60 किलो हो, 60 ग्राम प्रोटीन प्रति दिन चाहिए होती है और औसत भारतीय स्त्राी के लिए, जिसका वजन 50 किलो हो, 50 ग्राम प्रोटीन प्रति दिन आवश्यक है।

खनिज लवण : पुरुषों को प्रति दिन 400 मि.ग्रा. तक कैलिशयम मिलना चाहिए। जहां तक लौह का सम्बन्ध है पुरुषो के लिए 30 मिलिग्राम और सित्रायों के लिए 28 मिलिग्राम की आवश्यकता है, इस रक्तस्राव में लगभग दो मिलिग्राम लौह प्र्रतिदिन (मासिक

धर्म के दौरान) स्त्राी के शरीर से निकल जाता है। इस कारण पुरुषों की तुलना में सित्रायों में रक्त की कमी का रोग अधिक होता है।

विटामिन : सामान्य पुरुषों और सित्रायों के लिए विटामिन ए, एस्कोर्बिक एसिड, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 की आवश्यकता एक जैसी है। दूसरे शब्दों में रैटीनोल के रूप में 600 माइक्रो ग्राम विटामिन ए या बीटा-कैरोटीन के रूप में 2400 माइक्रो ग्राम प्रति दिन मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त 40 मिलिग्राम एस्कोर्बिक एसिड, सौ माइक्रो ग्राम फोलिक एसिड और एक माइक्रो ग्राम विटामिन ठ12 । जहां तक थियामिन, रिबोफ्लाविन और नियासिन का सम्बन्ध है, उनकी आवश्यकता ऊर्जा की आवश्यकता के अनुसार बदलती रहती है। पुरुषों को प्रति दिन 1ण्2 से 1ण्6 मिलिग्राम तक थियामिन प्रति दिन मिलना चाहिए और सित्रायों को 0ण्9 से 1ण्2 मिलिग्राम तक। पुरुषों को 1ण्4 से 1ण्9 मिलिग्राम तक रिबोफ्लाविन प्रति दिन मिलना चाहिए और सित्रायों को 1 मिलिग्राम से 1ण्5 मिलिग्राम तक। जहां तक विटामिन डी का सम्बन्ध है, उसकी 200 अन्तर्राष्ट्रीय इकाइयां प्रत्येक व्यकित को प्रति दिन मिलनी चाहिए, चाहे वह आयु के किसी भी वर्ग में आता हो।

भोजन की योजना बनाते समय ध्यान देने योग्य बातें :

(Factors to be considered while Planning Diets)

1. भोजन की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए कि उसमें पौषिटक तत्त्वों का संतुलन हो। इस बात पर बल देना आवश्यक है कि यह संतुलन प्रत्येक आहार में रहे।

2. यदि व्यकित दफ्तर जाता है तो पौषिटक, आकर्षक व आसानी से ले जाने वाले टिफिन की योजना बनानी चाहिए।

3. वसा के प्रयोग पर विशेष ध्यान देना चाहिए व ऐसी वसा का चयन करना चाहिए जिससे उच्च रक्तचाप व हृदय रोगों से बचा जा सके।

4. जिस व्यकित के लिए भोजन की योजना बनायी जा रही है, उसकी परम्पराओं, रीति-रिवाजों और धर्म के प्रति दृषिटकोण का ध्यान रखना चाहिए।

5. इस बात का ध्यान भी रखा जाए कि किस व्यकित को कौन-सा भोजन पसंद है। यदि उसे एक प्रकार का भोजन पसंद न हो तो दूूसरी प्रकार का भोजन दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यकित को दूध अच्छा न लगता हो तो उसे दही, पनीर आदि दिया जा सकता है।

6. भोजन की योजना व्यकित की आय के अनुसार बनायी जानी चाहिए। यदि वह महंगे खाध पदार्थ न खरीद सकता हो, तो उनके स्थान पर सस्ते, परन्तु पौषिटक खाध पदार्थ रखे जा सकते हैं।

7. भोजन, रंग और स्वाद आदि की दृषिट से नाना प्रकार का होना चाहिए।

8. व्यकित को कितना समय उपलब्ध है और उसमें कितनी शकित है उसका भी ध्यान रखना आवश्यक है। यदि भोजन की व्यवस्था किसी ऐसे स्त्राी के लिए करनी हो जो काम-काजी महिला है, तो उस भोजन को पकाने में अधिक समय नहीं लगना चाहिए।

9. व्यंजनों की सूची मौसम के अनुसार बनानी चाहिए। वही सबिजयां और फल चुने जाएं, जो किसी मौसम में मिलते हैं। कारण यह है कि वे अधिक स्वाद वाले, पौषिटक, सस्ते और आसानी से उपलब्ध होते हैं। मौसम के अनुसार भोजन में पेय पदार्थ भी शामिल किए जा सकते हैं।

10. भोजन की योजना इस प्रकार बनायी जाए कि उसे खाकर उसकी क्षुधा संतुषिट हो। भोजन में कच्चे फल व सबिजयाें को समिमलित करना चाहिए।

11. भोजन सुखद वातावरण में किया जाना चाहिए।    

 

      हल्का काम करने वाली (प्रबंधिका) के लिए दिन-भर आहार तालिका

दैनिक पौषिटक आवश्यकता

श्रम                               हल्का

ऊर्जा                             1875 कैलरी

प्रोटीन                           50 ग्राम

लौह                              30 मिलिग्राम

कठोर परिश्रम करने वाली मजदूर महिला के लिए दिन भर की आहार तालिका

दैनिक पौषिटक आवश्यकता

श्रम                                    भारी

ऊर्जा                                   2925 कैलरी

प्रोटीन                                 50 ग्राम

लौह                                   30 मिलिग्राम

वृद्धावस्था

(Old Age)

आयु के बढ़ने के साथ-साथ कर्इ शारीरिक परिवर्तन होते हैं और रोगों से लड़ने की शकित भी क्षीण हो जाती है। जिसके कारण पौषिटक आहार की आवश्यकता अधिक या कम हो सकती है। शरीर में पानी की मात्राा कम हो जाती है और वसा का प्रतिशत बढ़ जाता है। अनुमान है कि 80 वर्ष की आयु में मांस पेशियों की कोशिकाएं आधी रह जाती हैं। शरीर की सक्रिय कोशिकाओं की संख्या में कमी हो जाती है। इस प्रकार के परिवर्तन विशेष रूप से ऊतकों में दिखार्इ पड़ते हैंं मसितष्क, हडिडयों, हृदय, गुर्दे और ढांचे की मांस पेशियों में नए ऊत्तक उत्पन्न करने की शकित क्षीण हो जाती है। सक्रिय कोशिकाओं के स्थान पर वसा और मांस पेशियों को जोड़ने वाले ऊत्तक बन जाता है। आयु बढ़ने के साथ-साथ विभिन्न अंगों की सक्रिय कोशिकाओं की संख्या में कमी हो जाती है और अंगों की क्रियाशीलता घट जाती है। बहुधा वृद्धों में यह देखा गया है कि उनकी हडिडयों में खनिज तत्त्व समाप्त हो जाते हैं। इस दशा को ओस्टीयोपोरोसिस ;व्ेजवचवतवेपेद्ध की संज्ञा दी जाती है, और तब हडिडयां कुरकुरी हो जाती हैं तो हल्का-सा आघात लगने पर उनके टूट जाने की शंका बढ़ जाती है।

वृद्धावस्था में स्वाद और गंध की अनुभूति उतनी तीव्र नहीं होती, जितनी कि युवावस्था में होती है और इस कारण भोजन का आनन्द कम हो जाता है। वृद्धों में बहुधा दंतक्षय पाया गया है उनके मसूढ़े भी ठीक से काम नहीं करते। परिणाम यह होता है वृद्ध नरम भोजन करते हैं और ऐसी वस्तुएं खाते हैं, जिनमें कार्बोहाइड्रेटस की मात्राा अधिक होती है। उस भोजन से उनके शरीर में कैलिशयम, प्रोटीन और विटामिन जैसे पौषिटक तत्त्व नहीं पहुंच पाते। लार कम आने लगता है और पाचन शकित घट जाती है। वृद्धों में बहुधा यह पाया गया है कि वे मांड को नहीं पचा सकते। अधिकतर वृद्धों में आमाशय में अम्ल स्त्रााव कम हो जाता है। आमाशय में विभिन्न प्रकार के पाचक रसों की मात्राा भी कम हो जाती है, जिनके आमाशय में अम्ल की कमी होती है उनका पेट तेजी से खाली हो जाता है। आमाशय और अंतडि़यों में निषिक्रयता आ जाती है और इस बात की अधिक संभावना रहती है कि कुछ प्रकार के भोजन से उनका पेट फूलने लगे। âदय की सक्रियता कम हो जाती है और उसके साथ ही पाचन शकित के क्षय से शरीर की पौषिटक तत्त्वों को अवशोषित करने की शकित का Ðास होने लगता है।

पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकताएं (Nutritional Needs)

पौषिटक तत्त्वों की आवश्यकताओं के आंकड़े सारिणी 5 में दिए गए हैं।

25 वर्ष की आयु के बाद चयापचय की सक्रियता प्रति दस वर्ष में दो प्रतिशत घट जाती है। यह Ðास उन व्यकितया में कम होता है जो स्वस्थ रहते हैं और कठोर परिश्रम करते रहते हैं। चयापचय की घटी हुर्इ दर और कार्यकलाप में कमी होने के कारण वृद्धों में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो जाती हैं ऊर्जा की आवश्कयता का अनुमान लगाने के लिए भारत की चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने यह सिफारिश की है कि बढ़ती हुर्इ आयु के साथ-साथ ऊर्जा की आवश्यकता निम्न प्रकार से कम हो जाती है :

आयु                          आवश्यकता में प्रतिशत कमी

20-30 वर्ष                      0

40-49 वर्ष                       5

50-59 वर्ष                      10

60-69 वर्ष                       20

70 वर्ष और उससे अधिक      30

जिन वृद्धों का वजन सामान्य हो, उनके लिए ऊर्जा (कैलोरी) का हिसाब इस प्रकार लगाना चाहिए कि उनका वजन वैसा ही बना रहे। उनके भोजन में इतनी कमी कर दी जानी चाहिए, जिससे कि यदि उनका वजन अधिक हो तो घट कर सामान्य हो जाए।

60 वर्ष के ऊपर वृद्ध पुरूष व स्त्राी की दैनिक ऊर्जा की आवश्यकता तालिका 4 में दी गर्इ है।

तालिका-4

शारीरिक वजन के अनुसार वृद्ध स्त्राीपुरूष की दैनिक ऊर्जा की आवश्यकता

शारीरिक वजन                                                60 वर्ष के ऊपर हल्का श्रम करने वाले वृद्ध

(कि.ग्रा.)                                                         पुरुष                                       महिला

40                                                                —                                          1544

45                                                                1664                                    1624

50                                                                1768                                    1704

55                                                                1872                                    1784

60                                                                1976                                    1864

65                                                                2072                                    1944

70                                                                2176                                     2024

75                                                                2280                                       —

इस बात को देखते हुए कि वृद्धावस्था में भूख कम लगती है और पाचन शकित कम हो जाती है, वृद्धों के शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाती है। इस कारण इस बात की व्यवस्था करनी चाहिए कि शरीर में प्रोटीन की कमी न हो। दूध में प्रोटीन के साथ-साथ विटामिन और खनिज पदार्थ भी होते हैं, इस कारण दूध समुचित मात्राा में देना चाहिए। प्रतिदिन शरीर के वजन के हिसाब से एक किलोग्राम के पीछे 1ण्0 से 1ण्4 ग्राम तक प्रोटीन देनी चाहिए।

वृद्धों के भोजन में कम से कम 50 ग्राम घी अथवा तेल रहना चाहिए, क्योंकि वह ऊर्जा का सकेंæति स्रोत है। कम से कम इस मात्राा का पचास प्रति शत शाक भाजी के तेलों के रूप में होना चाहिए, जिनमें आवश्यक वसा-अम्ल रहते हैं।

वृद्धों में सामान्यतया कैलिशयम और लौह की कमी हो जाती है। इसका कारण यह है कि वयस्कों की तुलना में वृद्धों में इन तत्त्वों को पचाने की सामथ्र्य कम हो जाती है। कैलिशयम कम से कम आधा ग्राम प्रतिदिन और लौह 28 मिलिग्राम प्रतिदिन होना चाहिए। वृद्धों में रक्त का संचार अधिक नहीं होता और रक्त में लौह तत्वों की थोड़ी-सी कमी से भी उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। उसे रोकने के लिए लौह की मात्राा समुचित होनी चाहिए।

वृद्धों में बहुधा कर्इ प्रकार के विटामिनों की थोड़ी कमी हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि उनके भोजन में सभी आवश्यक विटामिनों की समुचित मात्राा रहे। यदि उनके भोजन में सभी विटामिनों की समुचित मात्राा न हो तो उन्हें मल्टी विटामिन गोली प्रतिदिन देनी चाहिए जिससे कि विभिन्न विटामिन उनके शरीर में पहुंच जाएं। थायमीन, रिबोफ्लेविन और नियासिन की आवश्यकता ऊर्जा की आवश्यकता के अनुसार तय की जाती है। एस्कोर्बिक एसिड (विटामिन सी) प्रतिदिन 40 मिलिग्राम, फोलिक एसिड, विटामिन ठ12 और विटामिन ठ6 लगभग सौ माइक्रोग्राम, एक माइक्रोग्राम और दो मिलिग्राम देना चाहिए। यह आवश्यक है कि प्रति दिन विटामिन डी के 400 अन्तर्राष्ट्रीय इकार्इ दिए जाएं, जिससे शरीर में कैलिशयम अवशोषित होने लगेगा और हडिडयों की रक्षा की जा सकेगी।

आमतौर पर इस बात को नहीं समझा जाता कि वृद्धों को जल तथा अन्य तरल पदार्थ समुचित मात्राा में देने चाहिए, जिससे कि वे प्रति दिन डेढ़ लीटर पेशाब करें। पानी के साथ-साथ छाछ, फलों का रस, सूप आदि देना चाहिए।

इस बात की व्यवस्था करनी चाहिए कि वृद्धों को हरी शाक-भाजी और फल समुचित मात्राा में दिए जाएं जिससे कि उनके भोजन में रेशे की मात्राा समुचित रहे और उन्हें कब्ज न होने पाए। वृद्धावस्था में अंतडि़यां ऐसी हो जाती हैं कि पकी सबिजयों का रेशा और अनाज का चोकर भली-भांति पच नहीं पाता।

भोजन की योजना बनाते समय ध्यान देने योग्य बातें :

(Factors to be considered while Planning Diets)

वृद्धों के लिए भोजन की योजना बनाते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

(1) भोजन ऐसा हो कि यह पौषिटक तत्त्वों की दृषिट से संतुलित रहे। इस बात पर बल देना चाहिए कि प्रोटीन, कैलिशयम, विटामिन और रेशे की समुचित मात्राा रहे, क्योंकि अधिकतर वृद्धों में इन तत्त्वों की कमी हो जाती है।

(2) वृद्धों के लिए भोजन को चबाने में कठिनार्इ हो सकती है इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भोजन नरम हो और उसमें सूप, दाल या दलिए जैसे तरल पदार्थ हों, जिन्हें निगलने में कठिनार्इ न हो। वृद्धों को सलाद कस करके दिया जा सकता है। भोजन पूरी तरह पका हुआ होना चाहिए। रोटी मोटी बनायी जा सकती है जिससे कि उसे चबाने में कष्ट न हो। अगर आवश्यकता हो तो रोटी को दूध या दाल में भिगो कर खाया जा सकता है।

(3) कैलिशयम की आवश्यकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि हडिडयों में धीरे-धीरे खनिज लवण निकलने शुरू हो जाते हैं।

(4) यदि एक समय में व्यकित पूरा आहार नहीं ले पाता है तब छोटे आहार कम समय अन्तराल में देने चाहिए।

(5) इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिसके लिए भोजन की योजना बनायी जा रही है उसे कौन-सा व्यंजन पसन्द है।

(6) कार्बोहाइड्रेटस की जो मात्राा भोजन में हो वह नरम होनी चाहिए, जिससे कि खाने वाले को कब्ज़ न हो।

(7) मीठे पदार्थ कम कर देने चाहिए, क्योंकि उनसे भूख मारी जाती है और केवल कैलोरी ही मिलती है।

(8) भोजन में कैलोरी की मात्राा इतनी होनी चाहिए कि शरीर का वजन न बढ़ने पाए।

(9) यदि भूख कम लगती हो तो ऐसा भोजन होना चाहिए जिसकी मात्राा कम हो परन्तु जिसमें कैलोरियों की मात्राा पूरी रहे साथ ही भोजन को सुस्वाद बनाना चाहिए। वृद्धों को नाश्ते और दोपहर के भोजन के बीच और तीसरे प्रहर भी कुछ खाने के लिए दिया जा सकता है।

(10) इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी आर्थिक सिथति कैसी है। योजना आर्थिक सिथति के अनुरूप बनानी चाहिए।

तालिका 6

वृद्धों के लिए कुछ प्रस्तावित व्यंजन सूची

नाश्ता                                          दोपहर का भोजन                            रात का भोजन

आटे या सूजी का हलवा                                          चपाती                                            चपाती या चावल

दूध                                                                 दाल और पालक                                   सब्जी या कढ़ी

                                                                               दही                                                पपीता

उपमा जिसमें मूंगफली हो                                           चावल                                               खिचड़ी

केला                                                                 अंकुरित चना                                         दूध या दही

                                                                      गाजर की सब्जी                                   टमाटर का सलाद

चावल व मूंग दाल                                                   चपाती                                                   चावल

का दलिया, दूध के साथ                                           चने की दाल                                             सांभर

                                                                        गाजर (कसी हुइ)                                         गाजर


पाव रोटी या टोस्ट                                                सब्जी वाला पुलाव                                       चावल

अंडे की भुर्जी                                                           धनिए की चटनी                                   अंडे की सब्जी

दूध                                                                              दही                                                  दही

यदि भोजन के समय भूख कम हो तो दो समय के भोजन के बीच पौषिटक आहार दिया जा सकता है। दो व्यंजनों के बीच खाने के लिए दिए जाने वाले व्यंजनों का सुझाव:

दूध और बिस्कुट/रस्क/टोस्ट

लस्सी और फलों की चाट

दही और केला

कोर्नफलेक और दूध

अंडे के सैंडविच

टमाटर और पनीर के सैंडविच

भोज्य पदार्थों का चुनाव सामाजिक-आर्थिक स्तर के अनुसार कर सकते हैं। मौसम व उपलब्धता के अनुसार सबिजयों व फलों में प्रतिस्थापन व परिवर्तन ला सकते हैं। मध्यान्तर के अल्पाहार व दोपहर के भोजन का चुनाव स्कूल समय के अनुसार कर सकते हैं।

सहायक-पुस्तकें

1. शिशु एवं बच्चों का पोषण व संभरण, डा. शांति घोष

2. खाध एवं पोषण विज्ञान, उच्चतर कक्षाओं के लिए, एजुकेशन प्लेनिंग ग्रुप द्वारा; आर्या पबिलशिंग हाउस

3. पोषण एवं आहार विज्ञान के मूल सिद्धांत; एस.पी. सुखिया; शिवलाल अग्रवाल एंड कं.

4. Fundamentals of Foods and Nutrition; Mudambi and Rajagopal; Viley Eastern Limited.

5. Recommended Allowances to Indians : ICMR; Publications, 1989.