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SM-2

Site: School of Open Learning
Course: Hindi
Book: SM-2
Printed by: Guest user
Date: Monday, 27 May 2019, 2:53 PM

1 (ग) हिन्दी कविता का प्रवृत्तिगत इतिहास

(ग) हिन्दी कविता का प्रवृत्तिगत इतिहास

-डा. मंजुला मोहन

-डा. शुभलक्ष्मी

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हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल 1850 र्इ. के लगभग से प्रारंभ होता है। इसे 'आधुनिक इसलिए कहा जाता है कि विश्व साहित्य और संस्Ñति में पाश्चात्य देशों के प्रभाव एवं राजनीतिक विचारधारा, विज्ञान की उन्नति और मशीनीकरण के कारण जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए, जिसका प्रभाव भारतीय जन-मानस पर भी पड़ा। अपनी प्राचीन मान्यताओं और रूढ़ परंपराओं के प्रति अरुचि हुर्इ और हमने स्वतन्त्रा चिंतन को अपना पथ-प्रदर्शक मान लिया। अंग्रेजी भाषा के माèयम से भारत के शिक्षित वर्ग पर उन्नीसवीं सदी की राष्ट्रीयता का प्रभाव पड़ना आरंभ होता है, तो दूसरी ओर पाश्चात्य विचारकों-माक्र्स, डार्विन और फ्रायड का भी प्रभाव पड़ता है। अंग्रेजों की जीवन-शैली, उनके सोचने समझने के ढंग तथा उनकी भाषा के अनुदित विश्व-साहित्य ने हमें वैज्ञानिक युग में ला खड़ा किया। सन 1857 के विæोह के बाद भारत की राजनीति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। भारतीय जनता जिस तरह की धारणाओं और विचारों के प्रभाव में थी, वह सभी इस विæोह के असफल होने के कारण निमर्ूल सिद्ध हुआ। तब उसे लगा कि अपनी दयनीय दशा को सुधारने के लिए उसे स्वयं ही प्रयत्न करना होगा। उसी समय में महारानी विक्टोरिया के शासन की घोषणा हुर्इ। यह घोषणा उदार नीति लिए हुए थी, जिसका भारतीयों पर फिर से राजभä कि असर पड़ा। एक ओर राजभä,ि दूसरी तरफ देशभä;ि इनकी मिश्रित भावना इस रूप में देखी जा सकती है-

''अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।

पे धन विदेश चलि जात, यहै अति ख्वारी।ß

इन पंäयिें के रचयिता भारतेन्दु हरिश्चन्æ ने इस युग की कविता को एक नर्इ दिशा प्रदान की। उन्होंने 'कविवचन सुधा पत्रिका के माèयम से नवयुग की चेतना का संचार और विस्तार किया। इससे पूर्व भäकिलीन कविता में जहाँ आèयातिमकता की प्रधानता थी और समाज को केन्æ में रखकर तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुरूप र्इश्वर भä किे महत्त्व दिया गया। तदुपरांत रीतिकालीन श्रृंगारिक कविता में दरबारी संस्Ñति की झलक मिलती है। आधुनिक कालीन कविता में जनता की, विशेष रूप में मèयम वर्ग की सांस्Ñतिक चेतना का विकास होता है।

भारतेन्दु और उनके सहयोगी कविगणों ने विषय और शिल्प की दृषिट से ब्रजभाषा काव्य की परंपराओं का प्रभाव तो ग्रहण किया, लेकिन साथ ही तत्कालीन देश काल के सामाजिक स्पंदन और जातीय जागरण से जुड़े आंदोलनों को भी अपनी कविता का विषय बनाया। भारतेन्दु युग को आधुनिक-काल का प्रवेश-द्वार भी कहा जा सकता है और प्रवृत्तियों की दृषिट से संधिकाल माना जा सकता है। वस्तुत: कविता की दृषिट से कवियों का जहाँ पुरानी परंपराओं से मोह अभी छूटा नहीं था और दूसरी ओर नवयुग की नवीन भावना भी अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। आचार्य रामचन्æ शुक्ल के शब्दों में, ''प्राचीन और नवीन के इस संधिकाल में जैसी शीतल कला का संचार अपेक्षित था वैसी ही शीतल कला के साथ भारतेन्दु का उदय हुआ, इसमें संदेह नहीं। मातृभूमि प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, गोरक्षा, बालविवाह निषेध, शिक्षा-प्रसार का महत्त्व, मध निषेध आदि विषयों को कविगण अधिकाधिक अपनाने लगे थे। ब्रह्रासमाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, रामÑष्ण परमहंस और विवेकानंद के विचारों तथा थियासाफिकल सोसाइटी के सिद्धान्तों का प्रभाव भी जन जीवन पर जिस रूप से पड़ रहा था, वह भी कवियों का विषय बना। आर्थिक, औधोगिक, धार्मिक क्षेत्राों में पुनर्जागरण की प्रक्रिया का प्रारंभ होना, पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली के कारण वैयकितक स्वतंत्राता की प्रेरणा तथा अंग्रेजी भाषा के प्रचार प्रसार के कारण विश्वस्तरीय प्रभावों का जन मानस तक पहुँचना आदि सिथतियों के कारण देश में राष्ट्रीय भावना के विकास का उचित वातावरण बन रहा था। परिणामत: तत्कालीन साहितियक काव्यधारा मèयकालीन रचना प्रवृत्तियों तक ही सीमित न रहकर नवीन दिशाओं की ओर उन्मुख होने लगी थी।


2 भारतेन्दुयुगीन कालगत विशेषताएँ

भारतेन्दुयुगीन कालगत विशेषताएँ

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भारतेन्दु-युगीन कवियों का काव्य-फलक बहुत विशाल है। उनकी रचना-प्रवृत्तियाँ एक ओर भäकिल और रीतिकालीन विशेषताओं से जुड़ी हैं तो दूसरी ओर समकालीन परिवेश के प्रति जागरूकता का भी उनमें अभाव नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में भारतेन्दु युग की साहितियक विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है-

1.राष्ट्रीय भावना : इतिहास साक्षी है कि भारतीय वीरों ने सदैव देश की आन के लिए तत्परता और वीरता का परिचय दिया, लेकिन साहित्य में उनका स्तवन प्राय: अधिक नहीं मिलता। भारतेन्दु युग के कवियों ने भारतीय इतिहास के गौरवशाली पृष्ठों की स्मृति अनेक बार दिलायी, साथ ही इस दृषिट से उन्होंने क्षेत्राीयता से ऊपर उठकर संपूर्ण राष्ट्र को अपना विषय बनाया। 'हमारो उत्तम भारत देस (राधाचरण गोस्वामी) और 'धन्य भूमि भारत सब रतननि की उपजावनि (प्रेमधन) आदि काल पंäयिँ इस भाव को प्रकट करती हैं। भारतेन्दु की 'विजयिनी विजय वैजयन्ती प्रेमघन की 'आनन्द अरूणोदय प्रतापनारायण मिश्र की 'महापर्व, 'नया संवत तथा राधाÑष्ण दास की 'भारत बारहमासा और 'विनय शीर्षक कविताएँ देशभä कि संदेश देती हैं। अंग्रेजों की शोषण नीति को भारतेन्दु ने व्यंग्योäयिें के माèयम से व्यä किया है-

''भीतर भीतर सब रस चूसै, हँसि हँसि के तन मन धन मूसै।

जाहिर बातिन में अति तेज, क्यों सखि साजन। नहिं अंग्रेज।।

भारतेन्दु युग में राष्ट्रीय चिंतनधारा के दो पक्ष हैं- देशप्रेम और राजभä।ि देशप्रेम के अंतर्गत उन्होंने 'हिन्दी हिन्दू और हिन्दुस्तान का गुणगान किया।

''चहहु जु साँचहु निज कल्यान, तौ सब मिलि भारत संतान।

जपो निरन्तर एक ज़बान, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान।।

                                                                                            -प्रतापनारायण मिश्र

इसके साथ ही 'जजिया जैसा कर न लगाने वाले अंग्रेजों की मुक्ता कंठ से प्रशंसा भी की। इस युग की राजभäपिरक कविताओं में भारतेन्दु की 'भारतभिक्षा, 'विजवल्लरी प्रेमधन की 'स्वागत, राधाÑष्णदास की 'मेक्डानल्ड पुष्पाँजलि, 'विजयिनी विलाप आदि प्रसिद्ध कविताएँ हैं। डयूक आफ एडिनबरा के स्वागत, रानी विक्टोरिया के शासन-काल की प्रशंसा और उनकी मृत्यु पर शोक-संदेश, लार्ड रिपन के प्रति श्रृंद्धाँजलि आदि विषयों पर लिखित कविताएँ तत्कालीन राजनीतिक चेतना का प्रतीक मानी जानी चाहिए, क्योंकि ये ही कवि दूसरी ओर देश की पतनावस्था को बताते हुए, र्इश्वर से देश की रक्षा की कामना भी करते हैं-

'कहाँ करुणानिहि केशन सोए?

जानत नहिं अनेक जतन करि भारतवासी रोए।

2. सामाजिक चेतना : भारतेन्दुयुगीन कवियों ने जनता की सामाजिक समस्याओं का निरूपण व्यापक ढंग से किया। इससे पूर्व रीतिकालीन दरबारी साहित्य में सामाजिक परिवेश प्राय: नगण्य ही था। भारतेन्दु युग में मèयवर्गीय सामाजिक समस्याओं का चित्राण, और साथ ही रूढि़यों का विरोध करते हुए विकास चेतना की आकांक्षा को अभिव्यä दिी गर्इ। आर्य समाज, ब्रह्रासमाज आदि के प्रभाव से उत्पन्न सुधारवादी नवीन सामाजिक चेतना इस युग के काल का महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। भारतेन्दु ने 'भारत दुर्दशा नाटक में वर्णाश्रम धर्म की संकीर्णता का विरोध किया-

''बहुत हमने फैलाए धर्म, बढ़ाया छुआछूत का कर्म।

'मन की लहर में प्रतापनारायण मिश्र की दृषिट बाल-विधवाओं की करुण दशा की ओर गयी है-

''कौन करेजो नहिं कसकत सुनि विपत्ति बालविधवन की।

इनके अतिरिक्त स्त्राी-शिक्षा पर बल, अनमेल विवाह, छुआछूत आदि विषयों पर भी कविताएँ लिखी गर्इं। स्त्राी-सुधार के उíेश्य से ही भारतेन्दु ने 'बाला बोधिनी पत्रिका भी निकाली थी। प्रतापनारायण मिश्र ने स्त्राी-शिक्षा के समर्थन और बाल विवाह के विरोध में लिखा है-

''निज धर्म भली विधि-जानै, निज गौरव पहिचानै।

स्त्राीगण को विधा देवैं, करि पतिव्रता यश लेवै।

झूठी यह गुलाब की लाली, घोवत ही मिट जाय।

बाल विवाह की रीति मिटाओ, रहे लाली मुख छाप।

3. आर्थिक सिथति : भारतीय अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कवियों ने स्वदेशी उधोगों को प्रोत्साहन देने और स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार प्रसार पर विशेष बल दिया। 'प्रबोधिनी शीर्षक कविता में भारतेन्दु ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर विशेष बल दिया। यधपि प्रेमघन, अंबिकादत्त व्यास, राधाÑष्ण दास आदि कवियों में अंग्रेजों द्वारा दी गर्इ सुविधाओं, जैसे बिजली, यातयात के साधन, सिंचार्इ की सुविधा, शिक्षा प्रसार आदि की प्रशंसा की है, लेकिन वे यह नहीं भूल सके हैं कि सामान्य जनता और किसानों, मजदूरों की दरिæता लगातार बढ़ती गर्इ है। इसलिए उन्होंने शासक वर्ग के आर्थिक शोषण का घोर विरोध किया। प्रतापनारायण मिश्र देश की दुर्दशा पर चिंता व्यä करते हुए कहते हैं-

''अभी फिर देखिए क्या दशा देश की हो, बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे!

अकाल, महँगार्इ, करों के दुर्दम्य बोझ से त्रास्त मानव जीवन कवि की करुणा और रोष को जगाता है। बालमुकुन्द गुप्त ने Ñषको के जीवन की विडम्बना इन शब्दों में व्यä की है-

''जिनके कारण सब सुख पावै, जिनका बोया सब जन खाय।

हाय हाय उनके बालक नित भूख के मारे चिल्लायै।

अहा बिचारे दु:ख के मारे निस दिन पच पच मरे किसान।

जब अनाज उत्पन्न होये तब सब उठवा ले जाए लगान।

परिवार, समाज और देश की क्रमश: बढ़ती हुर्इ हीनावस्था कवियों की वाणी को जहाँ करुणा से भर देती है वहीं शासन वर्ग की अनीतियों के विरूद्ध जन जागरण का संदेश भी देती है।

4. भä भिवना : देशप्रेम, समाज सुधार जैसे तत्कालीन विषयों के साथ-साथ इस युग के कवियों ने मèयकालीन कवियाें के समान भä-िभाव पर भी कविताएँ लिखीं। इस काल के काल में निगर्ुण भä अिैर वैष्णव भä पिर जो कवियाएँ लिखी गर्इ उनमें मèययुगीन परिपाटी का अनुसरण मात्रा था, लेकिन भä अिैर देशप्रेम को एक ही समकोण पर प्रतिषिठत करना निश्चय संवेदना की मौलिकता कही जा सकती है। रामकाव्य की अपेक्षा Ñष्णभä किव्य की रचना इस युग में अधिक हुर्इ। भारतेन्दु राधा Ñव्य के अनन्य भä थे। वल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होने के कारण उनके अनेक पदों में सख्य और विनय भाव की भä कि अधिक निरूपण मिलता है।

''अपुनो अपुनो मत लै लै सब झगरत ज्यों भठिहारे'- कहकर उन्होंने धार्मिक मतभेदियों की तीव्र भत्र्सना की है, वहाँ- ''मेरे तो साधन एक ही हैं, जग नन्दलला वृषभानुदुलारी। भä भिवना की दृषिट से प्रेमधन की अलौकिक लीला, अंबिकादत्तव्यास की 'कंसवंध आदि रचनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

देशानुरागमयी भä भिवना के अंतर्गत इस युग के कवियों ने धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय भावना को महत्त्व दिया।

'प्रबोधिनी शीर्षक कविता की डूबत भारत नाथ बेगी जागो अब जागो जैसी पंäयिें के माèयम से भारतेन्दु ने जातीयता राष्ट्रीयता और भä भिवना को समरेखा प्रदान की है। ''कहाँ करूणानिधि केशव सोए में भी भä सिे साथ-साथ तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों को भी उभारने का प्रयास किया गया। हम आरत भारत वासिन पै अब दीनदयाल दया करिए- कहकर प्रतापनारायण मिश्र ने र्इश्वर भä अिैर देशभä कि समन्वय प्रस्तुत किया है।

5. Üाृंगार-भावना - भारतेन्दु और उनके समकालीन कवियों ने Üाृंगार रस को भी अपने काव्य का विषय बनाया। रीतिकालीन काव्य की परंपरा का अनुसरण करते हुए उन्होंने सामान्यत: राधा-Ñष्ण के संदर्र्भ में प्रेम और सौन्दर्य का वर्णन किया है। भारतेन्दु ने प्रेम सरोवर, प्रेम माधुरी, प्रेम तरंग, प्रेम फुलवारी आदि में भä-िÜाृंगार और कहीं कहीं विशुद्ध Üाृंगार को व्यंजित किया है। प्रेमधन की 'युगलमंगल स्तोत्रा तथा वर्षा बिन्दु भी इसी प्रकार की रचनाएँ हैं। भारतेन्दु के प्रेमदशा का वर्णन करते हुए कुछ सवैयों (छन्द) में घनानन्द जैसी सरसता देखी जा सकती है। अंबिकादत्त व्यास की 'पावन पचासर Üाृंगारस का मनोहारी वर्णन प्रस्तुत करती है। जगमोहनसिंह ने प्रेम का जो निश्छल, रागात्मक वर्णन 'प्रेमसम्पत्तिलता में प्रस्तुत किया है, वह अनुपम है-

''अब यों उर आवत है सजनिं मिली जाऊँ गरे लगी कै छतियाँ।

मन की करि भाँति अनेकन औ मिली कीजिय री इस की बतियाँ।।

हम हारि अरी करि कोटि उपाय, लिखि बहु नेह भरी पतियाँ।

जगमोहन मोहनी मूराती के बिना कैसे कटे दुख की रतियाँ।।

इस युग के कवियों ने रीतिकालीन कवियाें की भाँति उन्मुä Üाृंगार का नहीं वरन मर्यादित Üाृंगार वर्णन किया है। भारतेन्दु का Üाृंगार वर्णन आदर्श है-

''एक अंगी बिनु कारने इस रस सदा समान।

पियाहिं गने सर्वस्व जो सोर्इ प्रेम समान।।       

6. प्रÑति-वर्णन - प्रÑति के स्वच्छन्द वर्णन में कवियों ने प्राय: परंपरा का ही निर्वाह किया है। प्राय: सर्वत्रा प्रÑति भावों को उíीप्त करने वाली ही रही है। भारतेन्दु की 'बसन्त होली, अंबिकादत्त व्यास की 'पावस पचासा, गोविन्द गिल्लाभार्इ की षडऋतु आदि में बसंत ऋतु और वर्षा-ऋतु का आलम्बनात्मक चित्राण के स्थान पर पर नायक-नायिका के मनोदशाओं के चित्राण में अधिक रुचि प्रतीत होती है। प्रÑति को Üाृंगारिक मनोदशाओं, सामाजिक उदबोधन और नीति-कथन आदि से सम्बद्ध करने का भी सत्प्रयास मिलता है। भारतेन्दु की 'प्रात-समीरन 'प्रेमधन की 'मयंक महिमा प्रतापनारायण मिश्र की 'प्रेम पुष्पांजलि इस दृषिट से महत्त्वपूर्ण कही जा सकती हैं। जगमोहनसिंह की कविताओं में प्रÑति के सूक्ष्म निरीक्षण और नैसर्गिक दृश्यों का अत्यंत सुन्दर चित्राण हुआ है, जैसे कि पर्वत-श्रृंखला की शोभा का चित्रा-शैली ने किया गया यह

चित्राण -

''पहार अपार कैलास से कोटिन ऊँची शिखा लगी अंबर चूम।

निहारत दीठि भ्रमै पगिया गिरि जान उतंगता ऊपर झूम।।

प्रकाश पतंग सों चोटिन के बिकसै अरबिन्द मलिन्द सूझूम।

लसि कटि मेखला के जगमोहन कारी घटा घन घोरत घूम।।

7. हास्य-व्यंग्य : भारतेन्दु युग में कविता की दृषिट से हास्य-व्यंग्य का भी प्रचुर मात्राा में प्रयोग हुआ। समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, विÑतियों, रूढि़यों आदि के साथ-साथ पाश्चात्य सभ्यता, अंग्रेजों की शासन नीति आदि पर व्यंग्य करने के लिए विषय और शैली की दृषिट से अनेक प्रयोग किए गए। भारतेन्दु ने अपने नाटकों के प्रगीतों में व्यंग्यगीतियों और मुकरियों की भी रचना की। 'बंदरसभा के गीतों की रचना उन्होंने उदर्ू-नाटक 'इन्दर-सभा के गीतों की पैरोडी के रूप में की। 'नए जमाने की मुकरी शीर्षक से तत्कालीन सामाजिक.राजनीतिक विसंगतियों को उभारने का प्रयास किया गया। मधपान के विषय में मुकरी में व्यंग्य का तीखापन देखा जा सकता है-

''मुँह जब लागै जब नहिं छूटै, जाति, मान, धन सब कुछ लूटै।

पागल करि मोहि करे खराब, क्यों सखि साजन, नहिं सराब।

अंग्रेजी शिक्षा-प्राप्त युवा-वर्ग द्वारा पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण को ऐसे ही मार्मिक व्यंग्य से रोका जा सकता है-

जग जानै इंगलिश हमें वागी वस्त्राहिं जोय।

मिटै बदन पर श्याम रंग जन्म सुफल तब होय।।

प्रावधान के 'हास्य बिंदु प्रकरण में तत्कालीन अनेक असंगतियों पर विनोदपूर्ण व्यंग्य मिलता है। इसी प्रकार प्रतापनारायण मिश्र की हरगंगा, बुढ़ापा, ककराण्टक आदि कविताएँ इसी दृषिट से प्रसिद्ध हुर्इ।

8. काव्यानुवाद : भारतेन्दु युग के कवियों ने हिंदी और ब्रजभाषा में मौलिक रचनाओं के साथ-साथ संस्Ñत की अनेक रचनाओं के अनुवाद भी किए। राजा लक्ष्मणसिंह द्वारा अनुदित 'रधुवंश और 'मेघदूत उल्लेखनीय Ñतियाँ है जिनमें 'भावान्तरण की सरसता, शैली का लालित्य शुद्ध ब्रजभाषा तथा सवैया छंद के माèयम से प्रस्तुत किया गया है। भारतेन्दु ने 'नारद भä सिूत्रा और शांडिल्य के 'भä-िसूत्रा को 'तदीय सर्वस्व और 'भäसिूत्रा वैजयन्ती शीर्षक से अनुदित किया, जिनमें 'प्रतिपाध की प्रेषणीयता पर अधिक èयान दिया गया। ठाकुर जगन्मोहनसिंह द्वारा अनुदित रचनाएँ 'ऋतुसंहार और 'मेघदूत विशेष उल्लेखनीय हैं।

अंग्रेजी की ललित काव्य रचनाओं के रूपान्तरण की ओर èयान दिलाने का श्रेय श्रीधर पाठक को है, जिन्होंने गोल्डसिमथ की 'हरमिट और 'डेज़र्टेड विलेज को 'एकान्तवासी योगी और 'ऊजड़ ग्राम के शीर्षक से अनुदित किया। इस प्रकार काव्यानुवाद को प्रोत्साहन देने और इसके साथ ही ब्रजभाषा के साहित्य को समृद्ध करने की दिशा में यह योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

कलापक्ष

1. ब्रजभाषा का प्रयोग : भारतेन्दु युग में गध भले ही खड़ी बोली में लिखा गया लेकिन कविता की भाषा का आधार पूर्व परंपरा से चली आ रही ब्रजभाषा ही बनी रही। यधपि भारतेन्दु ने स्वयं खड़ी बोली में काव्य लिखने का प्रयास किया था लेकिन अभी वह अपने शैशव काल में ही थी। उसमें वह सरसता और लालित्य नहीं आ पाया था जो ब्रजभाषा में था। ब्रजभाषा की माधुरी पर रीझे हुए भारतेन्दु ने स्वीकार किया था कि, ''ब्रजभाषा में ही कविता करना उत्तम होता है, और इसी से सब कविता ब्रजभाषा में ही उत्तम होती है। इस रूप में भारतेन्दु युग में भले ही विषय की दृषिट तत्कालीन परिसिथतियों, सुधारवादी मनोवृत्ति, जनजागरण को लिया हो लेकिन भाषा ब्रजभाषा ही रही। भä किव्य और Üाृंगार-काव्य में कोमलकांत पदावली और वीरकाव्य में ओजपूर्ण शब्दावली का प्रयोग दर्शनीय है। खड़ीबोली में लिखी गर्इ कतिपय रचनाएँ हैं- भारतेन्दु का फूलों का गुच्छा, प्रेमधन की भयंक महिमा और प्रतापनारायण मिश्र की कविताएँ।

2. काव्यरूप : काव्यरूप की दृषिट से इस युग की रचनाएँ मुक्तक शैली में ही लिखी गर्इं। हरिनाथ पाठक की 'श्री ललित नारायण प्रेमधन की 'जीर्ण जनपद मुäक काव्य के उदाहरण हैं। भारतेन्दु की 'रानी छदमलीला, देवी छदमलीला और तन्मयलीला प्रबन्ध-गीति के उदाहरण हैं। लोकसंगीत की शैली- प्रेमधन और प्रतापनारायण मिश्र की कजलियाँ भारतेन्दु की वर्षा विनोद, तथा प्रतापनारायण मिश्र, 'राधाचरण गोस्वामी और जगमोहन द्वारा रचित लावनियाँ- में देखी जा सकती है। रीतिकालीन सतसर्इ परंपरा का अनुसरण करते हुए 'Ñष्ण शतक और 'सुकवि सतसर्इ आदि रचनाएँ देखी जा सकती हैं। भारतेन्दु द्वारा 'रसा उपनाम से प्रेमघन द्वारा 'अब्र उपनाम से उदर्ू में गज़ल आदि की रचना भी नवीन प्रयोग है। प्रतापनारायण मिश्र की प्रवृत्ति कसीदा, शेर, मरसिया आदि लिखने की भी थी। इस रूप में इस युग के कवियों ने काव्यरूप के क्षेत्रा में यथासंभव नवीन प्रयोग किए।

3. अलंकार और छंद : सामान्यत: कवियों ने रीतिकालीन अलंकरण प्रवृत्ति का अनुकरण नहीं किया है। प्रसंगवश अलंकारों के सहज प्रयोग में भारतेन्दु की यमुना-छवि जैसी कुछ कविताओं में उत्प्रेक्षा, संदेह आदि अर्थालंकारों की प्रमुखता लक्षित होती है। शब्दालकारों अनुप्रास, यमक, श्लेष आदि का सहज रूप से अभिनिवेश है।

भारतेन्दु और उनके सहयोगी कवियों ने मुख्यत: पदशैली में ही कविताएँ लिखीं है, फिर भी परंपरित छंद योजना सभी कवियों के काव्य में मिलती है। दोहा, चौपार्इ, सोरठा, कुण्डलिया, रोला आदि मात्रिक छन्द और कवित्रा, सवैया, शिखरिणी, वंशस्थ, वसंन्ततिलका आदि वार्णिक छंद कवि समुदाय में विशेष प्रचलित थे। भारतेन्दु ने उदर्ू छंदों में काव्य रचना के साथ प्रात समीरण कविता में बँगला के 'पयार छंद का प्रयोग भी किया।

इस प्रकार वण्र्य विषय और कला शैली की दृषिट से आधुनिक काव्यधारा के प्रारंभिक चरण के रूप में भारतेन्दु काव्य साहित्य एक विशिष्ट स्थान रखता है।


3 द्विवेदी युगीन काव्यगत विशेषताएँ

द्विवेदी युगीन काव्यगत विशेषताएँ

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भारतेन्दु युग से हिंदी कविता Üाृंगारिकता से राष्ट्रीयता, रूढि़ से स्वच्छंदता और जड़ता से प्रगति की ओर अग्रसर करने का जो प्रयत्न प्रारंभ हुआ था, द्विवेदी-युग को उसे और आगे बढ़ाने का श्रेय है। इस काल खंड के पथ-प्रदर्शक, विचारक और साहित्य नेता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर इसका नाम द्विवेदी युग सर्वथा उचित है। इस युग का आरंभ 'सरस्वती पत्रिका के प्रकाशन सन 1900 से माना जाता है। इसे जागरण सुधार-काल भी कहा जाता है। भारतीय इतिहास में इस समय बि्रटिश शासन का दमन-चक्र पूरे जोरों पर था। सन 1857 के विæोह के बाद, महारानी विक्टोरिया द्वारा किए गए (सâदयतापूर्वक) घोषणा-पत्रा से भारतीय जनता आशानिवत हो गर्इ थी। जो थोड़े बहुत सुधार हुए, उन्हीं के कारण भारतेन्दु युग में अंग्रेजों का प्रशसित-गान किया गया, पर यह सिथति अधिक देर तक नहीं रही। अनेक काले कानून पास हुए, और शासक-वर्ग की असलियत सामने आते ही जनता में क्षोभ और असंतोष बढ़ता गया। देश का कच्चा माल बाहर भेजने की नीति आदि के साथ-साथ, एक के बाद एक पड़ने वाले दुभिक्षों से जनता लगातार पिसने लगी। ऐसी सिथति में गोपालÑष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक जैसे मेघावी नेताओं ने 'स्वराज्य को 'जन्मसिद्ध अधिकार घोषित कर जनता को उनके अधिकारों के प्रति सजग कराने का क्रांतिकारी प्रयास किया।

अंग्रेजों की कूटनीति राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं, शिक्षा, धर्म और समाज के क्षेत्राों में भी भारतीय जनता को निरन्तर दीन और असहाय बनाए रखना चाहती थी और किसी सीमा तक उन्हें इसमें सफलता भी मिली। लेकिन अंग्रेजी शिक्षा के ही परिणामस्वरूप भारतवासी मिल, स्पेंसर, रूसों जैसे पाश्चात्य उदारवादी विचारकों के साहित्य के सम्पर्क में आए। इधर-तिलक, गोखले, लाल लाजपतराय, मदनमोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानंद आदि नेताओं और समाज सेवियों ने भी जनता के स्वाभिमान को जगाकर राष्ट्रीय भावना के प्रति निष्ठावान बनाने का प्रयास किया। यूँ भी उन्नीसवीं शती के उत्तराद्र्ध में आर्य समाज, ब्रह्रा समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी और इंडियन नेशनल कांग्रेस आदि के स्थापना के परिणामस्वरूप भारतीय सभ्यता और संस्Ñति तथा समाज के पुनरुत्थान की प्रक्रिया तो प्रारंभ हो चुकी थी। इन सभी परिसिथतियों और परिवर्तनों से राष्ट्रीय पुनरुत्थानवादी आंदोलन को और भी बल मिला।

द्विवेदीयुगीन काव्य

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक साहितियक दृषिट से भä अिैर Üाृंगार के विषय अधिक मान्य नहीं रह गए थे। समस्यापूर्ति और नीरस तुकबनिदयों से भी सâदय ऊबने लगे थे। पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती के संपादक बन, नायिकाभेद को छोड़कर विविध विषयों पर कविता लिखने की प्ररेणा दी। इसके साथ ही सभी प्रकार के छंदों का व्यवहार करने, सभी काव्यरूपों को अपनाने तथा गध और पध की भाषा के एकीकरण का परामर्श दिया। जिन साहित्यकारों ने इन आदशो± का अनुसरण करते हुए साहित्य-रचना के माèयम से जन-मन को नवीन संचेतना से भरने का प्रयास किया, उनमें मैथिलीशरण गुप्त, गोपालशरण सिंह, गयाप्रसाद शुक्ल, 'सनेही, लोचनप्रसाद पाण्डेय, अयोèयासिंह उपाèयाय हरिऔध और नाथूराम शर्मा 'शंकर आदि हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

1. राष्ट्रीय भावना : द्विवेदी युग में राजनीतिक चेतना और सांस्Ñतिक पुनरुत्थानवादी विचारधारा के कारण राष्ट्रीयता का स्वर सर्वोपरि हुआ। देशभä प्रिय: सभी कवियों का मूल उíेश्य रही। विदेशों में इटली का स्वतंत्राता युद्ध, रूस जापान युद्ध और जापान की विजय, आयरलैंड के होमरूल आंदोलन आदि ने भारतीय जन मानस को देश की स्वतंत्राता के लिए नर्इ दिशा दी। महात्मा गाँधी का दक्षिण अफ्रीका से लौटकर देश मे जन-जागृत्ति का प्रयास कवियों की मूल प्रेरणा बना। उन्होंने पराधीनता को जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बताया, इसीलिये उन्होंने क्रांति और आत्मोत्सर्ग के मार्ग पर चलकर स्वतंत्राता-प्रापित की प्रेरणा दी।

''देशभä वीरो, मरने से नेक नहीं डरना होगा।

प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा। (शंकर सर्वस्व)

मैथिलीशरण गुप्त ने ओजस्वी स्वरों में देश के युवा वर्ग को झकझोरने का प्रयास किया -

''धरती हिलाकर नींद भगा दे

बज्रनाद से व्योय जगा दे

दैव, और कुछ लाग लगा दे। (स्वदेश संगीत)

रामनरेश त्रिपाठी अपने 'मिलन 'स्वप्न और 'पथिक काव्यों के द्वारा परतंत्राता के बंधन काटने के लिए जनता को उदबोधित करते हैं। मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती ने जनता में आशा और उत्साह का अनोखा रूप संचरित किया। देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ प्रकट करते हुए कवि ने देश के अतीत का अत्यंत गौरव और श्रद्धा के साथ गुणगान किया। भारते श्रेष्ठ था, है और सदैव रहेगा का भाव इन पंäयिें के साथ गुंजायमान है-

''भू लोक का गौरव, प्रÑति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?

फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?

संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?

उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन है? भारतवर्ष है।

देश की धीरता गंभीरता, वीरता, बड़ार्इ, कला-कौशल के अभाव पर क्षोभ व्यä करते हुए ठाकुर गोपालशरण सिंह कहते हैं-

''किसने शताबिदयों की ली छीन सब कमार्इ?

राय देवीप्रसाद 'पूर्ण जनता के अंतर से आलस्य, फूट, मिथ्या कुलीनता जैसे अभिशापों को जड़ से मिटा देना चाहते हैं-

''भरतखण्ड का हाल देखो है कैसा।

आलस का जंजाल ज़रा देखो है कैसा।।

जरा फूट की दशा खोलकर आँखें देखोे।

खुदगजऱ्ी का नशा खोलकर आँखों देखो।।

है शेखी दौलत की कहीं, बल का कहीं गुमान है।

है खानदान का मद कहीं, कहीं नाम का èयान है।

इस प्रकार देश की दुर्दशा के अनेक कारणों की ओर जनता का èयान आकर्षित करते हुए उसे स्वतंत्राता प्रापित की ओर अग्रसर करने का प्रयास किया गया। आर्थिक विपन्नता, सामाजिक कुरीतियाँ, रूढ़ प्रथाएँ, धार्मिक आडम्बर किस प्रकार देश की नीवं खोखली कर रहे हैं- इसका प्रत्यक्ष.अप्रत्यक्ष कथन जन.मानस को झकझोरने में सफल हुआ और जनता अपने  अधिकारों के प्रति सचेत और सावधान होने लगी। स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और विदेशी के बहिष्कार पर विशेष बल दिया गया। इन सभी विशेषताओं के साथ.साथ मातृभूमि क महिमा का गान निरन्तर जन.मानस में स्वतन्त्राता प्रापित की भावना को प्रबल कर रहा था।

2. मानवतावाद : द्विवेदी युग में मानवतावाद के आदशो± का विस्तार से चित्राण हुआ। इससे पूर्व र्इश्वर, उनके अवतार, राजा और उनके उच्चपदीय विभिन्न सामंत, योद्धा आदि का ही चित्राण काव्य का विषय या अथवा नायिकाओं के विभिन्न रूप रस की दृषिट से काव्य में चित्रित किए जाते थे; लेकिन अब सामान्य मानव को काव्य का विषय बनाया गया। किसान, मजदूर, दुखी दीन जनता के प्रति सहानुभूति कवि को उद्धेलित करने लगी और शब्दों के माèयम से उनकी पीड़ा जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास तीव्र होने लगा। 'साकेत में राम का अवतार पीडि़त जन से दुख दर्द को मिटाने के लिए हुआ है, इसका संकेत इन पंäयिें में स्पष्ट है-

''मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं।

जो विवश, विकल, बलहीन, दीन, शापित हैं।।

मानव.सेवा ही र्इश्वर-भä हिै। 'हरिऔध के 'प्रियप्रवास मे राधा Ñष्ण मानवतावादी गुणों से सम्पन्न हैं, इसीलिए राधा Ñष्ण के वियोग में आँसू नहीं बहाती, बलिक वह अपना समय दीन दुखियों की सेवा कर, प्रेम के प्रति अपने कत्र्तव्य की पूर्ति करती है। मैथिलीशरण गुप्त की 'किसान, सियाराम शरण गुप्त की 'अनाथ तथा 'सनेही की 'Ñषक-क्रन्दन Ñषक-जीवन से संबंधित रचनाएँ हैं। शिक्षाविहीन नारियों की दुर्दशा की ओर भी कवियों का èयान गया और उन्होंने उनकी पीड़ा को समाज के सामने रख, उनके प्रति प्रेम सहानुभूति का भाव रखने का संदेश दिया। इस प्रकार इस काव्य में जनसाधारण की भावनाओं को पर्याप्त स्थान मिला।

3. नीति और आदर्श: आलोच्च युग का काव्य नीतिपरक और आदर्शवादी काव्य है। उसमें नैतिकता की प्रधानता है, और यही कवि का आदर्श होना चाहिए। मैथिलीशरण गुप्त का कहना है-

''केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए।

उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।।

क्यों आज 'रामचरितमानस सब कहीं सम्मान्य है।

सत्काव्य-युग उसमें परम आदर्श का प्राधान्य है।।

कवियों ने इतिहास, पुराणों आदि से लिए गए कथा-प्रसंगों के आधार पर या फिर कल्पनाजन्य कथाएँ लेकर आदर्श चरित्राों पर प्रबन्ध काव्य लिखे, जिनमें सत की असत पर विजय दिखार्इ गर्इ। स्वार्थ-त्याग, कत्र्तव्य-पालन, आत्मगौरव जैसे उच्चादर्श जीवन में सकारात्मक भावना का संचार करते हैं। 'हरिऔध का 'प्रियप्रवास, मैथिलीशरण गुप्त का 'साकेत, 'रंग में भंग, 'जयद्रथवध, गोकुलचंद शर्मा का 'गाँधी गौरव, रामनरेश त्रिपाठी का 'मिलन आदि काव्य इन्हीं आदर्श भावनाओं को प्रस्तुत करते हैं। प्रेम की महिमा रामनरेश त्रिपाठी ने इन शब्दों में व्यä की है-

''गंधविहीन फूल हैं जैसे चंæ चंæकि-हीन।

यों ही फीका है मनुष्य का जीवन प्रेम विहीन।।

प्रेम स्वर्ण है, स्वर्ग प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक।

र्इश्वर का प्रतिबिम्ब प्रेम है, प्रेम âदय-आलोक।।

पौराणिक और ऐतिहासिक वीरों के चरित्रा, जैसे- परशुराम, अर्जुन, अभिमन्यु, चंæगुप्त, स्कंदगुप्त, आदि कवियों के प्रेरणास्त्राोत बने।

4. काव्य-विषय का क्षेत्रा-विस्तार - द्विवेदी युगीन कविता में वण्र्य विषय का खूब विस्तार हुआ। आचार्य द्विवेदी ने कवि कत्र्तव्य निबंध में लिखा था-

''चींटी से लेकर हाथी पर्यन्त पशु, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुæ पर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनंत पर्वत-सभी पर कविता हो सकती है।

परिणामत: प्रÑति से सभी दृश्य और पदार्थ कविता का विषय बनने लगे। इस युग में छोटे से छोटे, साधारण विषयों पर लिखी गइ± कविताओं की तो कोर्इ सीमा ही नहीं है- परोपकार, मुरली, सत्य, कुलीनता, पौरुष, शिशु-स्नेह, सुखमय-जीवन, मेंहदी, मनोव्यथा, कामना, विधा, सपूत, ग्राम-गौरव, सज्जनों का स्वभाव, समालोचक-लक्षण, दरिæ विधार्थी आदि अनेकानेक विषय काव्य क्षेत्रा में प्रविष्ट हुए और इस रूप में हर छोटा बड़ा व्यä मिनो काव्य से सीधे ही जुड़ गया था।

5. प्रÑति का स्वतंत्रा चित्राण - प्रÑति-प्रेम हिंदी साहित्य के आदिकाल से ही कवि-मन के लिए प्रेरणा बना रहा था, लेकिन 'आलंबन रूप में उसका चित्राण प्राय: नगण्य ही था। श्रीधरपाठक ने अपनी रचनाओं द्वारा यह भाव संप्रेषित किया कि अनंत और चिरसुंदर प्रÑति में मानव-âदय को आÑष्ट करने की अपार शä हिै। यूँ संस्Ñत-साहित्य में कालिदास के मेघदूत, ऋतुसंहार आदि में प्रÑति का आलंबन रूप में खूब चित्राण मिलता है, लेकिन हिंदी साहित्य अब तक उसका प्रयोग केवल उíीपन रूप में किया गया था। स्वतंत्रा रूप से प्रÑति-चित्राण का प्रारंभ भारतेन्दु युग में हो गया था जिसे द्विवेदी युग में विस्तार मिला। मैथिलीशरण गुप्त, अयोèयासिंह उपाèयाय 'हरिऔध, त्रिपाठी, गोपालशरण सिंह, लोचनप्रसाद पाण्डेय, गिरधर जैसे कवियों के काव्य में प्रÑति का स्वतन्त्रा और मनोहारी चित्राण मिलता है। यधपि इस युग के प्रÑति चित्राण में पर्याप्त स्थूलता, सौम्य भाव और कल्पना वैभव का अभाव है, फिर भी एक ऐसी ताज़गी और आकर्षण है, जो पाठक के मन को बाँधने में समर्थ है-

दिवस का अवसान समीप था।

गगन था कुछ लोहित हो चला।।

तरू-शिखा पर थी अब राजती।

कमलिनी-कुल वल्लभ की प्रभा।।

पं. रामचंæशुक्ल द्वारा 'ग्राम-सौन्दर्य का वर्णन, रामनरेश त्रिपाठी का 'पथिक और 'स्वप्न काव्य में प्रÑति का अनूठा सौन्दर्य चित्राण, सत्यनारायण 'कविरत्न का 'भ्रमरदूत में संवेदनायुä प्रÑति चित्राण इस युग की महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

6. हास्य व्यंग्य - द्विवेदीयुगीन काव्य साहित्य में भारतेन्दु युग जैसी जिंदादिली, चुहलबाजी और फक्कड़पन देखने को नहीं मिलती। कारण था द्विवेदी जी के व्यäतिव के प्रभाव स्वरूप संयत और मर्यादित रहना। राजनीतिक शोषण, सामाजिक कुरीतियाँ, धार्मिक आडम्बर, विदेशी सभ्यता का अनुकरण, व्याभिचार जैसे विषय इस युग में हास्य व्यंग्य के माèयम से प्रस्तुत किए गए। आचार्य द्विवेदी ने 'सरगौ नरक ठिकाना नाहिं में कल्लू अल्हैत के माèयम से गाँव छोड़कर शहर जाने वाले और विदेशी सभ्यता का अंधानुकरण करने वाले लोगों की अधकचरी आदत को अपने हास्य व्यंग्य का विषय बनाया। बालमुकुन्द गुप्त जैसे सशä व्यंग्यकार ने तो वाइसराय लार्डकर्जन को अपने व्यंग्य का विषय बनाकर, तीखा प्रहार इस रूप में किया है-

''हमसे सच की सुनो कहानी, जिससे मरे झूठ की नानी।

सच है सभ्य देश की चीज़, तुमको उसकी कहाँ तमीज़?

औरों को झूठा बतलाना, अपने सच की डींग उड़ाना।

ये ही पक्का सच्चापन है, सच कहना तो कच्चापन है।।

बोले और करे कुछ और, यही सभ्य सच्चे के तौर।

मन में कुछ मुँह में कुछ और, यही है सत्य कर लो गौर।।

झूठ को जो सच कर दिखलाए, सो ही सच्चा साधु कहाए।

मुँह जिसका हो सके न बंद, समझो उसे सचिचदानंद।।

इसी प्रकार 'कर्जनाना शीर्षक कविता में लार्ड कर्जन को 'अपने मुँह मियाँ मिठठू कहते हुए व्यंग्य का विषय बनाया है। नाथूराम शर्मा 'शंकर की सुप्रसिद्ध कविता है 'गर्भरण्डा रहस्य, जिसमें गर्भ में ही विधवा हो जाने वाली बालिका के माèयम से समाज की कुरीति का पर्दाफाश किया गया है। आर्यसमाज से प्रभावित ये कविगण एक ओर सामाजिक धार्मिक कुरीतियों का पर्दाफाश करते हैं और दूसरी ओर अपनी सभ्यता और संस्Ñति को तिलांजलि देकर विदेशी सभ्यता का अंधानुकरण करने वाले लोगों को अपने परिहास का विषय बनाते हैं। इस दृषिट से ब्रजराज Ñष्ण, र्इश्वरीप्रसाद शर्मा, जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी के नाम उल्लेखनीय है।

शिष्ट और संयत हास्य का मनोहारी चित्राण 'साकेत के मंगलाचरण में गणेश और षडानन की बालोचित क्रीड़ाओं में तथा प्रथम सर्ग में लक्ष्मण-उर्मिला के परिहास प्रसंग में किया गया है।    

कला पक्ष

1. भाषा संस्कार : द्विवेदी युग में गध और पध की भाषा खड़ीबोली सर्वस्वीÑत हो गर्इ थी। ''जार्ज गि्रयसन जैसे भाषाविद भारतेन्दु, प्रतापनारायण मिश्र आदि कवि तथा बाद में रत्नाकर सरीखे कवि-मनीषी खडी़बोली की काव्योपयुक्तता के विषय में संदेहशील थे। द्विवेदीयुगीन काव्य ने इस शंका को निमर्ूल कर दिया। (डा. नगेन्æ) यूँ प्रारंभ में खड़ी बोली में लिखा काव्य नीरस तुकबंदी ही अधिक था, लेकिन धीरे-धीरे इसमें पर्याप्त सुधार आया, और 'जयद्रथवध जैसे खंडकाव्य की प्रसिद्धि ने तो जैसे 'ब्रजभाषा के मोह का वध ही कर दिया था। इस युग के काव्य से यह बस स्पष्ट हो जाती है कि ''खड़ीबोली अपरिपक्वता, अव्यवस्था और अमार्दव से किस भाँति परिपक्वता, व्यवस्था और मार्दव तक पहुँचींं। -(डा. नगेन्æ)। द्विवेदी जी ने खड़ीबोली हिंदी को समृद्ध करने के लिए संस्Ñत से शब्द-सम्पदा लेने का परामर्श दिया, परिणामत: काव्य-भाषा शुद्ध व्याकरण सम्पदा और संस्Ñतनिष्ठ बनी। निश्चय ही खड़ी बोली को सामथ्र्यवान बनाने में द्विवेदी का अनुपम योगदान रहा।

2. काव्यरूपों की विविधता : आलोच्य काल में प्रबन्ध, मुत्तक, प्रगीत आदि सभी काव्य रूपों को अपनाया गया। इतिवृत्तात्मकता अर्थात कथाश्रित काव्य-रचना कवियों को अधिक प्रिय था। इस युग के महाकाव्यों में 'प्रियप्रवास, 'साकेत तथा 'रामचरित चिंतामणि का प्रणयन हुआ। मैथिलीशरण गुप्त के 'रंग में भंग, 'जयæथ वध, 'किसान 'प्रसाद का 'प्रेम पथिक, सियारामशरण गुप्त का 'मौर्य विजय, रामनरेश त्रिपाठी का 'मिलन जैसे उच्च्कोटि के खण्डकाव्य इसी युग में लिखे गए। रत्नाकर ने प्रबन्ध-मुäक 'उद्धव शतक की रचना की, जिसमें प्रबंध का पूर्वापर संबंध भी है और प्रत्येक पध मुäक के समान स्वत: पूर्ण है। निश्चय ही यह अपने आपमें एक अनूठा प्रयोग था। मुäक रचना के अंतर्गत छोटे-छोटे अनेक विषयों को लेकर स्वतंत्रा पधों की रचना हम युग के काव्य की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। द्विवेदी युग में 'प्रगीत शैली का भी प्रयोग हुआ, जिसका आगे चलकर अधिकाधिक विकास हुआ।

3. छंद वैविèय - वण्र्य विषय के अनुरूप, इस युग में छंदों में भी विविधता मिलती है। कविगण दोहा, कवित्त या सवैया तक ही सीमित नहीं रहे। रोला, छप्पय, कुण्डलिया, गीतिका, हरिगीतिका, नाटक, लावनी आदि छंद भी कुशलतापूर्वक अपनाए गए। मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध तथा शंकर आदि कवियों ने छंद-प्रयोग में अदभुत कौशल का परिचय दिया। द्विवेदी जी की प्रेरणा से अतुकांत छंदों को भी अपनाने की प्रेरणा मिली, और 'हरिऔध ने 'प्रियप्रवास की रचना संस्Ñत के अतुकांत छंदों के आधार पर की। महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ-साथ श्रीधर पाठक, मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, राय देवीप्रसाद पूर्ण, जगन्नाथ पांडेय आदि ने संस्Ñत में छंदों का खड़ी बोली में सफल प्रयोग किया। भगवानदीन और श्रीधर पाठक ने उदर्ू के छंद अपनाए।

द्विवेदीयुगीन ये सभी विशेषताएँ इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण है कि द्विवेदी जी ने सदैव नवीनता का स्वागत किया और पुरातनता का घोर विरोध किया। परिणामत: नवीनता लाने की तरह-तरह की शुभ प्रवृत्तियों के समारंभ से हिंदी कविता सच्चे अथो± में नए काव्यान्दोलन के लिए तैयार होती गर्इ। विषय विस्तार, भाषा के संस्कार तथा शिल्पगत नए प्रयोग आदि विशेषताओं के कारण द्विवेदी युग आने वाले युग के लिए एक प्रेरक पृष्ठभूमि बना। निश्चय ही हिन्दी साहित्य के विकास-क्रम में इन कवियों का योगदान सराहनीय है।


4 छायावाद

छायावाद

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पृष्ठभूमि :

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने काव्य की सामाजिक उपयोगिता को èयान में रखते हुए, साहित्य में 'सरलता, असलियत और जोश, पर बल दिया। इस रूप में इस युग में ठोस यथार्थ के चित्राण का प्रबल आग्रह था। इस युग के नैतिक बुद्धिवाद और इतिवृत्तात्मक शैली की प्रतिक्रियास्वरूप हिंदी में जिस काव्यधारा का उदय हुआ, उसे 'छायावाद की संज्ञा से जाना गया। द्विवेदी जी के लिए कठोर अनुशासन और नैतिकता के प्रति घोर आग्रह की प्रतिक्रियास्वरूप युवा-मन में विरोध का भाव जागृत हुआ। वह प्रेम, Üाृंगार और व्यäगित राग-विराग के भावों की प्रस्तुत करने के लिए उत्सुक हो रहा था। संयोगवश इसी समय में रवीन्æनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि को विश्वव्यापी मान्यता मिली। इसके साथ-साथ अन्य बंगला कवियों का भी हिन्दी कविता पर प्रभाव पड़ा और कवि-मन लाक्षणिक शैली में प्रेम, Üाृंगार, प्रÑति, स्वातन्त्रय जैसे व्यäगित और सामाजिक विषयों पर कविता करने लगा। इधर नर्इ शिक्षा ने अनंत संभावनाओं को तो उजागर तो किया, उन्हें साकार करने के अवसर नहीं के बराबर थे। असफलता, कुंठा से उत्पन्न विक्षोभ क्रानित और घोर व्यäविदिता के स्वर निरन्तर मुखर होते गये। इसी कारण छायावादी कवियों की आरंभिक रचनाओं में कुण्ठा और निराशा के स्वर अधिक मुखर हुए, जिसका प्रभाव राष्ट्रीय-सांस्Ñतिक आंदोलन में भाग लेने वाले 'नवीन जैसे कवियों पर भी पड़ा। किंतु यह भी सत्य है कि छायावादी कवियों का क्षेत्रा अत्यंत व्यापक होने के कारण, ये सभी पुनर्जागरण के भाव से भी गंभीर रूप से प्रभावित थे और इसी कारण निराशा और पलायन से अलग सकारात्मक विचारधारा उनके विश्वास को सींच रही थी। इस रूप में इस युग ने भारतीय जीवन के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इस युग का कवि द्विवेदीयुगीन इतिवृत्तात्मकता के विरुद्ध सूक्ष्म भावनाओं की प्रतिष्ठा करता है। तत्कालीन रूढि़यों और र्इसार्इ धर्म-प्रचारकों के आक्षेपों के विरुद्ध भारत के अतीतकालीन प्राणवान मूल्यों की भी प्रतिष्ठा करता है। आर्थिक राजनीतिक दासता के विरूद्ध केवल राष्ट्रीय ही नहीं, संपूर्ण मानव जाति की स्वाधीनता के मूल्यों को प्रस्तुत करता है।

नामकरण : नवीन विषय, नयी भाव भंगिमा को नवीन शैली में अभिव्यä दिेने के कारण प्रारंभ में मुकुटधर पांडेय ने व्यंग्यात्मक रूप में इसे छायावाद नाम दिया, जो बाद में इस युग की कविता के लिए रूढ़ हो गया। महादेवी वर्मा ने इस नामकरण की उपयुäता पर अपने विचार इन शब्दों में व्यä किए हैं- ''सृषिट के बाáाकार पर इतना लिखा जा चुका था कि मनुष्य का âदय अभिव्यä किे लिए रो उठा। स्वछन्द छंद में चित्रित उस मानव अनुभूतियों का नाम छाया उपयुä ही था और मुझे तो आज भी उपयुä लगता है। जयशंकर प्रसाद ने 'छायावाद के 'छाया शब्द के भाव को स्पष्ट करते हुए कहा है- ''छाया भारतीय दृषिट से अनुभूति और अभिव्यä किी भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है। èवन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्य, प्रÑति-विधान तथा उपचार वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृत्ति छायावाद की विशेषताएँ हैं। अपने भीतर से मोती के पानी की तरह आंतर स्पर्श करके भाव स्पर्श करने वाली, अभिव्यä किी छाया कांतिमयी होती है। मुकुटघर पांडेय ने छायावाद को रहस्यवाद से जोड़कर उसे इन शब्दों में व्यä किया है- ''छायावाद का मुख्य विषय रहस्यवाद की अनुभूति की अभिव्यंजना है और यह अभिव्यंजना सीधी-सादी भाषा में नहीं हो सकती, इसलिए कवि बड़ी कल्पना-प्रवणता से लाक्षणिक पदावली में इसकी अभिव्यä किरता है। प्रतीकों से अभिव्यä मिें एक अस्पष्टता आ जाती है। यही अस्पष्टता छायावाद का पर्याय है।

इनके अतिरिä अनेक समीक्षकों ने भी 'छायावाद पर अपने विचार अभिव्यä किए। आचार्यरामचंद शुक्ल 'छायावाद को दो अथो± में ग्रहण करते हैं- पहला, रहस्यवाद के अर्थ में जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर, लाक्षणिक भाषा में प्रेमाभिव्यä किरता है। दूसरा प्रयोग 'काव्य-शैली अथवा पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है। बाबू गुलाबराय ने छायावाद और रहस्यवाद दोनों को ही मानव और प्रÑति का आèयातिमक आधार बताया है। पं. नंददुलारे वाजपेयी ने छायावादी आèयातिमकता को मèयकालीन संतों और भäों की आèयातिमकता से भिन्न माना है। उनका मानना है- ''नर्इ छायावादी काव्यधारा का भी एक आèयातिमक पक्ष है, परंतु उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्Ñतिक है। डा0 रामविलास शर्मा छायावाद को मèयवर्ग की चेतना मानते हैं।

इस प्रकार अनेक कवियों और समीक्षकों ने छायावाद की विभिन्न विशेषताओं पर प्रकाश डाला। वस्तुत: छायावाद की भावभूमि प्रांरभिक चरण में रुढि़वादिता और परंपरागत संस्कारों के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पार्इ थी। साधारणत: इसे पाश्चात्य कविता का अनुकरण-मात्रा ही माना गया, लेकिन धीरे-धीरे अपनी सरसता, नूतनता और व्यंजना की अदभुत क्षमता के कारण, छायावाद आरोपों प्रत्यारोधों से ऊपर उठकर अपनी विशिष्टता में प्रतिषिठत हुआ। इस काव्यधारा से जुड़े हुए प्रमुख कवि हैं- जयशंकर प्रसाद, सुमित्राानंदन पंत, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला, महादेवी वर्मा। इन चार कवियों को छायावाद का आधारभूत भी माना गया है। इनके अतिरिä जिन कवियों ने इस विशिष्ट भावधारा को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया वे हैं- डा. रामकुमार वर्मा, हरिवंशराय 'बच्चन, भगवती चरण वर्मा, बलÑष्ण शर्मा, नवीन, नरेन्æ शर्मा, रामेश्वर शुक्ल, 'अंचल, रामधारीसिंह दिनकर आदि।

छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताएँ

1. आत्माभिव्यä -ि छायावादी कवियों ने निजी अनुभूतियों को कविता में इस प्रकार व्यंजित किया कि पाठक सहज ही उसमें तल्लीन हो जाता है अनुभूति के स्तर पर इस युग का काव्य मानव-मात्रा की एकता की स्थापना करने में सफल हुआ है। छायावादी काव्य में अनुभूति की इस प्रधानता के कारण ही इसे 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विæोह माना गया है। यहाँ कवि अंतमर्ुखी होकर अपने सुख दुख, कल्पनाओं और संभावनाओं को अभिव्यä करता है। जयशंकर प्रसाद का आँसू उनके व्यथित âदय की वेदना ही नहीं है, बलिक उसमें जगत के प्रत्येक प्राणी का दर्द जैसे आकर सिमट गया है-

''जो धनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति सी छार्इ।

दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आर्इ।

यह काव्य व्यä मिन का प्रतिबिंब है। डा. शिवदान सिंह चौहान के अनुसार, 'कवि का मैं प्रत्येक प्रबुद्ध भारतवासी का 'मैं था। इसीलिए कवि की विषयगत दृषिट ने अपनी सूक्ष्मतिसूक्ष्म अनुभति को व्यä करने के लिए जो लाक्षणिक भाषा अपनार्इ,  उसके संकेेत और प्रतीक हर व्यä किे लिए सहज प्रेषणीय बन गए। 'निराला की ये पंäयिँ इसी 'मैं की शैली की ओर संकेत करती हैं-

''मैंने मैं की शैली अपनार्इ

देखा एक दुखी निजभार्इ।

दु:ख की छाया उमड़ पड़ी âदय में

झट वेदना उमड़ आर्इ।

'बच्चन का 'आज मुझसे दूर दुनिया गीत उनके जीवन के एकाकीपन का प्रतीक है।

(2) प्रÑति चित्राण - छायावादी कवि प्रेम और सौन्दर्य का चितेरा कवि है। वह प्रÑति के अनूठे सौन्दर्य को एक अलग ही दृषिट से देखता है, इसलिए छायावादी काव्य में प्रÑति का भरपूर चित्राण हुआ है। कवि की जीवनमयता प्रÑति को गतिशील रूप में देखती है। बादल, झरने, तरंगे, नदी, वृक्ष सभी गतिशील हैं, यहाँ तक कि 'सुप्त समीरण भी 'हुआ अधीर। यही नहीं अचल पर्वत भी पावस ऋतु में उड़ने लगता है-

''उड़ गया अचालक लो भूघर

फड़का अपार वारिद के पर।

प्रÑति में गति का यह चैतन्य वर्णन पूरी तरह से आधुनिकता का प्रतीक है; मानो यह सुन्दर, भव्य, अलौकिक प्रÑति आज ही ऐसा क्रियाकलाप कर रही हो, इससे पहले ऐसा शायद कभी हुआ ही नहीं था। निराला के 'बादलराग, पंत के परिवर्तन, प्रसाद की 'कामायनी में चित्रित प्राÑतिक दृश्यों की मनोरमा निराली है। प्रÑति के मधुर रूपों के प्रति कवि-âदय में प्रबल आकर्षण है क्योंकि प्रÑति में अक्षत सौन्दर्य है, यौवन की मुग्धावस्था है। सूर्य की प्रथम रशिम नवविकसित कलियों का मुख चूमकर, उनके अंग-अंग में मुस्कान का पराग बिखेर देती है। पल-पल परिवर्तित प्रÑति के परिवेश में आनन्द, और ज्ञान, सौन्दर्य-पिपासा की वृत्ति और आत्मबोध का स्फुरण इस युग के प्रÑति-चित्राण के अंग-अंग में बसा है। प्रसाद ने रात्रि को संबोधित करते हुए कहा है-

''पगली ! हाँ संभाल ले कैसे छूट पड़ा तेरा अंचल।

देख बिखरती है मणिरानी, अरी उठा बेसुध चंचल।

उन्होंने कभी प्रÑति को तारों से अलकों को गूँथकर वत्कल वस्त्रा पहने संèया रूपी नारी को सरोवर के समीप जाते हुए देखा है, तो कभी वह सिंधु-शय्या पर धरा-वधू के रूप में मान प्रदर्शित करते हुए बैठी है।

प्रÑति की रमणीयता को स्वतन्त्रा रूप से चित्रित करने और प्रÑति के जिन उपादानों से हमारा दीर्घकालीन साहचर्य है उन्हें प्रत्यक्ष रूप में लाने से हमारे मन में दबे ढके स्थायी भाव अनायास ही जागृत हो जाते हैं। देश के पर्वत, वन, नदी, खेत खलिहान - सभी से हमारे भावों का सीधा लगाव है। इन पर प्रेमभरी दृषिट डालकर इनका चित्राण करने से 'साहचर्यजनित रतिभाव का उद्रेक होता है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में- ''देशप्रेम है क्या? प्रेम ही तो है। इस प्रेम का आलंबन क्या है? सारा देश अर्थात मनुष्य, पशु, पक्षी, नदी, नाले, वन, पर्वत सहित सारी भूमि। प्रेम किस प्रकार है? यह साहचर्यगत प्रेम है। निराला 'संèया का चित्राण करते हुए इसी प्रेम को तो अभिव्यä कर रहे हैं-

''दिवसावसान का समय

मेघमय आसमान से उतर रही है

वह संèया सुंदरी परी सी

धीरे धीरे धीरे ।।

डा0 नगेन्æ ने छायावादी काव्य में प्रÑति का उपयोग दो रूपों में माना है- ''एक कोलाहलमय जीवन से दूर शांत-

सिनग्ध-विश्राम-भूमि के रूप में और दूसरे प्रतीक रूप में। रूप, ऐश्वर्य और स्वच्छंदता जो जीवन में नहीं मिल सके, वे प्रÑति में प्रचुर मात्राा में मिले। अतएव कवि की मनोकामनाएँ बार-बार उसी के मधुर अँचल में खेलने लगीं और प्रÑति के प्रति आकर्षण बढ़ जाने से स्वभावत: उसी के प्रतीक से अधिक रुचिकर और प्रेय हुए।

(3) रहस्यभावना - छायावाद में बाá प्रÑति की अपेक्षा आंतरिक अथवा अंतमर्ुखी प्रÑति की अपेक्षा आंतरिक अथवा अंतमर्ुखी प्रÑति का चित्राण हुआ है, जो कवि की आèयातिमक भावना का प्रतीक है। इसे ही कवि की रहस्यवादी भावना भी कहा गया। इतना अवश्य है कि इस दृषिट से हर कवि का दृषिटकोण एक दूसरे से भिन्न था। निराला तत्त्व ज्ञान को प्रमुखता देते हैं तो पंत प्रÑति के अप्रतिक सौन्दर्य से अभिभूत होकर इस ओर उन्मुख हुए।

''विश्व के पलकों पर सुकुमार, विचरते हैं जब स्वप्न अजान।

न जाने नक्षत्राों से कौन, निमंत्राण देता मुझको मौन।।

जयशंकर प्रसाद ने प्रÑति में परम सत्ता को खोजने का प्रयत्न किया-

''हे विराट! ये विश्वदेव! तुम कौन हो ऐसा होता भान।

मंद गंभीर घीर स्वर संयुत यही कर रहा सागर गान।।

महादेवी वर्मा प्रेम और वेदना के कारण इस सृषिट के सूत्रााधार के प्रति अपनी जिज्ञासा व्यä करती हैं-

''कनक से दिन मोती सी रात, सुनहली सांझ गुलाबी प्रात।

मिटाता रंगता बार-बार, कौन जगा का वह चित्रााघार।।

(4) नारी सौन्दर्य का चित्राण -

रीतिकाल में प्राय: घोर Üाृंगारिकता के कारण नायिकाओं का उधाम चित्राण मिलता है तो द्विवेदीकाल में नैतिकता के आग्रह के कारण Üाृंगार रस का अत्यंत संयत भाव देखने को मिलता है। छायावादी कवि प्रेम और सौन्दर्य का पुजारी है अत: नारी सौन्दर्य के चित्राण में सूक्ष्मता और शीलता का भाव देखने को मिलता है। यदि सौन्दर्य में कहीं मांसलता की गंघ आ भी जाती है तो कवि उसे अलौंकिक उपमानों द्वारा अस्पृथ्य बना देता है-

''नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल गुलाबी अंग।

खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ बन बीच गुलाबी रंग।

नारी सौन्दर्य और प्रेम का चित्राण करते हुए स्थूल क्रियाव्यापारों की प्राय: उपेक्षा की गर्इ है। इनकी प्रेमगाया का अंत निराशा या असफलता में हुआ है इसलिए इनके काव्य में मिलनपक्ष की सुखानुभूतियों की अपेक्षा विरहजन्य पीड़ा का अधिक चित्राण मिलता है। प्रसाद, महादेवी, पंत आदि के काव्य में Üाृंगार का मर्यादित वर्णन है परन्तु परवर्ती कवियों जैसे नरेन्æ, अंचल, बच्चन आदि के Üाृंगार-चित्राण में स्थूलता, मांसलता देखने को मिलती है।

(5) राष्ट्रीय सांस्Ñतिक कविता -

यह युग भारतीय जीवन के लिए विषय संघर्ष का काल था। साम्राज्यवादियों के चंगुल में फँसे देशवासियों को महात्मा गाँधी सत्य और अहिंसा पर आधारित असहयोग आंदोलन के पथ पर ले जा रहे थे। इस युग के कवियों ने एक ओर भारत की आंतरिक विसंगतियों और विषमताओं को दूर करने के लिए देशवासियों का आहवान किया और दूसरी ओर विदेशी शासन से मुä होने के लिए स्वतंत्राता संग्राम में कूद पड़ने की ललकार की। माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालÑष्ण शर्मा 'नवीन, सुभæाकुमारी चौहान ने लेखनी की शä किे ही नहीं आजमाया, बलिक देश के इस संघर्ष में सक्रिय भाग लेकर देशवासियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। माखनलाल चतुर्वेदी ने 'कैदी और कोकिला शीर्षक कविता में अपनी अनुभूति को इस रूप में व्यä किया-

''क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना।

हथकडि़याँ क्यों? यह बि्रटिश राज्य का गहना।।

कोल्हू का चर्रक चूँ? जीवन की तान।

मिêी पर लिखे अँगुलियों ने क्या गान?

हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जुआ।

खाली करता हूँ बि्रटिश अकड़ का कुआ।।

जनमानस में जागरण और संघर्ष के भावों को जगाने के लिए कवि ने जनता को यह अहसास कराया कि प्रत्येक व्यä प्रिÑति से ही असीम अक्षय शä कि स्रोत है। आवश्यकता इस बात की है कि वह इसे पहचाने और अपने सोए हुए आत्मविश्वास को जगाकर देश के शत्राु को समूल नष्ट करने के लिए, युद्ध.भूमि में कूद पड़े। 'नवीन पराजित और चिरदोहित होकर भिखमंगे की तरह जीवन की नियति को स्वीकार करने वाले दीन वर्ग को इन शब्दों में झकझोरते हैं-

''ओ भिखमंगे, अरे पराजित, ओ मजलूम, अरे चिरदोहित,

तू अखण्ड भण्डार शä कि, जाग अरे निæा सम्मोहित।  

      प्राणों को तड़पाने वाली हुंकारों से जल-थल भर दे।

अंगारों के अंबारों में अपना जवालित पलीता भर दे।

जनता का आत्मविश्वास जगाने का एक अन्य उपाय था- अतीत का गौरवगान। कभी जगदगुरू कहलाने वाला यह देश भले ही आज दुर्दशा को झेल रहा हो, पर आज भी वह अपनी प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़ा हुआ है। अनेक सांस्Ñतिक संस्थाओं और महान ऋषि-मुनियों, समाज सुधारकों और सांस्Ñतिक नेताओं ने देश के अतीत की गरिमा को जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए, उन्हें अपने खोए नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक किया। इन सबसे प्रभावित कवि भी राम, Ñष्ण, भीम, अर्जुन, हरिश्चन्æ आदि प्राचीन युग पुरूषों के चरित्राों के उदाहरण देकर जनता को विश्वास और आस्था से भरने का प्रयत्न करते हैं। सियारामशरण गुप्त 'बापू कविता में गाँधी को हरिश्चंæ की अटलता, प्रहलाद की अनन्त भä,ि Ñष्ण के ज्ञान-कर्मयोग से युä मानते हैं, तो दूसरी ओर निराला 'दिल्ली कविता में अतीत के गौरव की तुलना देश की वर्तमान दुर्दशा से करते हैं- ''क्या यही वही देश है? माखनलाल चतुर्वेदी के पुष्प की तो यही अभिलाषा है-

''मुझे तोड़ लेना वननाली, उस पथ पर देना तुम फेेंक।

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाते वीर अनेक।।

(6) मानवतावादी दृषिटकोण - छायावादी कवियों ने 'वसुघैव कुदुम्बकम मानकर समूची मानव जाति के प्रति सहानुभूति और प्रेम व्यä किया। इन कवियों पर भारतीय सर्वात्मवाद और अद्वैतवाद का गहरा प्रभाव था। साथ ही रामÑष्ण परमहंस, विवेकानंद, गांधी, टैगौर और अरविन्द दर्शन से भी ये कविगण प्रभावित थे। प्रसाद जी ने 'कामायनी में मानवता के उत्थान का संकेत दिया है। मनु श्रद्धा से कर्मण्यता के द्वारा सतत उन्नति की प्रेरणा मिलती है। श्रद्धा मनु को निराशात्मक भावना को समाप्त करके निर्माण की दिशा में प्रेरित करते हुए कहती है-

''बनो संसृति के मूल रहस्य,

तुम्हीं से फैलेगी वह बेल।

विश्वभर सौरभ से भर जाए,

सुमन के खेलो सुंदर खेल।

पंत ने 'सुंदर है विहग सुमन सुन्दर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम कहकर मानव के महत्त्व को प्रस्तुत किया। यही दृषिट नारी के प्रति पूज्य भाव में भी प्रकट होती है।

''नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।

मानवतावादी दृषिटकोण को ही प्रचार और प्रसार देते हुए 'निराला में शोषित वर्ग के प्रति गहरी संवेदना 'भिक्षुक 'विधवा, 'इलाहाबाद के पथ पर, 'बादल राग आदि कविताओं में दिखार्इ देती है।

(7) वेदना और करुणा - छायावादी काव्य में वेदना, करुणा, पीड़ा, निराशा की भी अभिव्यä बिहुत हुर्इ है। इसका एक कारण राष्ट्रीय आंदोलनों की असफलता को भी माना जा सकता है। पंत के वेदना और करुणा को कविता का मूल माना है-

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान,

उमड़ कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।

महादेवी वर्मा का तो समस्त काव्य वेदना और पीड़ा से ओत प्रोत हे-

''सजनी मैं उतनी करूण हूँ, करूण है जिनकी रात।

पंत को सुख सरसों के समान तथा शोक सुमेरू के समान दिखार्इ देता है और इसी कारण उन्होंने सुख की आशा को दुराशा मात्रा माना। महादेवी वर्मा ने 'यामा की भूमिका में दुख को सुख से अधिक महत्त्वपूर्ण माना है-

''दुख मेरे निकट जीवन का एक ऐसा काव्य है जो सारे संसार को एक सूत्रा में बाँधे रखने की क्षमता रखता है। हमारे असंख्य सुख चाहे हमें मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सके, किंतु हमारा एक आँसू भी जीवन को अधिक मधुर, अधिक उर्वर बनाए बिना नहीं गिर सकता। मनुष्य सुख को अकेला भोगना चाहता है परन्तु दु:ख सबको बाँटकर।

पीड़ा और वेदना की तीव्र अभिव्यä हिेने से उन्हें पीड़ा की कवयित्राी भी कहा गया।      

(8) स्वच्छंदतावाद - विषय, भाव, कला, धर्म, दर्शन आदि क्षेत्राों में छायावादी कवि ने नवीन चिंतन पद्धति को उदघाटित करते हुए, आधुनिक जीवन से संबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कीं। धीरे-धीरे कवि पुरानी परिपाटी को छोड़कर स्वच्छंद होता गया। उसे अपनी भावनाओं को व्यä करने के लिए अब किसी भी शास्त्राीय बंधन या रूढि़ग्रस्त विचारधारा मान्य नहीं रही। विषय की दृषिट से सौन्दर्य, प्रेम, करुणा, मानवता, जन-स्वातन्त्रय आदि सभी को अपनी कविता का विषय बनाया। स्थूल के स्थान पर सूक्ष्मता, बुद्धि के स्थान पर âदय उसे अधिक ग्रहणीय लगा। उसका भावलोक यथार्थ पर न रहकर प्रÑति, रहस्य, कल्पना के स्वप्नलोक को अपनाने लगा, इसी कारण छायावादी कवि पर पलायनवादी होने का आरोप भी लगाया गया। 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नविक धीरे-धीरे- जैसी पंäयिँ इसी भाव का प्रमाण हैं।

(9) हास्य व्यंग्यात्मक काव्य - र्इश्वरीप्रसाद शर्मा, हरिशंकर शर्मा, उग्र व बेढव बनारसी प्रभृत्ति कवियों ने इस विषय पर प्रमुख रूप से रचनाएँ लिखीं। 'मतवाला, 'गोलमाल, 'भूत, 'मौजी आदि पत्रिकाओं में इनकी अनेक हास्यरसात्मक कविताओं का प्रकाशन हुआ। बेढव बनारसी ने हास्य की छटा बिखेरने के लिए अंग्रेजी और उदर्ू की शब्दावली का भी खुलकर प्रयोग किया। उपमा और वक्रोä किे द्वारा व्यंग्य के तीखा बनाने में ये सिद्धहस्त थे-

''बाद मरने के मेरे कब्र पर आलू बोना

हश्र तक यह मेरे ब्रेकफास्ट के सामाँ होंगे,

उम्र सारी तो कटी घिसते कलम ए बेढ़ब

आखिरी वक्त में क्या खाक पहलवाँ होंगें।

इस युग की हास्य व्यंग्यात्मक रचनाओं में हरिऔध के 'चोखे चौपदे और 'चुभते चौपदे, 'चतुर्भज चतुरेश Ñत 'हँसी का फव्वारा, ज्वालाराम नागर विलक्षण द्वारा 'छायापथ उल्लेखनीय हैं।

कलापक्ष :

(1) प्रतीकात्मकता : छायावादी कवि ने जीवन के प्रतीक रूप में प्रÑति को ग्रहण किया है। उन्होंने सर्वत्रा ही प्रÑति पर मानवीय भावनाओं का आरोपण किया है और उसके संवेदनात्मक रूप को प्रस्तुत किया है। फूल सुख के अर्थ में, शूल दुख के अर्थ में, उषा प्रफुल्लता के लिए, संèया निराशा और उदासी के लिए प्रयुä हुर्इ हैं। प्रसाद ने 'कामायनी में अनेक नवीन प्रतीकों को निर्माण किया, जो मनोभावों, चेष्टाओं तथा पदाथो± के बिंबों को प्रस्तुत करने में समर्थ हैं। बसंत के प्रतीक द्वारा यौवन का आगमन कुछ इस तरह वर्णित हुआ है-

मधुमय बसंत जीवन वन के

वह अंतरिक्ष की लहरों में,

कब आए थे तुम चुपके से

रजनी के पिछले पहरों में,

महादेवी वर्मा ने आèयातिमक जीवन की अनेक अनुभूतियों को प्रतीकों के ही माèयम से व्यä किया है।

(2) चित्राात्मकता : छायावादी कवियों ने भाषा सौन्दर्य और लालित्य की दृषिट से उसे बिंबग्राहिणी भाषा बनाया। अमूर्त विषयों को भी चित्राात्मक शैली में प्रस्तुत करना इस युग की कविता की विशिष्टता है-

''धीरे-धीरे उतर क्षितिज से आ बसन्त रजनी।

शशि मुख पर घूँघट डाले, आँचल में दीप छिपाए।

जीवन की गोघूलि में, कौतूहल से तुम आए।

(3) लाक्षणिकता : सहज भाषा में लाक्षणिक और अप्रस्तुत विधान में योग से कवियों ने उसके सौन्दर्य की वृद्धि की है। नवीन उपमानों के प्रयोग से भाषा की प्रेषणीयता और अर्थ-गांभीर्य और भी बढ़ जाता है-

''वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी

''घूल की ढेरी में अनजान, छिदे हैं मेरे मधुमय गान।

''इस करूण कलित âदय में, अब विकल रागिनी बजती।       

 (4) गेयता : छंद और संगीत की दृषिट से इस युग का काव्य उच्चकोटि का है। इसमें प्राचीन और नवीन दोनों प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया। काव्य-विषय के अनुरूप ही इन्होंने गीति-शैली को प्रधानता दी। आत्माभिव्यंजक काव्य के लिए गीति-शैली ही उपयुä हो सकती है। गीतिकाव्य की विशेषताएँ संगीतात्मकता, संक्षिप्तता, कोमल-कांत पदावली आदि छायावादी काव्य में देखने को मिलती हैं। द्विवेदी युग में भाषा परिष्Ñत तो अवश्य हुर्इ, पर उसमें एक प्रकार की नीरसता बनी रही, जबकि छायावादी कविता में भाषा ने लालित्य सरसता के ऊँचे स्तरों को हुआ।

(5) अलंकारों का प्रयोग : इस युग तक भारतीय साहित्य परंपरा में चले आ रहे उपमा, रूपक, उल्लेख, संदेह, विरोधाभास, व्यतिरेक जैसे अलंकारों का बहुत ही सुंदर प्रयोग मिलता है। इसके साथ ही अंग्रेजी साहित्य के दो अलंकारों-विशेषय विपर्यय और मानवीकरण अलंकारों का भी प्रयोग हुआ, जिसने भाव गांभीर्य को और भी बड़ा दिया। विशेषण-विपर्यय में अभिधावृत्ति के द्वारा निशिचत स्थान से विशेषण को लक्षण द्वारा हटा कर दूसरी जगह आरोपित कर देने पर होता है। प्राÑतिक उपादानों - प्रात:, संèया, बादल, सूर्य, तरंग आदि मानवीय भावनाओं का आरोपण करने से मानवीकरण अलंकार होता है। इन अलंकारों के द्वारा भाषा और भी सरस, सुकुमार और सौष्ठव सम्पन्न हुर्इ।

छायावादयुगीन काव्य का यह समनिवत अèययन स्पष्ट कर देता है कि इस युग की कवि-प्रतिभा सर्जना के विभिन्न क्षेत्राों में गतिशील होने के साथ-साथ नर्इ संभावनाओं की ओर भी संकेत करती है। राष्ट्रीय-सांस्Ñतिक कविता और प्रेमप्रधान स्वच्छंद वैयäकि काव्यधारा में शैली सरलता और आवेग से युä दिखार्इ देती हे। अभिव्यंजना की दृषिट से इस काल के काव्य में सूक्ष्मवक्रता और गंभीर संरचना दिखार्इ देती है।


5 प्रगतिवाद

प्रगतिवाद

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'प्रगति शब्द का अर्थ है 'आगे बढ़ना, 'उन्नति। 'प्रगतिवाद है ''समाज, साहित्य आदि की निरन्तर उन्नति पर जोर देने का सिद्धांत। साहित्य के संदर्भ में यह ''साहित्य का एक आधुनिक सिद्धांत जिसका लक्ष्य जनवादी शäयिें को संपादित कर माकर््सवाद तथा भौतिक यथार्थवादी èयेय की संपूर्ति करना है। 'हिन्दी सहित्य कोश, भाग 1 में प्रगतिवाद के संबंध में लिखा गया है- ''प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाया गया वह साहितियक आंदोलन है, जिसमें जीवन और यथार्थ के वस्तु सत्य को उत्तर छायावाद काल में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहितियक चेतना को अग्रसर होने की पे्ररणा दी। प्रगतिवाद का उíेश्य था साहित्य में उस सामाजिक यथार्थवाद को प्रतिषिठत करना, जो छायावाद के पतनोन्मुख काल की विÑतियों को नष्ट करके एक नये साहित्य और नये मानव की स्थापना करे और उस सामाजिक सत्य को, उसके विभिन्न स्तरों को साहित्य में प्रतिपादित होने का अवसर प्रदान करे। वर्ग-संघर्ष की साम्यवादी विचार धारा और उस संदर्भ में नये मानव, 'नये हीरो की कल्पना इस साहित्य का उíेश्य था। इसकी मूल प्रेरणा माक्र्सवाद से विकसित हुर्इ थी। (पृ. 511) 

इस उद्धरण के रेखांकित वाक्यांशों को èयान से पढ़ने पर प्रगतिवाद का अर्थ और उसकी मुख्य विशेषताओं को समझा जा सकता है। इस संदर्भ में पहली बात तो यह कि प्रगतिवाद में व्यä अिैर समाज के आगे बढ़ने, उसकी उन्नति पर बल है। जैसे ठहरा हुआ पानी कुछ समय बाद दुर्गंधयुक्त हो जाता है और प्रयोग करने योग्य नहीं रहता, किन्तु नदी का बहता पानी जहाँ-जहाँ से बहता है वहाँ की भौगोलिक सिथति के अनुसार अपनी जगह बनाता हुआ, आस-पास के लोगों को आनंद देता हुआ आगे बढ़ता जाता है। बहते पानी में गंदगी रुकती नहीं अत: उसका पानी प्रयोग में आने योग्य रहता है। ठीक वैसे ही, जो समाज अपने समय की आवश्यकताओं को नहीं समझता और वषो± पूर्व बनाये गये सिद्धांतों, नियमों, मान्यताओं और विश्वासों में जकड़ा रहता है वह भी कभी आगे नहीं बढ़ता और रुके हुए पानी की भाँति बदबूदार हो जाता है। प्रगतिवाद उन रूढि़यों, नियमों, मान्यताओं, पद्धतियों का विरोध करता है जो समाज की प्रगति में बाधक हैं, और उन नियमों-मान्यताओं को अपनाने पर बल देता है जो वर्तमान के अनुकूल हैं। दूसरी बात है सामाजिक यथार्थ और जीवन और यथार्थ के वस्तु सत्य की अभिव्यä किी। हम जिस समाज में रहते हैं, उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से प्रभावित होते हैं। गुणदोषोें से भरपूर इस समाज में ही हमारे व्यäतिव का निर्माण होता है और अपने व्यäतिव, इच्छाओं, आकांक्षाओं के सहारे इस समाज को भी हम बनाते-बिगाड़ते हैं। फिर सामाजिक यथार्थ क्या है? क्या समाज में व्याप्त अच्छाइयाँ, या बुराइयाँ? सामाजिक यथार्थ की बात जब हम करते हैं तो उसके अंतर्गत अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों ही आते हैं। साहित्य में यदि केवल अच्छाइयों का ही चित्राण हो तो वह आदर्शवादी साहित्य कहलाता है ओर यदि केवल बुराइयों का ही चित्राण हो, तो नग्न यथार्थवादी या प्राÑतवादी। प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचंद ने कहा था कि यथार्थ केवल प्रकाश या केवल अंधकार नहीं है, बलिक अंधकार के पीछे छिपा प्रकाश और प्रकाश के पीछे छिपा अंधकार है। प्रगतिवाद उन शäयिें को पहचानने पर बल देता है जिनके कारण हमारा समाज अंधकार.ग्रस्त है और उन शäयिें को पहचानने पर भी बल देता है जिनके बलबूते इस अंधकार को हराया जा सकता है। तीसरी बात प्रगतिवाद का प्रेरक कारण माकर््सवाद का सिद्धांत हैं। यह सिद्धांत शोषक शäयिें का विरोध करता है और शोषित समाज में चेतना जगाने, उन्हें अपने अधिकारों और समवेत शä किे प्रति भरोसा करने पर बल देता है। यह उस सामंतवादी और पूंजीवादी मानसिकता और संस्Ñति का विरोध करता है जो शä अिैर धन को कुछ मुट्टीभर लोगों के हाथों में केंæति कर देती है, जिससे वे स्वार्थी और दंभी हो जाते हैं और अपनी शä अिैर धन का दुरुपयोग कर उन लोगों का शोषण करते हैं जिनके परिश्रम के बल पर वे सुख भोगते हैं। प्रगतिवाद भी सामंतवाद और पूँजीवाद का विरोध करता है जो समाज में व्याप्त अंधकार का कारण है और उन गरीबों मजदूरों-किसानों को प्रकाश-पुंज मानता है जिनके बल पर यह अंधकार नष्ट हो सकेगा। प्रगतिवाद की दृषिट में यही श्रमशील मानव 'नयामानव और 'नया हीरो है। चौथी बात, इस उíेश्य में छायावाद के पतनोन्मुख काल की विÑत्तियों को नष्ट कर नये समाज के निर्माण की बात कही है। आप पढ़ चुके हैं कि छायावादी कविता में इतिहास, कल्पना, आदर्श, प्रेम, विरह, प्रÑति की सुंदरता और सुकुमारता पर विशेष बल था। प्रगतिवाद में इतिहास को नकारा नहीं गया, इतिहासअतीत के मोह से मुä किी बात की गयी है। इसके लिए व्यä कि उन्नयन समाज के सभी वगो± की समान रूप से उन्नति, रूढि़यों, अंधविश्वासों से मुä अिदि वस्तु सत्य प्रधान हैं इसलिए र्इश्वर, रहस्य, प्रÑति की सुंदरता, वैयकितक प्रेम, विरह के लिए वहाँ कोर्इ स्थान नहीं।

हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का उदय

हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का आरंभ 1936 के आसपास माना जाता है। परंतु कविता के प्रगतिवादी तत्त्वों का समावेश कोर्इ आकसिमक घटना नहीं थी। इसके अंकुर आधुनिक काल के आरंभ में ही भारतेंदु युग से फूटने लगे थे। बि्रटिश राज्य की जनविरोधी नीतियों, उनके अत्याचारों के परिणामस्वरूप लोगों का èयान देश की दुर्दशा, और उसके मूल कारणों की ओर आÑष्ट हुआ। नवजागरण के प्रभाव से भी इस दुर्दशा के मूल कारणों की पड़ताल की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। अशिक्षा, अंधविश्वासों, रूढि़यों, संप्रदायवाद को प्रगति विरोधी माना जाने लगा। विदेशी दासता से मुä पिने की छटपटाहट जोर पकड़ने लगी। अनेक राजनैतिक-सामजिक संस्थाओं का जन्म हुआ जिन्होंने देश की दशा सुधारने और उसे अंगे्रजी साम्राज्यवाद के चंगुल से निकलने के प्रयास किये। महात्मा गाँधी के प्रभाव से दबे-कुचले हरिजनों के प्रति भी सहानुभूति का भाव उदय हुआ। इन सभी सिथतियों का प्रभाव तत्कालीन साहित्य में किसी न किसी रूप में देखा जा सकता है। भारतेंदु और द्विवेदी युग की रचनाओं में जाति और धर्म के बंधनों के प्रति प्रश्नचिहन लगने लगे थे क्योंकि इन्हीं के कारण देश अनेक वगो± में बँट गया था, कमजोर हो गया था, और समाज का एक बड़ा वर्ग उपेक्षा और अत्याचार सहने को विवश था। हिन्दी में छायावाद युग में साहित्य में प्रेम-विरह की निजी अनुभूतियों, स्वप्नों, रहस्यों को प्रधानता दी गयी। लगभग इसी समय में यूरोप में रह रहे भारतीय साहित्यकारों ने लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की। उन्होंने अपने परिपत्रा में रुढि़वादी, जड़तावादी, परंपरावादी विचारों से समाज को मुक्त कराने पर बल दिया। उन्होंने देश की सामाजिक-आर्थिक अवनति के मूल कारणों को पहचानने पर बल दिया और कहा कि साहित्यकारों को कल्पना-लोक से बाहर निकल कर यथार्थ की भूमि पर खड़े होना होगा। इस संघ पर माकर््सवाद का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है, जो वंचितों शेषितों और किसान-मजदूरों का पक्षधर था। सन 1936 में लखनऊ में इस संघ की बैठक हुर्इ जिसकी अèयक्षता प्रेमचंद ने की थी। इस नवीन चेतना और प्रगतिशील लेखक-संघ की इस बैठक का प्रभाव हिंदी लेखकों-कवियों पर व्यापक रूप से हुआ। छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाने वाले सुमित्राानंद पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला की रचनाओं में यह परिवर्तन स्पष्ट देखा जा सकता हैं। प्रÑति के सुकुमार कवि पंत 'रूपाम के संपादकीय में लिखते हैं- ''इस युग में जीवन की वास्तविकता ने जैसा उग्र आकार धारण कर लिया है उससे प्राचीन विश्वासों में प्रतिषिठत हमारे भाव और कल्पना के मूल हिल गये हैं। अतएवं इस युग की कविता स्वप्नों में नहीं पल सकती, उसकी जड़ों को पोषण सामग्री ग्रहण करने के लिए कठोर आश्रय लेना पड़ रहा है। 'जुही की कली और संèया सुंदरी के रचयिता निराला जी 'विधवा, 'वह तोड़ती पत्थर, 'कुकुरमुत्ता और 'गुलाब जैसी कविताएँ लिखने लगते हैं। सन 1936 से आंरभ हुआ प्रगतिवाद का यह दौर सन 1950 के लगभग तक माना जाता है। उसके बाद प्रगतिवाद आंदोलन के रूप में भले ही न रहा हो, किंतु उसके द्वारा स्थापित मूल्य परवर्ती कविता में भी किसी न किसी रूप में विधमान हैं। मुäबिेध, नागाजर्ुन, धूमिल, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल आदि अनेक कवियों की रचनाओं में यह प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

प्रगतिवादी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ-

1. शोषक शäयिें की पहचान और उनका विरोध - प्रगतिवाद में देश और समाज की आर्थिक-सामाजिक अवनति के मूल कारणों की पड़ताल पर जोर दिया गया। भारतीय संदभो± में सामंतवाद, पूँजीवाद, सेठ, साहूकार, जमींदार, शासन तंत्रा को शोषक तंत्रा के रूप में प्रस्तुत करने वाले अधिकारी, पटवारी, पुलिस, पंडे-पुजारी आदि उन सभी वगो± के प्रति आक्रोश का भाव मिलता है जो निजी स्वाथो± की पूर्ति के लिए कभी परंपरा के नाम पर और कभी शासन के नाम पर निरीह जनता को अपने अत्याचारों का शिकार बनाते हैं। प्रगतिवादी कविता ने स्वर्ग और र्इश्वर की कल्पना से दूर हट कर ठोस यथार्थ पर पांव रखने और मानवता के वास्तविक शत्राुओं के विरोध का स्वर बुलंद किया-

ताक रहे हो गगन - मृत्यु नीलिमा गहन गगन,

देखों भू को - जीव प्रसू को। -पंत

बालÑष्ण शर्मा 'नवीन कवियों से ऐसी कविता सुनाने का आग्रह करते हैं जो इस गली.सड़ी व्यवस्था को बदलने के प्रति जागृति उत्पन्न कर सके- कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए।

2. मानववाद के प्रति आस्था - प्रगतिवादी विचारधारा में ऐसे समाज की स्थापना पर बल दिया गया है जिसमें मनुष्य को विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हो सकें। वह अपनी शä अिैर सामथ्र्य का सही उपयोग कर समाज के निर्माण और विकास में सहयोग कर सके। इसीलिए प्रगतिवाद में मानव का महत्त्व सर्वोपरि है-

सुंदर है विहग, सुमन सुंदर

मानव तुम सबसे सुंदरतम।

साम्राज्यवाद और पूँजीवाद - दोनों ही मनुष्य के सवा±गीण विकास में बाधक हैं अतएव मानव-विरोधी हैं। जो व्यवस्था धन और शä किे मुट्टी भर लोगों के हाथों को मजबूत करने में विश्वास रखती हो और साधारण जन को उनकी प्राथमिक आवश्यकताओं से भी वंचित कर देती हो, उनके व्यäतिव के विकास को रोकती हो, उन्हें पशुओं से भी बदतर जीवन जीने पर विवश करती हो, प्रगतिवाद उस मानव-विरोधी व्यवस्था का विरोध करता है।

3. शोषण का विरोध और समानता पर बल - जैसाकि अभी कहा प्रगतिवाद मानववाद का समर्थन करता है और धन तथा सत्ता के केन्æीकरण का विरोध करता है। इसी क्रम में यह बात भी समझनी आवश्यक है कि प्रगतिवादी विचारधारा शोषण का विरोध करती है और शोषण के शिकार गरीब-असहाय वंचित जनों के प्रति सहानुभूति रखती है। प्रगतिवाद में उस मानसिकता और व्यवस्था का विरोध है जो स्वयं परिश्रम नहीं करते किंतु गरीब मजदूरों के परिश्रम के बल पर अपनी तिजोरियाँ भर लेना चाहते हैं, जो आम जनता को पद-दलित कर अपना वर्चस्व और राजसिंहासन बनाये रखना चाहते हैं, और जो लोग अपने श्रम से इस समाज को सुखी-समृद्ध बनाने में सर्वाधिक योग देते हें वे अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते। निराला जी ऊँची-ऊँची अêालिकाओं और विशाल प्रासादों में रहने वाले धनिकों को अपने काव्य का विषय नहीं बनाते, बलिक इलाहाबाद के राजमार्ग पर पत्थर तोड़ती गरीब मजदूर स्त्राी को काव्य का विषय बनाते हैं-

श्याम तन, भर बँधा यौवन

नत नयन प्रिय कर्म-रत-तन

गुरू हथौड़ा हाथ

करती बार-बार प्रहार

सामने तरु मालिका, अêालिका, प्रकार

4. धर्म और इश्वर के प्रति अनास्था - विश्व के प्रत्येक देश, प्रत्येक समाज में धर्म और इश्वर की उपसिथति किसी न किसी रूप में अवश्य रही है। किंतु प्रगतिवाद में इनके प्रति कोइ आस्था नहीं। इसका कारण यही है कि धर्म और इश्वर के नाम पर लोगों ने अपना स्वार्थ सिद्ध करना आरंभ कर दिया, स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन समझने लगे, धर्म के नाम पर अनेक युद्ध हुए। जिस धर्म की स्थापना समाज को सँभालने के उíेश्य से हुइ थी, उसी धर्म के नाम पर लोगों को बाँटा जाने लगा। धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और अंधविश्वासों को बढ़ावा मिलने लगा। धर्म व्यवसाय बन गया। प्रगतिवाद में इसीलिए धर्म और इश्वर के प्रति अनास्था का भाव दिखाइ देता है। नवीन जी लिखते हैं-

है कितनी-कितनी विडंबना इनमें, हाय यहाँ कितनी अक्षमता,

इन पर छाये पीर, कब्र, सब भूत.प्रेत.पीतल और पत्थर,

एक छींक से ही होते हैं ये मानव सभीत अति सत्वर।

ऐसा ही एक और उदाहरण प्रस्तुत है-

हर पत्थर भगवान यहाँ का हर पंडा पैगंबर है,

गाय यहाँ माता बन पुजती, अब बकरी का नंबर है,    

यह ऋषियों का देश घुली है भंग यहाँ के पानी में,

नरकों का मनहूस बुढ़ापा मिलता भरी जवानी में।

(5) प्रगतिवादी कविता में गाँवों, नगरों, महानगरों का चित्राण - प्रगतिवादी कविता में गाँवों के जीवन, रहन-सहन, वहाँ के प्राÑतिक वातावरण, ग्रामीण संस्Ñति को आधार बनाया गया है। परंतु इन कवियों के लिए ग्रामीण जीवन अहा ! ग्राम्य जीवन भी क्या है! क्यों न इसे सबका मन चाहे! वाला भाव ही महत्त्वपूर्ण नहीं। नगरों, महानगरों की भागमभाग वाली जीवन-चार्ये और यांत्रिकता की बजाय उन्हें ग्राम्य जीवन अपनी सरलता के कारण तो आÑष्ट करता है, किंतु वहाँ की गरीबी, अज्ञानता, अशिक्षा, रूढि़याँ, अंधविश्वास आदि इस आकर्षण को èवस्त कर देते हैं। किसानों की दयनीय सिथति उन्हें विहवल कर देती है। पंत, निराला, दिनकर, नवीन, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह आदि कवियों की कविताओं में भारतीय ग्राम्य जीवन के यथार्थ चित्रा देखे जा सकते हैं। इस संदर्भ में एक उíरण द्रष्टव्य है-

मिêी से मैले तन अघफटे कुचैले जीर्ण वसन,

ज्यों मिêी के बने हुए ये गँवर्इ लड़के भू के धन,

कोइ खंडित, कुंठित, Ñशबाहु पसलियाँ रेखांकित,

टहनी सी टाँगे, बड़ा पेट, टेढ़े-मेढ़े, विकलांग, घृणित।

गा्रम्य जीवन के साथ-साथ नागरिक जीवन के यथार्थ चित्रा भी इस दौर की कविताओं में मिलते हैं। औधोगिक सभ्यता के प्रसार के साथ-साथ ग्रामीण-Ñषि-व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने लगी और नगरों.महानगरों का विस्तार होने लगा। संयुक्त परिवार टूटने लगे। बढ़ती महँगार्इ, विश्वयुद्धों, विदेशी सरकार की नीतियों के कारण किसान मजदूर बनने को विवश हो गये। इन नये बनते नगरों.महानगरों की चकाचौंध में भारत की पहचान माना जाने वाला सादा जीवन लुप्त लोने लगा और इस नयी महानगरीय यांत्रिक सभ्यता ने सारी भावनाओं को कुचल दिया, स्वार्थ और लोभ को बढ़ावा मिला और मनुष्य आत्म.केंæति होने लगा। संपन्नता के लालच से इस औधोगिक सभ्यता की शरण में आये मज़दूरों को भी निर्धनता और प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ा। प्रगतिवादी कवियों की पूरी सहानुभूति इन किसानों, मजदूरों के प्रति है। इसीलिए उनकी कविता में गाँवों की तरह नागरिक जीवन की विषमताएँ भी दिखार्इ देती हैं-

घाट, धर्मशालें, अदालतें,विधालय, वेश्यालय सारे,

होटल, दफ्तर, बूचड़खाने,मंदिर, मसिजद, हाट, सिनेमा

श्रमजीवी की उस हìी परटिके हुए हैं जिस हìी को

सभ्य आदमी के समाज नेटेढ़ी करके मोड़ दिया है।

(6) सौंदर्य के प्रति नवीन दृषिटकोण - प्रगतिवादी कविता में सौंदर्य के परंपरागत मापदंड टूट गये हैं। अभी तक की कविता में नायक और नायिका 'धीरोदात्त श्रेणी के, सुख-सुविधा संपन्न बड़े घरानों के, आदर्श हुआ करते थे। कभी वे राजा-रानी राजकुमार.राजकुमारी थे, तो कभी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी.देवता और अवतार पुरुष। प्रÑति का सौंदर्य कवियों को आÑष्ट करता था, कभी यमुना नदी, कभी कश्मीर सुषमा, कभी संèया सुंदरी और जुही की कली, कभी समुæ की लहरें और आकाश में चमकते चाँद-सितारे। किंतु प्रगतिवादी कवि की दृषिट जीवन के ठोस यथार्थ पर टिकी है, इसीलिए प्रÑति के उक्त उपकरण या नायक-नायिकाओं की परंपरागत अवधारणा उनकी कविताओं का विषय नहीं बनाते। उनकी कविता के विषय बनते हैं शासन और तंत्रा की मार झेलती साधारण जनता, किसान और मजदूर, गरीबी और शोषण के चक्र में पिसते लोग। मेघमय आसमान से उतरीसंèया सुंदरी परी सीधीरे-धीरे-धीरे! लिखने वाले निराला को अब गरीबी की मार झेलती पत्थर तोड़ती मजदूरनी और सामाजिक परंपराओं का अभिशाप झेलती 'विधवा सुंदर प्रतीत होती है। इन कवियों का विश्वास है कि श्रमिकों का श्रम ही दुनिया भर में फैली जड़ता को तोड़ सकेगा। भारत का भविष्य कहलाने वाले बच्चों के पास न तन ढँकने को पर्याप्त वस्त्रा हैं, न भरपेट रोटी और न शिक्षा प्राप्त करने के साधन। उन्हें पढ़ा-लिखा कर आदमी बनाने का संकल्प लिये शिक्षक भी साधनों के अभाव में अपने कर्तव्य की पूर्ति नहीं कर पाते। तोतारटन्त विधा को प्रश्रय देने वाली हमारी शिक्षा नीति भी इस जड़ता को बनाये रखने के लिए उत्तरदायी है-

घुन खाये शहतीरों पर की बारहखड़ी विधाता बाँचे,

फटी भीत है, छत है चूती, आले पर विसतुइया नाचे,

लगा-लगा बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पाँच तमाचे,

इसी तरह से दुखरन मास्टर गढ़ता है आदम के साँचे।   

 (7) प्रगतिवादी कविता की भाषा - जैसा कि बार-बार कहा गया है, प्रगतिवादी दृषिट का आग्रह जीवन के यथार्थ के प्रति है। इस दृषिट का प्रभाव इस दौर की कविता की भाषा पर भी दिखार्इ देता है। छायावादी कविता की भाषा में संस्Ñत के तत्सम शब्दों की बहुलता है जबकि प्रगतिवादी कविता में आम बोल-चाल के शब्दों का प्रयोग अधिक है। प्रगतिवाद की विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए अभी जो उदाहरण दिये गये हैं उनकी तुलना प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी की कविताओं की भाषा से करने पर यह अंतर स्वत: स्पष्ट हो जाएगा और यह अंतर केवल शब्द प्रयोग में ही नहीं, बिंबों और प्रतीकों में भी देखा जा सकता है। एक ओर वैयäकि प्रेम की अभिव्यä हिै, प्रÑति के सुंदर दृश्यों और उसकी गतियों के बिंब हैं, जीवन के रहस्यों को जानने की उत्कट उत्कंठा है, दूसरी ओर प्रगतिवाद में आम आदमी सुख-दुख हैं, भूख, गरीबी और शोषण के प्रति आक्रोश है, व्यवस्था को बदल डालने की चाह है और टूटे झोंपड़े, जीर्ण-शरीर भारतीय श्रम जीवियों के प्रति सहानुभूति है। प्रगतिवाद की कविता में व्यंग्यात्मकता का स्वर अत्यंत प्रबल है। सामाजिक विषमताओं की अभिव्यä कि इससे अच्छा और कोर्इ तरीका हो भी नहीं सकता-

धीरे बोलो शांत रहो जी, काम काज में खलल पड़ेगा,

व्यस्त देश के कर्णधार है।

तुम बेकार कि सच है भार्इ, पर अपनी सरकार व्यस्त है,

नेता की खातिरदारी में, लाला जी की कार व्यस्त है,

उदघाटन, भाषण, अभिभाषण, अधिवेशन, सेशन, देशाटन

डेपुटेशन, प्लान-कमीशन, उपचुनाव का हरदम सीजन

अमरीका से ट्रंककाल है, लंदन से आ रहा तार है

व्यस्त देश के कर्णधार हैं।

उपयर्ुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रगतिवादी दौर की कविता तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक परिसिथतियों की देन थी। छायावाद की व्यैकितकता की प्रतिक्रियास्वरूप इसका उदय हुआ था। पूँजीवादी सामंती व्यवस्था जो धन और शä किे केंद्रीकरण पर बल देती थी- उसके विरोध में श्रमजीवियों-किसानों-मजदूरी के प्रति सहानुभूति व्यä की गयी। अमानुषिक परिसिथतियों में जीने को विवश इन श्रमजीवियों के प्रति जनता का èयान आÑष्ट हुआ। राजनीति के घिनौनेपन को लोगों के सामने रखा और कल्पना की बजाय यथार्थ के अनुभवों को साहित्य में प्राथमिकता दी गयी। प्रगतिवादी कविता ने लोकचेतना को जागृत करने का काम किया। इस दौर की कविता पर सामयिक और सतही होने का आरोप भी लगाया गया किंतु आलोचकों के इस मत के समक्ष यह आरोप èवस्त हो गया कि कोर्इ भी साहित्य जीवन के यथार्थ से उदासीन होकर शाश्वत नहीं रह सकता। भविष्य में परिसिथतियाँ भले ही बदल जाएँ किंतु वंचितों के प्रति सहानुभूति और शोषण के प्रति आक्रोश सदा रहेगा। यही कारण है कि प्रगतिवादी कविता का दौर भले ही समाप्त हो गया हो, उसके बाद प्रयोगवाद, नयी कविता, अकविता आदि न जाने कितने आंदोलन आये और गये, किंतु आज भी कविता में प्रगतिवादी चेतना विधमान है।

नयी कविता


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प्रगतिवाद के बाद जो नया काव्यान्दोलन उभरा वह था 'प्रयोग-वाद। सन 1943 में 'तार सप्तक का प्रकाशन हुआ जिसके संपादक थे सचिचदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय। इस में सात कवियों की कविताएँ संगृहीत थीं। इस संग्रह को प्रयोगवाद का आरंभ माना जाता है। इन कवियों ने स्वयं को 'नर्इ राहों का अन्वेषी कहा। उनके अनुसार इस नर्इ राह की खोज भाव के स्तर पर भी थी और शिल्प के स्तर पर भी। यह आंदोलन छायावाद की वैयäकिता और प्रगतिवाद के माकर््सवाद के प्रति अतिशय आग्रह के विरोध में थी। जैसा कि पहले भी कहा गया है, छायावाद में वैयäकि अनुभूतियों संस्Ñतनिष्ठ भाषा, कल्पना, बिंब-योजना, छंद इत्यादि पर बहुत बल दिया गया था। प्रगतिवादी कवियों ने आम आदमी की समस्याओं को आम जन की भाषा में अभिव्यä करने पर बल दिया, शिल्प के प्रति उनमें कोर्इ मोह नहीं दिखार्इ देता। प्रयोगवाद में 'क्या कहना है के साथ-साथ कैसे कहना है भी महत्वपूर्ण था, अर्थात नये उपमान, नये प्रतीक, नये चित्रा, नये बिंब और नये छंद। प्रगतिवाद के बाद की इस कविता में रचनाकार की स्वतंत्राता और रचनाकार की वैयäकिता को भी महत्त्वपूर्ण माना गया। 'तार सप्तक के बाद 'दूसरा सप्तक ओर फिर 'तीसरा सप्तक प्रकाशित हुए। बाद के इन संकलनों में संगृहीत कविताएँ 'तार सप्तक की कविताओं से थोड़ी भिन्न थीं। 1953 में प्रयाग से नये पत्ते का प्रकाशन हुआ, और 1954 में डा. जगदीश गुप्त और डा. रामस्वरूप चतुर्वेदी के संपादकत्व में 'नयी कविता नामक पत्रिका प्रकाशित हुर्इ और इस नयी काव्यधारा के लिए 'नयी कविता नाम प्रचलित हो गया। हालाँकि यह नाम आलोचकों के मध्य चर्चा और विवाद का विषय रहा क्योंकि हर आने वाली कविता अपनी पूर्ववत्र्ती कविता से नयी होती है फिर इस नयी कविता में ऐसा क्या था जिसे 'नयी कविता का नाम ही दे दिया गया?। 'नयी कविता, 'नये पत्ते और 'आलोचना के कुछ अंकों में इसी नाम को अपनाया गया और बाद में इस विशिष्ट काव्यान्दोलन के लिए 'नयी कविता नाम ही रूढ़ हो गया। हिन्दी साहित्य.कोश में डा0 लक्ष्मीकांत वर्मा 'नयी कविता के विषय में लिखते हैं- ''..... इस नयी काव्यधारा को उस वैयäकि यथार्थ और सामाजिक यथार्थ के साथ उन प्रतिमानों को लेकर विकसित किया जाए, जो आज के भाव बोध को वहन करते हुए सर्वथा नयी दृषिट के साथ विकसित हो गयी है। नयी कविता का मूल स्रोत आज के युग सत्य और युग यथार्थ में निहित है। इसीलिए उसमें गध का यथार्थ और काव्य की संवेदनशील अभिरुचि, दोनों एक साथ सर्वथा नयी भावभूमि पर अनुभूति को प्रस्तुत करती है।......

''अस्तु, नयी कविता आज की मानव-विशिष्टता से उदभूत उस लघु मानव के लघु परिवेश की अभिव्यä हिै, जो एक ओर आज की समस्त तिक्तता और विषमता को तो भोग ही रहा है, साथ ही उन समस्त तिक्तताओं के बीच वह अपने व्यäतिव को भी सुरक्षित रखना चाहता है। वह विशाल मानव-प्रवाह में बहने के साथ-साथ असितत्व के यथार्थ को भी स्थापित करना चाहता है, उसके दायित्व का निर्वाह भी करना चाहता है। (हिन्दी-साहित्य कोश, पृ. 401)

उपयर्ुक्त उद्धरण के रेखांकित अंशों से नयी कविता की विशेषताओं को समझा जा सकता है-

1. नयी कविता में वैयäकि यथार्थ और सामाजिक यथार्थ दोनों को महत्त्व दिया गया है। वस्तुत: व्यä अिैर समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है, और नयी कविता इस संबंध को स्वीकारती है। इसीलिए नयी कविता में वैयäकि यथार्थ का अर्थ आत्मरति अथवा समाज के प्रति विæोह नहीं है, अपितु उन मूल्यों और सिथतियों की स्थापना-पुनस्र्थापना पर बल है जो या तो किन्हीं कारणों से समाज से लुप्त हो गये हैं या जिनकी स्थापना समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है। डा. धर्मवीर भारती के अनुसार, ''कोर्इ भी विकासशील समाज नीतिवान, दायित्वयुक्त, स्वतंत्राचेता व्यäयिें का संगठन होता है। इसीलिए नर्इ कविता उन मूल्यों के पुनरन्वेषण और पुन: स्थापना के लिए अग्रसर होती है। (सामाजिक आग्रह, (संकलित) नर्इ कविता, पृ. 34)

2. नयी कविता के संदर्भ में 'लघु मानव और उसके 'लघु परिवेश की बात प्राय: की जाती है। 'लघु मानव का तात्पर्य है वह आम आदमी जो अपनी वैयäकि सबलताओं दुर्बलताओं, इच्छाओं- आकांक्षाओं के साथ जीता है, और 'लघु परिवेश का अर्थ है वे सामाजिक राजनैतिक परिसिथतियाँ, वे विषमताएँ अन्याय, शोषण, संघर्ष, जिनसे जूझना, संघर्ष करना इस 'लघु मानव की नियति है। नयी कविता में आम आदमी की इच्छाओं आशा-निराशाओं की अभिव्यä भिी है और सामाजिक राजनैतिक विæूपताओं विषमताओं को भी विभिन्न कोणों से प्रस्तुत किया गया है। भारतीजी की ये पंäयिँ इस संबंध में æष्टव्य हैं-

मैं रथ का टूटा पहिया हूँलेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गतिसहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जानेसच्चार्इ टूटे पहियों का आश्रय ले।

वे लिखते हें- हारो मत, साहस मत छोड़ो,

इससे भी अथाह शून्य में

बौनों ने तीन पगों में धरती नापी।

स्पष्टत:, नयी कविता समाज के कठोर यथार्थ और उससे टकराते मानव की कविता तो है किंतु निराश होकर, अकर्मण्य होकर बैठ जाने की नहीं अपितु साहस और विश्वास के साथ उनसे संघर्ष करने की है।

3ण् नयी कविता में समाज को बदल डालने की ललक है, प्रगति की राह में आने वाले सभी अवरोधों को उखाड़ फेंकने की चाह है, सड़ी-गली परंपराओं और रुढि़यों के प्रति अनास्था और अविश्वास का भाव भी है, किंतु यह किसी राजनैतिक विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह के कारण नहीं, और न ही विवेक और बुद्धि को तिलांजलि देकर किसी फ़ैशन के तहत। वस्तुत: यह अनास्था और अविश्वास का भाव युगीन परिसिथतियों की देन है, उसके प्रति प्रतिक्रिया है-

ये किसी निशिचत नियम, क्रम की सरासर सीढि़याँ हैं,

पाँव रख कर बढ़ रहीं जिस पर कि अपनी पीढि़याँ हैं,

बिना सीढ़ी के चढ़ेंगे तीर के जैसे बढ़ेगे। (भवानी प्रसाद मिश्र)   

किन्तु जब सिथतियों में बदलाव दिखार्इ नहीं देता, तो वह हताश और कुंठित होने लगता है। धर्मवीर भारती की निम्नांकित पंäयिँ युवा मन की इसी सिथति की अभिव्यä किरती हैं-

अपनी कुंठाओं कीदीवारों में बंदीमैं घुटता हूँ।

भारती जी के 'अंघायुग में जिस अंधकार का वर्णन है वह इन्हीं विषमतापूर्ण परिसिथतियों की देन है जिसमें भूख, गरीबी, असमानता के संकट तो हैं ही, मूल्यों, आस्था और विश्वास का संकट भी है। यह अंधकार असितत्व का संकट उत्पन्न कर रहा है, नये कवि को भयभीत कर रहा है-

यह है मेरा कुटुंब

Ðासोन्मुख कुटुंब

जिसे कुछ ही वषो± में बाहर घिरा हुआ

अंधेरा निगल जाएगा।

4. नयी कविता में एक ओर मूल्यों के विघटन, अनास्था और अविश्वास से उत्पन्न अंधकार का चित्राण है, निराशा और कुंठा का भाव है, परंपराओं और रूढि़यों का अस्वीकार है, दूसरी ओर भविष्य के प्रति आस्था के संकेत भी मिलते हैं। नरेश मेहता, रधुवीर सहाय, हरिनारायण व्यास, गिरिजाकुमार माथुर और अज्ञेय की कविताओं में भविष्य के प्रति इस आस्था के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। अज्ञेय और गिरिजा कुमार माथुर की कविताओं की कुछ पंäयिें से यह बात स्पष्ट हो जाएगी-

अभी न हारो, अच्छी आत्मा,

मैं हूँ, तुुम हो और अभी मेरी आस्था है। (अज्ञेय)

विश्व में जब कुटिलता है, त्राास है

सत्य शिव का तब हमें विश्वास है। (गिरिजा कुमार माथुर)

5ण् भारत भूषण अग्रवाल लिखते हैं-

पर न हिम्मत हार;

प्रज्ज्वलित है प्राण में अब भी व्यथा का दीप

ढाल उसमें शä अिपनी

लो उठा।

उपयर्ुक्त पंäयिें में जिस 'व्यथा की बात है, इस व्यथा, पीड़ा या वेदना की चर्चा नये कवियों की कविताओं में भी हुर्इ है और उनके लेखों-वक्तव्यों में भी। यह व्यथा ही व्यä किी पीड़ा को समाज की पीड़ा से जोड़ती है। इस संदर्भ में अज्ञेय की ये पंäयिँ बार-बार उदधृत की जाती हैं-

दर्द सबको मांजता है

और जिन्हें वह मांजता है

उन्हें वह यह सीख देता है

कि सबको मुक्त रखे।

इसीलिए नयी कविता को 'अर्पित रसना का विशेषण प्रदान किया गया- ''इस प्रकार नर्इ कविता एक अर्थ में 'अर्पित रसना भी है। पर उसका यह अर्पण किसके प्रति है? निस्संदेह मानव-मूल्यों के प्रति। उसके व्यä सिे मानव मूल्य बड़े हैं, और पीड़ा के माèयम से वह उन्हीं को उपलब्ध करना चाहता है, उनकी उपलबिध के लिए अपने अहम को अर्पित भी करता है, क्योंकि वह दर्द उससे बड़ा है। (सामाजिक आग्रह : धर्मवीर भारती, संकलित नयी कविता, पृ. 36) कुँवर नारायण की निम्नलिखित पंäयिें में आस्था का आधार इस वेदना का स्वीकार स्पष्ट èवनित है-

है मुझे स्वीकारमेरे वन, अकेलेपन, परिसिथति केसभी काँटे

ये दघीची हìयिँहर दाह में तप लें      

 न जाने कौन दैवी आसुरी संघर्ष बाकीहों अभी

जिसमें तपायी हìयिँ मेरी यशस्वी हों।

6. नयी कविता के उत्तराद्र्ध में भय, आंतक, ऊब, अकेलापन, अजनबीपन, मृत्युबोध, व्यर्थताबोध, यातना, शून्यता आदि की बात भी की गयी है। वस्तुत: ये सभी प्रवृत्तियाँ उन पशिचमी देशों की रचनाओं को प्रभाव हैं जिन्होंने द्वितीय महायुद्ध की विभीषिका को प्रत्यक्ष देखा और भोगा था। सामूहिक नाश और अनिशिचत भविष्य के भय और आंतक से उन देशों के रचनाकारों की मानसिकता इस प्रकार की हो गयी थी। पशिचम में ही उभरा असितत्ववादी दर्शन (म्गजपेजमदजपंसपेउ) इसी मानसिकता की उपज था जिसमें र्इश्वर के असितत्व को नकारा गया, और अकेलापन, मृत्युबोध, यातनाबोध, व्यर्थता बोध आदि को मान्यता दी गयी। नयी कविता और बाद में अकविता में इस असितत्ववादी दर्शन का प्रभाव दिखार्इ देता है। हिन्दी साहित्य में रचनाकारों ने इस प्रवृत्तियों को कुछ तो फ़ैशन और आधुनिकता के नाम पर अपनाया, और कुछ स्वातंत्रयोत्तर परिसिथतियों और महानगरीय जीवन के प्रभाववश। पशिचम के प्रतीकवाद मनोविश्लेषणवाद, अंग्रेजी कवियों एज़रापाउंड, इलियट आदि से भी इन कवियों ने प्रभाव ग्रहण किया- भाव के स्तर पर भी और अभिव्यä किे स्तर पर भी।

7. अभिव्यä किी दिशा में भी नयी कविता पूर्ववर्ती कविता से भिन्न और विशिष्ट दिखार्इ देती है। प्रयोगवाद में 'शिल्प ही शिल्प प्रधान था, किंतु नयी कविता के रचनाकारों का मत था कि 'बात बोलेजी हम नहीं (शमशेर बहादुर सिंह), और भवानी प्रसाद मिश्र ने कहा 'जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख। अर्थात कविता में संप्रेषणीयता तो हो, किंतु जटिलता न हो। बलिक सहज अभिव्यä पिर अधिक बल दिया गया। भाषा, èवनि और छंद-विधान में उन्होंने नये प्रयोग किये। छंदों के बंधन से मुä किी बात की गयी, पर अंतर्लय को महत्त्व दिया गया। दुष्यंत कुमार ने उदर्ू में लिखी जाने वाली ग़ज़लों को हिंदी में अपनाया। गीतों का प्रयोग भी हुआ। पुराने उपमानों का नये ढंग से प्रयोग किया गया, नये उपमानों की खोज की गयी। उदाहरणार्थ-

कैमरे की लैंस सी हैं आँखें बुझी हुइ,

बिगड़े, कम्बख्त लाउडस्पीकर से

जिनके मुख निश्शब्द खुले हैं

दांतेदार पहिया सा घूमे जाता है

टाइपराइटर की 'की की तरह

सबके पैर बारी बारी से उठते हैं। (भारत भूषण अग्रवाल)

उपयर्ुक्त पंäयिें में रेखांकित सभी उपमान हमारे दैननिदन के उपयोग में आने वाली वस्तुओं के हैं। जो अपने नयेपन के कारण ताजगी भरे तो हैं ही, अभिव्यä सिमथ्र्य में भी कम नहीं। नरेश मेहता की निम्नलिखित पंäयिें में गोमती नदी के तट का बिंब प्रस्तुत किया गया है। इस बिंब में गोमती का तट अपनी समस्त विशिष्टताओं, दृश्यों, èवनियों, गतियों के साथ पाठकों के सम्मुख मूर्तिमान हो जाता है-

गोमती तट

दूर पेंसिल रेखा-सा वह बाँस झुरमुट

शरद दुपहर के कपोलों पर उड़ी वह धूप की लट

जल के नग्न ठंडे बदन पर कुहरा झुका

लहर पीना चाहता है।

सामने के शीत नभ में

आयरन बि्रज की कमानी, बांह मसिजद की बिछी है।

धोबियों का हांक,

वट की डालियाँ दुहरा रही हैं।

'नयी कविता आंदोलन के प्रमुख कवि हैं- कुँवर नारायण, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह, मुäबिेध, जगदीश गुप्त, अज्ञेय, दुष्यंत कुमार, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, नागजर्ुन, प्रभाकर माचवे, भारतभूषण अग्रवाल, रधुवीर सहाय, शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकंस वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन आदि।     

     उक्त विवेचन से 'नयी कविता की विशेषताएँ आपके सामने स्पष्ट हो गयी होंगी। इस दौर की कविता में वैयäकि अनुभूतियाँ भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं जितना सामाजिक आग्रह, एक ओर परंपराओं के प्रति अविश्वास और अनास्था का भाव है दूसरी ओर भविष्य के प्रति आशा और उत्साह भी है। नयी कविता में भूतकाल की प्रगतिविरोधी मान्यताओं.विश्वासों और वर्तमान की असमानताओं, विæूपताओं और आमनुषिक परिसिथतियों से टकराने का भाव है, विपरीत सिथतियों के कारण कुंठा और संत्राास के भाव भी दिखार्इ देते हैं, परंतु वह थकहार कर बैठ जाने की कविता नहीं वरन इस अंधकार को चीर प्रकाश की ओर बढ़ने को वरीयता देती है। इसीलिए नयी कविता में गध और पध की विशेषताओं का मिश्रण दिखार्इ देता है- गध की यथार्थ परकता और पध की संवेदनशीलता। पशिचम के असितत्ववादी दर्शन का प्रभाव उस पर है। भाषा, छंद, प्रतीक, उपमान और बिंबयोजना आदि की दृषिट से भी नयी कविता में ताजगी दिखार्इ देती है। पर बाद में इन्हीं विशेषताओं को आधुनिकता और फ़ैशन के नाम पर अपनाया जाने लगा, सामाजिक आग्रहों और दायित्वों को तिलांजलि देकर केवल वैयäकि अनुभूतियों, कुंठाओं और संत्राास, अनास्था और अविश्वास की ही कविता लिखी जाने लगी। परंपराओं, मूल्यों, आस्था, विश्वास, समाज, संस्Ñति सभी के निषेध पर बल दिया जाने लगा, नये बिंबों-प्रतीकों-उपमानों का प्रयोग केवल चमत्कार उत्पन्न करने के लिए होने लगा। ऐसे में नयी कविता का अवसान और 'अकविता आंदोलन का जन्म हुआ।