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Study Material-1

Site: School of Open Learning
Course: Anya Gadya Roop
Book: Study Material-1
Printed by: Guest user
Date: Wednesday, 18 September 2019, 2:43 PM

1 विषय-सूची

विषय-सूची

प्रश्नपत्रा 103

अèययन-सामग्री

विषय-सूची   

1. निबन्ध्

(i) आत्मनिर्भरता (लेखक परिचय) : बालÑष्ण भटट

(ii) कविता क्या है ? : रामचन्द्र शुक्ल

(iii) अशोक के पूफल : आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

2. आत्मकथा और जीवनी

(i) जूठन : ओमप्रकाश वाल्मीकि

(ii) आवारा मसीहा : विष्णु प्रभाकर

3. संस्मरण एवं रिपोर्ताज

(i) पथ के साथी (संस्मरण) : महादेवी वर्मा (सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला)                                                                                                                                      

 सम्पादक :

डा. मनीराम यादव

डा. सुध्ीर शर्मा

डा. भवानी दास           

                                                                                                                               

                                                                                               

मुक्त शिक्षा विधालय

(मुक्त शिक्षा परिसर)

दिल्ली विश्वविधालय

5, कैवेलरी लेन, दिल्ली-110007


2 1. निबन्ध्

1. निबन्ध्

1. 'आत्मनिर्भरता (निबंध्): लेखक परिचय

2.  कविता क्या है? (रामचन्द्र शुक्ल)

3. अशोक के फूल



2.1 1. 'आत्मनिर्भरता (निबंध्): लेखक परिचय

1. 'आत्मनिर्भरता (निबंध्): लेखक परिचय

आत्मनिर्भरता

(बालÑष्ण भêट)

लेखक परिचय

पं. बालÑष्ण भêट भारतेन्दु युग के निबन्ध्कार थे। उनका जन्म 3 जून, 1844 को प्रयाग में हुआ और उन्होंने 70 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही संस्Ñत में हुर्इ। बाद में उन्होंने नियमित रूप से स्कूल में प्रवेश लेकर विधाèययन किया। थोड़े समय के लिए भटट जी ने अèयापन कार्य भी किया, लेकिन बाद में उन्होंने इस कार्य को छोड़कर साहित्य-सेवा को ही अपना मुख्य उíेश्य बना लिया।

निबन्ध् के क्षेत्रा में भêटजी का स्थान

पं. बालÑष्ण भêट भारतेन्दु-युग के निबन्ध्कार थे। आपने सं. 1933 वि. में 'हिन्दी-प्रदीप मासिक पत्रा का उत्तरदायित्त्व संभाला था। इससे पूर्व इलाहाबाद में कालेज के कतिपय विधार्थियों ने हिन्दी की उन्नति के लिए एक 'हिन्दी-वर्(िनी-सभा स्थापित की थी और यह निश्चय किया था कि हिन्दी की अभिवृ(ि के लिए हिन्दी में एक मासिक पत्रा भी निकाला जाय। तभी उन लोगों ने पाँच-पाँच रुपये के हिस्से करके कुछ ध्नराशि इकटठी की और 'हिन्दी-प्रदीप का प्रथम अंक प्रकाशित किया।1 परन्तु वे विधार्थी इस मासिक पत्रा को चलाने में सर्वथा असमर्थ रहे और एक ही अंक के उपरान्त वह विधार्थी-मण्डली तत्कालीन बि्रटिश शासन के दमन-चक्र का शिकार होकर छिन्न-भिन्न हो गर्इ तथा वह 'हिन्दी-प्रदीप एक अनाथ नवजात शिशु की तरह सिसकता हुआ रह गया। तभी पं. बालÑष्ण भटट ने इस नवजात शिशु रूप मासिक पत्रा को अपने संरक्षण में ले लिया और तैंतीस वर्ष तक अनेक विघ्नों, बाधओं एवं अभावों से संघर्ष करते हुए 'हिन्दी-प्रदीप का पालन-पोषण करते रहे। इतना ही नहीं, इसी मासिक पत्रा के द्वारा वे अंग्रेजों की शोषक प्रवृत्ति, उनके अत्याचार एवं अनाचार, Ñषि की दुर्दशा, पुलिस का अन्याय, अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति, हिन्दी की उपेक्षा, शासकों की दूषित मनोवृत्ति आदि का पर्दापफाश करते हुए तत्कालीन शासन पर अगिनवर्षा करते रहे और अपने सदृढ़ एवं निर्भीक विचारों के द्वारा सामाजिक कुरीतियों, अंध्विश्वासों, थोथी रूढि़यों, अनर्गल परम्पराओं के विरु( प्रचार करते हुए भारतीय जनता में स्वस्थ परम्पराएँ स्थापित करके देश-भकित की भावना जगाने, शकित-संचय करने तथा परतंत्राता की बेडि़यों को तोड़कर स्वतन्त्राता की प्रापित के लिए प्रेरणा प्रदान करने लगे।

'हिन्दी-प्रदीप उस काल का एक ऐसा मासिक पत्रा था, जिसमें नाटक, इतिहास, साहित्य, दर्शन, भूगोल, Ñषि, स्वास्थ्य, विज्ञान, चरित्रा, शिक्षा आदि से सम्बनिध्त विविध् प्रकार के निबन्ध् प्रकाशित होते थे। साथ ही कपड़े सापफ करने से लेकर बर्तनों पर कलर्इ करने आदि से सम्बनिध्त सभी विषयों का चयन किया जाता था। इतना ही नहीं, तत्कालीन शासन की कटु-से-कटु आलोचना करना भी इस पत्रा की एक विशेषता थी। तत्कालीन शासन ने लाख प्रयत्न किये, परन्तु वह इस पत्रा के सम्पादक को खरीद न सका। सरकार ने अनेक कष्ट दियेऋ पिफर भी वह इस पत्रा का मुख बन्द न कर सकी। अंग्रेजों ने अनेक बार कानूनी शिकंजे में कसना चाहा पिफर भी यह पत्रा निडर एवं निर्भीक होकर व्यंग्यात्मक शैली में शासन पर प्रहार करता रहा। इसका कारण यह था कि इस पत्रा के कुशल सम्पादक पं. बालÑष्ण भêट थे, जो सत्य एवं न्याय के पक्षपाती थे, शासन की बुराइयों को तनिक भी सहन नहीं कर सकते थे, शासकों की दूषित मनोवृत्ति को भली प्रकार जान गये थे और उनके साम्राज्यवादी विचारों से पूर्ण परिचित थे, जिनक

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1. सरस्वती मासिक पत्रिका, अगस्त 1909, पृ. 326

2. साभार-हिन्दी के प्रतिनिधि निबन्ध्कार - द्वारिकाप्रसाद सक्सेना   

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 द्वारा वे भारत को लगातार निर्जीव एवं निष्प्राण बना रहे थे। इसी कारण भêटजी ने निडर होकर शासन का विरोध् किया और तत्कालीन असंतोष, आक्रोश एवं क्षोभ को वाणी प्रदान की। भêटजी के ये विचार उनके इन निबन्धें के द्वारा अभिव्यक्त होते थे, जो 'हिन्दी-प्रदीप में प्रति माह प्रकाशित होते थे। भêटजी अकेले ही

सर्वाधिक मात्राा में 'हिन्दी-प्रदीप के लिए सामग्री जुटाते थे। इसीलिए उन्होंने एक हजार से अधिक निबंध् लिखे। हिन्दी-निबन्ध् के क्षेत्रा में आज तक कोर्इ ऐसा निबन्ध्कार नहीं हुआ, जिसने इतने अधिक निबन्ध् लिखे हों और जो इतने अधिक विषयों पर लेखनी चला सका हो। भêटजी की प्रतिभा विलक्षण थी, उनका ज्ञान असाधरण थाऋ उनकी बु(ि अदभुत थी, उनकी चिन्तन-शकित अलौकिक थी और उनकी सूझबूझ अनुपम थी। वे लघु से लघु एवं महान से महान विचार को निबन्ध् का ऐसा जामा पहना देते थे कि पाठक उसे पढ़े बिना नहीं रहता था तथा उसे पढ़कर भêटजी के लेखन-कौशल की भूरि-भूरि प्रशंसा किया करता था। निस्सन्देह, उस युग में भêटजी जैसा वाणी का ध्नी, भाषा का पारखी, समसामयिक विचारों का चितेरा तथा अभिव्यकित का कुशल पंडित और कोर्इ दूसरा निबन्ध्कार नहीं था।

भêटजी ने विविध् विषयों पर निबन्ध् लिखे। उस समय पं. प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौध्री 'प्रेमध्न, लाला श्रीनिवास, पं. अमिबकादत्त व्यास, पं. राधचरण गोस्वामी, बालमुकुन्द गुप्त आदि भी उत्Ñष्ट निबन्ध् लिख रहे थे परन्तु पं. बालÑष्ण भêट की-सी जि़न्दादिली, निभर्िीकता, सूझबूझ, सशक्तता, मार्मिकता, èवन्यात्मकता एवं अभिव्यंजना की कुशलता अन्य किसी भी तत्कालीन निबन्ध्कार में नहीं थी। यदि कुछ समानता थी तो

पं. प्रतापनारायण मिश्र में थी, क्योंकि मिश्रजी भêटजी की ही तरह व्यंग्य एवं वक्रता का सहारा लेकर सामाजिक, साहितियक, राजनीतिक एवं नैतिक विषयों पर निबन्ध् लिखा करते थे। परन्तु मिश्रजी के निबन्धें में उतना तीखा एवं मर्मप्रहारी हास्यविनोद नहीं रहता था, जितना कि भêटजी के निबन्धें में रहता था। साथ ही, भêटजी का पद-विन्यास भी मिश्रजी की अपेक्षा कहीं अधिक चोखा और अनूठा होता था। इसके अतिरिक्त विषय की विविध्ता में तो मिश्रजी भी भêटजी की समता नहीं कर सके थे। इतना ही नहीं, भêजी जहाँ कहीं भी कोर्इ अन्याय एवं अत्याचार देखते थे, अपने पत्रा में उसकी तुरन्त आलोचना कर डालते थे। इस तरह अधिक-से-अधिक खतरे में पड़कर भी वे अत्यंत उग्र एवं क्षोभपूर्ण लेख लिखा करते थे, जो देश-भकित से परिपूर्ण होते थे, जिनमें समसामयिक जीवन की झलक रहती थी, जो राजनीतिक हलचल से परिपूर्ण होते थे, जिनमें सामाजिक बुराइयों को दूर करने की प्रवृत्ति विधमान रहती थी, जो अन्ध्-परम्परा का विरोध् करते हुए जन-साधरण को सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न करते थे, जिनमें समाज-सुधर की भावना भरी रहती थी, जो जीवन के स्तर को उन्नत बनाने में प्रयत्नशील थे, जिनमें देश की हीनावस्था का चित्राण करके देश-वासियों को जाग्रत करने की प्रेरणा भरी हुर्इ रहती थी, जो राष्ट्रव्यापी शोषण का चित्राण करके राष्ट्र को पराध्ीनता की बेडि़यों से उन्मुक्त करने के लिए प्रोत्साहन देते थे, जिनमें लोक-कल्याण की भावना व्याप्त थी, जो भारत को निर्जीव एवं निष्प्राण बनाने वाली बि्रटिश सरकार की कूटनीति का उदघाटन करने वाले थे, जिनमें जनता पर लगाये जाने वाले करों का विरोध् किया गया था, जो देश-प्रेम का मन्त्रा पूफँकने वाले थे, जिनमें अंग्रेजों की मुसलमानों तथा हिन्दुओं के साथ पक्षपातपूर्ण नीति का परदापफाश किया गया थाऋ जो Ñषकों की दुर्गति के यथार्थ चित्रा अंकित करने में सर्वथा समर्थ थे, जिनमें हिन्दू-जाति के कदर्यता के कारण होने वाली दुर्गति का चित्राण थाऋ जो परमुखापेक्षी, परभाग्योपजीवी एवं निष्पुरुषार्थी बनाने वाली कुप्रथाओं का भंडापफोड़ करने वाले थेऋ जिनमें दुव्र्यसन, खुदगर्जी, पिफजूलखर्ची, बैर, पूफट आदि में लिप्त समाज की भत्र्सना की गर्इ थी, जो कुपढ़ों को हजारों रुपये लुटाने वाले तथा विधा-बु(ि के लिए एक पैसा भी देना हराम समझने वालों पर तीव्र प्रहार करने वाले थे, जिनमें हिन्दुओं की अन्ध्भकित पर आक्रोश प्रकट किया गया था, जो बाल-विवाह के उग्र विरोध्ी थे, जिनमें बाáाडम्बर का तीव्र विरोध् किया गया था, जो छुआछूत को देश के लिए हानिकर बतलाते थे, जिनमें विध्वा-विवाह का समर्थन किया गया था तथा जो 'सादा जीवन उच्च विचार के सि(ान्त का प्रचार एवं प्रसार करते हुए पैफशन, आडम्बर तथा कोरे दिखावे को समाज के लिए अमंगलकारी बतलाते थे। इस तरह भêटजी के निबन्धें में विविध् सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों पर ऐसे-ऐसे विचार मिलते हैं, जो आज भी भारतीय जन-जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं।

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                1. हिन्दी साहित्य का इतिहास-पं. रामचन्द्र शुक्ल, पृ. 467            

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भêटजी के साहितियक निबन्ध् भी अनुपम एवं बेजोड़ हैं। भêट जी ने जहाँ एक ओर अत्यन्त असाधरण एवं विचित्रा विषयों पर साहितियक निबन्ध् लिखे हैं, वहाँ दूसरी ओर असमसामयिक विषयों पर अत्यन्त गम्भीर एवं शिक्षाप्रद निबन्धें का भी प्रणयन किया है। जैसे-'र्इश्वर क्या ही ठठोल है, 'नाक निगोड़ी भी बुरी बाला है 'भकुआ कौन कौन है आदि यदि हास्य-व्यंग्यपूर्ण विचित्रा निबन्ध् हैं, तो 'पुरातन तथा आध्ुनिक सभ्यता, 'साहित्य जनसमूह के âदय का विकास है, 'आत्म-निर्भरता आदि अत्यन्त गम्भीर एवं मननशील विचारों से परिपूर्ण निबन्ध् हैं। इसी तरह आपने काल्पनिक निबन्ध् भी लिखे हैं और भावात्मक निबन्धें पर भी लेखनी चलार्इ है जैसे-'आँसू, 'चन्द्रोदय आदि आपके काल्पनिक निबन्ध् हैं और 'कल्पना, 'मुग्ध् माध्ुरी, 'प्रेम के बाग का सैलानी, पत्नी-स्तव आदि भावात्मक निबन्ध् है, जिनमें काव्य का चमत्कार विधमान है। इतना ही नहीं, भêटजी ने राजनीति, समाज और साहित्य के अतिरिक्त Ñषि, ज्योतिष, भूगोल, अर्थशास्त्रा, व्यापार, नीति, इतिहास, जीवनी, विज्ञान आदि विविध् विषयों पर निबन्ध् लिखकर निबन्ध्-साहित्य के भंडार की पूर्ति की है। इसी कारण डा. रामविलास शर्मा ने तो भêटजी को केवल प्रताप नारायण मिश्र से ही नहीं, अपितु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से भी बढ़कर माना है और लिखा है-''भêटजी का बहुविध् साहित्य जनता को अंग्रेजी राज के सच्चे रूप से परिचित कराता है। अंग्रेजों की न्याय-व्यवस्था, उनकी सभ्यता, उनकी राजनीति-इनके बाá रूपों से चमत्Ñत न होकर भêटजी ने उनकी वास्तविकता उदघाटित की। पैनी सूझबूझ के अलावा यह साहस का काम भी था। ....वह अपने युग के श्रेष्ठ क्रानितकारी विचारक थे। इस दृषिट से वे भारतेन्दु से भी बढ़कर थे।1 डा. लक्ष्मी सागर वाष्र्णेय ने भी बालÑष्ण भêट की महत्ता घोषित करते हुए लिखा है-''भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, उपाèयाय बदरीनारायण चौध्री 'प्रेमघन, जगमोहनसिंह, अमिबका दत्त व्यास, राधचरण गोस्वामी, गोविन्दनारायण मिश्र आदि अनेक लेखकों की ऐसी रचनाएँ मिलती हैं, जिनमें निबन्ध् के कुछ लक्षण अवश्य मिल जाते हैं, किन्तु उन्हें निबन्ध् न कहकर 'लेख कहना ही अधिक युकित-संगत होगा। निबन्ध्-रचना के कुछ लक्षण होने पर भी, निबन्ध् जैसे होने चाहिए, वे वैसे नहीं हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्( में निबन्ध्-रचना का यदि वास्तविक रूप कहीं मिलता है तो बालÑष्ण भटट और प्रतापनारायण मिश्र की रचनाओं में मिलता है।2 पं. रामचन्द्र शुक्ल ने भी भêटजी की प्रशंसा करते हुए लिखा है-''पंडित प्रतापनारायण मिश्र और पंडित बालÑष्ण भêट ने हिन्दी गध-साहित्य में वही काम किया, जो अंग्रेजी गध-साहित्य में एडीसन और स्टील ने किया था।3 डा. ओंकारनाथ शर्मा ने भी भêटजी की भूरि-भूरि प्रशंंसा करते हुए स्पष्ट लिखा है-''ये भारतेन्दु-युग के प्रतिभाशाली लेखक संस्Ñत के प्रकांड विद्वान तथा युग के सर्वश्रेष्ठ निबन्ध्कार माने जाते हैं। इन्होंने साहितियक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि अनेक विषयों पर सुन्दर निबंध् लिखे। इनके निबंधें में अनेक शैलियों के दर्शन होते हैं। वैयकितकता की छाप भêटजी के निबन्धें में पूर्णतया पार्इ जाती है। पं. बालÑष्ण भêट पाश्चात्य निबन्ध्कार एडीसन से अधिक प्रभावित थे। एडीसन के अनुसार निबन्ध् में विचार-धरा तरल और मिश्रित होती है, उसका प्रवाह कभी साधरण उपदेशात्मकता की ओर उन्मुख रहता है, कभी वैयकितक आत्माभिव्यंजना की ओर। बस इसी लक्षण के आधर पर भêटजी ने निबन्ध्-रचना की। हिन्दी निबन्ध्-साहित्य में वैयकितक कोटि के निबन्धें के तो भêटजी प्रवर्तक भी माने जा सकते हैं। ...ये भावात्मक निबन्धें के भी श्रेष्ठ निबन्ध्कार हैं।4 प्रो. जयनाथ ललित ने भêटजी को भारतेन्दु-युग का सर्वश्रेष्ठ निबन्ध्कार घोषित किया है और हिन्दी का माण्टेन माना है।1 इतना ही नहीं, बाबू गुलाबरायजी ने तो भêटजी के बारे में यहाँ तक लिखा है कि ''वे अपने युग के ही सर्वप्रमुख निबन्ध्-लेखक नहीं, वरन समस्त हिन्दी-साहित्य में आज तक होने वाले प्रथम श्रेणी के निबन्ध्कारों में उनकी गणना अनिवार्य है।

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1. हिन्दी गध के निर्माता बालÑष्ण भêट-भूमिका, पृ. 2

2. आध्ुनिक हिन्दी साहित्य, पृ. 152

3. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 467

4. हिन्दी निबन्ध् का विकास, पृ. 116-120   
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इस प्रकार पं. बालÑष्ण भêट के निबन्धें में भारतेन्दु-युग की जिन्दादिली निर्भीकता, स्वच्छन्दता, विनोदशीलता, चपलता, चमत्कारप्रियता, सशक्ता आदि तो विधमान हैं ही, किन्तु उनकी चिन्तन एवं मनन करने की शकित अदभुत है, उनकी कल्पना-शकित अद्वितीय है, उनकी उर्वर प्रतिभा अनुपम है और समय के प्रतिकूल ब(मूल विचारों को उखाड़ पेंफकने तथा परिसिथति के अनुकूल नूतन विचारों को स्थापित करने में उनकी तत्परता एवं दृढ़ता सर्वथा असाधरण एवं अलौकिक है। उनके निबन्धें में अन्य सभी समसामयिक निबन्ध्कारों की अपेक्षा उमंग की प्रधनता है, विचारशीलता का आधिक्य है, गम्भीरता एवं प्रौढ़ता का प्राबल्य है, आत्मविश्वास एवं दृढ़ता का बाहुल्य है, निर्भीकता एवं सशक्ता का प्राधन्य है और शकित-सम्पन्न लेखनी के कौशल की प्रमुखता है। निस्संदेह भêटजी भारतेन्दु-युग के सांस्Ñतिक उत्थान के प्रमुख सूत्राधर थे, तत्कालीन निबन्ध्-लेखकों के सहयोगी एवं शिक्षक थे, परवर्ती लेखकों के प्रेरणा-केन्द्र थे, राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचारक थे, सातिवक क्रोध् से परिपूर्ण तीक्ष्ण व्यंग्य लेख लिखने में सि(हस्त थे, सामाजिक एवं राजनीतिक दायित्व की भावना का शंखनाद करने वाले थे, जन-जीवन को सुख-समृ(ि से परिपूर्ण बनाने की प्रेरणा देने वाले थे और परतंत्राता की बेडि़यों को काटकर स्वतन्त्राता-प्रापित की प्रेरणा प्रदान करने वाले थे। इसीलिए उनके निबन्ध् जहाँ इतने अधिक लोकप्रिय थे, वहाँ उनकी गध-शैली भी सरल और सुबोध् होने के साथ-साथ बोलचाल के अत्यधिक निकट होने के कारण लोकप्रिय थी। वे न तो राजा लक्ष्मणसिंह की तरह पूर्णतया शु( हिन्दी गध के पक्षपाती थे, न राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द की तरह अरबी-पफारसी मिश्रित हिन्दी-गध को रुचिकर समझते थे और न भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की तरह मèय मार्ग के अनुयायी थे, अपितु उन्होंने मुहावरे, लोकोकित आदि से सम्पन्न चुभते हुए वाक्यों से परिपूर्ण ऐसी गध-शैली का प्रचार किया था, जो संस्Ñत के तत्सम शब्दों एवं अरबी-पफारसी की पदावली से ओतप्रोत होकर भी बोलचाल के सनिनकट थी, जो व्याकरण की कठोर श्रृंखलाओं में आब( न होकर स्वच्छन्द गति से विचरण करती थी, जिसमें परिसिथतियों की आवश्यकताओं के अनुकूल अदम्य वेग था, जो वाणी का विलास होती हुर्इ भी तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक अन्याय एवं अत्याचार के विरु( आग उगलती थी, जिसमें चिड़चिड़ाहट होते हुए भी मनोरंजन का आधिक्य था, जो समाज को परिवर्तन की ओर अग्रसर करने में सशक्त थी, जिसमें नूतन विचारों को जन-मानस तक पहुँचाने का अदम्य वेग विधमान था जो लोक-हित में बाध्क परम्पराओं का डटकर विरोध् करने में समर्थ थी, जिसमें भाव, कल्पना एवं विचार तीनों का सपफल सामंजस्य था और जन-जन में व्याप्त असंतोष, आक्रोश एवं क्षोभ को अभिव्यक्त करने में सि(हस्त थी। डा. रामविलास शर्मा ने भêटजी की गध-शैली के बारे में ठीक ही लिखा है-''भêटजी की गध-शैली समतल भूमि पर मन्थर गति से बहने वाली नदी नहीं हैऋ वह चटटानों से टकराती, प्रस्तर-खण्डों को बहाती, प्रखर वेग वाली पर्वत-सरिता है, जिसका सौन्दर्य उसके अदम्य वेग में है।2 यही कारण है कि अपने निबन्धें की विविध्ता, सशक्तता, वैयकितकता, सरसता, प्रौढ़ता, गम्भीरता, विचारशीलता, निर्भीकता एवं मार्मिक अभिव्यंजकता तथा अपनी गध-शैली की चारुता, अदम्य धरावाहिकता तीव्रता, प्रखरता, चपलता, स्वच्छन्दता, ओजसिवता आदि के पफलस्वरूप पं. बालÑष्ण भêट भारतेन्दु-युग के सर्वश्रेष्ठ निबन्ध्कार हैं।

भêटजी के निबन्धें का वर्गीकरण एवं विश्लेषण

पं. बालÑष्ण भêट भारतेन्दु-युग के ही श्रेष्ठ निबन्ध्कार नहीं हैं, अपितु वे हिन्दी के सर्वप्रथम निबन्ध्कार है, क्योंकि हिन्दी में निबन्ध्-कला का अविर्भाव आपके द्वारा ही हुआ था और आपने ही हिन्दी में सर्वप्रथम मौलिक चिन्तन-मनन से परिपूर्ण सुन्दर एवं गम्भीर साहितियक निबन्धें का सूत्रापात किया था। आपने सरल एवं गम्भीर सभी प्रकार के विषयों पर निबन्ध् लिखे हैं। इसी कारण आपकी तुलना अंग्रेजी के एडीसन, स्टील, चाल्र्स लैम्ब आदि श्रेष्ठ निबन्ध्कारों से की जाती है।3 आपने छोटे और बड़े सभी प्रकार के निबन्ध् लिखे हैं, जिनकी संख्या लगभग एक हजार है।           

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1. हिन्दी निबन्ध्कार, पृ. 76

2. हिन्दी गध के निर्माता पं. बालÑष्ण भटट, भूमिका, पृ. 2

3. भटट निबन्ध्माला (दूसरा भाग) ध्नंजय भटट, वक्तव्य, पृ. 4                    

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 इतनी विपुल मात्राा में निबन्ध् लिखने का श्रेय एकमात्रा भêटजी को ही प्राप्त है। उन्होंने विविध् प्रकार के निबन्ध् लिखकर हिन्दी के सर्वांगीण विकास में महत्त्वपूर्ण योग प्रदान किया है और निबन्ध्-साहित्य के भंडार की पूर्ति की है। यधपि आप निबन्ध्-कला के प्रवर्तक हैं और आपके निबन्ध् हिन्दी-निबन्ध्-कला की आरमिभक अवस्था के धोतक हैं, तथापि उनमें निबन्ध् रचना का आरमिभक रूप न होकर पर्याप्त सुसंस्Ñत रूप मिलता है और सभी निबन्धें में पर्याप्त रोचकता, सजीवता, जिन्दादिली, आत्मीयता, सशक्तता, सरसता एवं मार्मिकता विधमान है। भêटजी के प्राय: सभी निबन्ध् 'हिन्दी-प्रदीप में प्रकाशित हुए हैं। उनके कतिपय सुन्दर एवं सजीव निबन्धें का एक संकलन 'साहित्य-सुमन के नाम से प्रकाशित हुआ था। तदनंतर भêटजी के सुपुत्रा पं. जनार्दन भêट ने सं. 2004 वि. में बत्तीस निबन्धें का एक संकलन भêट निबन्ध्-माला प्रथम भाग के नाम से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित कराया। तत्पश्चात सं. 2004 वि. में ही पुन: बत्तीस निबन्धें का एक ओर संकलन 'भêट निबन्ध्-माला दूसरा भाग के नाम से नागरीप्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक भी पं. जनार्दन भêट ही है। इस प्रकार भêटजी के चौंसठ उत्तम निबन्धें को पुस्तकाकार रूप में दो भागों के अन्तर्गत प्रकाशित कराया गया है। अन्य सभी निबन्ध् अभी तक 'हिन्दी-प्रदीप की पफाइलों में ही विधमान हैं।

(1) वण्र्य-विषय की दृषिट से भêटजी के सभी निबन्धें को चार भागों में विभाजित कर सकते हैं-

(क) सामाजिक, (ख) राजनीतिक, (ग) साहितियक, और (घ) अन्य विषयक निबन्ध्।

(क) सामाजिक निबन्ध्-

भटटजी के सामाजिक निबन्धें के अन्तर्गत वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें भटटजी ने किसी-न-किसी ऐसी सामाजिक समस्या पर अपने विचार प्रकट किये हैं, जो तत्कालीन सामाजिक जीवन से सम्ब( है और जिसका उल्लेख करके भêटजी ने या तो किसी-न-किसी सामाजिक आडम्बर या कुरीति का विरोध् किया है अथवा किसी सुन्दर प्रथा का अनुमोदन या समर्थन किया है। जैसे भêटजी ने अपने कर्इ निबन्धें में संयुक्त परिवार-प्रथा के दुगर्ुणों का स्पष्टीकरण करते हुए यह सि( किया है कि संयुक्त परिवार-प्रथा के कारण व्यकित की उन्नति नहीं होती, सित्रायाँ घोर मानसिक पीड़ा से त्रास्त रहती हैं और निकम्मे एवं निष्पुरुषार्थी व्यकितयों को व्यर्थ प्रश्रय मिलता रहता है। इतना ही नहीं, भêटजी के विचार से तो इस प्रथा के कारण ही भारतीय समाज में अधिकाधिक मनुष्य परमुखापेक्षी, परभाग्योपजीवी तथा निष्पुरुषार्थी होते चले जा रहे हैं।1 ऐसे ही भêटजी ने अपने इन सामाजिक

निबन्धें में कहीं साध्ु, वैरागी एवं तपस्वी के वेश में घूमने वाले पाखंडी ध्ूत्तों के द्वारा तीर्थस्थानों पर भ्रष्टाचार पैफलाने का निरूपण किया है, तो कहीं समाज में व्याप्त पुरानी रीति-रिवाजों का बिना सोचे-समझे अन्धनुकरण करने का विरोध् किया है। इसी तरह कहीं बाल-विवाह की दूषित प्रथा का विरोध् किया गया है, तो कहीं विध्वा-विवाह का अनुमोदन किया गया है। ऐसे ही कहीं अनमेल विवाह को सामाजिक पापाचार सि( किया गया है, तो दूसरे निबन्ध् में परदा-प्रथा को सामाजिक अभिशाप बतलाया गया है। इसी प्रकार कहीं समाज में पैफले हुए बाáाडम्बरों को सामाजिक व्यभिचार बतलाया गया है, तो कहीं वेश्यागामी एवं व्यभिचारी व्यकितयों के द्वारा छुआछूत के विष को पैफलाने का प्रबल विरोध् किया गया है। ऐसे ही कहीं पैफशन के प्रति घोर चिढ़ प्रकट की गर्इ है, तो कहीं भिक्षा-वृत्ति की दूषित प्रथा का तीव्र विरोध् किया गया है। इतना ही नहीं, भêटजी ने स्त्राी-शिक्षा का समर्थन किया है, गृहस्थ-जीवन को महत्त्व प्रदान किया है और हिन्दू-मुसिलम एकता को समाज के लिए उपयोगी बतलाया है। हम इस तरह भêटजी ने समाज में पैफली हुर्इ विविध् कुरीतियों, कुप्रथाओं एवं कुसंस्कारों का विरोध् करते हुए समाज में नर्इ क्रानित, नर्इ चेतना एवं नर्इ जागृति लाने का प्रयत्न किया और अपने निबन्धें के द्वारा तत्कालीन समाज को क्रानितकारी विचार प्रदान किये। उनके श्रेष्ठ सामाजिक निबन्धें में से 'कोलीन्य, 'कौलीन्य और सदवृत, 'जात-पांत, 'हिन्दू-जाति का स्वाभाविक गुण, 'मानवी सम्पत्ति, 'तीर्थो की तीर्थता, 'कौम, 'हमारी ललनाओं की शोचनीय दशा, 'दान की जुदा-जुदा प्रणाली, भिक्षावृत्ति, 'सुगृहिणी, 'हिन्दुस्तान के रर्इस आदि निबन्ध् प्रसि( हैं। 

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                1. 'हिन्दी-प्रदीप पत्रिका से उधृत।

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(ख) राजनीतिक निबन्ध्-

इस वर्ग में भêटजी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें उन्होंने तत्कालीन राजनीति एवं शासननीति की कटु आलोचना करते हुए तत्कालीन शासन की दुहरी नीति का पर्दापफाश किया है या देशभकित को जगाने का प्रयास किया है अथवा विश्व-राजनीति पर अपने विचार प्रकट किये हैं। इन निबन्धें में कहीं तो व्यापार एवं नौकरशाही द्वारा अंग्रेजों की शोषण-प्रवृत्ति का स्पष्टीकरण किया गया है, कहीं उनकी कूटनीति एवं चरित्राहीनता का भंडापफोड़ किया गया है और कहीं उनकी उस पक्षपातपूर्ण नीति का चित्राण किया गया है, जिसके पफलस्वरूप अंंग्रेज भले ही कैसा ही अपराध् करे, किन्तु भारतीय न्यायध्ीश उसके मुकíमे नहीं सुन सकता था। इतना ही नहीं, इन निबन्धें में कहीं तो तत्कालीन शासकों द्वारा लगाये गये अनुचितकरों की घोर निंदा की गर्इ है, कहीं पुलिस की ज्यादतियों, उसके दमन एवं अत्याचारों तथा अनाचारों का प्रबल विरोध् किया गया है, कहीं उदर्ू के प्रति सरकार के पक्षपात का पर्दापफाश किया गया है, कहीं मुसलमानों के साथ अनुचित पक्षपात और हिन्दुओं के प्रति द्वेष का भंडापफोड़ किया गया है, कहीं तत्कालीन सरकार द्वारा हिन्दी की उपेक्षा होने के कारण अंग्रेजों की भाषा-विषयक नीति की कटु आलोचना की गर्इ है, कहीं तत्कालीन कठोर शासन-व्यवस्था से Ñषि की दुर्गति होनेऋ बड़े बन्दोबस्त, टैक्स, पुलिस आदि के कारण अत्यधिक परेशानी के बढ़ने आदि का चित्राण किया गया है, कहीं जमींदारों के दुष्कर्मों एवं अत्याचारों से संत्रास्त प्रजा की दुरवस्था का निरूपण किया गया है और कहीं तत्कालीन दुर्भिक्षों के कारण उत्पन्न प्रजा की दयनीय अवस्था में भी सरकारी अधिकारियों के गुलछर्रें उड़ाने का अत्यन्त मर्मघातक चित्राण किया गया है। इतना ही नहीं, तत्कालीन शासन की दोषपूर्ण नीतियों का पर्दापफाश करते हुए भटटजी ने अपने एक निबन्ध् में सरकार से यह मांग की है कि वह जनता को शस्त्रा रखने की अनुमति प्रदान करे, जिससे सरकार को उनकी सदैव रक्षा न करनी पड़े और प्रजा अपनी रक्षा अपने आप कर सके। भटटजी ने तत्कालीन सरकार की घोर निन्दा करते हुए अत्यन्त कटु आलोचना की है और उनकी बेर्इमानी, भ्रष्टाचारपूर्ण मनोवृत्ति एवं प्रवचना पूर्ण नीति का खुलकर विरोध् किया है। साथ ही, आपने राजभकित और देशभकित का निरूपण करते हुए देशभकित को अपनाने की सलाह दी है। और हिन्दू-मुसिलम एकता पर विशेष बल दिया है। भटटजी ने अपने राजनीतिक निबन्धें में सरकारी पिटठुओं की

अत्यधिक भत्र्सना की है और उन्हें देश का कटटर शत्राु बतलाया है, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की प्रेरणा प्रदान की है और स्वाध्ीनता के लिए लड़ने वाले देशों के प्रति सहानुभूति प्रकट की है।1 इस तरह भटटजी के राजनीतिक निबन्ध् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं, जो उनकी निडरता एवं निर्भीकता के धोतक हैं तथा उनके राष्ट्रीय एवं राजनीतिक विचारों से ओत-प्रोत हैं। भटटजी ने केवल भारतीय राजनीति पर ही अपने विचार व्यक्त नहीं किये थे, अपितु उन्होंने इंग्लैण्ड और आयरलैण्ड के पारस्परिक सम्बन्धें पर लेखनी चलार्इ, अपफगानिस्तान और इंग्लैंड के सम्बन्धें पर विचार प्रकट किये और रोम और रूस के यु( पर भी अपना मत प्रकट किया। इसके अतिरिक्त भटजी ने बरमा के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए अंग्रेजों की उस कूटनीति एवं षडयंत्रा की कटु आलोचना की, जिसके पफलस्वरूप वे वरमा को अंग्रेजी राज्य में मिलाना चाहते थे।2 इस प्रकार भटटजी ने अपने राजनीतिक निबन्धें में ऐसे स्वस्थ एवं निष्पक्ष विचार व्यक्त किये हैं, जो उनकी निर्भय मनोवृत्ति के सूचक हैं और देशभकित एवं राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ उनके मानवतावादी दृषिटकोण के परिचायक हैं। ऐसे निबन्धें में से 'हाकिम और उनकी हिकमत, 'भेदभाव नीति, 'पशिचमोत्तर के विधा-विभाग में अन्ध-ध्ुन्ध्, 'अखंड कीर्ति और अचल यश बड़े भाग से मिलता है, 'कर्षकों का अश्रुपात, 'सरकारी दफ्रतरों में नौकरी, 'सरकार पर अपार भार, 'हमीं सबसे बुरे हंै, 'जातियों का अनूठापन, 'रूस की तैयारी, 'दुर्भिक्ष दलित भारत, 'राजभकित और देशभकित, 'भारत का भावी परिणाम क्या होगा, 'लिबरलों के लिबरलपन की सब कलर्इ खुल गर्इ, 'Ñषि कार्य की दुर्गति 'इंग्लैंड की जर्जर दशा, 'सीमा रहस्य, 'व्यवस्था या कानून, 'प्रतिनिधि शासन आदि निबन्ध् विशेष उल्लेखनीय हैं।  

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                1-2. 'हिन्दी-प्रदीप पत्रिका से उधृत।         

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(3) साहितियक निबन्ध्-

इस वर्ग में भटटजी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें साहित्य, साहित्य-शास्त्रा, भाषा, अलंकार, नाटक, उपन्यास, रंगमंच, रचना-शैली, लोकोकित एवं मुहावरों आदि पर लेखक ने अपने स्वतन्त्रा एवं मौलिक चिन्तन-मनन से परिपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। इन निबन्धें की संख्या भी पर्याप्त है और इनमें विद्वान लेखक ने ग्रामीण भाषा, भाषाओं के परिवर्तनऋ हिन्दी, उदर्ू, संस्Ñत एवं भाषा परिष्कार सम्बन्ध्ी विचारों से लेकर साहित्य के विविध् पक्षों एवं विविध् विधओं पर अपने महत्त्वपूर्ण मत व्यक्त किये हैं, जिनका अनुशीलन करके हम भाषा और साहित्य की विविध् समस्याओं के समाधन प्राप्त कर सकते हैं और जो आज भी अत्यन्त उपयोगी हैं। इन निबन्धें में से 'साहित्य जन-समूह के âदय का विकास है, 'साहित्य जन-समाज के चित्त का चित्रापट है, 'सभ्यता और साहित्य, 'अनूठी उपमा, 'उपमा 'रसाभास, 'वाक्यालंकार, 'रूपक, 'पफारसी थियेटर, 'प्रतिभा, 'खड़ी बोली का पध, 'उपन्यास, 'उपयुक्त उपमा, 'हिन्दी की वर्तमान दशा, 'गुन आगरी नागरी, 'हमारी मातृ-भाषा, 'हमारी भाषा क्या है, 'भाषा कैसी होनी चाहिए, 'भारतवर्ष की जातीय भाषा, 'देशी भाषा और देशी अक्षर, 'भाषा कैसी होनी चाहिए, 'भारतवर्ष की जातीय भाषा, 'देशी भाषा और देशी अक्षर, 'शब्दों की बनावट, 'खड़ी और पड़ी बोली का विचार, 'उपयुक्त विशेषण, 'उपयुक्त क्रिया, 'हिन्दी, 'संस्Ñति की वर्तमान अवस्था, 'हिन्दी की पुकार, 'लोकोकित तथा सूकितयाँ, 'मुहावरे लोकोकित, 'शब्द-परिचय, 'उपयुक्त विशेषण और विशेष्य आदि साहितियक निबन्ध् उल्लेखनीय हैं।

(4) अन्य विषयक निबन्ध्-

यह वर्ग भी अत्यन्त विस्तृत एवं विशाल है और इस वर्ग में भटटजी के भी निबन्ध् आते हैं, जो मनोविज्ञान, देश-सेवा, भकित, ज्ञान, चरित्रा, भोजन, नारी-भावना, सूदखोरी, गृहस्थ-जीवन, राजा, प्रजा, जाति, Ñषि, Ñषक, ग्राम्य-जीवन, वाणिज्य, शिक्षा, सुशिक्षित, पर्व, जात-पाँत, व्यंग्य एवं हास-परिहास आदि विविध् विषयों से सम्बनिध्त हंै और जिनमें भटटजी की विचारगत नूतनता एवं शैलीगत विविध्ता के भी दर्शन होते हैं। इन निबन्धें में से 'मनोविज्ञान, 'अभिलाषा 'मन की दृढ़ता, 'ध्ैर्य, 'मन और प्राण, 'हमारे मन की मध्ुप वृत्ति, 'मनुष्य की बाहरी आÑति मन की एक प्रतिÑति है, 'चरित्रापालन, 'मुकित और भकित, 'ज्ञान और भकित, 'लोक एषणा, 'कत्र्तव्य-परायणता, 'देश-सेवा का महत्त्व, 'राजा और प्रजा, 'बाल्य विवाह, 'महिला स्वातंत्रय, 'सुगृहिणी, 'सित्रायाँ और उनकी शिक्षा 'हमारी भारत ललनायें, 'परिवार की एकान्त भोजन की कुप्रथा, 'मांस-भक्षण, 'सूदखोरी, 'हमारा दास्य भाव, 'हिन्दूजाति का स्वाभाविक गुण, 'ग्राम्य जीवन, 'स्वतन्त्रा वाणिज्य, 'Ñषकों की दुरवस्था, 'Ñषि की कर्षित दशा, 'अंग्रेजी शिक्षा और प्रकाश, 'हिन्दुस्तान में तालीम का नपफा-नुकसान, 'हमारे नये सुशिक्षितों में परिवर्तन, 'पत्नीस्तव, 'वध्ूस्तव, 'ढोल के भीतर पोल, 'हुक्कास्तवन, 'खलवंदना, 'लक्ष्मी, 'वकील, 'नाक, 'कान, 'आँख, 'घर, 'दर्पण, 'नाम, 'बात, 'खलवंदना, 'गदहे का गदहापन क्या है, 'चित्त और चक्षु का घनिष्ठ सम्बन्ध्, 'यह जगत एक अदभुत नाटयशाला है, 'र्इश्वर भी क्या रूठोल है, 'देवताओं से हमारी बातचीत, 'नर्इ वस्तु की खोज, 'होता आया है, 'लौ लगी रहे आदि उल्लेखनीय हैं।

(2) रचना-शैली की दृषिट से भटटजी के निबन्धें को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(क) विचारातमक (ख) आलोचनात्मक, (ग) भावात्मक, (घ) वर्णनात्मक और (Ä) विवरणात्मक।

(क) विचारात्मक निबन्ध्-इस कोटि में भटटजी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें तर्क का अधिक सहारा लिया गया है और जिनमें बु(ि-तत्त्व की प्रधनता है। ऐसे निबन्धें को मसितष्क की वस्तु माना जाता है।1 आचार्य शुक्ल का विचार है कि ''शु( विचारात्मक निबन्धें का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है, जहाँ एक-एक पैराग्रापफ में विचार दबा-दबा कर ठूँसे गये हों और एक-एक वाक्य किसी सम्ब( विचार-खंड को लिए हो।2 भटटजी के विचारात्मक निबन्धें में उनके मौलिक स्वतन्त्रा विचार तर्कपूर्ण प(ति में अभिव्यकित हुए हैं और ये निबन्ध् उनकी डर एवं निर्भीक मनोवृत्ति, देशभकित, समाज-सुधर की भावना, भाषा-प्रेम, विषय-वर्गीकरण की प्रवृत्ति, तर्क-प(ति, समसामयिक समस्याओं के प्रति जागरूकता, राष्ट्रीयता, भाषा-परिष्कार एवं भाषा-निर्माण के प्रति तत्परता आदि के परिचायक हैं।

   भटटजी के विचारात्मक निबन्धें की ही संख्या सर्वाधिक है। इनमें से 'चारु-चरित्रा, 'चरित्रा-पालन, 'कत्र्तव्य-परायणता, 'सुख क्या है, 'कौलीन्य, 'देश-सेवा, 'महत्त्व, 'मनुष्य और वनस्पतियों में समानता, 'प्रतिभा, 'आत्मनिर्भरता, 'भारतवर्ष की जातीय भाषा, 'साहित्य जन-समूह के âदय का विकास है, 'हिन्दी की वर्तमान दशा, 'सभ्यता और साहित्य, 'हिन्दी का अपमान, 'भाषा कैसी होनी चाहिए, 'हिन्दी की वर्तमान दशा, 'हमारी मातृभाषा, 'अंग्रेजी शिक्षा और प्रकार, 'आध्ुनिक वैज्ञानिकों से प्राचीन आर्यों तक, 'Ñषकों की दुरवस्था, 'बोध्, मनोयोग और मुकित, 'दृढ़ संकल्प या सिथर अèयवसाय आदि।

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1. सि(ान्त और अèययन-काव्य के रूप, ले. गुलाबराय, पृ. 228

2. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 509                  

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(ख) आलोचनात्मक निबन्ध्-इस कोटि में भटटजी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें लेखक ने विविध् रचनाओं की तत्त्वान्वेषिणी आलोचना की है तथा जिनमें किसी रचना के गुण-दोषों का विवेचन किया है। वैसे आलोचना की कर्इ प(तियाँ हैं, किन्तु उन सभी प(तियों को दो भागों में विभाजित किया जाता है-प्रथम सै(ानितक आलोचना-प(ति में अपनी बु(ि, मनीषा और प्रतिभा के आधर पर आलोचना, के लिए सि(ान्तों की स्थापना करना और उनके

आधर पर Ñतियों की समीक्षा करना आता है और दूसरी प्रयोगात्मक आलोचना-प(ति में शास्त्राीय आलोचना, व्याख्यात्मक आलोचना, निर्णयात्मक आलोचना, तुलनात्मक आलोचना, ऐतिहासिक आलोचना, मनोवैज्ञानिक आलोचना, स्वतन्त्रा एवं वैयकितक आलोचना, ऐतिहासिक आलोचना, प्रभाववादी आलोचना आदि अनेक प(तियाँ आती हैं। भटटजी ने स्वतन्त्रा रूप से आलोचनात्मक निबन्ध् तो बहुत कम लिखे हैं, किन्तु 'हिन्दी प्रदीप में आलोचनात्मक टिप्पणियाँ अधिक लिखी हंै, जो उनके आलोचनात्मक निबन्ध्कार के रूप को प्रकट करती हैं। इनमें से चन्द्रहास तथा सबसे गुरु गोवर्(न दास के अभिनय की आलोचना, लाला श्री निवासदास Ñत रणध्ीर प्रेम मोहिनी नाटक, नाटकाभिनय, शमशाद सौशन नाटक, नीलदेवी, परीक्षागुरु, मुद्राराक्षस, नेक सलाह, सच्ची समालोचना संयोगिता स्वयंवर की, एकान्तवासी योगी, बंग विजेता, हिन्दी कालिदास की आलोचना, नैषध्चरित चर्चा पर सुदर्शन का दंश, रामलीला नाटक मंडली आदि भटटजी के आलोचनात्मक निबन्ध् प्रसि( हैं।

(ग) भावात्मक निबन्ध्-इस कोटि में भटट जी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें रागात्मक तत्त्व की प्रधनता है, जिनका सम्बन्ध् लेखक की बु(ि से अधिक न होकर âदय से अधिक है और जिनमें हास्य एवं विनोद के साथ-साथ व्यंग्य का अधिक सहारा लिया गया है। भावात्मक निबन्ध् प्राय: दो शैलियों में लिखे जाते हैं-धरा-शैली और विक्षेप-शैली। धरा-शैली में भावों की धरा प्रवाहमयी होकर प्राय: एक गति से ही चलती है, जबकि विक्षेप शैली में यह भाव-धरा कहीं तीव्र, कहीं मंद, कहीं उन्नत, कहीं अवनत, कहीं सम और कहीं विषम रहती है। भटटजी के इन निबन्धें में शब्द की रंगीनी पर अधिक èयान दिया गया है और सभी ओर से विविध् रंगों के शब्दों, मुहावरों, कहावतों और उदाहरणों को लेकर इन्हें सुसजिजत किया गया है। इनके भावात्मक निबन्ध् अत्यन्त रोचक एवं आकर्षक हंै, जिनमें हास-परिहास के साथ-साथ चुटीला व्यंग्य है और शब्द-चमत्कार के साथ आलंकारिक सौन्दर्य भी विधमान है। भटट जी के भावात्मक निबन्धें में 'आँसू, 'मुग्ध्माध्ुरी, 'प्रेम के बाग का सैलानी, 'हमारे मन की मध्ुप वृत्ति, 'कल्पना, 'माध्ुर्य, 'चलन, 'आज्ञा, 'माता का स्नेह, 'पत्नीस्तव, 'वध्ूस्तवराज, 'हुक्कास्तवन, 'कौआपरी और आशिक तन, 'चलन, 'दंभाख्यान, 'हाकिम और हिकमत, 'पंचमहाराज और मिडिल क्लास परीक्षा, 'कटटर सूम की एक नकल, 'हाकिम, 'चलता है, 'नाम में नयी कल्पना आदि उल्लेखनीय हैं।

(घ) वर्णनात्मक निबन्ध्-इस कोटि में भटटजी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें किसी वस्तु को सिथर रूप में देखकर उसका वर्णन किया गया है। ऐसे निबन्धें का सम्बन्ध् प्राय: देश से ही होता है। भटटजी ने वर्णनात्मक निबन्ध् अत्यल्प संख्या में लिखे हैं। इनके वर्णनात्मक निबन्धें में से 'चन्द्रोदय उल्लेखनीय है, जिसमें किलष्ट कल्पना एवं पांडित्य-प्रदर्शन का प्राधन्य है और जो गध-कल्पना का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक द्वारा उत्प्रेक्षा एवं सन्देह अलंकारों का सहारा लेकर चन्द्रमा के बारे में विविध् प्रकार की संभावनाएँ की गर्इ हैंऋ जैसे-''क्षपातमस्कांड को हटाने वाला यह चन्द्रमा ऐसा मालूम होता है मानो आकाश महासरोवर में श्वेत कमल खिल रहा है, उसमें बीच-बीच में जो कलंक की कालिमा है, सो मानो भौंरे गूँज रहे हैं अथवा सौन्दर्य की अधिष्ठातृ देवी लक्ष्मी के स्नान करने की यह बावड़ी है या कामदेव की कामिनी रीति का यह चूना पोता ध्वलगृह है।1 आदि।

(Ä) विवरणात्मक निबन्ध्-इस कोटि में भटटजी के वे निबन्ध् आते हैं, जिनमें लेखक ने स्वप्नकथा, आत्मकथा या जीवनी के माèयम से किसी वस्तु या व्यकित के गतिशील रूप को अंकित किया है। वर्णनात्मक

निबन्धें का सम्बन्ध् जहाँ देश से होता है, वहाँ विवरणात्मक निबन्ध् काल से सम्बनिध्त होते हैं और इनमें वस्तुओं की गत्यात्मक सिथति तथा व्यकितयों के साहसपूर्ण एवं उल्लेखनीय कार्यों के विवरण प्रस्तुत किए जाते हैं। भटटजी ने विवरणात्मक निबन्ध् भी कम लिखे हैं, इनमें से 'शंकराचार्य, 'नानक, एक अशपर्फी का आत्मवृत्तान्त, 'कटटर सूम की नकल, 'पढ़े-लिखे बेकार की नकल, साहितियक स्वप्न आदि उल्लेखनीय हैं।

इस प्रकार भटटजी के निबन्धें का वर्गीकरण एवं विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि उन्होंने साहितियक, राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक आदि अनेक विषयों पर सुन्दर एवं सजीव निबन्धें की रचना की है। भटटजी के निबन्धें में उनके व्यकितत्व की पूर्ण छाप विधमान है। इन निबन्धें की विचारधरा पर समसामयिक घटनाओं का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। इसी कारण इनका झुकाव कभी सामान्य उपदेशात्मकता की ओर रहा है, तो कभी व्यकितगत आत्मव्यंजना की ओर। इनमें से अधिकांश निबन्धें को वैयकितक कोटि के निबन्ध् कहा जा सकता है, क्योंकि इन पर सर्वत्रा भटटजी की वैयकितकता का प्रभाव दृषिटगोचर होता है। भटटजी के भावात्मक निबन्ध् भी अत्यन्त प्रभावोत्पादक हैं और भटटजी को जहाँ वैयकितक निबन्धें का प्रवर्तक कहा जा सकता है, वहाँ उन्हें अपने युग का एक श्रेष्ठ भावात्मक निबन्ध्कार भी माना जा सकता है।

भटटजी के निबन्धें को तात्तिवक समीक्षा

निबन्ध् एक ऐसी साहितियक विध है, जिसमें किसी एक विषय पर लेखक स्वतंत्रा रूप से विचार व्यक्त करता है, उसमें लेखक के निजी दृषिटकोण के साथ-साथ उसके आत्म-तत्त्व का प्रधन्य होता है, वह विषय का सूक्ष्म निरीक्षण करता हुआ अपना स्वतन्त्रा मत देता है एवं अपना निजी निष्कर्ष निकालता हैऋ उसमें आदि से अन्त तक विषय की एकसूत्राता, क्रमब(ता एवं प्रभावानिवति होती है और उसकी शैली सजीव, रोचक एवं प्रसाद-गुण-सम्पन्न होती है। इसलिए निबन्ध् से तात्पर्य एक ऐसी गधमयी रचना से है, जिसमें किसी एक विषय पर स्वानुभूति एवं वैयकिकता के साथ स्वच्छन्द एवं सजीव विचारों को सीमित आकार में अभिव्यक्त किया जाता है। निबन्ध् के तत्त्वों के बारे में विद्वानों में बड़ा मतभेद पाया जाता है। डा. दशरथ ओझा ने निबन्ध् के छ: तत्त्व स्वीकार किए हैं-

(1) गध-रचना,

(2) लेखक का व्यकितत्व,

(3) विचारों की एकसूत्राता,

(4) सहज रोचकता,

(5) भावों का पुट और

(6) औपचारिकता का अभाव।2

श्री दानबहादुर पाठक के निबन्ध् के सात तत्त्व स्वीकार किए हैं-

(1) निबन्ध्कार का व्यकितत्व,

(2) विषय-स्वतन्त्राता,

(3) आकारलघुता और सूक्ष्म-निरीक्षण शकित

(4) विचारों की स्वाध्ीनता तथा अनेकता में एकता या एकसूत्राता,

(5) निजी अनुभूति का प्रकाशन,

(6) भावप्रवणता एवं सजीव भाषा-शैली और

(7) सहज प्रभावोत्पादकता।3

कुछ विद्वान निबन्ध् के तीन तत्त्व ही स्वीकार करते हैं-

(1) सरलता,

(2) सुबोध्ता और

(3) प्रसादगुण युक्त व्याख्या।4

परन्तु इन सभी तत्त्वों का अनुशीलन करने पर यही ज्ञात होता है कि ये तत्त्व नहीं, अपितु निबन्ध् की विशेषताएं हैं, जिनको भिन्न-भिन्न प्रकार से तत्त्व कह कर अभिव्यक्त किया गया है। तत्त्वों से तात्पर्य तो उन मूलभूत उपकरणों से होता है, जिनसे किसी का निर्माण होता है और जिनके बिना उसका असितत्व सर्वथा असम्भव होता है। इस दृषिट से निबन्ध् के पाँच तत्त्व सि( होते हैं-

(1) बु(ि-तत्त्व,

(2) अनुभूति तत्त्व,

(3) कल्पना तत्त्व,

(4) अहं तत्त्व और

(5) शैली तत्त्व।

इन्हीं तत्त्वों के आधर पर पं. बालÑष्ण भटट के निबन्धें का विवेचन किया जायेगा।           

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1. हिन्दी-प्रदीप, अक्तूबर से दिसम्बर 1889, पृ. 291

2. समीक्षा-शास्त्रा-डा. दशरथ ओझा।

3. साहित्य-संदेश-निबन्ध् विशेषांक, अगस्त 1991, पृ. 59-60 ।

4. साहित्य-शास्त्रा-सरोजिनी मिश्रा, पृ. 355 ।         

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(1) बु(ि-तत्त्व-निबंध् में बु(ि-तत्त्व से तात्पर्य उस विचार-शकित से है, जो एक निबन्ध्कार को चिन्तन-मनन की ओर अग्रसर करती हुर्इ उसे किसी एक विषय पर विविध् दृषिटयों से सोचने के लिए प्रेरित करती है, जिसके द्वारा भावों एवं विचारों का समावेश किया जाता है और जिसके पफलस्वरूप कोर्इ निबन्ध् राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक, धर्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहितियक आदि रूप ग्रहण किया करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भटटजी के निबंधें में बु(ि-तत्त्व पर्याप्त मात्राा में विधमान है। इसी बु(ि-तत्त्व के कारण भटटजी के राजनीतिक निबन्धें में तत्कालीन शासकों की कटु से कटु आलोचना अत्यन्त व्यंग्यपूर्ण शैली में की गर्इ है-

''हे शुभयो ! आप राजराजेश्वरी के महापार्षद हो ! खाँबहादुर, रायबहादुर आदि उपाधि आपकी सेवा परिचर्या का सध: पफल और आपकी हिकमत अमली का परिणाम है। हे सकल सामन्त चक्रवर्तिन! अनेक दोष दूषित भी आपकी कारगुजारी को क्या ताकत कोर्इ दूष सके। आपके प्रबन्ध् को बुरा कहना गवर्नमेण्ट का विरोध्ी हो जाना है।

.....हे महाभाग! तुम प्रत्यक्ष देवता हो। देवगण जैसा देवाÄõनाओं को साथ लिए स्वच्छन्द क्रीड़ा-विहार किया करते हैं वैसा ही तुम भी प्रजा का ध्न और प्राण अपनी मूठी में कर विमान सदृश स्वच्छ पिफटिन पर लोंडियों को अपने पास बैठाये विमल गगन-पथ समान ठंडी सड़कों में स्वच्छ समीर का सेवन करते हुए विचरते हो।1

इसी बु(ि-तत्त्व की प्रबलता के कारण भटटजी ने अपने 'त्रिदेव कल्पना नामक निबन्ध् में राम, रावण, सीता, बलदेव एवं कल्की सम्बन्ध्ी मौलिक विचार व्यक्त किए हंै और लिखा है कि ''जब कोर्इ क्रोध्ी कामी राजा रावण अर्थात प्रजा को रुलाने वाला बनता है और सीता अर्थात खेती की लांगल प(ति या हल रेखा की अपफीम और नील आदि की खेती से स्ववश या कैद में डाल Ñषि को कर्षित और Ñष (दुर्बल) कर देता है, उस समय अन्न भगवान सीता अर्थात Ñषि-प(ति की मुकित के लिए रावण (रुलाने वाले) राजा और उसके साथ Ñषि-साहित्य-विनाशियों को दंड दे, पफल-पूफल जोजियों की सहायता से अपनी Ñषि-प(ति-रेखा को स्वतंत्रा कर सम्पूर्ण प्रजा के चित्त में रम जाते हैं, उस अवस्था में अन्न देव का नाम 'राम होता है। हल द्वारा Ñषि का सब कार्य होता है तब हली 'बलदेवजी अन्न को कहना ही उचित है। अन्न भगवान अपनी रक्षा से सृषिट की पूर्ण रक्षा समझ दया का विस्तार करते हैं और जीव-हिंसा को रोकते हैं। उस समय बु(ि के अनुकूल काम करने से बौ( कहलाते हैं, पर जब उनका कहा कोर्इ नहीं मानताऋ अन्न विष्णु की लक्ष्मी मानुषी सृषिट की परम उपकारिणी गौओं का संहार अधिक बढ़ जाता है, तब अन्नदेव गुप्त हो जाते हैं, दैवी शकित से समुत्पन्न सुध रूप विकराल तलवार समस्त गोभक्षियों का संहार कर देती है, तब अन्नदेव का नाम 'कल्की पड़ता है। ऐसे दशावतारी Ñष्ण के लिए नमस्कार है।2

भटटजी के अधिकांश निबन्ध् चिन्तन-मनन से परिपूर्ण है। उनके चिन्तन एवं मनन की प(ति अत्यन्त मौलिक है और वे किसी भी विषय पर बड़ी गहरार्इ के साथ विचार करते हुए उसकी तह तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। उनके 'आत्मगौरव निबन्ध् में इसी चिन्तन-प(ति को देखा जा सकता है, जिसमें बु(ि-तत्त्व का प्रखर रूप विधमान है। आप लिखते हैं कि ''आत्मगौरव एक प्रकार का साध्न है जिसे बनाये रखना सहज काम नहीं है। यावत बुराइयों से अपने को अलग रख सकें, तब आत्म-गौरव पाने का दावा कर सकता है। अपने आत्मगौरव का निर्बाह करने वाला मैला काम प्राण निकलने की दशा पर भी करने में सकुचायगा। अपनी बड़ी से बड़ी हानि सह लेगा, पर उचित बात से न हटेगा। बेर्इमानी के अपवाद से बचने को लेन-देन में सापफ रहेगा। वित्त से बाहर कोर्इ काम न करेगा, ऊपरी बनावट और जाहिरदारी को जहर के समान बरकावेगा। पक्षपात का लेश भी अपने में न होने देगा। हमारी बात कदाचित झूठ न निकले इसलिए बिना सोचे-समझे एक शब्द भी मुँह से न निकलेगा। सारांश यह है कि आत्मगौरव चरित्रा-संशोध्न की पहिली सीढ़ी है। ...भलमन-साहत की कसौटी है। स्वर्गद्वार की सोपान परम्परा है। हम सबों के जीवन का उत्तम परिणाम है। सीध्े और सरल मार्ग पर बेखटके चलने वाले संसार-चक्र की ध्ुरी है।1  

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 1. भटट-निबन्ध्-माला, प्रथम भाग पृ. 135-136

2. भटट-निबन्ध्-माला, प्रथम भाग, पृ. 15-16

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भटटजी के विचारों में निर्भीकता एवं स्पष्टवादिता लाने में भी बु(ि-तत्त्व का बड़ा हाथ रहा है। उनके 'जातपाँत निबंध् में उनकी स्पष्टवादिता के दर्शन होते हैं, जहाँ वेे लिखते हैं कि ''जैसा बेहूदा तरीका बिरादरी का इस समय प्रचलित है, उससे कभी आशा नहीं की जा सकती कि जाति-पाँति के सत्यानाश बिना हुए उन्नति की हषार-हषार चेष्टा करने पर भी हमारी या हमारे देश की कभी तरक्की होगी। स्वाध्ीनता की नाक काटने वाली इस जाति-पांति की कुरीति देख यही मन में आता है कि हे परमेश्वर हमने कौन-सा पाप किया था जिसका पफल भोगने को ऐसी कुलच्छनी समाज में तूने हमें पैदा कर दिया। हमारे एक प्रेमी मित्रा का कथन है कि (यदि हिन्दू-शास्त्रा सच है और हिन्दू-शास्त्रा के अनुसार पुनर्जन्म भी सच है तो अब दूसरा जन्म हमारा हबश ऐसे कुदेश में या सहारा के रेगिस्तान में हो, पर इस भारत सरीखी पाप भूमि में हम कभी न जन्मैं), सो यह बात सहज मज़ाक की नहीं, किन्तु समझदार के लिए वास्तव में ऐसी ही चुभती है। नासमझ बेहया की कौन जिसे भला-बुरा सब एक-सा है।2

इतना ही नहीं, भटटजी ने जहाँ अपने निबन्धें में समाज-सुधर की बातें की हैं, संयुक्त परिवार के दोषों का निरूपण किया है, तीर्थों को प्रजाभक्षक दरिन्दों की माँद बतलाया है, बाल-विवाह का विरोध् किया है, विध्वा-विवाह का समर्थन किया है, परदा-प्रथा को कलंक बतलाया है,3 हिन्दी-भाषा को विविध् भाषाओं की शब्दावली से विभूषित करने का सुझाव दिया है,4 उदर्ू भाषा का पृथक असितत्व स्वीकार न करके उसे हिन्दी का ही रूपान्तर माना है, वैदिक साहित्य एवं परवर्ती साहित्य के अन्तर को स्पष्ट किया है, लोक-कविता तथा साहितियक कविता की तुलना की है, पारसी थियेटर कम्पनियों की कटु आलोचना की है अथवा उपन्यासों के बारे में अपने गहन विचार व्यक्त किये हैं,5 वहाँ सर्वत्रा भटटजी के निबंधें में बु(ि-तत्त्व की प्रबलता के दर्शन होते हैं। इसी बु(ि-तत्त्व के कारण भटटजी के निबंधें में तर्कशीलता, स्पष्टवादिता, जिन्दादिली, निर्भीकता, भाव-व्यंजकता, प्रखरता, सजीवता, स्वच्छन्दता, चटपटेपन के साथ पौषिटकता, चमत्कारप्रियता, यथार्थता, उग्रता एवं सशक्ता के दर्शन होते हैं।

(2) अनुभूति-तत्त्व-निबन्धें में प्रौढ़ता, गुरुता एवं गम्भीरता के साथ-साथ परिपुष्टता लाने का श्रेय अनुभूति-तत्त्व को है, क्योंकि जिस लेखक की अनुभूति जितनी गहन होती है, उसकी रचना भी उतनी ही गौरवमयी होती है। इस अनुभूति का सम्बन्ध् जीवन और जगत से होता है, क्योंकि जीवन के विविध् क्रिया-व्यापार जीवन की विभिन्न परिसिथतियाँ, विविध् उतार-चढ़ाव, नाना प्रकार के परिवर्तन आदि के साथ-साथ जब कोर्इ लेखक जगत के अंतर्गत भी विविध् उत्थान-पतन, ßास-विकास हर्ष-शोक, सृषिट-संहार, सदाचार-दुराचार, सत-असत व्यवहार आदि को देखता है, तब उसकी अनुभूति प्रौढ़ एवं परिपक्व होती जाती है और वह अपनी Ñतियों में उसके द्वारा अधिकाधिक प्रौढ़ता, परिपक्वता एवं गहनता लाने का प्रयास किया करता है। भटटजी की अनुभूति भी बड़ी प्रौढ़ एवं परिपक्व थी। वे खुली आँखों से जीवन और जगत की गतिविधियों का निरीक्षण एवं परीक्षण करते थे। वे वर्तमान के आधर पर भविष्य का परिणाम भी सोचा करते थे। उनके निबन्धें में जो आज विषयों की विविध्ता के दर्शन होते हैं, इसका सबसे बड़ा कारण ही उनकी अनुभूति की विशालता, प्रौढ़ता एवं सजीवता है, क्योंकि उन्होंने जहाँ राजनीतिक गतिविधियों के कारण देश की असहाय एवं दीन-हीन दशा की ओर संकेत किए हैं, वहाँ उसकी अनुभूति अत्यधिक मुखर हो उठी है और वे भारत के किसानों की दीन-हीन एवं दयनीय अवस्था की ओर संकेत करते हुए 'Ñषकों का अश्रुपात निबन्ध् में पुकार उठे हैं कि ''बड़े संताप और दु:ख की बात है कि प्रजा-समूह में सबसे अधिक दीन-दुखिया और Ñपापात्रा  

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1. वही, दूसरा भाग, पृ. 27

2. भटट निबन्ध्-माला, दूसरा भाग, पृ. 47-48

3. हिन्दी-प्रदीप से उधृत

4. मर्यादा, सितम्बर, 1911, पृ. 224 से 230

5. हिन्दी-प्रदीप से उधृत     

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     Ñषकों का अश्रुपात, जिसमें किसी प्रकार की चिल्लाहट या कोर्इ दूसरे प्रकार की आहट है ही नहींऋ दूसरों की कौन कहे जिसे वे लोग दीन-दुखियों का मालिक और प्रत्यक्ष देवता समान मान दिन-रात जिसकी दुहार्इ मचाते रहते हैं, वह सरकार भी कभी कुछ नहीं देखती सुनती। हाँ! इससे अधिक क्लेश की और कौन बात होगी कि सीध्ी-

साध्ी सरल, भाव-सम्पन्न-Ñषक मण्डली पशुओं की भाँति अपना तन-मन-ध्न होम के मिटटी में मिला रही हैऋ ध्ूप, वर्षा और जाड़ा सहकर सब मास और )तु जगदुपकारी पदार्थ पैदा करती हैऋ चोकर, चना, भूसी, सागपात खाके जीती है और सब उत्तम पदार्थ देवान्न को बेच-बेच जमींदार का पेट और सरकार का खजाना भरती है। उसके अश्रुपात की धरा रोकने वाला कोर्इ नहीं है।

भटटजी की इस गहन अनुभूति को 'ध्र्म का महत्त्व नामक निबन्ध् में भी देखा जा सकता है, जहाँ वे हिन्दू-ध्र्म के मिथ्याडम्बर एवं मिथ्याभिमान पर प्रहार करते हुए ध्र्मान्ध्ता की छीछालेदार करते हैं और कहते हैं कि ''यह महत्त्व नहीं है बलिक इस बात की गवाही है कि हिन्दू की कौम कहाँ तक 'डिजेनेरेट पतित और नष्ट-भ्रष्ट हो गर्इ है कि त्रिदेव और पंचायतन पूजन की कौन कहे, शीतलता भवानी से लेकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी वाले मियाँ गांजी, मिया इमामहुसैन तक को पूजती है और पिफर भी अपने ध्र्म के महत्त्व के घमंड में हम पूफले नहीं समाते। सच मानिए जब तक इस नासमझी से हम अपना गला न छुटावेंगे। ऐसा क्लेश जैसा इस समय हम भुगत रहे हैं कोर्इ दूसरी कौम होती तो न जानिये क्या कर डालती, पर हम उसे भी सुख से झेलते जाते हैं। हर तरह की चपकुलिशों में पड़ काँख रहे हैं सही पर उस बँध्ी लकीर से बाहर न होंगे।1

भटटजी की यही गहन अनुमति उनके 'हमारी ललनाओं की शोचनीय दशा नामक निबन्ध् में भी विधमान है। जहाँ वे तत्कालीन नारी-समाज की दुर्दशा की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि ''अंगरेजी राज्य की महिमा से अंगरेजी नर्इ सभ्यता का असर हमारी कोर्इ ऐसी बात न बच रही जिस पर न पहुँचा हो। हमारे ख्याल, हमारी रहन-सहन, बोलचाल, नाशिस्त-बरखास्त के तरीके सबों में परिवर्तन पाया जाता है, किन्तु हमारी सित्रायों की दशा में कुछ अन्तर न हुआ। वे पचास वर्ष पहले जिस हालत में रहीं वैसी ही आज तक है। ..........बाल्यविवाह समाज की प्रचलित बुराइयों के हटाने के लिए हम हज़्ाार तदवीर सोचा करें, कभी सपफल मनोरथ न होंगे जब तक हमारी मूढ़ ललनाओं के मन में यह बात ध्ँसी हुर्इ है कि कन्या आठ वर्ष की बिन ब्याही बैठी रहेगी तो सात पुरखे नरक में जायेंगे अथवा शीतला भवानी को न पूजैगी तो लड़कों को शीतला भख लेंगी। .....बाहर हम कितनी ही तरक्की करें बड़े से बड़ा इमितहान पास कर उशना और वृहस्पति के प्रतिनिधि हो जायें, सित्रायों की दशा में जब तक परिवर्तन न होगा कुछ न हो सकेगा।2

इस प्रकार भटटजी के निबन्धें में जहाँ कहीं भी समसामयिक समस्याओं पर विचार व्यक्त हुए हैं अथवा तत्कालीन समाज की कुरीतियों एवं रूढि़यों पर प्रहार हुए हैं अथवा तत्कालीन सरकार की कूटनीतियों का परदापफाश हुआ है या भारतीय ध्र्म एवं संस्Ñति के विÑत अंश का स्पष्टीकरण हुआ है अथवा भारतीय साहित्य एवं भाषा पर मर्मस्पर्शी विचारों की अभिव्यकित हुर्इ है, सर्वत्रा लेखक की गहन एवं परिपक्व अनुभूति के दर्शन होते हैं। यही कारण है कि भटटजी के निबन्धें में अनुभूति तत्त्व भी अपनी गरिमा के साथ विधमान है।

(3) कल्पना-तत्त्व-लेखक के मन में किसी वस्तु या विषय का संशिलष्ट एवं समग्र रूप अंकित करने वाली उस शकित को कल्पना कहते हैं, जो जैसे विचार या भाव लेखक के âदय में उदभुत होते हैं, वैसे ही भावों एवं विचारों को रचना या Ñति में प्रदर्शित करती हुर्इ पाठकों के âदय-पटल पर भी उन्हें उसी रूप में अंकित कर देती है। कल्पना का प्रमुख कार्य है अप्रत्यक्ष या परोक्ष का प्रत्यक्षीकरण कराना अथवा अनुभूत पदार्थों, मनोवृत्तियों, भावों एवं विचारों के मानसिक चित्रा शब्दों के माèयम से कराना। कल्पवृक्ष की तरह कल्पना भी मनोवांछित पफल को देने वाली  होती है। यह लेखक के âदय में उपसिथत होकर नवनवोन्मेष में सहायक होती है और वह जिस क्षण जिस पदार्थ का अभिनिवेश अपनी रचना में करना चाहता है उसी क्षण ला उपसिथत करती है। यदि कोर्इ लेखक मत्र्यलोक में ही स्वर्ग के नन्दन-वन की अभिलाषा करता है, तो कल्पना उस नंदन-वन के अमिट सौन्दर्य का मानस प्रत्यक्ष करा देती है और यदि वह अपनी रचना में अगम्य, अगोचर एवं अलौकिक पदार्थों के अभिनिवेश की कामना करता है, तो कल्पना शीघ्र ही उन्हें उसके मनश्चक्षुओं के सम्मुख ला उपसिथत करती है। इस प्रकार कल्पना उन सभी पदार्थों, भावों, विचारों, अनुभूतियों एवं दृश्यों का मानस-प्रत्यक्ष कराने में सहायक होती है, जिन्हें लेखक अपनी Ñति में सजीवता एवं मार्मिकताओं के साथ अंकित करना चाहता है।    

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1. भटट-निबन्ध् माला, दूसरा भाग, पृ. 109

2. वही, पृ. 136-137                          

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भटटजी के विविध् निबन्धें का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि भटटजी ने भी कल्पना का अत्यधिक सहयोग प्राप्त किया है। वे एक ओर विविध् भावों एवं विचारों की दूरारूढ़ कल्पना करते हुए अपने निबन्धें को सरल सजीव एवं मार्मिक बनाने में सपफल रहे हैं, तो दूसरी ओर चटपटे एवं चुटीले व्यंग्य लिखने में कल्पना के बड़े )णी जान पड़ते हैं। अपने 'देवताओं से हमारी बातचीत नामक निबन्ध् में ही वे कल्पना के सहारे देवताओं के सम्मुख पहुँच जाते हैं और उस दृश्य का चित्रा अंकित करते हैं कि मुझे ऐसा मालूम हुआ कि पृथ्वी से आकाश गोलक बे-ओर-छोर लम्बी लाखों-करोड़ों डंडों की एक सीढ़ी लगी हुर्इ है, जिस पर से लाखों-करोड़ों देव-योनि कोर्इ श्यामवरण चतुभर्ुज, आकंठलमिबनी बनमाला और पीतपट पहने किरीट-मुकुट ध्रे कोर्इ कपर्ूर पुरोज्जवल शरीर सवाÄõ भस्मीदध्ूलित त्रिनेत्रा अक्ष और स्पफटिक की माला कण्ठ से पाँव तक धरण किये, सिर पर जटा और भालपटट में चन्द्रमा से सुशोभित था। कोर्इ ऊपर से उतरते हुए कोर्इ नीचे से ऊपर को चढ़ते हुए देख पड़े।1

भटटजी ने दृश्यों के निरूपण में ही कल्पना का योग नहीं लिया है, अपितु वे व्यंग्य लिखने में भी कल्पना का प्रयोग बड़ी तत्परता के साथ करते हैं। उनके 'पत्नी स्तव नामक निबन्ध् में उनके व्यंग्यपूर्ण विचार देखिए, जो कल्पना के कौशल को प्रकट कर रहे हैं-'हे महाराणी पत्नी तुम्हें नमस्कार है। तुम संसार का बन्ध्न महा जगडवाल की मूलाधर हो। एक बार विवाह कर तुम्हारे जाल में पँफस जाना चाहिए पिफर क्या सामर्थि कि इस छंदान को तोड़ कोर्इ कहीं भाग सके। ...हे पतिन! लोक और वेद दोनों तुम्हारी नमस्या और अपचिति में सावधन और प्रवण हैं। हे पतिन! तुम्हारे कोमल अंग-सौष्ठव का सम्पर्क, तुम्हारे अध्रामृत का पान, वाचारव कोकिलालाप, कूहू-नाद को तिरस्कार करने वाला तुम्हारे कोकिल-कंठ-निर्गत शब्दों को जिसने अपने कानों का अतिथि न किया उस लंडूरे का जीवन ही क्या? ...जिस घर में तुम अपना सौम्य रूप धरण किये हो वहाँ समग्र सम्पत्ति हँस रही है। जहाँ तुम्हारा विकट भयंकर अप्रचंड और उíण्ड रूप घर के एक-एक प्राणी को विकल किए है वहाँ दरिद्र का वास रुदन और क्रन्दन का सहकारी हो हाहाकार मचाये हुए है। और भी ''हे आदिरस की अधिष्ठात्राी! शूरवीर साहब लोग मुल्क के इनितजाम की चतुरार्इ में कहीं से नहीं चूकते, पर तुम्हारे समस्त नाज-नखरों पर अपना अधिकार जमाना तो दूर रहा एक साधरण गौन के इनितजाम में उनकी सब भूल जाती है, छोटभइये औसत दर्जे की तनख्वाह पाने पर भी सदा कर्जदार बने रहते हैं।2

भटटजी ने इसी कल्पना को आधर बनाकर 'चलन नामक निबन्ध् लिखा है, जिसमें चलन के विविध् रूपों की बड़ी ही मार्मिक कल्पना की है और लिखा है, कि ''चलन-बाजार न पैसा घाट न पैसा बाढ़, चोखा माल चोखा दाम, मोल तोल का क्या काम। ...चलन-हुँडी की, दरसनी देखते ही रुपया गिन दो नहीं दिवाला। ...चलन-भलमनसाहत की, बात के ध्नी। ...चलन-टुच्चों की, तुमसे तुम्हारी सी, उनसे उनकी सी। मुँह में राम-राम पेट में कसार्इ का काम ऐसा काटे कि लहर न आवै। ...चलन-कुलांगनाओं ...गंगा भी चाहती हैं कि सती, सावित्राी, कुलवती कब आकर हमारे में नहाय, हमें पवित्रा करेगी। ...चलन-व्यभिचारिणी कुलटाओं की ....र्इश्वर उनके पंफदे से बचावे। ...चलन-आजकल के अंग्रेजी पढ़ों की कि चाहे दस रुपये पर भी उन्हें कोर्इ न पूछे पर ठाठ बाट कमती न रहे।  

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1. भटट-निबन्ध्-माला, प्रथम भागऋ पृ. 10

2. भटट-निबन्ध् माला, प्रथम भाग, पृ. 27-28       

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       ...चलन-हमारे ना दिहन्द मुफ्रतखोरों की, बरसों तक पत्रा पढ़ते रहे दाम देने के समय निबुआ नौन। ...चलन-Ñपण कदर्य लोभियों की ...बात जाय, पत जाय, निन्दा हो, कहाँ तक कहैं, जान तक चली जाय बला से, ध्न पास का न जाये।1

भटटजी ने इसी कल्पना के सहारे बड़ी-बड़ी ऊँची उड़ानें भरी हैं और वे अपने 'एक अनोखे स्वप्न नामक निबन्ध् में इसी उड़ान का विवरण देते हुए लिखते हैं कि ''एक बारगी गहरी नींद ने मुझे ऐसा आ दबाया कि उसके अत्यन्त वश में हो यह अनोखा स्वप्न देखने लगा। मुझे जान पड़ा कि मैं एक ऐसे ऊँचे पर्वत के शिखर पर बैठा हूँ जहाँ पवन का भी गम्य नहीं है, मेव जिसकी ऊँचार्इ तक न पहुँच बीच ही में लटके रह जाते हैं। मैं इस बात के अचरज में हुआ कि हे परमेश्वर! मैं यहाँ कैसे आ पड़ा और अपने चारों ओर नज़र उठाय देखा तो सैकड़ों कोस के चौड़े मैदान लम्बी-लम्बी झीलें, बड़े-बड़े शहर जिनमें लाखों मनुष्य बसते हैं दिखार्इ दिये। ....एक ओर सभ्यता के छोर तक पहुँचे हुए राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार वैभवोन्माद में उन्मत्त अपने-अपने वित्त के अनुसार हर तरह का ठाठ ठाठे हुए पैफशनपरस्ती के पीछे परेशान, संसार के सुख की सीमा अपने ही में मानते हैं, एक ओर कंगाल किसान अपनी गरीबी के अभिमान में भूला हुआ थोड़े से खेत और पूफस की झोंपड़ी से संतुष्ट राजा-महाराजाओं की सम्पत्ति को भी तुच्छ कहता हुआ अपने को परम सुखी माने हुए है। ....इतने में एक स्त्राी न जाने कहाँ से आय मुझे अत्यन्त विनीत भाव से प्रणाम कर बोली-महाशय, कहिए आपने क्या देखा और सब देखभाल जो कुछ आपने निश्चय किया वह आपकी बड़ी भूल है। ये सब मेरे बड़े भक्त और अनुरागी हैं। इन्हें मैं अपना खिलौना बनाय जैसा चाहती हूँ वैसा खेल-खेला करती हूँ। नाम मेरा अविधा है-अशानित, स्वार्थपरता, निष्ठुरता, लोभ, मोह, बैर, पूफट इत्यादि कर्इ और भी मेरे भार्इ-बहन, सखी-सहेली हैं, जो सदा मेरे साथ रहती हैं। जहाँ मैं जाती हूँ वहाँ ये सब भी पहुँच अपना डेरा छोड़ देते हैं।2

इस प्रकार भटटजी ने कल्पना-तत्त्व का प्रयोग करते हुए अपने निबन्धें में न केवल विचारों की ऊँची-ऊँची उड़ानें भरी हैं, अपितु व्यंग्य का सहारा लेकर शिक्षा एवं उपदेश देने का भी प्रयत्न किया है। इतना ही नहीं, कल्पना-तत्त्व के समावेश से ही भटटजी के निबन्धें में सरसता, मार्मिकता, स्वाभाविकता, भावुकता, साहितियक लालित्य एवं चटपटापन आ गया है। इसी कारण उनके निबन्धें में जो रस है, मौलिक विवेचन है, अनूठी विचारशैली है, अनुपम व्यंग्य हैं या असाधरण रोचकता है, ये सब कल्पना-तत्त्व की ही देन हैं।

(4) अहं-तत्व-निबन्धें में वैयकितकता एवं व्यकितत्व-विशेषता का समावेश सदैव 'अहं-तत्त्व द्वारा ही होता है, क्योंकि यह अहं-तत्त्व निबन्धें में लेखक के व्यकितत्व का पुट देकर उन्हें अन्य निबन्ध्कारों की रचना से सर्वथा पृथक कर देता है। इसी कारण प्रत्येक निबन्ध्कार का व्यकितत्व उसके निबन्ध् में कहीं न कहीं अवश्य समाहित मिल जायेगा। यदि कोर्इ निबन्ध्कार गंभीर एवं चिन्तनशील है, तो उसके निबन्ध् भी गम्भीर विचारों एवं चिन्तनशील मनोवृत्ति के परिचायक होंगे। यदि कोर्इ निबन्ध्कार अत्यन्त भावुक एवं सâदय है, तो उसकी भावुकता एवं सâदयता की झलक उसके निबन्धें में भी मिल जायेगी। ऐसे ही यदि कोर्इ निबन्ध्कार अत्यन्त हँसमुख, विनोदप्रिय एवं मजाकिया है, तो उसके निबन्धें में भी उसकी यह मनोवृत्ति किसी न किसी स्थल पर अवश्य देखने को मिल जायेगी। यही कारण है कि प्रत्येक निबन्ध् में निबन्ध्कार का व्यकितत्व किसी-न-किसी अंश में समाहित रहता है और इसी को अहं-तत्त्व कहते हैं।

भटटजी के निबन्धें में भी इस 'अहं-तत्त्व के पर्याप्त दर्शन होते हैं। भटटजी अत्यन्त निर्भीक, निडर एवं स्वच्छंद मनोवृत्ति के लेखक थे। वे सच्चरित्रा एवं र्इमानदार होने के साथ-साथ स्वाभिमानी एवं ओजस्वी व्यकित थे। यही कारण है कि निर्भय होकर तत्कालीन शासकों की घोर निन्दा एवं भत्र्सना की तथा उनको झूठा, नीच बनिया और स्वार्थो से लेकर पापी एवं चरित्राहीन तक कह डाला। अंग्रेजों के पापाचरण एवं भ्रष्ट कार्यों का उल्लेख करत

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 1. वही, पृ. 63-68

2. भटट-निबन्ध् माला, प्रथम भाग, पृ. 89-92       

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    हुए आपने स्पष्ट लिखा कि ''ऐसी-ऐसी अनीति देख हम भी यही निष्कर्ष निकालते हैं कि भूखों के हाथ की रोटी छीन, दुखियों के तन के वस्त्रा उतार, लोगों के प्राण का रुधिर चूस सरकार रुपया उगाहेगी और उस रुपये से इंग्लैड की प्रबल जठरागिन को आहुति देगी। उस रुपये से अंग्रेज सिविलियनों और सिपाहियों को शराब पिलायी जायेगी। उस रुपये से हथियार खरीद सरकार अमीर काबुल को देगी कि अवसर पाय उसी से हमारा और अंग्रेजों का भी गला काटा जाय। उसी रुपये से ब्रह्राा के राजा को गíी से उतार, ब्रह्राा की निर्दोष प्रजा को सदा के लिए गुलाम बनायेगी।1 इतना ही नहीं, भटटजी ने यहाँ तक लिखा है कि ''क्या राजनीति या गूढ़ पालिटिक्स के यही माने हैं कि दया का कहीं लेश भी न रहने पाये। हिन्दुस्तान की करोड़ों दीन-प्रजा भूखों मरे और इंग्लैण्ड के पेट भरे लोग इन भुक्कड़ों की रोटी छीन गुलछर्रे उड़ावें।2

भटटजी अत्यन्त कोमल एवं सरल स्वभाव के व्यकित थे। वे बड़े ही निश्चल, उदार एवं विनम्र थे। उनकी उदारता, निश्छलता एवं विनम्रता उनके निबन्धें में विधमान हैं। इसी कारण वे हिन्दू-मुसलमानों की एकता पर बल देते हुए लिखते हैं कि ''थोड़े से लोगों के बहकाने में आय हमारे मुसलमान भार्इ हमसे रूंठ गये हैं उनमें जो सज्जन शरापफत की खुशबू से भरे भलमनसाहत के नगीने बने हैं, कुलीन जन है उनसे हमारा सविनय निवेदन है कि उन पर लक्ष्य कर, न हमने कभी कुछ लिखा है, न ऐसे सुपात्राों को कभी अपनी ओर से बिगाड़ा चाहें। हमारा लक्ष्य केवल उन्हीं पर है जो हम दीन-हीन हिन्दुओं को जब तब व्यर्थ की डाह परवेश हो हर तरह से क्लेश पहुँचाना चाहते हैं। इससे उन शरीपफों से हमारी विनती है कि वे नाराज न हों। इतना ही नहीं, आपने यहाँ तक लिखा है कि ''हम दोनों के बैरी यूरेशियन किरानी जब कभी हेटपुफल निगर कब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसके मानी से मुसलमानों को अलग नहीं छेक देते, पिफर जब कभी कोर्इ अत्याचार गर्वनमेंट के कर्मचारियों के हाथ से देश पर बन पड़ता है, तो दोनों ही कोमों को मुजिर होता है। इसलिए विचारशील हो इन सब बातों की ऊँची-नीच भली-भाँति तोलकर मुसलमानों को चाहिए कि हिन्दुओं के साथ वैर-भाव को सब सदा के लिए तलाक दे देना हर तरह पर मुनासिब समझें।

भटटजी में परदु:खकातरता एवं परोपकार की भावना भी कूट-कूट कर भरी हुर्इ थी। उन्हें भारत के दीन-हीन Ñषकों की दयनीय सिथति देखकर अत्यधिक दु:ख होता था और वे अपने निबन्धें के द्वारा तत्कालीन शासकों तक उनकी पुकार पहुँचाना चाहते थे, जिससे वे उन पर जुल्म न ढायें, उन्हें अधिक न सतायें और उनके साथ दया और सहानुभूति का व्यवहार करें। इसीलिए आपने जमींदारों एवं ताल्लुकेदारों के दुष्कर्मो एवं अत्याचारों की ओर संकेत किया कि ''ये जमींदार लोग जितने दुष्कर्म और अत्याचार के द्वारा प्रजा को पीड़ा देते हैं, उन सब दुखदायी कामों का लक्ष्य सरकार पर आरोपित कर खुलल्मखुल्ला यह कहते हैं कि हम क्या करें सरकार की ऐसी मर्जी है। ...जो बड़े-बड़े ताल्लुकेदार हैं उनके कुचरित्राों का तो कुछ कहना ही नहीं। साथ ही साथ आपने 'Ñषकों का अश्रुपात निबन्ध् में किसानों की दयनीय सिथति का विवरण इस तरह दिया-''बड़े संताप और दु:ख की बात है कि प्रजा समूह में सबसे अधिक दीन-दुखियों और Ñपामात्रा Ñषकों का अश्रुपात, जिसमें किसी प्रकार की चिल्लाहट या कोर्इ प्रकार की आहट है ही नहीं, दूसरों की कौन कहे जिसे वे दीन-दुखिया का मालिक और प्रत्यक्ष देवता समान मान दिन-रात जिसकी दुहार्इ मचाते रहते हैं वह सत्कार भी कभी कुछ नहीं देखती सुनती। हाँ ! इससे अधिक क्लेश की और कौन बात होगी कि जो सीध्ी-सादी सरल भाव सम्पन्न Ñषक-मंडली पशुओं की भाँति अपना तन, मन, ध्न होम की मिटटी में मिला रही है, ध्ूप, वर्षा और जाड़ा सहकर सब मास और )तु जगदुपकारी पदार्थ पैदा करती है, चोकर, चना, भूसी, सागपात खाके जीती है और सब उत्तम पदार्थ देवान्न को बेच-बेच जमींदार का पेट और सरकार का खजाना भरती है। उसके अश्रुपात की धरा रोकने वाला कोर्इ नहीं है।3    

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1. हिन्दी प्रदीप, मार्च 1886, पृ. 7-8

2. वही, जनवरी से मार्च 1891, पृ. 4

3. हिन्दी प्रदीप से उधृत     

भटटजी बड़े ही हँसमुख, विनोदी एवं हास्यप्रिय व्यकित थे। लोगों को उनकी गालियाँ भी सुहाती थीं और लोग प्राय: उनसे गाली सुनने के लिए उन्हें चिढ़ाया भी करते थे। उनके निबन्धें में उनके व्यकितत्व का यह अंश भी यत्रा-तत्रा मिल जाता है। उनके हास-परिहासपूर्ण विनोदी व्यकितत्व की छाप 'एक वृहत पाठशाला निबन्ध् में देखी जा सकती है। जहाँ वे लिखते हैं कि ''भारतवर्ष के दुदर्ैव ने एक बहुत बड़ी पाठशाला स्थापित की है, जिसमें ऐसी-ऐसी कला आदि की विधा विज्ञान और साइंस सिखाये जायेंगे जिनके द्वारा सर्वस्वापहरण तो कोर्इ बात ही नहीं है, वरन बाल की खाल खिंच सकती है और उस पाठशाले के महाशयों ने ऐसे-ऐसे यंत्रा निर्माण किए हैं कि जिनसे बालू में से भी तेल और मृगतृष्णा से भी जल निकल सकता है, तो मनुष्य की जीवनी नाड़ी का रस खिंचते कितनी देर। लम्बकूर्चक महामहोपाèयाय इसके प्रधनाèयापक नियुक्त हुए हैं ....मोहान्ध् निशा में इस पाठशाला की संस्था मिलेगी और वर्ष में दो बार यह पाठशाला खुलेगी। एप्रिल पूफल्स डे और ध्ुरेड़ी के दिन। जितने बंèया पुत्रा हैं, उनके चन्दे से यह पाठशाला खड़ी की गर्इ है। पफीस इसमें कुछ न लगेगी और जो परीक्षोत्तीर्ण होंगे, उन्हें परितोषिक में पुष्प का हार और शशाश्रृंग का बना ताज, पफजीलत की पगड़ी पहनायी जायेगी और ये ग्रन्थ पढ़ाये जायेंगे-वंचक, वृत्ति-रत्नाकर महाकाव्य, कुटिलकुवलयचनिद्रका व्याकरण, कराल कर-भार हारावली कोष, वाक-स्तम्भन महानिर्वाण तंत्रा और स्वार्थ निदान वैधक।1 इतना ही नहीं, भटटजी के 'हुक्कास्तवन, 'हाकिम, 'खलवंदना, 'बे, 'एक इंगलिसाइज्ड नये मित्रा की मुलाकात, 'वध्ूस्तव, 'पत्नीस्तव, 'वकील, 'कटटर सूम की एक नकल आदि ऐसे निबन्ध् हंै, जिनमें हास-परिहास के साथ व्यंग्य-विनोद भी पर्याप्त मात्राा में विधमान है।

इस प्रकार भटटजी के निबन्धें में 'अहं-तत्त्व ने उनके व्यकितत्व की विविध्ता को व्यक्त करने में पर्याप्त सहायता पहुंचायी है और इसी तत्त्व के पफलस्वरूप उनके निबन्धें में वैयकितता के साथ-साथ उनकी निर्भीकता, निश्छलता, परदु:खकातरता, सâदयता, वत्सलता, उग्रता, कत्र्तव्यपरायणता, राष्ट्रीयता, नम्रता, सरलता, तेजसिवता, निर्मलता, हास्यप्रियता आदि के भी दर्शन होते हैं।

(5) शैली-तत्त्व-इस तत्त्व के अन्तर्गत, निबन्ध्-रचना एवं विचारों की अभिव्यकित आती है। शैली-तत्त्व के द्वारा लेखक अपने निबन्ध् को अधिकाधिक रोचक, आकर्षक, मनोरंजक, प्रभावोत्पादक एवं भावप्रेषणीय बनाया करता है। इसके लिए एक निबन्ध्कार अपने विचारों के अनुकूल उत्Ñष्ट एवं सजीव भाषा का प्रयोग करता हैऋ व्यंग्य, रस, èवनि एवं अलंकारों के द्वारा चमत्कार की सृषिट करता है और शैली के अन्यान्य उपकरणों द्वारा अपनी अभिव्यकित को मौलिक, स्वच्छंद एवं प्रभावोत्पादक बनाया करता है। भटटजी के निबन्धें में भी शैली-तत्त्व अपनी गुरुता एवं महत्ता के साथ विधमान है, जिनका विस्तार के साथ आगे चलकर विवेचन किया जायेगा। यहां इतना ही पर्याप्त है कि भटटजी ने भारतेन्दु-युग की प्रचलित शैली का प्रयोग किया है, जिसमें लोक-प्रचलित शब्दों का प्रयोग हुआ है। उन्हें अरबी, पफारसी, संस्Ñत, अंग्रेजी आदि भाषाओं के व्यावहारिक शब्दों से कोर्इ परहेज नहीं है। वे अवध्ी व ब्रज बोली का पुट देना भी अच्छा समझते हैं। उनकी शैली में कहीं व्यंग्य एवं विनोद की प्रधनता रहती है, तो कहीं गुरुता-गम्भीरता भी विधमान रहती है। वे भावात्मक शैली का प्रयोग यदि अपने भावात्मक निबन्धें में करते हैं, तो विवरणात्मक शैली को अपने अन्य विचारात्मक निबन्धें में अपनाते हैं। वे अपने साहितियक निबन्धें में यदि तर्कपूर्ण आलोचनात्मक शैली का प्रयोग करते हैं, तो सरस निबन्धें में कवित्वपूर्ण रक्षात्मक शैली का प्रयोग करते हैं, जिसमें आलंकारिता भी विधमान रहती है। ऐसे ही उन्होंने कतिपय साहितियक निबन्धें में मुहावरों एवं लोकोकितयों से परिपूर्ण लाक्षणिक शैली का प्रयोग किया है, तो कहीं-कहीं संवादात्मक निबन्धें में संलाप एवं भाषण शैली को अपनाया है। इतना ही नहीं, भटटजी ने कहीं-कहीं प्रतीकात्मक शैली का भी प्रयोग किया है। भटटजी को संस्Ñत के उ(रण देने का भी बड़ा चाव है। साथ ही उन्होंने शब्द-चित्राों के साथ-साथ शब्द-क्रीड़ा का चमत्कार दिखाने के लिए चित्राात्मक एवं आलंकारिक शैलियों का भी प्रयोग किया है। इस प्रकार भटटजी के निबन्धें में विविध् शैलियों के दर्शन होते हैं।    

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                1. हिन्दी प्रदीप, अप्रैल 1878, पृ. 1-2         

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 श्री ध्नंजय भटट ने ठीक ही लिखा है कि ''उनका हर निबन्ध् भाषा की सजीवता, रोचकता और स्थान-स्थान पर सुन्दर मुहावरों की लड़ी से गूँथा हुआ एक सुन्दर गुलदस्ता मालूम होता है। उनका एक-एक निबन्ध् साहितियक सौरभ-संयुक्त है। उनके निबन्ध् के एक-एक शब्द में जो रस है, मौलिकता है, अनूठापन है, वह अन्यत्रा कहीं मिलना कठिन है।1 अत: भटटजी की रचना-शैली में विविध्ता तो है, किन्तु विशु(ता नहींऋ उनकी भाषा में विविध् भाषाओं के शब्दों का समिमश्रण तो है, किन्तु एकरूपता नहींऋ उनके प्रयोगों में अनेकता तो है, किन्तु गहरार्इ नहीं है और उनकी अभिव्यकित में चुलबुलापन तो है, किन्तु संयम का अभाव है।

भटटजी के निबन्धें की भाषा

भटटजी संस्Ñत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के अच्छे विद्वान थे और वे 'हिन्दी-प्रदीप के माèयम से हिन्दी भाषा के उन्नयन में लगे हुए थे। इसलिए उन्होंने एक ओर तो खड़ी बोली हिन्दी के गध को संस्Ñतनिष्ठ बनाने का प्रयत्न किया और दूसरी ओर उन्होंने हिन्दी-गध को समृ( एवं समुन्नत बनाने के लिए उसे अरबी-पफारसी एवं अंग्रेजी के लोकप्रचलित शब्दों से भी सुसजिजत किया। उनका भाषा पर असाधरण अधिकार था और वे विषयानुकूल भाषा का प्रयोग किया करते थे। यदि विषय अधिक गम्भीर होता तो भाषा भी गुरुता-गम्भीरता से सम्पन्न हो जाती थी और यदि विषय हलका-पुफलका या हँसी-मजाक से सम्बनिध्त होता तो भाषा भी चुलबुली एवं सरल हो जाती थी। वैसे संस्Ñतनिष्ठ भाषा को महत्त्व देते हुए भी उनकी भाषा के पक्ष में अत्यन्त उदार नीति थी, क्योंकि वे अरबी-पफारसी शब्दों से बोझिल भाषा के विरोध्ी थे, किन्तु लोकप्रचलित अरबी-पफारसी शब्दों का बहिष्कार करना सर्वथा अनुचित समझते थे। उनका स्पष्ट मत था कि ''यह अवश्य है कि यवन सम्पर्क से बहुत से अरबी-पफारसी के शब्द हमारी हिन्दी के साथ ऐसे समिमलित हो गये हैं कि घरेलू बातचीत में भी उनका प्रयोग किया जाता हैऋ जरूर, गरूर, मजूर, गरीब, पफकीर, अमीर, मुसापिफर इत्यादि। यदि ये शब्द संस्Ñत के अपभ्रंश शु( हिन्दी शब्दों के साथ लगाए जायें, तो असंगत न मालूम होंगे। जैसे, 'बहुत जरूर इसमें 'बहुत संस्Ñत 'बहुल का अपभ्रंश है। 'जरूर जो विदेशी शब्द है उसके साथ सर्वथा जोड़ खाता है। बहुत से लोगों का मत है कि हम लिखने-पढ़ने की भाषा से यावनिक शब्दों को बीन-बीन कर अलग करते रहें। कलकत्ता और बम्बर्इ के कुछ पत्रा ऐसा करने का यत्न भी कर रहे हैं, किन्तु ऐसा करने से हमारी हिन्दी बढ़ेगी नहींऋ वरन दिन-दिन संकुचित होती जाएगी। भाषा के विस्तार का सदा यह क्रम रहा है कि किसी भी देश के शब्दों को हम अपनी भाषा में मिलाते जायें और उसे अपना करते रहें। अरबी-पफारसी की कौन कहे अब तो अंग्रेजी के अनेक शब्द हमारी हिन्दी के एक अंग होते जा रहे हैं। जैसे-लालटेन, बोतल, पालिसी, स्टेशन, पैफशन, जज, टिकट आदि। वे सब शब्द अपने शु( रूप से बिगड़ अपभ्रंश ही हमारे हो गये हैं।2

अपने दृषिटकोण के अनुसार भटटजी ने खड़ी बोली हिन्दी के गध को एक ओर संस्Ñतनिष्ठ पदावली सेे सुसंस्Ñत बनाने का प्रयास किया और लिखा-''हे सर्व लोकचित रंजनि! विश्व विमोहिनि! ऐसी Ñपा कीजिए कि हमारी भकित आप में अचल बनी रहे। हे कुण्डलाÑति ध्र्मराशि समुत्पादिनि! हे अलसजन प्रतिपालिनि! भार्यार्भतिर्सत अनचित्त विकार विनाशिनि! प्रभुभीतजन साहस-प्रदायिनि! हे मुढ़े। तुम्हारी सेवा से महामूढ़ हो हम तुम्हारी महिमा की सीमा को कहाँ पहुँच सकते हैं। वहीं दूसरी ओर आपने अरबी-पफारसी के शब्दों से सुसजिजत करके यहाँ तक लिखा है ''आशिक तन है, इश्क की बीमारी है। मुवतिला हो यार के दीदार के प्यासे जुदार्इ का गहरा और जंगल की लम्बी सपफर, याद ने चश्मपैफयाजी से नियाज-मंद कर दिया। कामयाब हो मकसद बरारी को पहुँचे, निहाल हो गये। नाकामयाब हुए मजनू के समान इश्क के जनून में जन्म भर पड़े-पड़े झँखते रहे।

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1. भटट-निबन्ध्-माला, प्रथम भाग, वक्तव्य, पृ. 3

2. मर्यादा, सितम्बर, 1911, पृ. 224-230                     

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                भटटजी ने ऐसी भाषा का प्रयोग भी किया है, जिसमें अरबी-पफारसी की पदावली के साथ-साथ अंग्रेजी और संस्Ñत की पदावली का भी समिमश्रण पाया जाता है। जैसे, आपने लिखा है कि ''खटखट बूटदार चाल चलने के समय पद-पद में जिनके पदाघात से भूडोल जाता है। लैक्चरों में प्रलयकालीन मेघ के गर्जन समान जिनके घननाद से सुनने वालों के कान का परदा और मकान की छत दोनों पफटकर पुरजे-पुरजे हो जाते हैं .......दया-ध्रम का कहीं लेश न रहा, कोरी कठहुज्जत उनकी सुशिक्षा तालीम की जगमगाहट तथा अजीमुश्शान लियाकत का पफल हुआ जिसमें बीच-बीच खुश्क मियाजी की बघार दे दी गर्इ। 'हम चुनी दीगरे नेस्त जबानी, दुध् पूत ध्न लक्ष्मी देने को कहो राजा करन के भी पुरखा बन जायें, पर करतूत में निरे ढपोरशंख 'साक्षातढपोर शंखोहं बदामि न ददामिते।1

भटटजी की भाषा में पूर्वीपन, विशेषकर अवध्ी का पुट अधिक मिलता है। उन्होंने स्थानीय रंग देने के लिए इलाहाबाद नगर में बोली जाने वाली अवध्ी का पुट देते हुए लिखा है कि ''बेटा, अब तुम सयाने भए, घर दुआर की पिफकिर रक्खा करो। दुलहनिया की नथिया टूट गै है। बतसिया का ब्याह नियरान है। सदा पफक्कड़ बने रहने से काम न सरि है। कपूत आवें तपत, सपूत आवें नवत। भगवान देखार्इ चार दिना में तुम नाती पोता के होइहौ।2

भटटजी ने अपनी भाषा को सुसजिजत करने के लिए मुहावरों का अत्यधिक प्रयोग किया है। मुहावरों को वे किसी भी भाषा की जान मानते थे। मुहावरों के बारे में उनका मत था कि ''दो भाषा व्याकरण की रीति पर कुछ कुछ मिलती भी हों परन्तु वे चीजें जिनको मुहावरे कहते हैं कभी नहीं मिल सकते और ये मुहावरे ही हर एक भाषा की जान हैं। हिन्दी और अंग्रेजी ही लीजिए। हम दो भाषाओं में कहीं-कहीं थोड़ा-थोड़ा व्याकरण के नियमों का तो भेद हुर्इ है, किन्तु बड़ा भारी अन्तर मुहावरों की निराली चाल का है। जहाँ कहीं इन मुहावरों की कोर्इ गलती सुनने में आती है तो वह कान में चट चटक जाती है।3 अपने इन्हीं विचारों के आधर पर भटटजी ने मुहावरों का प्रयोग अत्यन्त कुशलता के साथ किया है। जैसे, 'चलता है निबन्ध् में आपने लिखा है कि ''चलता है राड़ का चरखा वो भटियारिन का मुँह। बस जो चला काहे को रोके रुकता है, कर्कशा लड़ाकिन मेहरियों की जुबान, एक-एक मुँह में सौ-सौ गाली, जबान क्या कतरनी हो गर्इ, आँध्ी हो गर्इ, रेल का इंजन हो गर्इ। चली जो चली अब कौन ऐसा दैव का दूसरा पैदा हुआ है जिसके रोके रुक सके। किसी का मुँह चला तो किसी का हाथ चल निकला।5

भटटजी ने विविध् प्रकार के शब्दों को अपनाकर अपनी भाषा के भण्डार की पूर्ति की है। शु( संस्Ñत के तत्सम शब्दों का प्रयोग उनकी भाषा में पर्याप्त मात्राा में मिलता है। जैसे-कौलीन्य, सदवृत्त, दुराचरण, दुष्कर, बाल्यविवाह, निषि(, मूलाच्छेदी कुठार, स्वात्प्रेक्षित बु(ि, सुस्वादु, अन्योन्याश्रय, असामान्य, अणुमात्रा, प्रतिष्ठा, Ñतकार्य, प्रकरण, ध्र्मशास्त्रा, अर्थशौच, विश्वासपात्रा, प्रतिपफल, सि(, ब्राह्राणत्व, कुलाभिमान, प्राÑतिक, व्यावहारिक, तारतम्य, निष्ठुराचारी, प्रवंचना-पटु नैसर्गिक शोभा, बु(ि-स्पूफर्ति-विहीन, वायावली, मृयमाण, उन्माद, सहानुभूति, उत्Ñष्ट, ऐक्य, चेष्टा, आरूढ़, मीमांसा, सच्चरित्रा, समाधन, दार्शनिक, स्वत्वाभिमान, आèयातिमक, कुशाग्रबु(ि, असत्पथगामी, सत्पथावलम्बी, ला×छना, प्रतिपत्ति, मनोमालिन्य, अरुचि, किंचित, Ñत्य, असÑत चेष्टा, र्इश्वर प्रदत्त, चित्तवृत्ति, दण्डायमान संकल्प, दुर्विनीत, मदान्ध्, उत्तमता, अभिजात्य, अच्युत गोत्राी, सुÑत-दुष्Ñत, श्रा(, अहिंसामूलक, कदाचित, पार्वण श्रा(, दक्षिणायन आदित्य आदि।

भटटजी की भाषा में तदभव शब्दों की भी भरमार है। बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए आपने तदभव शब्दों को पर्याप्त मात्राा में अपनाया है। जैसे, अधने, आसूदा, उकताती, उजागर, ओकलाही, कटहा, कांखते, खोड़,           

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1. हिन्दी-प्रदीप, मार्च 1880, पृ. 4

2. हिन्दी प्रदीप से उधृत।

3. हिन्दी-प्रकोप, जून 1885, पृ. 3

4. वही, पफरवरी, 1983, पृ. 17       

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                गाटा, गंजिया, गावली, चटुआ, जुड़ाती, जीभ, जघल, जन, जखेड़ा, झोंझट, टटका, ठिकरी, डाकते, तसमा, थहाया, दगीवी, ध्रम, नियरान, पिसौनी, पूनो, पुफचड़ा, बरकाया, बित्त, बिलमाए, रोचना, रूखा, साहुत, हलाकान, हलक आदि।

भटटजी ने अरबी-पफारसी के शब्दों का भी बड़ी उदारता के साथ प्रयोग किया है। जैसे-अलबत्ता, असाकत, अजीमुश्शान, अमला, इश्क, आजिज, उजलत, एहकाम, कामयाब, कदम व कदम, खाहिल, खुदगर्जी, खफ्रत, ख्वाब, गुमशुदा, चश्मपैफयाजी, जर्रार, जुदार्इ, जनून, ताजिरों, तअम्मल, तनहा, तहरीर, दीद शुनीद, नाकामयाब, पेशकार, बदली, बहनूदी, मस्तूरात, महजतन तनहा, मालिकुलमौत, मुहाजिब, मुवातिला, मुसनिनक, मुतलिलक, मुस्तैद, मुजिर, मुखासबत, मुआवजा, मुआइना, मुश्कमिजाजी, मुजाहिम, मजनू 'वाजिब विनयामुखासवत, बरतरपफ, शरिश्तेदार, भीसनी तहरीर, हम चुनी दीगरेनेस्त, हिमाकत, हकीकत, हतक, इज्जत, हिजो, हिकमत अमली आदि।

भटटजी की भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का भी खुलकर प्रयोग हुआ है और उन्होंने लोक-प्रचलित सभी प्रकार के अंग्रेजी-शब्दों को अपने निबन्धें में स्थान दिया है। जैसे-अप्स एण्ड डाउन्स, अपटूडेट, अनपफोरचुनेट, आर्टीकल, आर्ट, इम्मोरल, एजूकेशन, एन्ट्रीक्वेरियन मिस्ट्रीज, एडीटर, ऐसे ओपीनियन, क्लब, करैक्टरिसिटक, कम्पाउण्ड, कन्वीनियेंट, करेक्टर, कमिश्नर, क्लासिकल, कामिडी, ट्रेजडी, नेटिव पालिसी, प्रिविलेज, प्रोबलम, प्योरिटी, प्रिज्यूडिस, पोलिटिशियन, प्लाट, पेटि्रयोटिष्म, पबिलकगुड, प्रोपैफस्टीनेशन, पफण्ड, पेफथपुफल, फ्रयूडेटी, पफीट्रेड, म्यूनिसिपिल, मोरल प्योरिटी, रीडिंग क्लब, लाइपफ एण्ड डैथ, सोल्ब, सिविलियन, सिपरिट, हार्इ एम्बीशन, हार्इमाइण्ड आदि।

यधपि भारतेन्दु-काल के सभी लेखक शब्दों के लोकप्रचलित प्रयोगों के बारे में बड़े सतर्क रहते थे और शब्दों की आत्मा से पूर्णपरिचित थे, तथापि इस काल के लेखकों ने कतिपय ऐसे शब्दों के प्रयोग भी किए हैं, जो उस काल की प्रवृत्ति से मेल नहीं खाते, जो उस समय लोक-प्रचलित न थे और जिनमें बोलचाल की भाषा का भी रूप नहीं मिलता। भटटजी ने भी ऐसे अप्रचलित शब्दों का प्रयोग यत्रा-तत्रा किया है। जैसे, वैयथ्र्य, औदासीन्य, कौलीन्य, प्रागल्भ्य, अस्तमित, सारल्य आदि।

भटटजी के प्रयोगों पर दृषिटपात करने से ज्ञात होता है कि पूर्वकालिक क्रिया के रूपों में 'य का प्रयोग

अधिक किया है। जैसे, दिखाकर के लिए 'दिखाय, खिलाकर के लिए 'खिलाय, आकर के लिए 'आय, जाकर के लिए 'जाय, पिलाकर के लिए 'पिलाय आदि। इसी प्रकार भटटजी ने न जानें, न माने के स्थान पर क्रमश: 'न जानिए, 'न मानिए का प्रयोग किया है।

भटटजी के शब्द-प्रयोगों में और भी कितनी ही नवीनताएँ दृषिटगोचर होती हैं, जो उस काल की प्रवृत्ति की परिचायिका हैं। जैसे, उन्होंने बोलचाल के आधर पर प्राय: इसके, उसके, इसमें, उसमें, के लिए क्रमश: 'इसके, 'उसके, 'इस्में, और 'उस्में, रूप अपनाये हैं। ऐसे ही 'कैसे के लिए सदैव आपने 'क्योंकर शब्द का प्रयोग किया है, 'जिला देना तथा 'मिला देना के स्थान पर क्रमश: 'जिलो देना और 'मिलो देना अपनाया है, ले और देे के स्थान पर 'ले और 'दै लिखा है और 'डुबाए हुए ही स्थान पर 'डुबोए हो का प्रयोग किया है।

भटटजी की भाषा में पूर्वीपन की छाप स्पष्ट दिखार्इ देती है। इसीलिए................'सरस्वती को मैला नहीं किया चाहते, 'यदि हम स्वतन्त्रा हुआ चाहें, 'अपने .......लाद लिए होते आदि वाक्यावली का प्रयोग किया है। इतना ही नहीं, भटटजी ने स्त्राीलिंग एवं पुलिलंग शब्दों का प्रयोग भी मनमाने ढंग से किया है। जैसे ............ प्राय: स्त्राीलिंग मानी गर्इ है, किन्तु भटटजी ने पुलिलंग के रूप में इसका प्रयोग किया है-'बर्पफ मुँह में रखा कि ध्र्म गया। ऐसे ही 'उपाय पुलिलंग शब्द है, किन्तु भटटजी ने उसका स्त्राीलिंग के रूप में प्रयोग किया है-'यह बड़ी उत्तम उपाय निकाली आदि।

इस प्रकार भटटजी की भाषा का अèययन करने पर ज्ञात होता है कि उसमें विविध्ता है, स्वाभाविकता है और विषयानुकूलता है। भटटजी ने कहीं तो तीखी और मर्मभेदी आलोचना के लिए तीखी एवं चुटीली भाषा का प्रयोग किया है, भारतीय समाज की दयनीय सिथति एवं दुर्दशा का चित्राण करने के लिए भाव-प्रबल भाषा को अपनाया है, कहीं तत्कालीन समाज एवं शासन पर सात्तिवक क्रोध् प्रकट करने के लिए तीक्ष्ण व्यंग्य प्रधन गूढ़ भाषा का प्रयोग किया है और कहीं साधरण तक अपनी किसी मान्यता, धरणा अथवा अपनी बात को पहुँचाने के लिए अत्यन्त सरल, सुबोध् एवं बोलचाल की भाषा को अपनाया है। इतना ही नहीं भटटजी ने अपनी भाषा को अधिकाधिक प्रभावशाली बनाने के लिए मुहावरों कहावतों एवं चुभते हुए वाक्यों से सुसजिजत किया है। यही कारण है कि भटटजी की भाषा स्वतन्त्रा, चिन्तन एवं स्वाध्ीन विचारों से परिपूर्ण हैऋ उत्कट भावनाओं के प्रकाशन में सक्षम हैऋ हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में समर्थ हैऋ चिड़चिड़ाहट से युक्त होते हुए भी मनोरंजक है तथा चरपरीऋ तीखी एवं चमत्कारपूर्ण है।

भटटजी के निबन्धें की रचना-प(ति सम्बन्ध्ी विशेषताएँ

पं. बालÑष्ण भटट भारतेन्दु युग के सर्वोत्Ñष्ट निबन्ध्कार थे। उनके निबन्ध् में पाठकों के मन को आÑष्ट करने की अदभुत क्षमता थी। उनके कथन में अनुपम सरसता एवं सजीवता विधमान रहती थी। उनकी विरोध्मूलक अक्खड़ उकितयों में कटुता के साथ-साथ सâदयताऋ आक्षेप के साथ-साथ सहानुभूतिऋ आलोचना के साथ-साथ

सुधरवादी दृषिटकोण तथा व्यंग्य के साथ-साथ आत्मीयता भी विधमान रहती थी। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी इसी रचना-शैली के द्वारा तत्कालीन समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया, अंग्रेजी शासन की पक्षपातपूर्ण नीति को बदलने का प्रयत्न किया। Ñषकों की दुर्गति को सुधरने की कोशिश की और अन्याय एवं अत्याचार के विरु( अगिन-वर्षा की। इस प्रकार भटटजी ने अपने निबन्धें में एक ऐसी रचना-शैली का प्रयोग किया हैऋ जो भारतेन्दु-युग की प्रतिनिधि शैली से आपकी निबन्ध्-रचना में निम्नलिखित विशेषताएँ दृषिटगोचर होती हंै-

(1) भटटजी की रचना-प(ति में विविध्ता है। वे विषयानुसार रचना-प(ति का प्रयोग करते हैं। इसी कारण राजनीतिक विषयों में उनकी कटु आलोचनात्मक प(ति के दर्शन होते हैं, सामाजिक निबन्धें में उनकी खण्डनमण्डनात्मक विरोध्मूलक प(ति को देखा जा सकता है, देशभकितपूर्ण निबन्धें में उनकी गम्भीरतापूर्ण संवेगात्मक प(ति के दर्शन होते हैं, शास्त्राीय निबन्धें में उनकी गवेषणापूर्ण विवेचनात्मक प(ति दृषिटगोचर होती है, भाषाविषयक निबन्धें में उनकी तर्कपूर्ण आलोचनात्मक प(ति के दर्शन होते हैं और साहितियक विध सम्बन्ध्ी निबन्धें में उनके मौलिक चिन्तन-मनन से परिपूर्ण विश्लेषणात्मक प(ति को देखा जा सकता है।

(2) भटटजी की रचना-प(ति में विविध् विषयों का समावेश हुआ है, जो भटटजी की बहुलता एवं बहुमुखी प्रतिभा का धोतक है, क्योंकि उनकी रचना-प(ति में कहीं राजनीति की चर्चा है, तो कहीं अर्थशास्त्रा की व्याख्या हैऋ कहीं समाज का विवेचन हुआ है, तो कहीं साहित्य की व्याख्या हुर्इ हैऋ कहीं Ñषि पर विचार प्रकट हुए हैं, तो कहीं ज्योतिष पर अपनी राय दी गर्इ हैऋ कहीं भूगोल पर अपना मत प्रकट किया गया है, तो कहीं इतिहास पर अपनी धरणा व्यक्त की गर्इ हैऋ कहीं नीति पर अपनी सम्मति दी गर्इ है, तो कहीं व्यापार पर विचार व्यक्त किये गए हैं और कहीं खगोलशास्त्रा का वर्णन किया गया है, तो कहीं विज्ञान पर भी अपनी धरणा व्यक्त की गर्इ है।

(3) भटटजी ने अपनी रचना-प(ति को अधिकाधिक आकर्षक एवं मनोरंजक बनाने के लिए कभी विवरणात्मक प(ति का सहारा लिया है, तो कभी वार्तालाप प(ति को अपनाया हैऋ कभी विश्लेषणात्मक प(ति का आश्रय लिया है, तो कभी संश्लेषणात्मक प(ति को स्वीकार किया हैऋ कभी वर्गीकरण की प(ति को प्रश्रय दिया है, तो कभी व्याख्यात्मक प(ति को अंगीकार किया है और कभी इतिवृत्तात्मक प(ति का सहारा लिया है, तो कभी काव्यमयी व्यंजना-प्रधन प(ति को अपनाया है।

(4) भटटजी की रचना-प(ति में भाषाओं की भी विविध्ता के दर्शन होते हैं। इसीलिए कहीं यदि संस्Ñत की तत्सम पदावली का प्राधन्य है, तो कहीं सरल तदभव पदावली की छटा विधमान हैऋ कहीं यदि उदर्ू-पफारसी गर्भित पदावली का रंग है, तो कहीं अंग्रेजी की पदावली की छटा है और कहीं यदि शु( हिन्दी का साहितियक रूप शोभायमान है, तो कहीं अवध्ी भाषा के लोक-प्रचलित रूप की झाँकी भी मिल जाती है।

(5) भटटजी ने भावात्मक गध का सहारा लेकर अपने निबन्धें में ऐसी रचना-प(ति का प्रयोग किया है, जो गधकाव्य या गधगीत के सर्वथा अनुकूल है और जिसमें कवित्व की प्रधनता है। जैसे-''हे ललना ललाम! ह कुलकामिनियों की आदर्शरूप-हे गुण गरिमा विशिष्ट! तुम अपने स्वाभाविक सहज गुण से चिराभ्यासी योगियों की सहिष्णुता को सहज ही में जीत लेती हो। हे वंशप्ररोह-जननी! लोक-परलोक दोनों में सुख देने वाले शु( सन्तान के पैदा होने की बीजभूमि तुम हो।1

(6) भटटजी ने संलाप-प(ति का प्रश्रय लेकर अपनी रचना को अधिकाधिक आकर्षक बनाने का स्तुत्य प्रयास किया है। जैसे-''लालाजी यदि बुरा न मानिए। एक बात आपसे ध्ीरे से पूछें कि आप ऐतिहासिक नाटक किसको कहेंगे?2

(7) भटटजी की रचना-प(ति में भाषण-प(ति का भी पुट पर्याप्त मात्राा में रहता है, जिससे वे पाठकों को अपनी ओर सहसा आÑष्ट कर लेते हैं। जैसे-''प्रकरण मांस भोजन के गुण-दोष के विचार का है जिसका निचोड़ हम पिफर यही तय करते हैं कि हमारी सामाजिक तथा ध्र्म सम्बन्ध्ी उन्नति सर्वथा भोजन से सुसाèय है, किन्तु शारीरिक बल तथा और-और विषयों में हम आगे बढ़ना चाहें तो मांस भोजन के निषेध् की ओर से कान मूँद लें और इसका निषेध् करने वालों की एक बात भी न सुनें, नि:शंक इसके भोजन में प्रवृत्त हों।

(8) भटटजी ने कथनोपकथन-प(ति का प्रयोग करके अपनी रचना-प(ति को अत्यधिक रोचक एवं प्रभावोत्पादक बनाने का प्रयास किया है। जैसे-''शाम को मसिजद के पास जा निकला और जो हज्ज किए हुए बड़े नमाजो आबिद मालूम हुए उनको जा घेरा और नम्रभाव से उनसे पूछा-''मौलवी साहब! मैं आपको थोड़ा तकलीपफ दिया चाहता हूँ मुझको आपसे कुछ पूँछना है? मौलवी साहब बोले- ''कहो, क्या पूछते हो? मैंने कहा-''सभ्यता किसे कहते हैं?

(9) भटटजी ने अभिनयात्मक प(ति या नाटकीय प्रणाली का प्रयोग करते हुए भी कतिपय निबन्धें की रचना की है, जिनमें आपकी नाटकीय प(ति पर आधरित त्वरापूर्ण रचना-प(ति के दर्शन होते हंै। जैसे-'कटटर सूम की एक नकल नामक निबन्ध् की रचना नाटकीय प(ति पर ही हुर्इ है और जिसमें चपरासी, सेठ खेमकरन विनीत आदि पात्राों के संवादों द्वारा ही सम्पूर्ण विचारों की अभिव्यकित हुर्इ है।

(10) भटटजी की रचना-प(ति को अधिकाधिक सरस, सजीव एवं चित्ताकर्षक बनाने में मुहावरों का

अत्यधिक हाथ रहा है। जैसे-''निर्वशी अपने वंश का अन्त होते देख नाम ही के सैकड़ों खर्च कर लड़का मोल ले लेते हंै, जिससे नाम चलाने को एक वंशध्र कायम रहे। नाम लेते हैं, नाम रखते हैं, नाम करते हैं, नाम पड़ता है, नाम चलता है, नाम लिखा जाता है, कोर्इ नेक नाम है, कोर्इ बदनाम है, कोर्इ गुमनाम है, बेनाम का कोर्इ नहीं है।

(11) भटटजी की रचना-प(ति में अलंकारों ने भी चार चाँद लगा दिए हैं, जिससे इनकी शैली में चारुता एवं सुन्दरता की वृ(ि हुर्इ है। जैसे-दर्जी ऐसे अल-दर्जी हो गए किसी की अर्जी नहीं सुनते। आतशबाजी वाले अपनी ताजी-बाजी में खूब राजी रहे। .....कितने काजी अकाजी और अकाजी काजी, पाजी गाजी और गाजी पाजी बन बैठे। और भी जैसे-''साहित्य राहित्य भाव को प्राप्त हो गया .....वेदान्त का अस्त हो गया। पतिजलि को भी मैंने तिलांजलि दिलवा दी। पाणिनि को बिना पानी मरना पड़ा। ....मीमांसा का मांसाहार मैंने ही किया। पुराण को परान्न की भांति रुचि से खाया।

(12) भटटजी ने अपनी रचना-प(ति को अधिकाधिक मनोरंजक बनाने के लिए चित्राात्मक प(ति का भी प्रयोग किया है, जिसके पफलस्वरूप आपने ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है, जो पाठकों के सम्मुख किसी भी दृश्य का एक संशिलष्ट चित्रा उपसिथत कर देते हैं। जैसे-''मुझे ऐसा मालूम हुआ कि पृथ्वी से आकाश गोलक बे-ओर-छोर लम्बी लाखों-करोंड़ों डंडों की एक सीढ़ी लगी हुर्इ है, जिस पर से लाखों करोड़ों देवयोनि कोर्इ श्याम वरण चतुभर्ुज, आकण्ठलमिबनी बनमाला और पीतपट पहने किरीट-मुकुट ध्रे कोर्इ कपर्ूर पुरोज्ज्वल शरीर सर्वाÄõ भस्मीदध्ूलित त्रिनेत्रा अक्ष और स्पफटिक की माला कंठ से पाँव तक धरण किए सिर पर जटा और भालपटट में चन्द्रमा से सुशोभित था। कोर्इ ऊपर से उतरते हुए कोर्इ नीचे से ऊपर को चढ़ते हुए देख पड़ें।1

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1. भटट-निबन्ध्माला प्रथम भाग, पृ. 30

2. हिन्दी-प्रदीप, अप्रैल, 1886, पृ. 9     

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(13) भटटजी ने अपनी रचना-प(ति को मौलिक, रोचक एवं सरस बनाने के लिए वैयकितकता का पुट अत्यधिक दिया है। इससे न केवल इनके निबन्धें में मौलिकता का संचार हुआ है, अपितु इनकी शैली में भी मौलिकता का समावेश हुआ है। जैसे-''मैं बहुत दिनों से पेफर में पड़ा था कि सभ्यता किसे कहते हैं। कर्इ एक डिक्शनिरियां उलट-पुलट खूब छान-बीन की, पर कहीं इसका पता न लगा। ........मन में आया किसी पंडित या मौलवी से पूछें तो कदाचित मेरा मतलब निकल आवे। इसी सोच-विचार में था कि अकस्मात एक नर्इ रोशनी वाले से भेंट हो गर्इ।

(14) भटटजी ने अपनी रचना-प(ति में âास-परिहास का पुट देकर उसे अधिकाधिक मनोरंजक एवं आकर्षक बनाने का प्रयास किया है। जैसे-आपने 'हुक्का-स्तवम में लिखा है कि ''महाराणी हम सरीखें आलसी निष्पुरुषार्थी बेरोजकार मनुष्यों को तो दिल लगाने के लिए केवल तुम्हारा ही आसरा है। ........आप न होती, तो मुख को सदा दुर्गंध्पूरित कौन किए रहता।2

(15) भटटजी ने व्यंग्य का आश्रय लेकर अपनी रचना-प(ति की अधिकाधिक मार्मिक एवं अभिव्यंजक बनाया है, जिससे उसमें उकितवैचित्रय के साथ-साथ अर्थगांभीर्य भी विधमान है। जैसे-''भार्इ हिन्दुओं! कलिपुराण में तुम्हारी बेहतरी के बहुत-बहुत उत्तम उपाय लिखे हैं। उसे मानोगे तो भलार्इ हो या न हो पर बहुत जल्द सर्वनाश होने में तो किसी तरह का संदेह नहीं रहेगा। ....आँख में पटटी बांध्े सोते रहो उसे खोलना नहीं, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हें सूझने लगे और हिये की जो पुफटी है सो खुल जाय। जिहालत की गठरी सिर पर से मत उतारो लो यह कुतर्क-कौमुदी ग्रन्थ तुम्हारे लिए तैयार किया गया है, इसे पढ़ो, क्योंकि काल अब बड़ा कराल आया है कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी दुबर्ु(ि का शोध्न हो जाय, तो पिफर दुव्र्यसन, खुदगर्जी, पिफजूल खर्ची, बाल्यविवाह, बैर, पूफट आदि बेचारे किसके सहारे रहेंगे।3

(16) भटटजी की रचना-प(ति में एक विशेषता यह भी है कि वे संस्Ñत भाषा के उ(रणों से उसे

अधिकाधिक सुसजिजत करने में अधिक गौरव मानते हैं। इसी कारण अधिकांश निबन्धें के बीच-बीच में संस्Ñत के उ(रणों की भरमार मिलती है। जैसे-'देवताओं से हमारी बातचीत निबन्ध् में 'मन : पूत समाचरेत, 'शुचिमनो पधासित तीर्थेन किम।4 'त्रिदेव कल्पना निबन्ध् में 'क्षत्राक्षयं कुर्वन्ते, 'पौलस्त्यं जयते, 'शैवात शाक्तो विशिष्यते 'गुन्तमूलं बल पुसां5 आदि।

(17) भटटजी ने यत्रा-तत्रा प्रतीकात्मक प(ति का प्रयोग करके अपनी रचना-प(ति को अधिकाधिक मार्मिक एवं भावव्यंजक बनाने का प्रयास किया है। जैसे-''पशिचमोतर की सीमा का आकाश पिफर ध्ूमिल हो रहा है। बड़े-बड़े भयानक बादल इकटòा हो रहे हैं।6

(18) भटटजी ने कोष्ठकों का प्रयोग करके अपनी रचना-प(ति को नवीनतम बनाने का प्रयास किया है। जैसे-''हम समझते हैं अन्ध्कार महाशय बीबी संयोगिता को (पंडित प्रतापनारायण मिश्र के कलि कौतुक वाली) शराबखोरों की महपिफल में भेज देते। ....अथवा इस बात को बंगला या गुजराती ही में (जिसमें आपको पूर्ण पंडित होने का दावा है) देख लिया होता।7  

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1-2. भटट-निबन्ध्-माला, प्रथम भाग

3-4. हिन्दी-प्रदीप, मार्च 1880

5-6. भटट-निबन्ध् माला, प्रथम भाग

7. भटट-निबन्ध् माला

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(19) भटटजी ने अपनी रचना-प(ति को अधिकाधिक सुबोध् एवं सरल बनाने के लिए यत्रा-तत्रा अंग्रेजी के शब्दों का भी कोष्ठकों में प्रयोग किया है। जैसे-रिवाजे बख्त (थ्ेंीपवद व जिीम कंल)श्1ए पसन्द नापसन्द का (ैजंदकंतक)2 (त्पहीज ंदक चतपअपसमहम)श्3ए विवेचना-शकित (ब्वदेबपमदबम)श्4ए मुजसिसम आÑतिमान (म्उइवकपमक)श्5 खयाल (टपमूे)6 आदि।

(20) भटटजी न कभी-कभी रचना-प(ति को रोचक एवं मनोरंजक बनाने के लिए कोष्ठकों में कतिपय शब्दों की व्याख्याएं भी दी है। जैसे-''हमने खनसामा से कहा (शायद खानसामा इन लोगों का नाम इसलिए पड़ा है कि खाने का सामान करते हैं)।7

(21) भटटजी की रचना-प(ति में एक विशेषता यह भी है कि वे प्राय: शब्दों की परिभाषाएं अत्यन्त सरल, सजीव एवं सीध्े-सादे ढंग से दिया करते हैं। जैसे- ''प्रीति एक ऐसी मनोवृत्ति है जो स्वभावत: विश्वासपरायण, सरल स्वच्छदर्शना, क्रूरवृत्तिशून्या एवं कुसुम सदृश कोमला और संसार की सार वस्तु है।8 ऐसे ही ''दूसरे के दु:ख से दु:खी सुख से सुखी होने का नाम सहानुभूति है। 9

(22) भटटजी की रचना-प(ति में हिन्दी, संस्Ñत, उदर्ू, अंग्रेजी की लोकोकितयों अथवा कहावतों ने अत्यधिक रोचकता, सरलता एवं मार्मिकता का संचार किया है। जैसे-'माँ पिलंगिनी बाप पिलंग तिनके लड़के रंग बिरंगें,10 'स्पष्टवक्ता न वंचक11, 'जानै ऊख मिठास को जब मुख नोन चबाय12 ृ। इंतापदह कवह पे उवतम नेमनिस जींदेसममचपदह सपवदश्ण्13 'दारिद्र परमांजनम14, 'कोउ नृप होहि हमें का हानी,15 'सि(ि रही सो गोरख ले गये खाक उड़ावें चेले,16 भ्वदमेजल पे जीम इमेज चवसपबलश्ए17 खाना गेहूँ या रहना एहूै,18 'पीर बबर्ची भिश्ती खर,19 'हमचुनीदीगरे नेस्त। 20

सारांश यह है कि भटटजी के निबन्धें में जिन्दादिली है, सजीवता है, मनोरंजकता है, अनुभूति की तीव्रता है, सुधरवादी मनोवृति है, देशभकित की उत्कट भावना है, युग की हीनावस्था का सजीव चित्राण है, अनाचार एवं अत्याचार के विरु( क्षोभ एवं असन्तोष है, भारत को पराध्ीनता की बेडि़यों से मुक्त कराने की तीव्र आकांक्षा है, शासन की पक्षपातपूर्ण नीति का भंडापफोड़ करने की प्रवृत्ति है, Ñषकों एवं मजदूरों के प्रति सहानुभूति एवं सâदयता है, भाषा को रोचक एवं लोकप्रिय बनाने का सत्प्रयत्न है, स्वतन्त्रा चिन्तन एवं स्वाध्ीन विचारों से परिपूर्ण एक व्यापक प्रेरणा है, जन-जन के जीवन में उत्कट भावनाओं को जाग्रत करने की तीव्र अभिलाषा है शासकों के प्रति गहरी पफटकार है और शोषण की मनोवृत्ति को सदा के लिए मिटाने की प्रबल कामना है। यही कारण है कि उनके निबन्ध् सरल, सजीव, सुबोध् एवं संवेदनात्मक है तथा खंडनात्मक दृषिटकोण से ओतप्रोत होते हुए भी रोचक एवं मनोरंजक हैं।    

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1-8. भटट निबन्ध्-माला

9. हिन्दी-प्रदीप

10-19. भटट निबन्ध् माला

20. हिन्दी प्रदीप

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'आत्मनिर्भरता (निबंध्)

- डा. मनीराम यादव

निबंध्-सार

आत्मनिर्भरता अर्थात अपने भरोसे पर रहना पुरुष में श्रेष्ठ गुण है। अपने भरोसे के बल वाले सबके ऊपर रहेंगे। इस संदर्भ में महाकवि भारवि का कथन भी उदध्ृत किया है कि 'तेज और प्रताप से संसार भर को अपने नीचे करते हुए ऊँची उमंगवाले दूसरे के द्वारा अपना वैभव नहीं बढ़ाना चाहते। अपने बाहुबल के समक्ष सब बल क्षीण हैं। कहावत भी है कि 'अपना हाथ जगन्नाथ, यूरोपीय देशों की उन्नति का कारण है कि उन देशों में लोग अपने भरोसे पर रहना या कोर्इ काम करना अच्छी तरह जानते हैं। हिन्दुस्तान की दुर्दशा का कारण है कि यहाँ के लोग अपने भरोसे पर रहना भूल ही गए। इनमें सेवकार्इ का भाव आ गया है स्वामित्व अथवा प्रमुख का नहीं। कोरी किस्मत और भाग्य पर वे ही लोग रहते हैं जो आलसी हैं- 'दैव दैव आलसी पुकारै। र्इश्वर भी उन्हीं की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। यही सच्ची तरक्की की बुनियाद है। बाहरी सहायता इतना लाभ नहीं पहुँचा सकती जितना आत्मनिर्भरता। सरकारी कानूनों की अपेक्षा अपना संशोध्न अपने आप ही हो सकता है। अच्छी बातें ही प्रयत्न और चेष्टा से अपने में ला सकते हैं। जाति का कौम भी सुध्रे हुए ऐसे एक-एक व्यकित की समाषिट है। जिस कौम की नस-नस में दास्य भाव समाया हुआ है, कभी तरक्की नहीं करेगी चाहे कैसी ही उदार शासन से वह शासित क्यों न की जाये।

देश की स्वतंत्राता की नींव देश के एक-एक आदमियों के आत्मनिर्भरता आदि गुणों पर सिथत है। लेखक ने जान स्टुअर्ट मिल के सि(ान्त की प्रशंसा की है-''राजा का भयानक से भयानक अत्याचार देश पर कभी कोर्इ बुरा असर नहीं पैदा कर सकता जब तक उस देश के एक-एक व्यकित में अपने सुधर की अटल वासना दृढ़ता के साथ है।

मनुष्य में पूर्णता विधा से नहीं वरन काम से आती है। प्रसि( पुरुषों की जीवनी पढ़ने से ही नहीं वरन उन पुरुषार्थी पुरुषों के चरित्रा का अनुकरण करने से मनुष्य में पूर्णता आती है। यूरोप की सभ्यता के विकास से कहीं पुश्त तक देश का देश ऊँचे काम, ऊँचे ख्याल और ऊँची वासनाओं की ओर प्रबल चित्त रहा।

आत्मनिर्भरता की शिक्षा हमें पुस्तकों से नहीं वरन खेतिहर, दुकानदार, बढ़र्इ, लोहार आदि कारीगरों से मिलती है जिनमें दृढ़ता, ध्ैर्य, परिश्रम है। इन सब गुणों से हमारे जीवन की सपफलता है।

जो कोर्इ बड़ा काम करे या जिससे सर्वसाधरण का उपकार हो, वही बड़े लोगों की कोटि में आ सकता है। वह मनुष्य के तन के साक्षात देवता है। हमारे यहाँ अवतार ऐसे ही लोग हो गए हैं। सौ गीदड़ों की अपेक्षा एक सिंह का जन्म लेना उत्तम है। तीस करोड़ की आबादी वाले हिन्दुस्तान की हमारी बिगड़ी गिरी कौम को सिंह का जन्मना सर्वथा असंभव सा प्रतीत होता है। बाल-विवाह की Ñपा से जनसंख्या वृ(ि हो रही है जिससे हिन्दुस्तान की पृथ्वी का बोझ बढ़ रहा है।

समाज में कुसंस्कारों और कुरीतियों के चलते आत्मनिर्भरता नहीं आ सकती। बाल-विवाह एक प्रधन कारण है। हिन्दुस्तान के अस्सी प्रतिशत लोग बाप दादों की कमार्इ या परंपराप्राप्त जीविका अथवा वृत्ति से निर्वाह करते हैं। केवल एक प्रतिशत व्यकित निज बाहुबल और पुरुषार्थ के भरोसे हैं। जनसंख्या पर प्रतिबंध् लगाने के लिए बाल-विवाह का रोकना अनिवार्य है और इसके लिए कठोर कानून की आवश्यकता है। बाल-विवाह करकेे बच्चों की जीवनभर की आजादी छीन लेते हैं जबकि आदमी के लिए आजादी एक बेशकीमती मोती है।

भाषा-शैली

बालÑष्ण भटट आध्ुनिक काल के निबंध्कारों में प्रथम स्थान रखते हैं। उन्होंने आम विषयों में भी अपनी भाषा-शैली की गुणवत्ता सिथर रक्खी है। छोटे से छोटे विषय का विस्तार भी सहज प्रसादमयी शैली में करके पाठका  पर अपेक्षित प्रभाव डाला है। प्रस्तुत निबंध् में लेखक देश की दुर्दशा से दु:खी है, गुलामी से खिन्न है। देश की कुप्रथाओं और कुरीतियों के चलते जो दशा हुर्इ है, उससे छुटकारा दिलाने की तमन्ना लेखक के मनोबल में बसी हुर्इ है। दूसरे देशों की तुलना में हिन्दुस्तान की सिथति दयनीय है। इन सबसे छुटकारा दिलाने का मूलमंत्रा है 'आत्मनिर्भरता। इसी विषय को दृष्टांतों, उदाहरणों द्वारा वर्णित करते हुए विविध् शैलियों को ग्रहण करते हैं, जिनका संक्षेप में यहाँ उल्लेख किया जाता है।

उदाहरण शैली-

1. 'दैव दैव आलसी पुकारै।

2. 'र्इश्वर भी सानुकूल और सहायक उन्हीं का होता है जो अपनी सहायता अपने आप कर सकते हैं।

3. ''राजा का भयानक से भयानक अत्याचार देश पर कभी कोर्इ बुरा असर पैदा नहीं कर सकता जब तक उस देश के एक-एक व्यकित को अपने सुधर की अटल वासना दृढ़ता के साथ है।-जान स्टूअर्ट मिल

4. ''अन्न्पानजिता दारा सपफलं तस्य जीवनम।

सूत्रा-शैली-

1. ''प्रत्येक देश या जाति के लोगों मेें बल और ओज तथा गौरव और महत्त्व के आने का आत्मनिर्भरता सच्चा द्वार है।

2. ''किसी काम के करने में बाहरी सहायता इतना लाभ नहीं पहुँचा सकती जितना आत्मनिर्भरता।

3. ''गुलाम वही कौम है जिसमें एक-एक व्यकित सब भाँति कदर्य, स्वार्थपरायण और जातीयता के भाव से रहित है।


2.2 2. कविता क्या है? (रामचन्द्र शुक्ल)

2. कविता क्या है?

(रामचन्द्र शुक्ल)

लेखक-परिचय

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 र्इ. की आशिवन शुक्ल पूर्णिमा को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना ग्राम में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा मिर्षापुर में हुर्इ। उन दिनों हिन्दी के पठन-पाठन का विशेष-महत्त्व नहीं था, इसलिए शुक्ल जी की आरमिभक शिक्षा उदर्ू के माèयम से हुर्इ। यधपि उन्होंने इंटरमीडिएट तक ही शिक्षा ग्रहण की किंतु पढ़ने-लिखने में रुचि होने के कारण अंग्रेजी, हिन्दी, उदर्ू एवं संस्Ñत साहित्य का व्यापक ज्ञान इन्होंने स्वाèयाय से प्राप्त किया।

आरंभ में कुछ समय के लिए उनकी नियुकित एक सरकारी कार्यालय में 20 रु. मासिक वेतन पर हुर्इ परंतु उसका मन बहुत दिनों तक यहाँ नहीं रम पाया। कुछ समय बाद वे मिर्षापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग टीचर के रूप में नियुक्त हुए। यहीं से उनका साहित्य-प्रेम जाग्रत हुआ और पं. बदरीनारायण प्रेमध्न के संपर्क से उनके हिन्दी-प्रेम को प्रोत्साहन मिला। इसी समय वे लेखन-कार्य में पूरी तरह जुट गये। 'सरस्वती इत्यादि पत्रिकाओं में उनकी कहानी, कविता, निबंध् छपने लगे और उनकी पहचान हिन्दी के लेखक के रूप में होने लगी। 'नागरी प्रचारिणी सभा में सहायक संपादक के रूप में कार्य करने का आमंत्राण मिलने पर वे काशी आकर रहने लगे। कोश के संपादन का कार्य समाप्त होने पर वे बनारस हिन्दू विश्वविधालय के हिन्दी विभाग में प्राèयापक के रूप में नियुक्त कर लिये गये। बाद में उन्होंने अèयक्ष पद की गरिमा को बढ़ाया और अंत तक उसी पद पर बने रहे। अनेकमुखी साहितियक प्रतिभा के ध्नी इस साहित्यकार का देहावसान 2 पफरवरी 1941 को हुआ।

शुक्ल जी की साहितियक प्रतिभा अनेकमुखी थी। वे कवि, नाटककार, निबंध्कार, आलोचक, अनुवादक, संपादक, साहित्य के इतिहासकार और कोशकार-सभी कुछ थे। हिन्दी साहित्य का पहला और सर्वश्रेष्ठ इतिहास 'हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने का श्रेय शुक्ल जी को जाता है। उनका कोश 'हिन्दी शब्द सागर हिन्दी का पहला पूर्ण और प्रामाणिक कोश माना जाता है। इनकी कीर्ति का आधर-स्तंभ उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

निबंध्- विचारवीथि, चिन्तामणि (भाग 1 और 2)

समीक्षा- जायसी, सूर और तुलसी पर लिखी आलोचनाएँ, रसमीमांसा।

कहानी- ग्यारह वर्ष का समय।

अनुवाद- लाइट आपफ एशिया का 'बु(चरित नाम से काव्यानुवाद, 'दि मिस्ट्री आपफ युनीवर्स का विश्व प्रपंच नाम से अनुवाद और राखालदास बनर्जी के उपन्यासों का अनुवाद-शशांक एवं करूणा।

साहित्येतिहास- हिन्दी साहित्य का इतिहास।

कविता- âदय का मध्ुर भार तथा अन्य कविताएँ।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने यधपि साहित्य की अनेक विधओं पर अपनी लेखनी चलार्इ है तथापि हिन्दी साहित्य में उनकी निष्ठा मुख्यत: निबंध्कार के रूप में हुर्इ। 'चिंतामणि उनके निबंधें का संग्रह है, जिसमें उन्होंने विभिन्न विषयों पर बौ(िक निबंध् रखे हैं। श्र(ा, भकित, करूणा, लज्जा, उत्साह, क्रोध् आदि विषयों पर लिखे गये उनके निबंध् बौ(िक विवेचन से युक्त होने के साथ-साथ व्यंग्य विनोद की छुअन लिये हुए है। इसी प्रकार शुक्ल जी के आलोचनात्मक निबंधें-कविता क्या है, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, तुलसी का भकितमार्ग, काव्य में लोकमंगल की साध्वास्था, साधरणीकरण और व्यकित वैचिंत्रयवाद आदि में भी उनकी विद्वता दृषिट का परिचय मिलता है।

आचार्य शुक्ल : निबन्ध्-शैली

डा. नत्थन सिंह

मेरठ विश्वविधालय

शुक्ल जी की निबन्ध् विषयक मान्यता में पाश्चात्य लक्षणों का प्रभाव है। अर्थात निबन्ध् में व्यकितत्व और व्यकितगत विशेषता की संतुलित स्वीÑति वे मानते हैं। किन्तु सुसम्ब( विचार-श्रृंखला तथा प्रÑत अर्थ योजना के अभाव में उच्छृंखल-विचार प्रवाह को शुक्ल जी ने स्वीकार नहीं किया है। निबन्ध् लेखक स्वेच्छा से विषय की सीमाओं में विचरण करता हुआ अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्रा है, किन्तु किसी न किसी सम्बन्ध् सूत्रा का

आधर उसके पास होना चाहिए। निबन्ध् लेखक के लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपनी सम्पूर्ण मानसिक सत्ता के साथ-'अर्थात बु(ि और भावात्मक âदय दोनों के लिए हुए-अपने विषय-प्रतिपादन में प्रवृत हो। लेखक की प्रÑति का प्रभाव उसकी रचना पर पड़ना सहज है अत: करुण, विनोद, गम्भीर (आदि व्यवस्थाओं का प्रतिपफलन निबन्धें में यथा-स्थान देखा जा सकता है। अर्थगत विशेषता के आधर पर भाषा और अभिव्यंजना-शैली में परिवर्तन भी शुक्ल जी आवश्यक समझते हैं। शुक्ल जी के मन में निबन्ध्-लेखन एक गूढ़ और गम्भीर कार्य है। विचारोदभावना और विचारोत्तेजना करना निबन्ध् का प्रधन गुण होना चाहिए। ''निबन्ध् पढ़ते ही पाठक की बु(ि उत्तेजित होकर किसी नर्इ विचार प(ति पर दौड़ पड़े, वही निबन्ध् अपने उíेश्य में सपफल समझा जाएगा। इसी कारण विचारात्मक निबन्धें का शुक्ल जी सर्वश्रेष्ठ कोटि का निबन्ध् मानते हैं। शुक्ल जी ने अपने निबन्धें में उपयर्ुक्त मान्यताओं को पूरी तरह स्थान दिया है। उक्त मान्यताओं के आधर पर हम शुक्ल जी के 'चिन्तामणि में संकलित निबन्धें पर विचार करेंगे।

'चिन्तामणि में संकलित निबन्धें को हम विचारात्मक कोटि के निबन्धें में स्थान देते हैं-यधपि उन निबन्धें में विचार की कोटियां समान न होकर विविध् हैं। प्रथम कोटि में वे निबन्ध् आते हैं जिन्हें शुक्ल जी ने स्वयं भाव या मनोविकार शीर्षक से मनोवैज्ञानिक वृत्तियों, सिथतियों, और भावनाओं के प्रस्पुफटन के लिए लिखा है। उत्साह, श्र(ा भकित, करुणा, लज्जा और ग्लानि, लोभ और प्रीति, घृणा, र्इष्र्या भय और क्रोध्-ये नौ निबन्ध् इस प्रथम कोटि के विचार प्रधन मनोवैज्ञानिक निबन्ध् हैं। दूसरी कोटि साहित्य विचार प्रधन निबन्धें की है जिनको उíेश्य की दृषिट से दो भागों में विभक्त किया जाता है। प्रथम वर्ग में निबन्ध् हैं जो साहित्य के सै(ानितक (शास्त्राीय) पक्ष का विवेचण-विश्लेषण प्रस्तुत करने के उíेश्य से लिखे गये हैं। जैसे कविता क्या है, काव्य में लोक-मंगल की

साध्नावस्था, साधरणीकरण और व्यकित-वैचित्रयवाद तथा रसात्मक बोध् और विविध्-प्रकार। चिन्तामणि (द्वितीय भाग) के तीनों निबन्ध् भी सै(ानितक समीक्षा के अन्तर्गत आते हैं। अत: उनका विवेचन भी इसी कोटि के भीतर किया जाएगा। दूसरे वर्ग में हम उन निबन्धें को स्थान देंगे जो साहितियक समीक्षा के व्यवहारिक पक्ष को लेकर लिखे गये हैंऋ जिनमें 'भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, 'तुलसी का भकित मार्ग और 'मानस की ध्र्म-भूमि आते हैं। हम क्रमश: इन निबन्धें की शैली पर नीचे के पंकितयों में अपने विचार व्यक्त करेंगे।

शुक्ल जी ने भावों और मनोविकारों को निबन्ध् के लिए एक विशिष्ट उíेश्य से ग्रहण किया था। समस्त मानव जीवन के प्रवर्तक भाव या मनोविकार ही होते हैं अत: सामान्य क्रिया व्यापार से लेकर गम्भीर काव्यादि रचना तक इन्हीं को प्रभाव व्याप्त रहता है। जब तक इनके स्वरूप का बोध् न होगा तब तक मन की प्रवृत्तियों की प्रतीति भी सम्भव नहीं होगी। शुक्ल जी ने इस तथ्य को भली भांति समझकर इन विषयों के विश्लेषण का कार्य अपने हाथ में लिया। भाव और मनोविकार के साथ प्रत्येक मानव का परिचय होता है किन्तु उनके उदभव, विकास और गति को समझना बड़े-बड़े पंडितों और ज्ञानियों के लिए दुष्कर है। यही कारण है कि इन विषयों पर हिन्दी में तो किसी लेखक ने लिखने का साहस ही नहीं किया, अन्य भाषाओं में भी बहुत कम इन विषयों पर लिखा गया है। भारतेन्दु तथा द्विवेदी कालीन निबन्ध् लेखकों ने इन्हें दर्शन की परिधि में समझ कर स्पर्श नहीं किया। द्विवेदी जी ने भय और क्रोध् आदि विषयों पर दो-तीन निबन्ध् लिखें जो सतही स्पर्श के सिवा किसी गूढ़ अभिप्राय की व्यंजना नहीं कर सके। मनोवेगों की उत्पत्ति और उनके लक्षण तथा विकास की दृषिट में रख कर तो कोर्इ लेखक विचार ही नही कर सका था। मनोवैज्ञानिक आधर पर साहितियक शैली में मनोवेगों का सबसे पहली बार आचार्य शुक्ल ने ही विवेचन प्रस्तुत किया।

इन निबन्धें पर विचार करते समय सबसे पहला प्रश्न यह उपसिथत होता है कि मनोवेग या मनोविकार साहितियक परिधि के विषय हैं या मनोवैज्ञानिक होने के कारण दार्शनिक कोटि में रखे जाने योग्य हैं। कुछ विद्वानों ने इन्हें दर्शन का विषय समझकर यह व्यवस्था दे डाली है कि इन विषयों की मीमांसा शास्त्राीय चिन्तन है, साहितियक अभिव्यकित नहीं। इस शंका के निवारणार्थ हम इन निबन्धें के मौलिक स्वरूप का उदघाटन आवश्यक समझते हैं।

दर्शन या मनोविज्ञान चिन्तन-मनन की गूढ़ गम्भीर प्रक्रिया है। वस्तु तथ्य का बोध् और उदघाटन उसका उíेश्य है। तथ्यानुशीलन के कारण बौ(िक तर्क और प्रमाण की शुष्क प(ति उसका आधर बनती है। किन्तु इसके विपरीत काव्य या साहित्य आत्मानुभूति की सरस अभिव्यकित है जो भाव-सत्य पर केनिद्रत होकर मन की संवेदनशील गतियों का परिचय देती है। किसी बौ(िक तत्व की ग्रहण कर उसकी विवृति करना साहित्य का उíेश्य नहीं होता। âदय की रागातिमका वृत्ति के द्वारा सौंदर्य और आनन्द को मूत्र्त करना काव्य या साहित्य का èयेय है। अत: कोर्इ भी साहितियक उपक्रम दार्शनिक मतवाद के साथ अपना पूर्ण तादात्म्य करके जीवित नहीं रह सकता। शुक्ल जी इस तथ्य से भली भांति परिचित थे अत: वे अपनी आत्माभिव्यकित और अनुभूति को दर्शन की शुष्क और नीरस सीमाओं में आब( क्यों करते?

इन निबन्धें में शुक्ल जी ने विषय-प्रतिपादन करते समय यह èयान रखा है कि अपनी अनुभूति और प्रतिनिधि को प्रमुख स्थान मिले, शास्त्राीय वचनों का दामन पकड़कर किसी सि(ान्त की स्थापना न की जाय। किस भाव, विचार या मनोवृत्ति का स्वप्न प्रतिपादन करने में शुक्ल जी ने कहीं भी शास्त्रा का सहारा नहीं लिया। जीवन में प्रतिपफलित होने वाले व्यापारिक दर्शन को पकड़ कर भावों और मनोवेगों की व्याख्या की गर्इ है। कहीं व्यकित के माèयम से इनका वर्णन हुआ है तो कहीं सामाजिक प्रभाव दिखाकर इसका आकलन किया गया है। अत: इन निबन्धें का शास्त्राीय या दार्शनिक विवेचन समझना सरासर भूल है। शुक्ल जी जिस प्रकार साहित्य-विवेचना में रसवादी परिपादन के समर्थ थे वैसे ही इन निबन्धें में भी उनकी रसग्राहिता प्रतिबिमिबत होती दृषिटगत होती है।

मनोवेगों का हमारे जीवन के साथ शाश्वत सम्बन्ध् है। ये मनोवेग एक ओर जहाँ हमारे आèयातिमक जी का निर्माण करते हैं वहीं दूसरी ओर ये हमारे भौतिक अर्थात सांसारिक जीवन का भी नियन्त्राण और निर्माण करने वाले हैं। शुक्ल जी ने मनोविकार (इमोशन) तथा भाव-वृत्तियों (सेंटीमेंट) के वर्णन में उनकी इस द्विविध् कार्य क्षमता का èयान रखा है। साहित्य और जीवन को समपृक्त करके देखने की दिशा में इन निबन्धें का अपूर्व योगदान देकर शुक्ल जी ने अपनी साहित्य-समीक्षा में जिन मान्यताओं को स्थापित किया, यथार्थ में उनका मूलाधर इन मनोविकार-विषयक निबन्धें में ही है। आलोचना के मानदंड के रूप में शुक्ल जी ने इन भाववृत्तियों को स्वीकार किया था। इसी कारण इन पर प्रकाश डालना उन्हें अनिवार्य प्रतीत हुआ। दर्शन की गहन-गूढ़ जटिलता में इनका विश्लेषण उन्हें अभिप्रेत न था। जीवन के व्यवहार पक्ष और साहित्य के वण्र्य पक्ष को इन निबन्धें के मार्ग से एक सूत्रा में पिरोकर प्रस्तुत किया गया, यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता है।

विश्लेषण और व्याख्या का चरमोत्कर्ष इन निबन्धें का शैलीगत सौंदर्य है। विश्लेषण के लिए समता-मता प्रदर्शन, व्यास और समास शैली का ग्रहण, आगमन तथा नियमन-प(ति का सम्यक समन्वय स्थान-स्थान पर जा सकता है।

समास शैली से जहाँ भावाभिव्यकित हुर्इ है, वहाँ निबन्धें में सूत्रात्मक संक्षिप्तता, सौष्ठव और सुसम्ब(ता का सौंदर्य देखा जा सकता है। विशद भावखंड को सूत्रा के सीमित कलेवर में आब( करना एक दुरूह प्रक्रिया है।

लेखक ही इस शैली से विचार व्यक्त करने में सपफल होते हैं जो भाव को भली-भांति पचाकर उसके अनावश्यक विस्तार और अनपेक्षित आवरण को त्यागने में प्रवीण हों। सूत्राात्मक परिभाषाएं सिथर करना तो इससे भी एक कदम आगे की दुस्साèय कला है। शुक्ल जी ने अपने निबन्धें में इस प्रकार की बीसियों सूत्राात्मक परिभाषाए  प्रस्तुत करके अपनी तत्वाभि-निवेशिनी प्रतिभा का परिचय दिया है। उदाहरणार्थ सूत्रा-शैली की कतिपय परिभाषाएं मनन करने योग्य हैं :

(क) 'भकित ध्र्म की रसात्मक अनुभूति है। (चिन्तामणि पृ. 5)

(ख) 'साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है। (चिन्तामणि पृ. 6)

(ग) 'श्र(ा महत्व की आनन्दपूर्ण स्वीÑति के साथ-साथ पूज्य बु(ि का संचार है। (चिन्तामणि, पृ. 17)

(घ) 'वैर क्रोध् का अचार या मुरब्बा है। (चिन्तामणि, पृ. 138)

(Ä) 'काव्य में अर्थ ग्रहण मात्रा से काम नहीं चलता, बिम्ब ग्रहण अपेक्षित होता है। (चिन्तामणि, पृ. 145)

(च) 'श्र(ा, और प्रेम के योग का नाम भकित है। (चिन्तामणि, पृ. 32)

समास शैली का दूसरा रूप वहाँ मिलता है जहाँ लेखक ने दो भावों या मनोविकारों का पारस्परिक सम्बन्ध्, साम्य-वैषम्य, तारतम्य व्यक्त किया है। इस साम्य-वैषम्य प्रदर्शन में सूत्रा रचना का चातुर्य देखकर पाठक शुक्ल जी की मेध और प्रतिभा पर विस्मय-विमुग्ध् हुए बिना नहीं रह सकता। कुछ उदाहरणार्थ द्रष्टव्य हैं :

(क) श्र(ा का व्यापार स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकान्त। प्रेम में घनत्व अधिक है और श्र(ा में विस्तार। (चिन्तामणि, पृ. 18)

(ख) यदि प्रेम स्वप्न है तो श्र(ा जागरण है। (चिन्तामणि, पृ. 18)

(ग) लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख। (चिन्तामणि, पृ. 61)

(घ) साधरण बोलचाल में वस्तु के प्रति मन की जो ललक होती है उसे लोभ ओर किसी व्यकित के प्रति जो ललक होती है उसे प्रेम कहते हैं।

(चिन्तामणि, पृ. 85)

(Ä) वैर का आधर व्यकितगत होता है, घृणा का सार्वजनिक। (चिन्तामणि, पृ. 99)

(च) र्इष्र्या का संकर भाव है जिसकी सम्प्रापित आलस्य, अभिमान और नैराश्य के योग से होती है।

(चिन्तामणि, पृ. 107)

(छ) र्इष्र्या व्यकितगत होती है और स्पर्(ा वस्तुगत। (चिन्तामणि, पृ. 108)

(ज) दु:ख वर्ग में जो स्थान भय का है वही स्थान आनन्द-वर्ग में उत्साह का है।

(चिन्तामणि, पृ. 6)

शुक्ल जी ने अपने निबन्धें में सर्वत्रा समास शैली का ही आश्रय नहीं लिया है। अनेक स्थलों पर व्यास शैली से विषय की व्याख्या प्रस्तुत कर उसका अंत में संक्षेप में सार लिखा है। व्यास शैली की विशेषता व्याख्या और विषय के परिधि-विस्तार में देखी जा सकती है। व्यास शैली में भी दो रूप है, पहला रूप तो केवल किसी भाव या विचार की व्याख्या प्रस्तुत करके उसकी विशद-परिभाषा करना है, दूसरा रूप है उस भाव या विषय की सीमा में आने वाला विविध् विचारों का मूल विषम साम्य-वैषम्य का व्यावर्तन दिखाना। अत: व्यास शैली में भी दोनों प्रकार के अनेक स्थल उपलब्ध् होते हैं। व्यास शैली से विशद परिभाषात्मक प्रसंगों के दो तीन उादाहरण हम प्रस्तुत करते हैं :

(क) उत्साह की व्यास शैली से परिभाषा-

'जिस आनन्द से कर्म की उत्तेजना उत्पन्न होती है और जो आनन्द कर्म करते समय तक बराबर चलता रहता है उसी का नाम उत्साह है।

(ख) श्र(ा की व्यास शैली से परिभाषा-               

 ''किसी मनुष्य में जन-साधरण से विशेष गुण व शकित का विकास देख उसके सम्बन्ध् में जो एक स्थायी आनन्द प(ति âदय में स्थापित हो जाती है, उसे श्र(ा कहते है।

(चिन्तामणि, पृ. 17)

(ग) लज्जा की व्यास शैली से परिभाषा-

''दूसरों के चित्त में अपने विषय में बुरी या तुच्छ धरणा होने के निश्चय या आशंका मात्रा से वृत्तियों का संकोच होता है-उसकी स्वच्छन्दता के विधन का जो अनुभव होता है उसे लज्जा कहते हैं।

(चिन्तामणि, पृ. 56)

(घ) लोभ की व्यास शैली से परिभाषा-

''किसी प्रकार का सुख या आनन्द देने वाली वस्तु के सम्बन्ध् में मन की ऐसी सिथति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्रापित, सानिनèय या रक्षा की प्रबल इच्छा जाग पड़े, लोभ कहते हैं।

दो भावों या मनोविकारों का पार्थक्या प्रदर्शित करते हुए वृत्तियों के व्यावर्तन के लिए भी व्यास शैली का सुन्दर प्रयोग किया गया है। शुक्ल जी ने व्यावर्तक ध्र्म का निर्धरण जिस गहन अनुभूति और मनोवैज्ञानिक आधर पर किया गया है वह उनकी सारग्राही प्रतिभा और मनीक्षा का निदर्शन है। घृणा और क्रोध् में पार्थक्य-प्रदर्शित करते हुए शुक्ल जी ने दोनों विषयों की प्रवृत्ति-निवृति तथा प्रेरक शकित का सूक्ष्म छानबीन के साथ विवेचन किया है। घृणा में विषय से दूर ले जाने की प्रवृत्ति है, यह प्रवृत्ति एक तरह से विषय से निवृत्ति का ही रूप है। घृणा को इसलिए शान्तभाव से सिथर किया है। क्रोध् में हानि पहुँचाने वाले के पास जाते ही उद्वेगमयी (अर्थात) प्रवृति रहती है अत: उसे प्रेरक-उत्तेजक या उद्वेगक भाव कहा जाता है। इस विषय को व्यावर्तन के आधर पर शुक्ल जी ने मनोवैज्ञानिक प(ति से प्रस्तुत कर अपनी चिन्तन शैली का अच्छा परिचय दिया है।

''घृणा का भाव शान्त है, उसमें क्रियोत्पादिनी शकित नहीं होती। घृणा निवृत्ति का मार्ग दिखाती है और क्रोध् प्रवृत्ति का। घृणा विषय से दूर ले जाने वाली है और क्रोध् हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति उत्पन्न कर विषय के पास ले जाने वाली है।

(चिन्तामणि, पृ. 99)

इसी प्रकार लोभ और प्रीति का पार्थक्य सि( करते हुए दोनों शूल प्रवृत्तिपरक ध्र्मों का शुक्लजी ने मनोविज्ञान के आधर पर वर्णन किया है। यथार्थ में लोभ और प्रीति के बीच का अन्तर इतना सूक्ष्म और क्षणिक है कि उसका व्यावत्र्तन करना कभी-कभी कठिन हो जाता है। पिफर भी शुक्ल जी ने व्यकित और वस्तु के आधर पर उसका भेद सिथर करने की सपफल चेष्टा की है। ''मन की ललक यदि वस्तु के प्रति होती है तो लोभ और किसी प्राणी या मनुष्य के प्रति होती है तो प्रीति कहलाती है। लज्जा और ग्लानि के विषय में भी लेखक ने इसी शैली का अनुसरण करके उनके ध्र्म-पार्थक्य द्वारा दोनों की सीमाएँ निर्धरित की हंै। इस वर्णन में प्राय: गहन चिन्तनपूर्ण व्यास शैली का आश्रय लिया गया है। हां, अभिव्यंजना अवश्य तत्सम-प्रधन और सुगठित पदावली द्वारा हुर्इ है। साधरण पाठक को इस प्रकार के गंभीर चिन्तनपूर्ण स्थलों पर यदि कुछ किलष्टता प्रतीत हो तो यह लेखक का नहीं पाठक के ज्ञान की सीमा का ही दोष समझा जाएगा। विचारों में सघनता होने पर भी स्वच्छता और स्पष्टता का कहीं अभाव नहीं है।

शुक्ल जी गम्भीर प्रÑति के मननशील व्यकित थे। हास्य-विनोद उनकी सहज वृत्ति नहीं थी। अत: उनकी रचनाओं में विनोदपूर्ण हास्य की खोज करना व्यर्थ है। हाँ, किसी विषय का प्रतिपादन करते समय उस पर व्यंग्यमयी शैली से प्रकाश डालने के लिए शुक्ल जी हास्य का प्रयोग करते हैं किन्तु उनका हास्य प्राय: व्यंग्यात्मक और वस्तुपरक (आब्जेकिटव) होने के कारण पाठक के सिमत आनन तक ही सीमित न रह कर उसके अन्तर में पैनी लकीर नचता चला जाता है। उनका लक्ष्य विकच हास्य नहीं-विकल व्यंग्य होता है जो अपने उíेश्य तक पैने तौर की तरह पहुँचे बिना नहीं रुकता। व्यंग्यात्मक हास्य का प्रयोग टेढ़ी-खीर है ...सामान्य कोटि लेखक के लिए यह साèय नहीं। शुक्ल जी ने भी इसका प्रयोग बहुतायत से नहीं किया है। उनके निबन्धें में इसका प्रयोग विरल है। तीन-चार स्थलों पर उनका हास्य शु( सरल हास्य ही रहा है और किसी प्रखर व्यंग्य के बिना, मृदुल मोहक हँसी तक ही अपनी शकित को समेटे रहता है। हास्य और व्यंग्य का भेद यही है कि हास्य में छींटाकशी न होकर मनोरंजन ही प्रधन लक्ष्य रहता है किन्तु व्यंग्य में वण्र्य या अभिव्यंग्य को सन्मुख रखकर सोíेश्य प्रहार करना अभीष्ट होता है। व्यंग्य की प्रखरता उसके प्रहारजन्य प्रभाव से आंकी जाती है, हास्य की केवल मनोरंजन से। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के

निबन्धें में दोनों कोटि के हास्य-व्यंग्य मिलते हैं। पिफर भी इतना èयान रखना चाहिए कि शुक्ल जी ने तामस कोटि के पूफहड़ हास्य को कहीं भी स्थान नहीं दिया। हम उनके निबन्धें में से कुछ उदाहरण दोनों प्रकार के हास्य को प्रस्तुत करते हैं।

''संगीत के पेच-पांच देखकर हठयोग याद आता है। जिस समय कोर्इ कलावन्त पक्का गाना गाने के लिये, आठ अंगुल मुंह पफैलाता है और 'अ आ करके विकल होता हे उस समय बड़े-बड़े वीरों का ध्ैर्य छूट जाता है। दिन-दिन भर चुपचाप बैठे रहने वाले आलसियों का शासन डिग जाता है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 24)

''काव्य पर शब्दालंकार आदि का इतना बोझ लादा गया कि उसका सारा रूप ही छिप गया। यदि ये कलाएं मूर्तिमान रूप धरण करके सामने आतीं तो दिखार्इ पड़ता कि किसी को जलोदर हुआ है, किसी को पफीलपाँव। इनकी दशा सोने और रत्नों से जुड़ी गुठली धर की तलवार की सी हो गर्इ। (चिन्तामणि, पृ. 25)

''रसखान तो किसी की लकुटी और कमरिया पर तीनों पुरों का राज सिंहासन तक त्यागने को तैयार थे, पर देश-प्रेम की दुहार्इ देने वालों में से कितने अपने किसी थके मादे के पफटे-पुराने कपड़ों और ध्ूल भरे पैरों पर रोश कर-या कम से कम खीझकर बिना मन मैला किये कमरे की पफर्श भी मैली होने देंगे? मोटे आदमियों, तुम जरा सा दुबले हो जाते-अपने अंदेसे से ही सही-तो न जाने कितनी ठठरियों पर मांस चढ़ जाता।

(चिन्तामणि भाग 1, पृ. 77)

''इस जमाने में वीरता का प्रसंग उठाकर वाग्वीर का उल्लेख यदि न हो तो बात अध्ूरी ही समझी जाएगी। ये वाग्वीर आजकल बड़ी-बड़ी सभाओं के मंचों पर से लेकर सित्रायों के उठाए हुए पारिवारिक प्रपंचों तक में पाए जाते हैं और कापफी तादाद में। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 14)

उपरिलिखित चारों उदाहरणों में शुक्ल जी का हास्य पाठक को मोहक हास्य के वातावरण में ले जाने की पूरी शकित रखता है। पक्के गाने वाले कलावन्त का मुँह, काव्य कलाओं को जलोदर और पफीलपांव की बीमारी मोटे आदमियों का स्वार्थ वृत्ति तथा आध्ुनिक युग के वाग्वीरों की शूर वीरता किसे हँसी से परिपूर्ण नहीं करती।

मृदुल हास्य के साथ तीखा-व्यंग्य भी शुक्ल जी के निबन्धें में प्रचुर मात्राा में मिलता है। 'हिन्दी साहित्य के इतिहास में तो व्यंग्यात्मक हास्य के बहुत ही मार्मिक उदाहरण मिलते हैं। निबन्धें में इस कोटि के व्यंग्य का प्रयोग अन्ध्विश्वास, छल, दम्भ, कपट आदि भावों को स्पष्ट करने के लिए हुआ है, ऐसे स्थलों पर व्यंग्य की èवनि एक ओर जहाँ हास्य की सृषिट करती है वहाँ दूसरी ओर उन रूढि़यों और छलनाओं के-सामाजिक या धर्मिक असंगतियों-के प्रति मन में कुत्सा और वितृष्णा का भाव भी उत्पन्न करती है। इस प्रकार के हास्य मिश्रित व्यंग्य में हल्की-सी चोट रहती है जो पाठक की चेतना को जागरित कर उसे प्रस्तुत विषय पर विचार करने के लिए बाèय कर देती है। यह शैली काव्य के अप्रस्तुत विधन का ही रूप है जिसकी सराहना निबन्ध् पढ़ने पर प्रत्येक पाठक अवश्य करेगा। 'ह्राूमर और 'सेटायर में विट का पुट देकर शुक्ल जी ने व्यंग्यात्मक हास्य का जो मिश्रण तैयार किया है वह अपनी प्रभावोत्पादन में अद्वितीय है। इन उदाहरणों से हमारे इस कथन की पुषिट होगी।

''पर ..........श्र(ाकर्षण के लिए ढाेंगी व्यकितयों का वर्णन करते हुए शुक्ल जी ने बड़ी मीठी चुटकी लेते हुए लिखा है -

''आश्चर्य नहीं कि इसके लिए कुछ दिनों में एक अलग विधालय खुले। .....आजकल सार्वजनिक उधोगों की बड़ी ध्ूम रहा करती है और बहुत से लोग निराहार परोपकार व्रत करते सुने जाते हैं।     

 लज्जा और संकोच का भेद बताते हुए संकोच को लज्जा हल्का रूप ठहराते हुए कहते हैं कि प्राय: बहुत से लोगों में यह अनेक अवसरों पर देखा जाता है। आगे इसी संकोच की बात कहते हुए व्यंग्य किया है :

''सारांश यह है कि बेवकूपफी करने में लोग संकोच नहीं करते और सब बातों में करते हैं।

ध्न के लोभ का वर्णन करते हुए बड़ा ही सुन्दर व्यंग्य किया है-''रूपये के रूप, रस, गंध् आदि में कोर्इ आकर्षण नहीं होता, पर जिस वेग से मनुष्य उस पर टूटते हैं, उस वेग से भौंरे कमल पर और कौए मांस पर भी न टूटते होंगे। आगे लोभ की वृ(ि और लक्ष्य की एकता का उल्लेख करते हुए ध्न की लौलुपता पर बड़ी सटीक उकित है ....''लक्ष्मी की मूर्ति धतुमयी हो गर्इ, उपासक सब पत्थर हो गये। राज-ध्र्म, आचार्य-ध्र्म, वीर-ध्र्म सब पर पानी पिफर गया, सब टका ध्र्म हो गये .....केवल वणिग्ध्र्म रह गया।

प्रीति के स्वरूप पर और उसके ग्रहण करने के नाम पर बड़ी मार्मिक उकित देखिए ....मेल से क्या-क्या लाभ होते हैं, यह तो न जाने कितने झगड़ालू बताते हैं और न जाने कितने लोग मुनकर झगड़ा करते हैं।

लोभ में आपादमग्न Ñष्ण व्यकितयों का उपहास करते हुए शुक्ल जी ने जिस व्यंग्यमयी प्रखर शैली को स्वीकार किया है वह हास्यपूर्ण कठोर व्यंग्य का सुन्दर निर्देशन है ........''लोभियो ! तुम्हारा अक्रोध्, तुम्हारा इनिद्रयनिग्रह, तुम्हारी मानापमान-समता, तुम्हारा तप अनुकरणीय है। तुम्हारी निठुरता, तुम्हारी निर्लज्जता, तुम्हारा अविवेक, तुम्हारा अन्याय विगर्हणीय है। तुम ध्न्य हो तुम्हें धिक्कार है। इस संदर्भ में प्रत्येक शब्द का अभिध्ेयार्थ ही इतना अर्थ गर्भ पूर्ण है कि पाठक के समक्ष प्रत्येक पद-पदार्थ मूर्तिमान होता जाता है। शुक्ल जी के निबन्धें में इस तरह के चुटीले व्यंग्य अनेक स्थानों पर मिलते हैं। देश-प्रेम की बात करते हुए कहते हैं कि 'जो देश की प्रÑति और के स्वरूप का चिन्तन कर उसमें मग्न होता है वह सच्चा देश प्रेमी है। भले ही घूम-घूम कर वक्तृता दे या न दे, चन्दा इकटठा करे या न करे, देशवासियों की आमदनी का औसत, निकाल या न निकाले। इसी प्रकार आध्ुनिक युग के उपकरणों और सामाजिक कार्यों पर व्यंग्य करते हुए कहा है-'अनाथालय के लिए चैक काटना, सर्वस्व हरण के लिए जाली दस्तावेज बनाना, मोटर की चरखी घुमाना आदि द्वारा रसपरिपाक सम्भव नहीं है।

भाव और मनोविकार सम्बन्ध्ी निबन्धें के मूल मं कोर्इ न कोर्इ गम्भीर विचार रहता है जिसकी विवेचनात्मक शैली से निवृत्ति करना लेखक का अभीष्ट होता है। अत: निबन्ध् में अर्थ से इति तक एक ही प्रभाव का समंजस्य बनाये रखने पर भी विषय के स्पष्टीकरण के लिए विषयान्तर या प्रासंगिक सदभावनाएं स्वीकार करने पर लेखक को विवश होना पड़ता है। सपफल लेखक वह है जो विषय प्रतिपादन के लिए प्रसंग प्राप्त विषयान्तर ग्रहण करके भी मूल विचार की प्रभावानिवति में विघ्नबाध उपसिथत न होने दे। शुक्ल जी के निबन्ध् प्रभावानिवति की दृषिट से इतने सुसम्ब( और पुष्ट हैं कि उनकी आवान्तर उदभावनाएं उन्हें कहीं भी शिथिल या निर्जीव नहीं बनने देती। हाँ, विषयान्तर स्वीकार करने में शुक्ल जी ने एक दो स्थलों पर वैयकितक स्वतन्त्राता का पूरा-पूरा उपयोग किया है। उन्हीं दो एक स्थलों को लेकर कुछ लोगों ने यह आपत्ति उठार्इ थी कि शुक्ल जी अपनी मान्यताओं की स्थापना के लिए अप्रासंगिक रूप से विषयांतर ग्रहण कर लेते हैं। किन्तु उस स्थलों का भी यदि निष्पक्ष भाव से पारायण किया जाय। तो उनमें गम्भीर दोष-दर्शन का अवकाश न मिलेगा। उदाहरणार्थ श्र(ा और भकित के प्रसंग में क्षात्रा-ध्र्म की उत्Ñष्टता का प्रतिपादन करते हुए शुक्ल जी ने लम्बा प्रवचन प्रस्तुत कर दिया है। यह ठीक है कि श्र(ा भकित के प्रसंग में क्षात्रा-ध्र्म का यह उपदेश संदर्भ के साथ पूर्णतया अनिवत नहीं होता और पाठक को लगता है कि जैसे लेखक अपनी क्षात्रा-ध्र्म विषयक मान्यताओं को ऐसे अवसर पर सि(ान्त खंड के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जिसके लिए कदाचित यह उचित अवसर नहीं है। सबसे त्राुटिपूर्ण बात यह है कि यह निबन्ध् इसी क्षात्रा-ध्र्म सि(ान्त के प्रवचन में मूल विषय से उचिछन्न होकर एकदम (एवरप्टली) समाप्त हो जाता है।

विषयांतर का दूसरा उदाहरण 'लोभ और प्रीति निबन्ध् में द्रष्टव्य है। प्रीति के अन्तर्गत लेखक ने देशप्रेम को घसीटा है और उसका प्रतिपादन इस शैली से किया है कि पाठक की उसमें रुचि नहीं होती। देश प्रेम का वर्णन करते हुए इध्र-उध्र की बातें, जिनका साक्षात प्रीति से कोर्इ सम्बन्ध् नहीं है प्रस्तुत की गर्इ है और लिखने म वैयकितक अभिरुचि का भी पुट दे दिया गया है। देश प्रेम के भीतर ही प्रÑति प्रेम का भी ब्यौरेवार वर्णन है। कहीं-कहीं अवान्तर प्रसंग केवल विषय की सोदाहरण व्याख्या के लिए ही आये हैं उसमें प्रसंग-गर्भत्व तत्व भी रहता है। भारतीय इतिहास का पौराणिक आख्यान की कोर्इ मार्मिक घटना या व्यकित ऐसे अवसरों पर अंकित किया गया है। किन्तु ये अवान्तर प्रसंग प्रभावोत्पादन के साथ विषय की मूल विचारधरा में व्याघात उत्पन्न नहीं करते। पफलत: विचार का सतत प्रभाव रुकने पर भी मूल प्रभावासिथति का तारतम्य बना रहता है। इसके अतिरिक्त कहीं-कहीं अपने काव्य सि(ान्तों का भी भाव और मनोविकार-विषयक निबन्धें में वर्णन इन्हीं आयान्तर प्रसंगों या विषयान्तरों द्वारा लेखक ने किया है ऐसे स्थलों पर मूल उíेश्य तो विषयक की विवेचना ही है किन्तु उनका समर्थन किया गया है स्वमन्तव्यों द्वारा लेखक-संग्रह, शील और सौन्दर्य, काव्य में लोक मंगल की साध्नावस्था आदि को उच्च स्थान देने के लिए शुक्ल जी ने विषयान्तर किया है। इन निबन्धें में शुक्ल जी के काव्य सि(ांत खंड रूप में छिटके पड़े हैं।

शुक्ल जी के निबन्धें की भाषा अत्यधिक प्रौढ़, तत्सम प्रधन और प्रांजल है। गुमिपफत वाक्य रचना के लिए भावव्यंजक पदावली का जैसा सुन्दर चयन शुक्ल जी ने किया है वैसा हिन्दी निबन्ध् लेखकों में अन्यत्रा नहीं मिलता। कहीं-कहीं भाषा में कविता का लालित्य भी दृषिटगत होता है। तर्कपूर्ण वैज्ञानिक शैली के साहित्य निबन्धें की भाषा का मानदंड शुक्ल जी के इन्हीं भाव और मनोविकार-सम्बन्ध्ी निबन्धें से सिथर किया जा सकता है।

विषय-प्रतिपादन के अवसर पर व्याख्यात्मक शैली के साथ भाषा भी अपेक्षÑत सरल और प्रवाहमयी है वहाँ न तो गूढ़ भाव्य व्यंजक किलष्ट पदावली का प्रयोग है और न लाक्षणिक या शास्त्राीय शब्दों की भरमार। सीध्ी-सादी अभिव्यकित का ही लेखक ने आश्रय लिया है। वाक्य-योजना वार्तालाप शैली की होने से इतनी सहज है कि यह नहीं प्रतीत होता कि लेखक किसी भाव या मनोविकार का रहस्य समझाने का प्रयत्न कर रहा है। भाषा का रूप घरेलू बातचीत के समान जाना-पहचाना सा बना रहता है। जैसे-

''मान लीजिए कि एक ओर से हमारे गुरुजी और दूसरी ओर से एक दंडधरी दुष्ट दोनों आते दिखार्इ पड़े। ऐसी अवस्था में पहले हमें उस दुष्ट का सत्कार करके तब गुरुजी को दण्डवत करना चाहिए। इन दो वाक्यों में बात को समझाने की शैली घरेलू बातचीत की है। शब्द भी तदभव ही है। इस प्रकार की भाषा व्याख्यात्मक शैली से किसी विषय को स्पष्ट करने के लिए प्राय: प्रत्येक निबन्ध् में मिलेगी।

भाषा का दूसरा रूप तत्सम और किलष्ट-पद योजनापूर्ण है। ऐसे स्थलों पर सूक्ष्म भाव का साहितियक भाषा द्वारा विवेचन किया गया है।

''लोभ का प्रथम संवेदनात्मक अवयव है किसी वस्तु का बहुत अच्छा लगना, उससे बहुत सुख या आनन्द का अनुभव होना। अत: वह आनन्द स्वरूप है।

''भकित में किसी ऐसे सानिनèय की प्रवृत्ति होती है जिसके द्वारा हमारी महत्व के अनुकूल गति का प्रसार-और प्रतिकूल गति का संकोच होता है। इस प्रकार का सामीप्य लाभ करके हम अपने ऊपर पहरा बिठा देते हैं।

तत्सम पदावली से परिपूर्ण वाक्य-योजना से तो ये निबन्ध् आधोपान्त भरे पड़े हैं। अत: उदाहरण देकर विस्तार करना व्यर्थ है। अब काव्यमयी सरस भाषा वालें स्थलों का निर्देश करना हम आवश्यक समझते हैं। शुक्ल जी साहित्य में चमत्कार का सदा विरोध् करते रहे। उनकी मान्यता का कि कोरा शब्द चमत्कार न तो सुन्दर काव्य का स्रष्टा है और न वह उन्नत विचारशील भावुक का स्थायी मनोरंजन ही कर सकता है। अत: चमत्कार से बचना ही श्रेयस्कार है। किन्तु कहीं-कहीं वे स्वयं इस चमत्कार की सृषिट कर गये हैं। शुक्ल जी ने जिस समय साहित्य से परिचय प्राप्त करना प्रारम्भ किया था। उस समय बदरीनारायण चौध्री प्रेमध्न अपनी दीर्घ-समास-शैली से निबन्ध् लिखने में संलग्न थे। शुक्ल जी ने उनकी शैली से अव्यक्त रूप में प्रभाव ग्रहण किया। यधपि वे प्रेमध्न जी की शैली के समर्थक नहीं थे। किन्तु उनके प्रेमी पाठक अवश्य थे। चिन्तामणि के निबन्धें में तीन-चार ऐसे दीर्घ समास शैली वाले स्थल हैं जहाँ कविता की भाषा को शुक्ल जी ने गध का परिधन देकर प्रस्तुत किया है। कहना न होगा कि उन स्थलों पर 'प्रेमध्न जी की शैली का अव्यक्त प्रभाव है-

''जो केवल प्रपुफल्ल प्रसूर प्रसार के सौरभ संचार, मकरन्द लौलुप मध्ुप गुंजार, कौकिल कूजिन निकुंज और शीतल सुख-स्पर्श समीर इत्यादि की ही चर्चा करते हैं वे विषयी या भाग-लिप्सु हैं। इसी प्रकार जो केवल मुक्ताभास हिमबिन्दुपंडित मरकताभ शाद्वल-जाल, अत्यन्त विशाल गिरिशिखर से गिरते हुए जल प्रताप के गंभीर गर्त से उठी हुर्इ सीकर नीहारिका के बीच विविध् वर्ण स्पुफरण की विशालता, भव्यता और विचित्राता में ही अपने âदय के लिए सब कुछ पाते हैं .....तमाशबीन हैं।

''जैसा कि कहा जा चुका है, सौंदर्य का दर्शन मनुष्य में ही नहीं करता है प्रत्युक्त पल्लव-गुमिपफत पुष्पहास मेंऋ पक्षियों के पक्षजाल में, सिन्ध्ुराम सान्èय दिंगचल के हिरण्य मेखला-मंडित घनखंड में, तुषारावृत्त तुंग गिरि शिखर में, चन्द्रीकरण से झलझलाते निर्झर में और न जाने कितनी वस्तुओं में वह सौन्दर्य की झलक पाता है।

(चिन्तामणि भाग 1, पृ. 145)

उपयर्ुक्त दोनों उदाहरणों की भाषा अत्यन्त कवित्वपूर्ण एवं अनुप्रासमयी है। इसका कारण शुक्ल जी की प्रवृत्ति न होकर प्रसंग की अनिवार्यता ही समझना चाहिए। जिन संदर्भो में अन्य शैली को लेखक ने स्वीकार किया है वे काव्य का वातावरण प्रस्तुत करने वाले हैं अत: तदनुकूल अनुप्रासमयी कवित्वपूर्ण भाषा भी सहज ही में आ गर्इ है। पिफर भी निबन्धें में ऐसी भाषा के लिए विशेष अवकाश नहीं होता।

मुहावरे और लोकोकितयों का प्रयोग शुक्ल जी के निबन्धें में विरल है। दो तीन स्थलों को छोड़कर कहीं भी मुहावरे नहीं आये हैं। जिन स्थलों पर मुहावरों का प्रयोग हुआ है वह एक सुनिशिचत वाक्य योजना के साथ हैं। देखिए-

''यदि सब की ध्ड़क, एकबारगी खुल जाए तो एक ओर छोटे मुंहों से बड़ी-बड़ी बातें निकलने लगें, चार दिन के मेहमान तरह-तरह की पफरमाइशें करने लगें, उंगली का सहारा पाने वाले बांहु पकड़ कर खींचने लगें, दूसरी ओर बड़ों का बड़प्पन निकल जाए, गहरे-गहरे साथी बहरे हो जायें या सूखा जबाब देने लगें, जो हाथ सहारा देने के लिए बढ़ते हैं वे ढकेलने के लिए बढ़ने लगें-पिफर तो भलमनसाहत का भार उठाने वाले इतने कम रह जायें कि वे उसे लेकर चल ही न सकें। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 66)

''अनिष्ट से बचने-बचाने के लिए इष्ट यही है कि हम दुष्टों का हाथ थामें और ध्ृष्टों का मुंह। उनकी वन्दना करके हम पार नहीं पा सकते। इध्र हम हाथ जोड़ेंगे उध्र वे हाथ छोड़ेंगे। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 64)

''पर जब हम उस वस्तु की ओर हाथ बढ़ायेंगे या औरों को उसकी ओर हाथ बढ़ाने न देंगे तब बहुत से लोगों का èयान हमारे इस Ñत्य पर जाएगा जिनमें से कुछ हाथ थामने वाले और मुंह लटकाने वाले भी निकल

सकते हैं। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 72)

तत्सम और तदभव शब्दों के साथ उदर्ू पफारसी के कुछ गिने चुने शब्द तथा प्रान्तीय बोली के भी पांच-सात शब्द शुक्ल जी के निबन्धें में साभिप्राय प्रयुक्त हुए हैं। यह समझ रखना चाहिए कि उदर्ू, पफारसी या देशज शब्दों के स्थान पर उन्होंने तत्सम शब्दों का प्रयोग जान-बूझ कर बचाया है क्योंकि जिस विशिष्ट भाव की अभिव्यंजना उदर्ू-पफारसी या देशज शब्दों से सम्भव है वह तत्सम या तदभव शब्दों द्वारा नहीं। उदाहरणार्थ, हम पफारसी के 'इजारा काव्य का ही ले इसके स्थान पर हिन्दी का कोर्इ पर्यायवाची शब्द वैसी समर्थ और विशद व्यंजना नहीं कर सकता जो इस शब्द में समाविष्ट है। एकाधिपत्य के लिए 'इजारा का व्यवहार अंग्रेजी के 'मोनोपली से भी अधिक व्यंजक प्रतीत होता है। इसी प्रकार एक दूसरे स्थान पर पूरे वाक्य की योजना उदर्ू शैली में बहुत ही भावपूर्ण बन पड़ी है। ...इसी बात का विचार करके सलाम-साध्क लोग हाकिमों से मुलाकात करने से पहले अर्दलियों से उनका मिजाज पूछ लिया करते हैं। इस वाक्य में पाँच उदर्ू-पफारसी के शब्द हैं किन्तु उनका प्रयोग इतना व्यावहारिक और चालू शैली से हुआ है कि उनके लिए पर्यायवाची तलाश करना व्यर्थ है। झूठी कवायद, पिफजूल की शिकायत, दुरंगी झलक, आशिक-माशूक के किस्से, मुनादी होना, कठहुज्जती आदि इसी तरह के अन्य उदर्ू शब्दों के प्रयोग हैं जा  अपने प्रचलित रूप से वाक्य रचना के साथ ऐसे पिफट बैठते हैं कि उसकी जगह समानार्थ हिन्दी शब्दों को कोर्इ सâदय स्वीकार नहीं करेगा। अलवत, चुनांवे, गोया आदि भी कहीं दीख पड़ते हैं। प्रान्तीय देशज शब्दों में ढब, दुर्री, झोंक, परच, लहक आदि थोड़े से प्रयोग हैं। किन्तु इनका माध्ुर्य संदर्भ में ही सराहा जा सकता हैं। व्यावहारिक और प्रचलित शब्दों को भी शुक्ल जी ने स्वीकार किया है .... जैसे अटकल-पच्चू, पेफर-पफार, कलेजा चीरना, इध्र-उध्र पिफरना, तड़क-भड़क आदि।

शुक्ल जी की भाषा की सबसे उल्लेख्य विशेषता है समर्थ एवं भाव्यव्यंजक शब्दों का नूतन निर्माण। ऐसे भी अनेक शास्त्राीय शब्द हैं जिनका प्रयोग शुक्ल जी से पहले हिन्दी निबन्ध् या समालोचना में किसी ने नहीं किया था। संस्Ñत साहित्य-शास्त्रा के उन शब्दों का शुक्ल जी ने बेध्ड़क प्रयोग किया और उन्हें सर्वजन-सुलभ बनाया। अंग्रेंजी समीक्षा शास्त्रा के शब्दों को भी शुक्ल जी ने भावानुवाद के माèयम से हिन्दी में ग्रहण किया गया और उनका प्रचार करके परवर्ती लेखकों के लिए उपादेय बनाया। यदि ऐसे शब्दों की तालिका तैयार की जाए तो वे कर्इ सौ होंगे। अंग्रेजी शब्दों का अनुवाद यधपि सब जगह पूर्ण व्यंजक नहीं हुआ पिफर भी उसमें अर्थबोध् की पर्याप्त शकित है। कहीं-कहीं साधरण बोलचाल के रूप में प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी की तत्सम रूप में ही ग्रहण किया है जैसे, पैफशन, पास, सेक्चर आदि शब्द। कहीं-कहीं अंग्रेजी मुहावरों का हिन्दी रूपान्तर भी शुक्लजी ने स्वीकार किया है।

आचार्य शुक्ल के 'चिंतामणि में संकलित विचारात्मक मनोवैज्ञानिक निबन्धें के विषय में विवाद रहता है कि ये विषय प्रधन हैं अथवा व्यकित प्रधन। इस संबंध् में अपना निर्णय देने से पूर्व हम स्वयं लेखक के स्पष्टीकरण की ओर पाठक का èयान आÑष्ट करना चाहते हैं। चिन्तामणि के निवेदन में शुक्ल जी ने इन निबन्धें को अपनी अन्तयात्राा में पढ़ने वाले कुछ प्रदेश माना है। बु(ि और âदय के सहयोग से भावलोक की यह यात्राा सम्पन्न हुर्इ है। यात्राी तो बु(ि ही है पर एकाकी नहीं ....âदय उसका साथी है। यात्राा के मार्ग (विषय) का संधन बु(ि ने किया है किन्तु मार्मिक प्रदेशों में पहुंचने पर âदय उनमें रमा है। अर्थात बु(िपथ पर âदय भी अपने लिए कुछ न कुछ पाता रहा है। उक्त परिष्कार के बाद लेखक ने यह निर्णय नहीं दिया कि वह इन निबन्धें को व्यकित-प्रधन मानता है या विषय-प्रधन।

शुक्ल जी के निवेदन का यदि विश्लेषण किया जाए जो इतना तो स्पष्ट है कि इन निबन्धें का मुख्य संबंध् बु(ि (विषय) से रहा है। बु(ि पथ पर âदय (व्यकित) को भी कुछ न कुछ मिलता अवश्य रहा है किन्तु यात्राा बु(ि ने की है। अत: बु(ि के प्रमुख होने पर विषय की प्रमुखता तो अपने आप ही सि( हो जाती है। पिफर भी यह प्रश्न विवादस्पद क्यों बना, यह विचारणीय है।

व्यकित-प्रधन निबन्ध् (पर्सनल ऐसे) की सीमा मर्यादा पर विचार करने पर यह प्रश्न सुलझ जाता है। वैयकितक भावनाओं, विचारों, अनुभूतियों और मान्यताओं के आरोप से जो निबन्ध् लिखे जाते हैं जिनमें व्यकितगत सुख-दुख, रुचि-अरुचि, त्याग ग्रहण की ही चर्चा होती है वे व्यकित प्रधन कहे जाते हैं। अंग्रेजी में चाल्र्स लैम्ब, लीहंट हैजलिट और स्टीवेंसन प्रभृति लेखकों में इस कोटि के निबन्ध् लिखने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। हिन्दी में बालÑष्ण भटट और प्रतापनारायण मिश्र के निबंध् इस कोटि के हैं। वर्तमान युग में बाबू गुलाबराय ने उच्चकोटि के वैयकितक निबंध् लिखे हैं। बाबू जी के आत्मव्यंजक निबन्ध् हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ कोटि के हैं। उनके निबन्धें के विषय भी कही-कभी इतने आत्मनिष्ठ और वैयकितक होते हैं कि पाठक को रसानुभूति होने पर भी लेखक के निजी रूप के छाप से मुकित नहीं मिलती। उन निबन्धें में लेखक कभी-कभी ऐसी विलक्षण और वैयकितक अनुभूति और मान्यता का वर्णन प्रस्तुत करता है जो सामान्य पाठक की अनुभूति से तादात्मय नहीं रखती। पफलत: उनको विषय-प्रतिपादन और व्यकित के निकट पाकर हम व्यकित प्रधन कह देते हैं। व्यकित प्रधन निबन्धें के विषय का स्वरूप इतना क्षीण और दुर्बल रहता है कि उसकी ओर न तो लेखक का èयान जाता है और न पाठक ही पूरा निबन्ध् पढ़कर प्रतिपाध विषय से अवगत होता है। व्यकित प्रधन निबन्धें की जहां यह कमजोरी है वहां रोचकता और सरलता के कारण उनमें पाठक की चित्तवृत्ति को रमाए रखने की प्रबल शकित होती है। कभी-कभी तो पाठक गल्प, उपन्यास या आत्मकथा क सदृश रसानुभूति करने लगता है और उनमें लीन होकर यह विस्मृत कर बैठता है कि वह निबन्ध् पढ़ रहा था या लेखक के आत्मचरित का कोर्इ मोहक विवरण। इन निबन्धें में लेखक प्राय: प्रथम पुरुष में आत्माभिव्यकित करके किसी घटना या तथ्य का वर्णन प्रस्तुत करता है।

इसके विपरीत विषय-प्रधन निबन्ध् का आधर प्रतिपाध वस्तु होती है जिसकी रूप-संघटना के लिए लेखक को युकित, तर्क, प्रमाण, दृष्टान्त आदि प्रस्तुत करके उसका आकार बड़ा करना होता है। लेखक को अपने अध्ीन और अनुभूति ज्ञान की समस्त अर्जित सम्पत्ति विषय प्रतिपादन में लगानी होती है। लोक व्यवहार èयान में रखकर उसका भी अपने विषय की पुषिट में उपयोग करना पड़ता है। तात्पर्य यह कि प्रतिपाध विषय को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्राों में सामग्री चयन करके उसे ऐसा रूप देना अनिवार्य समझा जाता है कि जो पाठक के लिए सुपाठय होने के साथ-साथ बु(िग्राá हो सके। पफलत: विषय-प्रधन निबन्ध् की आत्मा का निर्माण व्यापक भाव सामग्री से होता है, केवल लेखक की आत्माभिव्यंजक उकितयों या अनुभूतियों के चित्राण से नहीं विषय-प्रधन निबन्ध् जब किसी विचार या भाव को केन्द्र बिन्दु मानकर लिखे जाते हैं तब लेखक उसमें उन्हीं आत्मानुभूतियों का पुट दे सकता है जो आत्म-सीमा का अतिक्रमण कर सहज ही परानुभूति भी बनने में समर्थ हों। दूसरे शब्दों में एक व्यकित की अनुभूति होने पर भी उनकी संवेदना अनेक की बन सके अर्थात वे व्यषिट सीमा से पूरे समषिट में समा सके। प्रतिपाध विषय काल की दृषिट से कालातीत, देश की दृषिट से सार्वदेशिक और व्यकित की दृषिट से सार्वजनिक होकर सबक बन सके। विषय-प्रधन निबन्धें में व्यकितत्व का आरोप केवल शैली में किया जा सकता है। समर्थ लेखक सदैव अपनी वैयकितक शैली को अक्षुण्ण रखते हुए विषय का प्रतिपादन करते हैं। उनके विषय-प्रधन निबन्ध् भी अभिव्यंजना में व्यकितत्व की ऐसी गहरी छाप लेकर सामने आते हैं कि उनका प्रत्येक वाक्य, प्रत्येक शब्द लेखक के नाम का जो बोध् करता सुनार्इ देता है।

व्यकित-प्रधन और विषय-प्रधन निबन्ध् की सीमाओं का संक्षेप में वर्णन करने के बाद शुक्ल जी के निबन्धें पर दृषिटपात करने से यह निष्कर्ष सहज ही में निकाला जा सकता है कि भाव या मनोविकार-सम्बन्ध्ी विषयों पर लिखते समय लेखक के समक्ष गंभीर तथ्य-निरूपण ही प्रमुख रहा है। लेखक का èयेय सूक्ष्म भाव या मनोविकार का वैज्ञानिक विवेचन करना है, उसका मनमाना अनर्गल वर्णन करना नहीं। लोकानुभव की-भित्ति पर लेखक ने अपने प्रतिपाध का भवन खड़ा किया है, केवल वैयकितक विचार या कल्पना के आधर पर मन की मौज या तरंग में बहक कर इन्हें नहीं लिखा है। सु Üाृंखल विचार-परम्परा की निहिति लेखक का जागरूक प्रयत्न है। अभीष्ट विषय को तर्क, युकित, प्रमाण और लोक दृष्टान्त द्वारा प्रस्तुत करने का तात्पर्य यही है कि ये निबन्ध् व्यकित सीमा (लेखक) को लांघकर समषिट-सीमा (सâदय पाठक) में समा सकें। अत: निबन्ध् की कसौटी पर कसने पर इन्हें विषय-प्रधन ही समझते हैं। हाँ, व्यकितत्व का स्पृहणीय संयोग इन निबन्धें में लेखक ने अभिव्यंजना-शैली और कहीं-कहीं विषय-प्रतिपादन के लिए दृष्टान्त आदि प्रस्तुत करने में किया है। उस स्पृहणीय संयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती और इसलिए इन निबन्धें के वैयकितक पक्ष पर विचार करते करते समय उसका उचित मूल्यांकन भी करना आवश्यक है।

शुक्ल जी के भाव मनोविकार-सम्बन्ध्ी निबंधें पर दृषिटपात करते समय मूलत: उनके प्रतिपाध पर ही èयान रखना चाहिए क्योंकि लेखक भावों और मनोविकारों का सामाजिक तथा साहितियक दृषिट से स्वरूप-निर्धरण करने में प्रवृत्त हुआ है, उसके सम्बन्ध् में अपनी वैयकितक रूचि या भावना का वर्णन करना उसका लक्ष्य नहीं है। अत: इस भ्रम के लिए कोर्इ अवकाश नहीं कि शुक्ल जी के निबन्ध् व्यकित प्रधन हैं और इनका मूल्यांकन वस्तु के आधर पर न करके व्यकित विचार के आधर पर होना चाहिए। उनके निबन्ध् अकेले लेखक के âदय से ही सम्बन्ध् नहीं रखते वरन मनुष्य मात्रा की भावात्मक सत्ता पर प्रभाव डालने वाले हैं।

शुक्ल जी समर्थ शैलीकार निबन्ध् लेखक हैं। उनकी शैली का वैशिष्टय शब्द-चयन पदयोजना, वाक्य-रचना-सादृश्य विधन आदि सभी क्षेत्राों में देखा जा सकता है। शैली को व्यकितत्व का प्रतिरूप कहा जाता है।-'स्टाइल इज द मैन इटसेल्पफ का प्रयोजन भी यह है कि समर्थ शैली निर्माता अपनी प्रत्येक रचना में अपने सम्पूर्ण व्यकितत्व के साथ प्रतिबिमिबत रहता है। व्यकितत्व की यह स्पष्ट छाप देख यदि कोर्इ पाठक उस रचना को व्यकित प्रधन समझ बैठे तो यह उसकी भूल है। शैलीगत व्यकितत्व तो प्रत्येक समर्थ लेखक की पहचान है। इसके अभाव से लेखक को साहित्य में स्थायित्व ही नहीं मिलता। अत: व्यकितत्व के स्वरूप का निर्धरण करते समय शैली से ही किसी रचना को व्यकित-प्रधन नहीं कहा जा सकता। 'पर्सनल एस्से का तात्पर्य है उसमें निहित भाव, विचार या वस्तु का वैयकितक रूप से वर्णन। कभी-कभी इस प्रकार के वर्णन व्यकितगत अनुभूति या कल्पना तक ही सीमित रहते हैं, पाठक का उनके साथ न तो तादात्म्य होता है और न साधरणीकरण द्वारा आनन्दोपलबिध् ही। किन्तु सभी व्यकितप्रधन निबन्धें में यह त्राुटि नहीं पार्इ जाती। सुन्दर निबन्ध् व्यकित प्रधन होने पर भी इतने रोचक और आकर्षक होते हैं कि पाठक का मन उनमें लीन होकर रसानुभूति करता है।

व्यकित-प्रधन निबन्धें की एक शैली प्रथम पुरुष का प्रयोग है। 'मैं सर्वनाश का प्रयोग लेकर स्थान-स्थान पर स्वानुभूतियों को उपन्यास करके निबन्ध् को कलेवर देता है। शुक्ल जी ने भी अपने निबन्धें में अनेक स्थलों पर 'मैं सर्वनाम द्वारा स्वानुभूति या स्वमत प्रकाशन की शैली स्वीकार की है। शु( आत्माभिव्यकित का स्वरूप विषय से दूर मन की तरंग में बहकर वर्णन करना मात्रा है जो शुक्ल जी को कभी ग्राá नहीं हुआ। अत: प्रथम पुरुष 'मैं शब्द के प्रयोग से इन निबन्धें को व्यकित प्रधन ठहरा देने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए। प्रथम पुरुष में वैयकितक घटनाओं का वर्णन या स्वमत प्रकाशन के कतिपय प्रसंगों का संकेत हम चिन्तामणि के निबन्धें में कर सकते हैं-

''एक दिन मैं काशी की एक गली से जा रहा था। एक ठठेरे की दुकान पर कुछ परदेसी यात्राी किसी बरतन का मोल भाव कर रहे थे और कह रहे थे कि इतना नहीं-इतना लो तो लें। इतने ही में सौभाग्यवश दुकानदार जी को ब्रह्राज्ञानियों के वाक्य याद आ गए और उन्होंने चट कहा-''गाया छोड़ो और इसे ले लो। सोचिए तो, काशी ऐसा पुण्य क्षेत्रा। यहां न माया छोड़ी जाएगी तो कहां छोड़ी जाएगी। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 28)

''एक बार मैंने देखा कि एक ब्राह्राण देवता चूल्हा पूंफकते-पंूफकते थक गये। जब आग न जली, तब उस पर कोप करके चूल्हे में पानी डाल किनारे हो गए। इस प्रकार का क्रोध् अपरिष्Ñत है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 135)

''मैं अपने एक लखनवी दोस्त के साथ सांची का स्तूप देखने गया। वसन्त का समय था। महुए चारों ओर टपक रहे थे। मेरे मुंह से निकला-'महुओं की कैसी मीठी महक आ रही है। इस पर लखनवी महाशय ने मुझे रोककर कहा, 'यहां महुए-सहुए का नाम न लीजिए, लोग देहाती समझेंगे। मैं चुप हो गया, समझ गया कि महुए का नाम जानने से बाबूपन में बड़ा भारी बटटा लगता है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 78)

''मिलकर कोर्इ कार्य करने से उसका साध्न अधिक या सुगम होता है, यह बताना 'पर उपदेश कुशल नीतिज्ञों का काम है, मेरे विचार का विषय नहीं। मेरा íेश्य तो मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों की छानबीन है जो निश्चयातिमक वृत्ति से भिन्न है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 79)

उलिलखित चारों उ(रणों में लेखक ने प्रथम पुरुष एकवचन सर्वनाम 'मैं द्वारा भावाभिव्यकित की है। इन प्रसंगों में प्रथम पुरुष का प्रयोग किसी घटना विशेष की ओर पाठक का èयान आÑष्ट कर मूल विषय के प्रतिपाध के साथ उसे संयुक्त करना है। वे स्वानुभूतिपरक घटनायें केवल आत्माभिव्यंजन के उíेश्य से नहीं लिखी गर्इ हैं अत: इस प्रकार के पांच दस प्रसंगों के आधर पर निबन्धें को व्यकित-प्रधन नहीं ठहराया जा सकता है।

संक्षेप में, इन निबन्धें में विषय-प्राधन्य होने पर भी विद्वान लेखक ने व्यकितगत शैली और यथास्थान उदाहरण, दृष्टान्त आदि द्वारा व्यकितत्व का ऐसा सुन्दर समावेश किया है कि हम लेखक के व्यकितत्व का क्षण भर के लिए भी विसर्जन नहीं कर पाते। विषय और व्यकितत्व के समीचीन समन्वय से ही इन निबन्धें की रचना हुर्इ है किन्तु केवल व्यकितगत अनुभूति, मान्यता या अभिरुचि के आधर पर विषय-प्रतिपादन नहीं किया है। व्यकितत्व का समावेश विषय का सहायक और समर्थक है, स्वतन्त्रा रूप से निबन्ध् का अधिष्ठान उसमें नहीं है।

विवेचनात्मक शैली के माèयम से लेखक ने लोभ के मूल कारणों को सरल शब्दावली में व्यक्त किया है।

'कविता क्या है?

डा. मनीराम यादव

एसोसिएट प्रोपेफसर, मुक्त शिक्षा विधालय

दिल्ली विश्वविधालय

निबंध्-सार :

कविता का पर्याय काव्य है। काव्य के लक्षण संस्Ñत के आचार्यों ने अपने अपने दृषिटकोण से प्रस्तुत किए हैं। काव्य की आत्मा का निर्धरण भी विभिन्न सि(ान्तों के स्थापक आचार्यों ने अपने-अपने दृषिटकोण से किया है। कविता के लक्ष्य को èयान में रखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यह स्पष्ट किया है कि सृषिट के नाना रूपों के साथ मनुष्य भी भीतरी रागातिमका प्रÑति का सामंजस्य स्थापित करता है। इस मान्यता से काव्य-लक्षणों के मतभेद दूर हो जाते हैं जो विशेषत: रस आदि के भेद-प्रतिबंधें के कारण चल पड़े हैं। 'वाक्यं रसात्मक काव्यम में जो अव्यापित दिखार्इ पड़ी है वह नौ भेदों के कारण। प्राÑतिक दृश्यों के वर्णन में एक प्रकार का रस अवश्य है। 'षट)तु के अंतर्गत कुछ इनीगिनी वस्तुओं को लेकर कभी नायिका को हर्ष से पुलकित करके और कभी विरह से विकल करके कवि लोग चलते हुए।

कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। बु(ि की अपेक्षा मन ही सबको उत्साहित करता है। अत: मन में वेग का आना आवश्यक है। कविता के द्वारा हम संसार के सुख-दु:ख, आनंद और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव करने में अभ्यस्त होते हैं जिससे âदय की स्तब्ध्ता रहती है और मनुष्यता आती है। लोभी, क्रूर âदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक ध्र्म पर लाने का सामथ्र्य काव्य ही में है।

मनोरंजन करना कविता का वह प्रधन गुण है जिससे वह मनुष्य के चित्रा को अपना प्रभाव जमाने के लिए वश में किए रहती है। यही कारण है कि नीति और ध्र्म-संबंध्ी उपदेश चित्रा पर वैसा असर नहीं करते जैसाकि काव्य या उपन्यास से निकली हुर्इ शिक्षा असर करती है। मनोरंजन करना और सुख पहुंचना ही यदि कविता का ध्र्म माना जाय तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुर्इ। लेखक को खेद है कि हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने Üाृंगार रस को उन्मादकारिणी उसितयों से भर दिया है कि कविता भी विलास की एक सामग्री समझी जाने लगी है।

कविता का काम मनोरंजन ही नहीं, कुछ और भी है। चरित्रा चित्राण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं।

कवि का कार्य भकित, श्र(ा, दया, करुणा, क्रोध् और प्रेम आदि मनोवेगों को तीव्र और परिवर्तित करना है तथा सृषिट की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त संबंध् सिथर करना है।

कविता का उच्च आदर्श है। मनुष्य के âदय को उन्नत, उदात्त करती है और ऐसे-ऐसे उत्Ñष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है। कविता सृषिट सौंदर्य का अनुभव कराती है। कविता सौन्दर्य और सातिवकशीलता या कत्र्तव्य परायणता में भेद नहीं देखा चाहती। इसी से उत्कर्ष साध्न के लिए कवियों ने प्राय: रूप-सौंदर्य और अन्त:करण के सौंदर्य का मेल कराया है। अत: कविता उच्चाशष, उदार और नि:स्वार्थ âदय की उपज है। उसका दुरुपयोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद में नहीं करना चाहिए।

कविता की भाषाओं में पुराने शब्द आध्ुनिक और पुरातन कविता के बीच संबंध्-सूत्रा का काम देते हैं। कविता में कही गर्इ बात चित्रारूप में हमारे सामने आती है, संकेत रूप में नहीं। अत: उसमें गोचर रूपों का ही विधन अधिकतर होता है, उसमें प्रत्यक्ष और स्वभावसि( व्यापार-सूचक शब्दोें की संख्या अधिक रहती है। 'समय बीता जाता है कहने की अपेक्षा 'समय भाग जाता है कहना अधिक काव्य-संगत है। 'किसी काम से हाथ खींचना, किसी का रूपैया खा जाना, कोर्इ बात पी जाना, दिन ढलना या डूबना, मन मारना आदि ऐसी ही कवि 'समय सि( वाक्य हैं जो बोलचाल में आ गए हैं। शास्त्रा और व्यवहार की शब्दावली को छोड़कर शेष शब्दावली काव्यसम्मत है। कुछ शब्द ऐसे हैं जिससे कर्इ क्रियाओं का एक ही साथ बोध् होता है, जैसे 'वहाँ बड़ा अत्याचार हो रहा है। इस 'अत्याचार शब्द के अंतर्गत मारना, पीटना, डाटना, डपटना, लूटना-पाटना इत्यादि बहुत से व्यापार हो सकते हैं। इससे कल्पना में किसी एक व्यापार का स्पष्ट चित्रा अंकित नहीं होता जिससे यह शब्द कविता के काम का नहीं है। तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो किन्हीं संयुक्त व्यवहारों की सूचना देते हैं, कविता में वांछित नहीं। 'तुमने उससे विग्रह किया साधरण वाक्य है। 'तुमने उसका हाथ पकड़ा यह अर्थगर्भित काव्योचित वाक्य है।

नाद-सौंदर्य और भाव-सौंदर्य- दोनों के संयोग से कविता की सृषिट होती है। छंद और तुक दोनों नाद-सौंदर्य के उíेश्य से रखे गए हैं। नाद-सौंदर्य कविता को स्थायी बनाता है। यह कविता की आत्मा नहीं तो शरीर अवश्य है। आचार्य शुक्ल जी सचेत करते हैं कि केवल श्रुति-मध्ुर अक्षरों के पीछे दीवाने रहना और कविता को अन्याय गुणों से भूषित न करना सबसे बड़ा दोष है।

कहीं-कहीं व्यकितयों के नामों के स्थान पर उनके रूप, गुण, या कार्य-बोध्क शब्दों का व्यवहार किया जाता है। 'गिरिध्र, मुरारि, त्रिपुरारि, दीनबंध्ु, चकपाणि, दशमुख आदि शब्द ऐसे ही हैं। ऐसे शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का èयान अवश्य रखना चाहिए। Ñत्रिमता से बचाने के लिए ऐसा करना उचित है। यह कविता की अत्यतम विशेषता है।

कविता में अलंकार- भिन्न-भिन्न वर्णन प्रणालियों का नाम अलंकार है अर्थात वर्णन करने की प्रणाली या प(ति का नाम अलंकार है। इनका उपयोग काव्य में प्रसंगानुसार विशेष रूप से होता है। जहाँ किसी प्रकार की रस-व्यंजना होगी वहीं किसी वर्णन प्रणाली को अलंकरता प्राप्त हो सकती है। रस और भाव ही कविता के प्राण हैं। काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है। किन्तु बाद में अलंकारों के लिए आग्रह बढ़ने लगा। चन्द्रलोकवर ने लिख डाला कि ''जो अलंकार रहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अगिन को उष्णता रहित क्यों नहीं मानता। किन्तु आचार्य शुक्ल की स्पष्ट मान्यता है कि 'रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्मा है। वर्णन करने की प्रणाली का नाम अलंकार है, किसी वस्तु विशेष से उसका संबंध् न हो। वस्तुनिर्देश अलंकार का विषय नहीं, वह यथार्थ में रस का विषय है। अलंकार वर्णन-शैली मात्रा के कह सकते हैं। इस दृषिट से कर्इ अलंकार ऐसे हैं जिन्हें अलंकार नहीं कहना चाहिए, जैसे स्वाभावोकित, अत्युकित, स्मरण, अल्प, उदात्त। स्वभावोकित में वण्र्यवस्तु का निर्देश है, परन्तु वस्तुनिर्वाण अलंकार का काम नहीं, शब्द-कौशल के कारण वे चित्त को चमत्Ñत करती हैं, उनसे रस-संचार नहीं होता। वे चमत्Ñत भले ही करें पर मानव âदय के स्त्राोंतों से उनका विशेष संबंध् नहीं। अलंकारों को हठात लाने का उधोग नहीं होना चाहिए।

भाषा-शैली

आचार्य शुक्ल की भाषा तत्सम बहुला संस्Ñतनिष्ठ है। अपने निबंधें में उन्होंने समास और व्यास शैलियों के साथ उदाहरण शैलियों का प्रयोग किया है। अपनी बात को समझाने के लिए उन्होंने इन वाक्यों का बहुध प्रयोग किया है-सारांशत: कहा जा सकता है कि कहने का तात्पर्य यह है कि, कहने का अभिप्राय यह है कि, बात यह है कि, जो कुछ अब तक कहा गया उससे यह स्पष्ट है कि आदि। इन प्रयोगों के पीछे उनका शिक्षक स्वभाव रहा है। वे एक बात को अनेक तरह से समझाने का प्रयास करते हैं। निबंध् का प्रारंभ समास शैली या सूत्रा-शैली से करते हैं- ''कविता वह साध्न है जिसके द्वारा शेष सृषिट के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध् की रक्षा और निर्वाह होता है। आगे पंकितयों में 'राग की व्याख्या करते हैं। दूसरे अनुच्छेद की प्रारंभिक पंकितयों में कविता का कार्य स्पष्ट करते हैं-''रागों का वेगस्वरूप मनोशकितयों का सृषिट के साथ उचित सामंजस्य स्थापित करके कविता मानव जीवन के कायकत्व की अनुभूति उत्पन्न करने का प्रयास करती है। अन्यथा मनुष्य के जड़ हो जाने में कोर्इ संदेह नहीं, उदाहरण शैली का नमूना द्रष्टव्य है- ''एक साधरण-सा उदाहरण लीजिए। ''तुमने उससे विग्रह किया यह बहुत ही

साधरण वाक्य है। पर ''तुमने उसका हाथ पकड़ा यह एक विशेष अर्थगर्भित और काव्योचित वाक्य है।      


मान्यताएं :

1. सृषिट के नाना रूपों के साथ मनुष्य की भीतरी रागातिमक प्रÑति का सामंजस्य ही कविता का लक्ष्य है।

2. इस बात का निश्चय हो जाने पर वे सब मतभेद दूर हो जाते हैं जो काव्य के नाना लक्षणों और विशेषत: रस आदि के भेद प्रतिबंधें के कारण चल पड़े हैं। èवनि संप्रदाय वालों का नैयायिकों से उलझना, अलंकारियों का रस प्रतिपादनों से झगड़ना एक पतली गली में बहुत से लोगों का ध्क्कम-ध्क्का करने के समान है।

3. कार्यप्रवृत्ति के लिए मन में वेग का आना आवश्यक है।

4. लोभी, क्रूर âदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक ध्र्म पर लाने का सामथ्र्य काव्य ही में है।

5. कविता का काम मनोरंजन ही नहीं, कुछ और भी है। चरित्रा-चित्राण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं।

6. जीते जी मृतवत, हो जाने वाले मनुष्य की कविता ही दवा है।

7. नाद-सौंदर्य और भाव-सौंदर्य-दोनों के संयोग से कविता की सृषिट होती है।

8. लक्ष्य ग्रंथ पहले रचे जाते हैं और लक्षण ग्रंथ बाद में।

9. भिन्न-भिन्न वर्णन-प्रणालियों का नाम अलंकार हैं।

10. जब से इन अलंकारों को हठात लाने का उपयोग होने लगा तब से कविता कुछ बिगड़ चली।


व्याख्या-भाग

''कविता वह साध्न है जिसके द्वारा शेष सृषिट के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध् की रक्षा और निर्वाह होता है। राग से यहाँ अभिप्राय प्रवृत्ति और निवृत्ति के मूल में रहनेवाली अंत:करणवृत्ति से है। जिस प्रकार निश्चय के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का बाá या मानस प्रत्यक्ष अपेक्षित होता है। यही हमारे रागों या मनोवेगों के जिन्हें साहित्य में भाव कहते हैं- विषय हैं। कविता उन मूल और आदिम मनोवृत्तियों का व्यवसाय है जो सजीव सृषिट के बीच सुखदुख की अनुभूति से विरूप परिणाम द्वारा अत्यंत प्राचीन कल्प में प्रकट हुर्इ हैं और जिनके सूत्रा से शेष सृषिट के साथ तादात्म्य का अनुभव मनुष्य जाति आदि काल से करती चली आर्इ हैं।

प्रसंग

प्रस्तुत अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित 'कविता रस है? नामक निबंध् से उदध्ृत है। इसके कविता की परिभाषा निरुपित है।

व्याख्या

कविता समस्त सृषिट के नाना रूपों के साथ मानव के रागात्मक संबंधें की रक्षा और उनके निर्वाह का ऐसा साध्न है जो मनुष्य की भीतरी रागातिमक प्रÑति का सामंजस्य स्थापित करती है। कविता जगत के नाना रूपों और व्यापारों के साथ उनका उचित संबंध् स्थापित करने का भी उधोग करती है। राग का अर्थ है प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात अनुकूल और प्रतिकूल या सुख और दु:ख के मूल में रहनेवाली अंत:करणवृत्ति जिसमें मन, बु(ि, चित्त और अहंकार की अन्त:करण चतुष्टय समिमलित हैं। किसी चीष के निश्चय करने के लिए जिस तरह प्रमाण की आवश्यकता होती है और प्रमाण-प्रमेय की एकता स्थापित हो जाती है, उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का बाá या मानस का प्रत्यक्ष होना आवश्यक है। ये ही भाव हमारे रागों या मनोवेगों के विषय हैं। ये भाव हमारे अंत:करण में आदिकाल से उदभूत होते आ रहे हैं जो सजीव सृषिट के बीच सुख-दुख की अनुभूति कराते हैं, इनके अभाव में व्यकित अपने को जड़ अनुभव करता है। भावों के संवेग और संवेदनाएँ सृषिट के प्रारंभ से हो चले आ रहे हैं। इन्ही  के द्वारा हमारा तादात्म्य सृषिट के साथ होता है। यह तादात्म्यावस्था आलंबन के सामान्यीकरण के बाद आश्रय से तादात्म्य स्थापित करने की अवस्था है जिसका अनुभव मानव-जाति सृषिट के आदिकाल से करती आ रही है। इन रागों या मनोवृत्तियों का सृषिट के साथ उचित सामंजस्य स्थापित करके कविता मानवजीवन के व्यापकत्व की अनुभूति उत्पन्न करने का प्रयास करती है। यही एकरसता की सिथति है जिसका कविगण अनुभव करते रहते हैं।

विशेष-

1. कविता की परिभाषा दी गर्इ है।

2. निबंध् की प्रारंभिक पंकितयों में समास शैली है, पिफर उसकी विश्लेषणात्मक प(ति में व्याख्या निरुपित है।

3. तुलनात्मक शैली द्वारा प्रमाण-प्रमेय की एकता स्थापित की गर्इ है।

4. साधरणीकरण सि(ान्त का परोक्ष रूप में निरूपण है जिससे तादात्म्य सिथति आती है, जो हिन्दी आलोचकों की चर्चा का विषय रहा है।


2.3 3. अशोक के फूल आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी


3. अशोक के फूल

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

- डा. विजयबाला तिवारी

ऐसोसिएट प्रोफसर,

मुक्त शिक्षा विधालय, दिल्ली विश्वविधालय

लेखक परिचय -

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन 1907 में बलिया जिले (उत्तर प्रदेश) के ग्राम ओझवलिया में हुआ। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविधालय से ज्योतिष एवं संस्Ñत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा समापित के बाद सन 1930 से 1950 तक वे शांति निकेतन में विश्वभारती के हिन्दी के अèयक्ष पद पर कार्य करते रहे। सन 1950 से 1960 तक वे काशी हिन्दू विश्वविधालय के हिन्दी विभाग के अèयक्ष रहे। तत्पश्चात पंजाब विश्वविधालय, चण्डीगढ़ में अèयक्ष एवं प्रोपफेसर के पद पर प्रतिषिठत हुए। इसके पश्चात उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविधालय के कुल निदेशक और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाèयक्ष पद का कार्यभार भी संभाला। उनकी विद्वता से प्रभावित होकर लखनऊ विश्वविधालय ने उन्हें डीúलिटú की उपाधि प्रदान की तथा भारत सरकार ने 'पदमभूषण की उपाधि से विभूषित किया।

विचारधरा एवं व्यकितत्व- आचार्य द्विवेदी के समस्त साहित्य में एक विशिष्ट सांस्Ñतिक गरिमा तथा उदार मानवतावादी दृषिट का प्रसार दिखार्इ देता है। वे मनुष्य को ही साहित्य का सर्वोपरि लक्ष्य घोषित करते थे। मनुष्य के विचारों को सही दिशा देना तथा उसके सहज मानवीय विकास में सहायक होना ही साहित्य का एकमात्रा लक्ष्य है। आचार्य द्विवेदी की यह विचारदृषिट उनकी सभी रचनाओं में विधमान है। अपनी Ñति 'साहित्य-सहचर में साहित्यकार के दायित्वों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा है-''लक्ष्य है मनुष्य जीवन के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करके मनुष्यता के वास्तविक लक्ष्य तक ले जाने का संकल्प, मनुष्य के दु:खों को अनुभव करा सकने वाली दृषिट की प्रतिष्ठा और ऐसे दृढ़ चेता आदर्श चरित्राों की सृषिट जो दीर्घकाल तक मनुष्यता को मार्ग दिखाते रहें। आचार्य द्विवेदी के साहितियक व्यकितत्व का यह मानवीय पक्ष उनकी रचनाओं में, विशेष रूप से उनके निबन्धें में भी विधमान है।

आचार्य द्विवेदी के अनेक निबन्धें में प्रÑति के सहज-नैसर्गिक सौन्दर्य के चित्रा भी मिलते हैं, जो प्रÑति के प्रति उनकी विशेष अनुरकित के परिचायक हैं। अशोक, शिरीष, केदार आदि के विषय में लिखे गए अपने निबन्धें में द्विवेदी जी ने इन पुष्यों के सौंदर्य को बड़ी बारीकी से उदघाटित किया है। ये निबन्ध् द्विवेदी जी के सौन्दर्य बोध् तथा ललित व्यकितत्व के परिचायक हैं।

आचार्य द्विवेदी का व्यकितत्व भारतीय संस्Ñति तथा ऐतिहासिक परम्पराओं के प्रति आस्थावान है। वे सामान्य से सामान्य विषय या समस्या से अपना निबन्ध् प्रारम्भ कर देते हैं और पिफर उसे गहरे सांस्Ñतिक चिंतन से जोड़ते हुए मानवीय जीवन-मूल्यों का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हैं। साथ ही वे किसी भी तथ्य का वर्णन करते समय उसका ऐतिहासिक साक्ष्य अवश्य देते हैं। आचार्य द्विवेदी का यह इतिहास बोध्, सांस्Ñतिक अनुभूति तथा मनुष्य की आश्चर्यजनक शकित के प्रति उनकी आस्था उनके व्यकितत्व को अत्यन्त विशिष्ट बना देती है।

आचार्य द्विवेदी का व्यकितत्व आस्थावान होने के साथ-साथ अèययनशील भी है। द्विवेदी जी के अèययन का क्षेत्रा बहुत व्यापक है। संस्Ñत, प्राÑत, अपभ्रंश, बंगला आदि भाषाओं तथा इतिहास, दर्शन, संस्Ñति, साहित्य, ध्र्मशास्त्रा आदि विषयों का उन्हें गहरा ज्ञान है। द्विवेदी जी की इस ज्ञानराशि तथा विद्वता की छाप उनके निबन्ध में सर्वत्रा दिखार्इ देती है। अपनी ज्ञानराशि का उपयोग करते हुए द्विवेदी जी समकालीन परिवेश में प्राचीन परम्पराओं के महत्त्व तथा शाश्वत औचित्य का भी वर्णन करते हैं।

आचार्य द्विवेदी की रचनाओं में उनके उन्मुक्त तथा सहज व्यकितत्व का परिचय भी मिलता है। गंभीर पांडित्य के साथ-साथ उन्मुक्तता, सहज आत्मीयता और विनोदप्रियता उनके व्यकितत्व की परिचायक विशेषताएँ हैं।

इस प्रकार आचार्य द्विवेदी का व्यकितत्व पांडित्य, विद्वत्ता, सहजता, आत्मीयता तथा संवेदनशीलता के समिमश्रण से निर्मित है। उनके निबन्धें तथा अन्य रचनाओं में इस समृ( व्यकितत्व की छाप लक्षित की जा सकती है।

रचनाएँ : आचार्य द्विवेदी की रचनाओं में निबन्धें के अतिरिक्त आलोचना ग्रन्थ तथा उपन्यास भी हैं।

आलोचना ग्रंथों में 'सूर साहित्य द्विवेदी जी की पहली रचना है। यह पहली बार सन 1930 के आसपास प्रकाशित हुर्इ थी। दूसरी रचना 'हिन्दी साहित्य की भूमिका (1904 र्इú) में द्विवेदी जी एक समर्थ इतिहासकार और मर्मी समीक्षक के रूप में सामने आए। आचार्य द्विवेदी की प्रसि( पुस्तक 'कबीर सन 1941 में प्रकाशित हुर्इ। इसमें द्विवेदी जी ने कबीर के व्यकितत्व और उनसे सम्ब( साहित्य का मंचन करके शोध्परक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनके द्वारा लिखित 'हिन्दी साहित्य का आदिकाल (1952 र्इú) हिन्दी की आरंभिक साहित्य संबंध्ी उलझनों का समाधन प्रस्तुत करने वाला इतिहास ग्रन्थ है। 'कालिदास की लालित्य-योजना (1965 र्इú) नामक अपनी पुस्तक में उन्होंने कालिदास के माèयम से भारतीय सौन्दर्य चेतना की व्याख्या की है। 'मèयकालीन बोध् का स्वरूप (1970 र्इú) में आचार्य द्विवेदी ने मèयकालीन साहित्य का अनुशीलन करके उसके मूल स्वर को रेखांकित किया है। 'नाथ संप्रदाय नामक पुस्तक में उन्होंने नाथ सम्प्रदाय के उदभव, विकास और महत्त्व को स्पष्ट किया है। इनके अतिरिक्त 'साहित्य सहचर, 'साहित्य का मर्म, 'मृत्युंजय रवीन्द्र आदि उनकी प्रसि( अनुसंèाात्मक तथा आलोचनात्मक Ñतियाँ हैं।

उपन्यास : 'बाणभटट की आत्मकथा, 'चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा तथा 'अनामदास का पोथा : आचार्य द्विवेदी के चार उपन्यास हैं। निबन्धें की तरह आचार्य द्विवेदी के उपन्यास भी प्राचीन भारत के ऐतिहासिक यथार्थ और व्यापक रूप से मानवीय यथार्थ ओढ़े हुए हैं। इन उपन्यासों से विद्वान लेखक के अपार पांडित्य और संवेदनशीलता का परिचय मिलता है। 'बाणभटट की आत्मकथा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हर्षवर्(न के शासनकाल के प्रारंभिक वषो± से संबंधित है। 'चारु चंद्रलेख की कथा गाहड़वार नरेश जायित्रा चन्द्र या जयचंद की पराजय के बाद के समय से संबंधित है। 'पुनर्नवा की कथा समुद्रगुप्त के राज्यारोहण के आसपास की है। 'अनामदास का पोथा औपनिपदिक युग (प्रागैतिहासिक काल) का चित्रा प्रस्तुत करता है। आचार्य द्विवेदी के ये उपन्यास प्राचीन भारत का मात्रा सूचनात्मक इतिहास प्रस्तुत नहीं करते। वरन अपने सांस्Ñतिक-बोèा, भाषा के कलात्मक सौन्दर्य, वर्णन कौशल तथा रागात्मक सौन्दर्य की वजह से कलात्मक कथाÑति के रूप में सामने आते हैं।

निबन्ध् : आचार्य द्विवेदी के प्रमुख निबन्ध्-संग्रह 'अशोक के पफूल, 'कल्पलता, 'विचार और वितर्क, 'विचार प्रवाह, 'कुटज और 'आलोक पर्व। द्विवेदी जी के निबंधें में विषय की विविध्ता है। उन्होंने ऐतिहासिक, सांस्Ñतिक, वैयकितक, साहित्य समीक्षा विषयक अनेक प्रकार के निबंध् लिखे हैं। उनके ऐतिहासिक विषयों से संबंधित विवरणात्मक निबंèाों में 'कलाओं की प्राचीनता, 'स्नान-भोजन, 'दोला-विलास आदि प्रमुख हैं। सांस्Ñतिक विषयों पर लिखे गए निबन्धें में 'मेरी जन्मभूमि, 'शकुन सूकित, 'भारतवर्ष की सांस्Ñतिक समस्या आदि प्रमुख हैं। आचार्य द्विवेदी ने भावात्मक कोटि के ललित निबंध् भी लिखे। जिनमें 'आम पिफर बौरा गए, 'शिरीप के पफूल, 'अशोक के पफूल आदि विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। उनके साहित्य समीक्षा विषयक विचारात्मक निबन्धें में 'समीक्षकों की समीक्षा, 'भक्तों की परंपरा, 'कवि प्रसि(ियाँ, 'जैन साहित्य आदि आते हैं। ये सभी प्रकार के निबंध् द्विवेदी जी की गहरी सांस्Ñतिक अनुभूति के धोतक हैं।

निबन्ध् शैली : आचार्य द्विवेदी के निबंध् विभिन्न प्रकार के विषयों से संबंधित हैं। अत: उन निबन्धें की रचना शैली भी विभिन्न प्रकार की है। उनके निबन्धें के विषयों के अनुरूप शैली स्वयं ही अपना रूप बदलती रहती है। विचारात्मक तथा बु(ि प्रधन निबन्धें में विवेचन शैली प्रयुक्त हुर्इ है। विवरणात्मक, वर्णनात्मक तथा ललित निबन्धें में विचारों की गहनता और गंभीरता के अनुकूल समास शैली, प्रवाह शैली, प्रसाद तथा व्यंग्य शैली का भी प्रयोग हुआ है। पर द्विवेदी जी की निबन्ध् शैली की विशेषता यह है कि उनका निबन्ध् चाहे समीक्षात्मक, विवेचनात्मक या समास शैली में लिखा गया हो पर उनमें एक विशेष प्रकार की भावात्मकता सभी स्थलों पर मिलती है। वस्तुत: सांस्Ñतिक अनुभूति और मानवीय भावबोध् द्विवेदी जी के व्यकितत्व और Ñतित्व के नियामक तत्त्व हैं। अत: उनके सारे निबन्ध् और सारी शैलियाँ इन दो तत्त्वों से परिचालित दिखार्इ देती हंै। वे किसी विषय का विवेचन करने तथा अपने मन की स्थापना के बाद उसकी पुषिट भावात्मक प(ति से करते हैं। उनके निबन्èाों में प्रयुक्त विभिन्न शैलियों का अलग-अलग परिचय इस प्रकार है :-

1. विवेचन शैली : आचार्य द्विवेदी के विचारात्मक, साहित्य समीक्षा और सि(ान्त निरूपण संबंध्ी निबन्ध् विवेचना प्रधन शैली में लिखे गए हैं। इन निबन्धें में विषय का तर्कपूर्ण विवेचन मिलता है। विभिन्न प्रकार के तर्क-वितर्क के साथ वे विषय का विवेचन करते हैं। अपने विवेचन और विश्लेषण की पुषिट के लिए विभिन्न प्रकार के प्रमाण तथा संस्Ñत साहित्य से उ(रण आदि देते हैं, उनकी व्याख्या करते हैं। इसके बाद वे इस सबका विद्वतापूर्ण मूल्यांकन करके अपने मौलिक निष्कर्ष और निर्णय प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इस विचार विशेषण तथा चिंतन में भी एक विशेष प्रकार का लालित्य रहता है जो उनकी विवेचन शैली को कठिन तथा रूखा होने से बचाता है।

2. वर्णनात्मक शैली भी आचार्य द्विवेदी के निबन्धें में मिलती है। लेकिन इस शैली में विषय का सपाट वर्णन मात्रा नहीं मिलता। यह वर्णन भावना, कल्पना और आत्मीयता से युक्त होता है। यही कारण है कि कूल या स्थान विशेष आदि निर्जीव वस्तुओं के वर्णन भी अत्यंत सजीव और स्पंदनशील बन उठते हैं। वे इस प्रकार से वस्तु का वर्णन करते हैं कि पाठक को महसूस होता है कि वह स्वयं उस वस्तु को देख रहा है, उसके गरिमामय असितत्व का अनुभव कर रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि आचार्य द्विवेदी मेरे, हमारे, आपके आदि शब्दों के प्रयोग के द्वारा पाठकों के साथ सीध व आत्मीय संबंध् स्थापित कर लेते हैं। उदाहरणार्थ 'मेरी जन्म भूमि निबन्ध् में वे पाठकों को संबोधित करते हुए बताते हैं कि-''अच्छा समझिए या बुरा, मेरे अंदर एक गुण है, जिसे आप बालू में से तेल निकालना समझ सकते हैं। मैं बालू में से तेल निकालने का सचमुचही प्रयत्न करता हूँ, बशर्ते वह बालू मुझे अच्छी लग जाए। और यह बात अगर छिपाऊँ भी तो कैसे छिप सकेगी कि मैं अपनी जन्मभूमि को प्यार करता हूँ...।

आचार्य द्विवेदी की यह आत्मीयता और वैयकितकता उन्हें अत्यंत विशिष्ट बना देती है। गंभीर विचार विश्लेषण के क्षणों में भी वे पाठक से सीध संपर्क बनाए रखते हैं। जिससे बोझिल विषय भी पाठक के लिए सरस बन जाते हैं और शैली में संवादात्मकता का गुण आ जाता है।

3. प्रसाद शैली : उनके वर्णनात्मक निबन्ध् प्राय: इसी शैली में हैं। इस शैली का प्रयोग करते हुए वे गंभीर से गंभीर तथा साधरण से साधरण विषय को भी सीध्े-सरल ढंग से समझाते हैं। सâदयता, सरलता, व्यापक और उदात्त दृषिटकोण उनकी इस शैली की मुख्य विशेषताएँ हैं।

4. व्यंग्य शैली : द्विवेदी जी के सभी प्रकार के निबन्धें में व्यंग्य शैली का प्रयोग हुआ है जिससे उनके विनोदी स्वभाव का परिचय मिलता है। वे प्राय: जीवन के गलत तथा असत पक्ष के पाठक को परिचित कराने के लिए उस पर व्यंग्य करते हैं। साथ ही पाठक विषय की उलझन से ऊब न जाएँ इसीलिए वे गंभीर विचार विशेषण को हास्य और विनोद द्वारा हल्का करते हैं। इस प्रकार के हास्य-व्यंग्य से उनके गहन वैचारिक विषयों में सरसता और रोचकता आ जाती है। उनकी व्यंग्य शैली कहीं भी बहुत तीखी या कटु नहीं है। यह सर्वत्रा संयत, प्रौढ़ और शालीन बनी रहती है।

5. प्रवाह शैली : आचार्य द्विवेदी के निबन्धें में भावावेग की सिथति में प्रवाह शैली भी प्रयुक्त हुर्इ है। इसमें भावों और विचारों का प्रवाह जैसा मिलता है। भावुकता के प्रवाह में बहकर लेखक धराप्रवाह ढंग से अपने विचारों और भावों को कहता जाता है। इस प्रकार की प्रवाह शैली उनके विषय प्रतिपादन को मार्मिक तथा आवेगपूर्ण बना देती है।     

 भाषा : आचार्य द्विवेदी अपने निबन्धें में पाठक से सीध संबंध् बनाए रखना चाहते हैं। पाठक को लक्ष्य करके या उसे संबोधित करके अपनी बात कहते हैं, अत: उनकी भाषा भी अत्यन्त आत्मीय और प्रवाहपूर्ण है। उनकी भाषा में भाषण शैली का प्रवाह और ओज है। वे बहुत लंबी, जटिल वाक्य योजना के मोह में न पफंसकर भाषण-सा देते हैं। इसमें वे ऐसे सरल संरचना वाले वाक्यों व सहज शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो पाठकों को उत्साह से भर दे। लेकिन दूसरी ओर संस्Ñत प्रधन प्रवाहमयी भाषा का लालित्य भी उनकी भाषा में मिलता है। बीच-बीच में वे संस्Ñत के साहितियक उ(रण भी देते चलते हैं। उनकी भाषा में संस्Ñत के अतिरिक्त अंग्रेजी, अरबी-पफारसी व देशज शब्दों का भी निस्संकोच प्रयोग मिलता है।

इस प्रकार आचार्य द्विवेदी के निबन्धें की भाषा अत्यन्त समृ( है। उसमें गंभीर चिंतन के साथ हास्य और व्यंग्य विनोद का पुट सर्वत्रा मिलता है। इन्हीं समनिवत विशेषताओं के कारण निबन्ध्कला की दृषिट से हिंदी निबंध्कारों में आचार्य द्विवेदी का स्थान बहुत ऊँचा है।     

अशोक के पफूल : (हजारीप्रसाद द्विवेदी) वस्तु एवं शिल्प

डा. शानितस्वरूप गुप्त

पूर्व रीडर हिन्दी विभाग,

दिल्ली विश्वविधालय

निबन्ध् का सार

अशोक वृक्ष पर छोटे-छोटे लाल-लाल पफूलों के मनोहर गुच्छों को देख लेखक का मन मुग्ध् हो उठा और उसे लगा कि उसके सौंदर्य और उसकी कमनीयता से प्रभावित होकर ही कामदेव ने अपने तूणीर में उसे स्थान दिया होगा। कामदेव के पाँच बाण हैं- कमल, आम, नीलोत्पल, नवमलिलका और अशोक।

प्राचीन भारत में जिस अशोक को इतना सम्मान दिया जाता था, आज उसके प्रति भारतीयों की उदासीनता और उपेक्षा को देख लेखक का मन उदास हो जाता है। इस उपेक्षा भाव के कारण जुटाने के प्रयास में वह अध्मूले इतिहास के आकाश में चील की तरह मंडराता है और जहाँ-कहीं कोर्इ चमकीली चीज नजर आती है, उस पर झपटटा मारता है।

अतीत में विचरण करते हुए जब वह भारतीय साहित्य पर दृषिटपात करता है तो उसे पता लगता है कि भले ही कालिदास पूर्व भारतवासी अशोक के पफूलों से परिचित रहे हों, परन्तु जीवन और साहित्य में इसका प्रवेश कालिदास के युग में ही हुआ था। कालिदास की रचनाओं से पहली बार हमें ज्ञात होता है कि लोगों को विश्वास था कि सुन्दरियों के पदाघात से अशोक पफूलता था, वे अपने कानों में अशोक के पफूल और किसलय आभूषण के रूप में धरण करती थीं, और उनसे अपने वेशों का प्रसाध्न करती थीं। इन पफूलों को सौन्दर्य और कामोíीपन का प्रतीक भी माना जाता था। पर मुसलमानी शासन का आरम्भ होते ही कवियों और नाटककारों ने उसकी अवमानना करनी आरम्भ कर दी और वह साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार दिया गया। लोगों ने उसे याद तो किया, उसका नाम भी वे यदा-कदा लेते रहे पर उसी प्रकार जैसे किसी प्राचीन अनुपयोगी वस्तु या पूर्वज का। लेखक को सबसे अधिक ग्लानि तो इस बात से होती है कि हम असली अशोक को पहचानते तक नहीं हैं और हमने एक ऐसे वृक्ष को अशोक कहना शुरू कर दिया है जिस पर पफूल तक नहीं आते।

इसी चिन्तन-प्रक्रिया में लेखक भरहुत, बोध्गया, सांची, मथुरा आदि की यक्षिणी मूर्तियों की गठन और बनावट से अशोक का सन्दर्भसूत्रा जोड़ता है, हजारों-लाखों वर्ष के साहित्य, शिल्प, ध्र्म, संस्Ñति और जीवन के आर-पार झाँकता है, और पाठकों के सम्मुख उनके चित्रा प्रस्तुत करता है। उसका कथन है कि र्इसा की प्रथम शताब्दी के आस-पास भारतीय ध्र्म, साहित्य और शिल्प में अशोक को अदभुत गौरव और महत्त्व प्राप्त था। गन्ध्र्व और कन्दर्य को एक ही शब्द के भिन्न उच्चारण बताते हुए वह कहता है कि गन्ध्र्व, यक्ष आदि आयोत्तर जातियाँ थीं। उनके उपास्य वरुण थे, कुबेर थे, वज्रपाणि वक्षपति थे। इन्होंने भारतीय ध्र्मसाध्ना को एक नया रूप दिया। इनकी संस्Ñति में भोग-विलास पर बल था- ध्न, सोम-पान, अप्सराएँ, पफूलों का प्रयोग - इसका साक्षी है। वामन-पुराण की यह कथा कि कामदेव का ध्नुष जब पृथ्वी पर टूट कर गिरा तो कोमल पफूलों में बदल गया, भी इस बात का संकेत देती है कि इन जातियों को पुष्पों से बड़ा लगाव था तथा उनका रहन-सहन, सुख-सुविèााओं, ऐश्वर्य और भोग विलास से परिपूर्ण था। महाभारत की अनेक कथाएँ जिनमें संतान की इच्छा के लिए सित्रायों को यक्षों के आस-पास नियोग के लिए जाते दिखाया गया है, पत्थरों पर उत्कीर्ण नग्न स्त्राी-मूर्तियाँ, अशोक के लाल पफूलों को स्मरवर्èाक मान कर उनका सेवन, चैत्रा शुक्ल अष्टमी को व्रत और अशोक की पत्तियों के भक्षण से स्त्राी के संतानवती होने का उल्लेख यक्षों में पृथ्वी के नीचे गड़ी हुर्इ निधियों का पता लगाने की कला, उनकी नृत्य-संगीत में रुचि आदि - सभी इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि यक्ष-गंध्वो± की सभ्यता भोग-विलास, आमोद-प्रमोद और सुख-संधन की सभ्यता थी।

 पुराणों की गवाही देता हुआ लेखक कहता है कि आयो± का अनेक जातियों - असुरों, दानवों, दैत्यों, राक्षसों, गन्èावो±, यक्षों, वानरों, भालुओं आदि से संघर्ष हुआ। इनमें कुछ जातियाँ जैसे- असुर, दानव, दैत्य और राक्षस गर्वीली थीऋ उन्होंने आयो± की अध्ीनता नहीं मानी, टक्कर लीऋ इसीलिए आयो± ने उनके लिए अपमानजनक शब्दावली का प्रयोग किया है और अपने गं्रथों में उनका स्मरण और उल्लेख घृणा के साथ किया है। इसके विपरीत पहाड़ों पर बसने वाले यक्ष, गन्ध्र्व, किन्नरऋ विधाचर, सि( आदि ने जो शांतिप्रिय थे, आयो± की अध्ीनता स्वीकार कर ली। वे उनके मित्रा बन गये। आयो± ने उन्हें द्वितीय कोटि के देवता या अपदेवता माना है। लेखक का निष्कर्ष है कि वर्तमान भारत की सभ्यता और संस्Ñति, रीति-नीति विशु( आर्य न होकर अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का मिश्रण है।

इस संदर्भ में गन्ध्वो± की भूमिका की चर्चा करते हुए लेखक बताता है कि गन्ध्वो± की भोगवादी जीवन-दृषिट से प्रभावित होने के कारण ही बौ(, शैव और शाक्त ध्मो± में विÑतियाँ आयीं। वज्रयान, कौल-साध्ना और कापालिक मतों में दिखार्इ देने वाली विÑतियाँ इसका प्रमाण हैं। वैराग्य, साध्ना, तपस्या, इनिद्रयदमन आदि का मार्ग छोड़ ये मदिरा और मदिराक्षी के सेवन में ही साध्ना का चरमोत्कर्ष मानने लगे। योग और भोग के इस अपूर्व मिलन ने व्यभिचार और माया को जन्म दिया।

दूसरी ओर गन्ध्र्व और यक्षों के कला-पे्रम, जीवन-दृषिट आदि के परिणामस्वरूप पूजा, उत्सव, समारोह आदि का आयोजन होने लगा। इनमें मदनोत्सव का अत्यन्त सरस-मनोहर वर्णन संस्Ñत के अनेक गं्रथों में मिलता है और उनसे पता चलता है कि उस समय भारत कितना समुन्नत, समृ( एवं सुखी देश था और यहाँ के लोग कितने प्रÑति-पे्रमी और कला-उपासक थे।

गौरवपूर्ण अतीत से ßासोन्मुख मèयकाल की तुलना करते-करते लेखक काल, परिवर्तन एवं जिजीविषा पर अपने विचार व्यक्त करता है। उसके अनुसार काल दुर्दम चक्र किसी को नहीं बख्शता - देश, जाति, ध्र्म, संस्Ñति, सभ्यता, कला आदि सब काल की अबाधित अनाहत दुर्दम धरा में बह कर लुप्त हो जाते हैं या नया रूप धरण कर लेते हैं। संघर्ष परिवर्तन लाता है पर यही नयी शकित भी प्रदान करता है। इस प्रकार काल और परिवर्तन शकितशाली तो हैं पर उनसे भी अधिक शकितशाली हैं मानव की जीने की इच्छा, उसकी जीवन-शकित। उसी के कारण वह कुछ चीजें ग्रहण करता है, और कुछ त्याग देता हैऋ जो समय के अनुकूल हैं वह ग्रहण किया जाता हैऋ जिसे बोझ समझा जाता है, उसे पफेंक दिया जाता है। इतिहास इसका साक्षी है। सम्राटों और सामन्तों की मोहक और मादक जीवन-प(ति, ध्र्माचायो± द्वारा बताये गये साध्ना-मार्ग और उनकी विपुल ज्ञान-राशि, ध्निक वर्ग द्वारा जुटाये गये ऐश्वर्य और भोग के असंख्य उपकरण - सब कुछ लुप्त हो गये। अशोक का वृक्ष और पफूल सामन्तीय सभ्यता से जुडे़ थेऋ अत: जब वह सभ्यता लुप्त हुर्इ तो लोग अशोक को भी भूल गये। उसका गौरव, महिमा आदि सब विस्तृत कर दिये गये। साहित्य, ध्र्म, कला सभी क्षेत्राों में उसे अपदस्थ कर दिया गया।

निबन्ध् के अन्त में लेखक स्वयं को प्रबोध् देते हुए पाठकों को भी परामर्श देता है कि परिवर्तन सृषिट का नियम है, उत्थान-पतन, और सुख-दुख का चक्र घूमता रहता है, अत: सिथतप्रज्ञ रहकर ही मनुष्य सुखी रह सकता है, उदास होना व्यर्थ है। हमें समय के अनुरूप स्वयं को ढालना चाहिए, जैसी बयार चले उसी के अनुरूप अपनी पीठ करनी चाहिए - ''जैसी चले बयार पीठ तब तैसी दीजे।

ललित निबन्ध् के रूप में ''अशोक के फूल

शानितनिकेतन और रविन्द्रनाथ टैगोर के सम्पर्क में रहने वाले तथा मानववादी दृषिटकोण वाले हजारीप्रसाद द्विवेदी मानव-जीवन के प्रवाह को अखण्ड तथा मानव की जिजीविषा को अक्षुष्ण मानते हैं। वह मानते हैं कि साहित्य मानव-सापेक्ष होना चाहिएऋ उसका लक्ष्य मनुष्य का उत्थान करना, मानव समाज को सुन्दर बनाना, मानव चरित्रा का उन्नयन करना और सामाजिक चेतना को झकझोर कर उसे विश्व-मंगल की दिशा में उन्मुख करना होना चाहिए। मात्रा वैयकितक अनुभूतियों की अभिव्यकित को वह सद साहित्य नहीं मानते। अत: उनके निबन्धें में लालित्य होत हुए भी वे मात्रा वैयकितक भावोच्छवास नहीं हैं। अपने निबन्धें के विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है, ''इसमें मेरा मनुष्य प्रधन है, शास्त्रा गौण।

द्विवेदी जी की साहित्य प्रतिभा बहुमुखी है। उन्होंने इतिहासकार, आलोचक, उपन्यासकार और निबन्ध्कार सभी रूपों में विशेष ख्याति अर्जित की है। उनके 8 निबन्ध्-संकलन प्रकाशित हुए हैं जिनके कुछ निबन्ध् भाषण के रूप में और कुछ आकाशवाणी से प्रसारित होने वाली वात्र्ता के रूप में लिखे गये थे। अन्य निबन्ध् या तो पत्रा-पत्रिकाओं के लिए अथवा स्वान्त:सुखाय लिखे गये। बहुश्रुत और बहुज्ञ द्विवेदी जी का संस्Ñत, साहित्य, इतिहास, संस्Ñति,

ध्र्म, दर्शन, भाषा-विज्ञान, ज्योतिष, प्राच्य कला आदि का ज्ञान विसिमत कर देने वाला है। इस ज्ञान का उपयोग उनके विविध् निबन्धें में किया गया है। अत: उनके सभी निबन्धें में वस्तुनिष्ठ प्रतिपादन दृषिटगत होता हैऋ इस प्रतिपादन की दो शैलियाँ हैं- पहली में विषय-विवेचन के क्रम में उनका व्यकितत्व झांकता रहता है और दूसरी में विषय का प्रतिपादन ही मुख्य है।

पहले वर्ग के निबन्धें में लालित्य, भावोच्छवास, लेखक की आत्मीयता, कल्पना की उड़ान, कथा की रोचकता और कलात्मक अभिव्यकित के दर्शन होते हैं, तो दूसरे वर्ग के निबन्धें में गूढ़ गंभीर विचार, विषय का विवेचन और सूक्ष्म विश्लेषण तथा लेखक का आपार ज्ञान और पांडित्य दिखार्इ देता है। पहले वर्ग के निबन्धें को व्यकित-व्यंजक या ललित निबन्ध् और दूसरे वर्ग के निबन्धें को विचारात्मक या विचारपरक निबन्ध् की संज्ञा दी जा सकती है।

ललित निबन्ध् में बु(ितत्त्व की अपेक्षा âदय तत्त्व की, विचारों के स्थान पर भावों की प्रधनता रहती है। एक ओर लेखक का आत्मतत्त्व, उसका व्यकितत्व, उसकी निजी प्रतिक्रियाएँ, उसकी निजी रुचि, उसका भावोच्छवास दृषिटगत होता है और दूसरी ओर उसमें कल्पना की उड़ान, कथा की सी रोचकता और शैली में काव्यात्मक सौष्ठव के दर्शन होते हैं। भावमयता की भूमि पर विचरण करता हुआ निबन्ध् पाठकों के âदय को स्पर्श करता है, उसे भावमग्न करता चलता है। विषय-वैविèय और लेखक की मन:सिथति के कारण उसमें कहीं धराशैली और कहीं विक्षेप शैली का प्रयोग होता है।

द्विवेदी जी का ''अशोक के पफूल ललित निबन्ध् है जिसमें भावना, कल्पना और अनुभूति की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है, जिसमें भावुकता और सâदयता का ज्वार उठता-गिरता रहता है और जिसमें लेखक के अनुभवों की दीर्घ परम्परा समाविष्ट है। उसमें स्वाध्ीन चिन्तन है और है साथ ही मानसिक क्रीड़ा-विलास। उदार दृषिटकोण और भावजन्य संवेदन और परिणामस्वरूप वह नगण्य पदाथो± और सामान्य घटनाओं पर लिखते हुए अतीत में विचरण करने लगते हैं, भारतीय संस्Ñति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए पाठक को अपने साथ प्राचीन गौरवमंडित काल की सैर कराते हैं और उसकी कल्पना को अभिषिक्त तथा भावना को उद्वेलित करते चलते हैं। ''अशोक के पफूल में अशोक के वृक्ष और उसके मनोहर लाल पफूलों के प्रभाव का वर्णन करते हुए लेखक कभी भारतीय ध्र्म-साध्ना, कभी कालिदास की रचनाओं, कभी आर्य और आर्योत्तर जातियों के संघर्ष का वर्णन करने लगता है। कभी उसकी दृषिट भारत की प्राÑतिक सम्पदा पर पड़ती है तो कभी वह देश के सौन्दर्य, वैभव और कला-सम्पदा की कहानी कहने लगता है।

''विषय का वस्तुनिष्ठ प्रतिपादन करते समय भी द्विवेदी जी का व्यकितत्व-उनका मानवतावादी दृषिटकोण, उनकी बहुज्ञता, उनकी भावुकता और सâदयता, उनका पफक्कड़पन, उनका भारतीय संस्Ñति के प्रति लगाव स्पष्ट दृषिटगोचर होता है। अत: निबन्ध् में स्वत: लालित्य की सघनता आ गयी है। कहीं वह अपनी धरणा व्यक्त करता है, कहीं अपनी मान्यता समझाता है, कहीं अपना विचार प्रकट करता है, कहीं अपना सम्मति देता है। कहीं वह भावोच्छवसित होकर प्रशंसा करता है तो कहीं ग्लानि, निराशा और आक्रोश प्रकट करता है। उनकी गहन और तीव्र अनुभूति इस निबन्ध् को ललित निबन्ध् बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कहीं प्रÑति के सौन्दर्य पर मुग्ध् हो वह उल्लसित हो उठाता है।

''इन छोटे-छोटे लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! कभी उसके प्रति उपेक्षा और उदासीनता को देख वह उदास हो उठता है, लेकिन पुषिपत अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है। वह कभी क्षोभ से भर जाता है, ''क्या यह मनोहर पुष्प भुलाने की चीज थी? जले पर नमक तो यह कि एक तरंगायित पत्रावाले निपफूले पेड़ को सारे उत्तर भारत में अशोक कहा जाने लगा। याद भी किया तो अपमान करके। प्राचीन साहित्य और शिल्प में अशोक वृक्ष, उसके पफूलों, विसलयों आदि का गौरव स्मरण कर वह अतीत में रमना चाहता है, पर वर्तमान का कठोर यथार्थ जब उसे ऐसा करने से रोकता है तो वह चीत्कार कर उठता है, ''मेरा मन प्राचीन काल के कुज्झटिकाच्छन्न आकाश में दूर तक उड़ना चाहता है। हाय, पंख कहां हैं! करुण उल्लास की झंझा की प्रतिèवनि निबन्ध् में सर्वत्रा व्याप्त है : अनुभूति की सघनता और तीव्रता निम्नांकित पंकितयों में चरम बिन्दु पर पहुँच गयी है, ''मैं जब अशोक के लाल स्तबकों को देखता हूँ तो मुझे पुराना वातावरण प्रत्यक्ष दिखार्इ दे जाता है। ं ं ं ं ं नीचे हल्की रुनझुन और ऊपर लाल पफूलों का उल्लास ं ं ं ं ं मैं सचमुच इस उत्सव को मादक मानता हूँ। अशोक के स्तवकों में वह मादकता आज भी है, पर कौन पूछता है? इन पफूल के साथ क्या मामूली स्मृति जुड़ी हुर्इ है? भारतवर्ष का सुवर्ण युग इस पुष्प के प्रत्येक दल में लहरा रहा है।

लेखक की विचार-तरंगे कभी इतिहास की ओर दौड़ती हैं और वह कालिदास के युग की संस्Ñति और उस युग के साहित्य की तस्वीर खींचने लगता है, कभी मुसलमानी सल्तनत में हुए पतन, ßास और अवनति पर आँसू बहाने लगता है, कभी यक्षों और गन्ध्वो± के ऐश्वर्य और रसपूर्ण जीवन का चित्रा उरेहता है तो कभी उनकी भोगलिप्सा और विलासपूर्ण दृषिटकोण के कारण भारतीय ध्र्म साध्नाओं-बौ(ों, शैवों और शाक्तों में पफैलने वाले अभिचार की निंदा करने लगता है। पुराणों और महाभारत की कथाओं, भरहुत, साँची और मथुरा में प्राप्त मूर्तियों का साक्ष्य देकर वह आर्य और आर्येतर जातियों के संघर्ष और उस संघर्ष की परिणति की जानकारी प्रदान करता हुआ बताता है कि गन्ध्र्व, यक्ष आदि पहाड़ी जातियाँ थीं और उनका समाज उस स्तर पर था जिसे आज ''पुनालुअन सोसायटी कहा जाता है।

लेखक द्वारा प्रस्तुत ये चित्रा कल्पनाश्रित नहीं हैं, उनके पीछे पुराण, शास्त्रा, ध्र्मगं्रथों, साहितियक रचनाओं- सरस्वती कण्ठाभरण, मालविकागिनमित्रा, रत्नावली, कुमारसंभव - आदि का ठोस आधर है, उनमें प्रत्युक्त कथानक-रूढि़यों का आश्रय लिया गया है।

लेखक का प्रÑति-पे्रम और प्राÑतिक दृश्यों का कवित्वपूर्ण, सरस और मनोमय चित्राण भी इस निबन्ध् के लालित्य को बढ़ाता है। प्रÑति का रम्य सौन्दर्य देख द्विवेदी जी का âदय उल्लासित हो उठता है और वह उल्लास शब्द-शब्द से पफूटने लगता है, ''अशोक के पफूल ही नहीं, किसलय भी âदय को कुरेद रहे हैं। ं ं ं ं ं शाखाओं में लमिबत वायुलुलित किसलयों में ही मादकता है। मेरी नस-नस से आज करुण उल्लास की झंझा उतिथत हो रही है।

लेखक जब-तक कल्पना की उड़ान भरता है, वह कभी मानव की जीवन-शकित को तीव्र, दुर्दम एवं निर्मम धरा बताता है जो अपने अन्तर्गत सब कुछ बहाती हुर्इ भी विशु( और निर्मल रहती है, ''शु( है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा की अबाधित-अनाहत धरा के सामान सबको हजम करने के बाद भी पवित्रा है। और कभी अशोक के पफूलों को देख वह उस युग के ऐश्वर्य एवं विलास के चित्रा उपसिथत करने लगता है जब रानियाँ या

पुषिपत अन्त:पुर की सुन्दरियाँ अपने पदाघात से अशोक को पुषिपत किया करती थीं और सपफटिक के आसन पर अपने प्रिय को बैठाकर कन्दर्प देवता की पूजा करती थीं और बाद में पति के चरणों पर वसन्त-पुष्पों की अंजलि बिखेरती थीं।

पुराने संस्मरण और कथा-प्रसंग निबन्ध् को और भी रोचक बना देते हैं। गंभीर विचारों और शास्त्रा-ज्ञान के मरुस्थल में विचरण करने वाले पाठक उनका स्वागत वैसे ही करता है जैसे रेगिस्तान का प्यासा-थका यात्राी शाद्वल का। ''अशोक के पफूल में शिव द्वारा कामदेव के भस्म की कथा तथा उसके रत्नमय ध्नुष के टूटकर कोमल पफूलों में बदल जाने की कथा निबन्ध् को रोचक बनाती है।

मीठी चुटकियाँ लेने, व्यंग्य करने तथा हास्य के छीटों द्वारा पाठकों का मनोविनोद करने में द्विवेदी जी आचार्य शुक्ल से कम नहीं हैं। उन्हीं के समान द्विवेदी जी व्यंग्यपूर्ण शैली द्वारा अपने विचारपूर्ण एवं गंभीर विषय वाले निबन्धें को लोहे के चने नहीं बनने देते, पाठक के तनाव को दूर कर उसे सहज बना देते हैं। प्रस्तुत निबन्ध् म एक जगह उन विद्वानों पर व्यंग्य करते हैं जिन्हें सुन्दर वस्तुओं को आभागा समझने में आनन्द मिलता है और जो जिस-तिस के बारे में भविष्यवाणी करते रहते हैं, ''वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अनितम मुहुर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। निबन्ध् के अन्त में पणिडतों का मजाक उड़ाते हैं, ''पणिडतार्इ भी एक बोझ है - जितनी ही भारी होती है उतनी ही तेजी से डुबाती है।

पाठक निबन्ध् पढ़ते समय जगह-जगह लेखक को अपने समीप पाता है, विशेषत: उन स्थलों पर जहाँ वह अपना जीवन-दर्शन और साहित्य-आदर्श सामने रखता है। जहाँ वह शोषण पर आधरित सामन्त सभ्यता, महाकाल, सृषिट में होने वाले परिवर्तन और दुर्दम जिजीविषा की बात करता है अथवा जहाँ विषम क्षणों में भी उदास न होने का परामर्श देता है, वहाँ लेखक का सानिèय और उसकी आत्मीयता पाठक को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। वह पाठक के âदय में भावान्दोलन करता है, उसकी अनुभूतियों को व्यापक बनाता है और उसकी संवेदनाओं को तीक्ष्ण करता है। लेखक के स्वाध्ीन चिन्तन और मानसिक क्रीड़ा-विलास से अभिभूत पाठक कहीं भावमग्न हो उठता है तो कहीं चिन्तन-मनन के लिए बाèय। विचारों की गूढ़-गुमिपफत परम्परा, ''बदली है मनुष्य की मनोवृत्ति। यदि बदले बिना वह आगे बढ़ सकती तो शायद वह भी नहीं बदलती। और यदि वह न बदलती और व्यावसायिक संघर्ष आरम्भ हो जाता ं ं ं ं ं तो बड़ा बुरा होता। हम पिस जाते। यदि पाठक को सोचने के लिए अनुपे्ररित करती है तो लेखक अपनी बात को अधिक विश्वसनीय बनाने तथा पाठक से अधिक आत्मीयता स्थापित करने के लिए ''मेरा मन उदास हो जाता है, ''ना मेरा मन यह सब मानने को त्यार नहीं, मेरे मानने-न मानने से क्या होता है, ''यह मुझे प्राचीन युग की बात मालूम होती है जैसे वाक्यों का प्रयोग करता है। पाठक की सौन्दर्य-चेतना जगाने या उसे भावोच्छवसित करने के लिए वह विस्मयादिबोध्क चिहनों वाले पदाशों का वाक्यांशों का प्रयोग करता है -''कैसा झबरा-सा गुल्भ है! ''ध्न्य हो महाकाल! ''हाय, पंख कहां हैं।

सारांश यह है कि ''अशोक के पफूल ललित निबन्ध् का आदर्श प्रस्तुत करता है जिसमें एक ओर विचारों की गूढ़़-गुमिपफत परम्परा है, दूसरी ओर लेखक की सâदयता और संवेदनशीलता है और तीसरी ओर कल्पना की स्वच्छंद उड़ान और मानसिक क्रीड़ा-विलास है। उसमें लेखक का मानवतावादी दृषिटकोण और संस्Ñति-पे्रम स्पष्ट झलकता है। विचारों की गंभीरता, पाणिडत्य के प्रकर्ष और गहन चिन्तन के बावजूद भावात्मकता, काव्यात्मकता और कल्पनाशीलता इस निबन्ध् को लालित्यपूर्ण बना देते हैं।

भाषा-शैली

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी के सध्े हुए सारस्वत और शीर्षस्थ गधकार हैं। वह एक समर्थ शैलीकार के रूप में प्रतिषिठत हो चुके हैं। शैली वह तत्त्व है जो एक व्यकित के लेखन को दूसरे के लेखन से भिन्न बना देता है। वह लेखक के विचारों की वेशभूषा नहीं, शरीर में त्वचा की तरह अभिन्न हैं। प्रभावपूर्ण अभिव्यकित लेखक के व्यकितत्व से जुड़ी होती है। ष्ैजलसम पे जीम उंपदष् उकित द्विवेदीजी पर पूर्णत: चरितार्थ होती है। उनका पाणिडत्य, हंसोड और पफक्कड़ स्वभाव, उनकी सâदयता, उनकी भाषा पर पूर्ण अधिकार, उनका इतिहास-ज्ञान और जीवन-दर्शन, उनकी संस्Ñति-पे्रम-सर्वत्रा उनके लेखन में झांकता है।

द्विवेदी जी की धरणा है, ''यह लेखक की पराजय उस स्थान पर है जहां वह अपने प्रयोजन को प्रकट करने के लिए कम शब्दों का प्रयोग करके अस्पष्ट कर दे या अधिक शब्दों का प्रयोग करके निरर्थक। स्पष्ट है कि वह विषय को स्पष्ट करना अपना प्रमुख लक्ष्य मानते हैं और सरल, सहज, सजीव तथा स्वछंद शैली के पक्षध्र हैं। उनकी शैली विषयानुवर्तिनी है : विषय के अनुरूप उनकी भाषा-शैली भी अपना स्वरूप परिवर्तन करती चलती है। गहन-गंभीर विषयों पर लिखते समय उनकी शैली चिन्तनमूलक होती है और उस समय वह मौलिक विचार और दृषिटकोण प्रस्तुत करते हैंऋ भावुकता के प्रवाह में बहते समय वह अपने भाव विशेष शैली या तरंग शैली में व्यक्त करते हैं-कहीं उनके भाव और विचारधरा के रूप में अग्रसर होते हैं, कहीं रुक-रुक कर खंड-खंड में और कहीं ज्वार-भाटे की तरह उनके भावों का उतार-चढ़ाव परिलक्षित होता है। भावावेग के क्षणों में लिखे जाने के कारण निबन्ध् में सरसता और प्रवाह होता हैऋ पाठक उस भावप्रवाह में बहकर विषय के तदरूप और भावों में निमग्न हो जाता है। पफलत: ऐसे स्थल गधकाव्य का सा आनन्द देते हैं। ''ध्न्य हो महाकाल! तुमने कितनी बार मदन देवता का गर्व खण्डन किया है, ध्र्म राज के कारागार में क्रानित मचायी है, यमराज के निर्दक तारल्य को पी लिया है, विèााता के सर्वÑर्तत्व के अभिमान को चूर्ण किया है।

द्विवेदी जी चिन्तक होने के साथ-साथ अपने गवेषणा-कार्य के लिए भी विख्यात हैं। उनके विचारात्मक निबन्धें में तो गवेषणा शैली का प्रयोग हुआ ही है, व्यकितनिष्ठ निबन्धें में भी गवेषणा-तत्त्व मिल जाता है। अशोक के पफूल देख उनकी गवेषणा प्रवृति जाग्रत होती है और वह अशोक के पफूल को भारतीय साहित्य तथा इतिहास के विभिन्न कालों में जो सम्मान प्राप्त था उसकी छानबीन करने लगते हैं-

र्इसवी सन के आरम्भ के आसपास अशोक का शानदार पुष्प भारतीय ध्र्म, साहित्य और शिल्प में अदभुत महिमा के साथ आया था। इसी समय शताबिदयों से परिचित यक्षों और गंध्वो± ने भारतीय ध्र्मसाध्ना को एकदम नवीन रूप में बदल दिया था। पंडितों ने शायद ठीक ही सुझाया है कि ''गध्र्व और ''कंदर्य वस्तुत: एक ही शब्द के दो भिन्न उच्चारण हैं।

विषय का समीचीन प्रतिपादन करने के लिए वह कहीं व्यास शैली अपनाते हैं तो कहीं समास शैली। समास शैली का प्रयोग कम हुआ है और जहाँ हुआ भी है वहाँ इस तरह कि पाठक को उनके वाक्यों की व्याख्या करने में अधिक कठिनार्इ नहीं होती। अधिकतर उन्होंने संतुलित व्यास शैली को अपनाया है, ''अशोक वृक्ष की पूजा इन्हीं गंध्वर्ौं और यक्षों की देन है। प्राचीन साहित्य में इस वृक्ष की पूजा के उत्सवों का बड़ा सरस वर्णन मिलता है। असल पूजा अशोक की नहीं, बलिक उसके अधिष्ठाता कन्दर्प-देवता की होती थी। इसे मदनोत्सव कहते थे।

द्विवेदी जी ने निगमन तथा आगमन दोनों ही प(तियों को अपनाया है। कहीं वह आरम्भ में विषय को संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत कर पिफर उसकी व्याख्या-विवेचना करते हैं तो कहीं विषय का स्पष्ट विवेचन करने के उपरान्त अन्त में उसका सार या अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।

पाठक के सम्मुख अपनी बात सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने के उíेश्य से वह अनेक युकितयों का प्रयोग करते हैं-कभी बीच-बीच में अवान्तर कथाएँ प्रस्तुत करते हैं, जैसे वामनपुराण का हवाला देते हुए कामदेव के भस्म होने और उसके ध्नुष के टूटकर पफूलों में परिणित होने की कथा। कहीं पुराने संस्मरण और अनुभव बताकर पाठक के साथ आत्मीयता स्थापित करते हैं, 'पिफर भी मेरा मन इस पफूल को देखकर उदास हो जाता है। असली कारण तो मेरे अन्तर्यामी ही जानते होंगे। कुछ थोड़ा-सा में भी अनुमान कर सका हूँ। उसे बताता हूँ।

उ(रणों का प्रयोग न केवल उनके पांडित्य और व्यापक अèययन का परिचायक है, उनकी अभिव्यंजना को भी सशक्त बनाता है। संस्Ñत रचनाओं से अनेक उ(रण दिये गये हैं, जेसे, किसलय-प्रसवो¿पि विलासिनां मदयिता दक्षिताश्रवणार्पित: ''या श्री सुन्दरीसाध्न तत्पराणां योग्श्च भोग्श्व करस्थ एव।

सूत्रा वाक्यों और सूकितयों का प्रयोग द्विवेदी जी के निबन्धें में हुआ तो है पर आचार्य शुक्ल की तुलना में अपेक्षाÑत कम और उनमें सरलता है, ''स्वर्गीय वस्तुएं ध्रती से मिले बिना मनोहर नहीं होतीं। अथवा ''सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।

जहाँ-कहीं वह किसी दृश्य, स्थान या प्रसंग का वर्णन करने लगते हैं वहाँ चित्रामय शैली का प्रयोग उसे पाठक की कल्पना में साकार और सजीव बना देते हैं, ''नीचे हल्की रुनझुन और ऊपर लाल पफूलों का उल्लास! किसलयों और कुसुम-स्तवकों की मनोहर छाया के नीचे स्पफटिक के आसन पर अपने प्रिय को बैठाकर सुन्दरियाँ अबीर, कुम्कुम, चन्दन और पुष्प-संभार से पहले कन्दर्प-देवता की पूजा करती थीं और बाद में सुकुमार भंगिमा से पति के चरणों पर वसन्त-पुष्पों की अंजलि बिखेर देती थी। इन पंकितयों को पढ़ते समय पाठक के सम्मुख मदनोत्सव का दृश्य साकार हो उठता है।  

 ऐतिहासिक तथ्यों अथवा जीवन और जगत के सत्यों का निरूपण करते समय वह विचरात्मक शैली का प्रयोग करते हैं। ऐसे स्थलों पर न कल्पना होती है, न भावोच्छवास और न कवित्व। ''भगवान बु( ने मार-विजय के बाद वैरागियों की पलटन खड़ी की थी। असल में ''मार मदन का ही नामान्तर है। कैसा मध्ुर और मोहक साहित्य उन्होंने दिया। पर न जाने, कब यज्ञों के वज्रपाणि नामक देवता इस वैराग्य-प्रवण ध्र्म में घुसे और बोध्ीसत्वों के शिरोमणि बन गये। पिफर वज्रयान का अपूर्व èार्ममार्ग प्रचलित हुआ। त्रिरत्नों को मदन देवता ने आसन पाया। वह एक अजीब आंध्ी थी।

अवसरानुकूल उन्होंने अलंÑत शैली का भी प्रयोग किया है, पर अलंÑत भाषा-शैली का प्रयोग चमत्कार के लिए नहीं स्वत: हो गया है। भावोच्छवास के समय द्विवेदी जी के लेखन में कवित्व की छटा स्वत: आ गयी है, ''उस प्रवेश में नववèाू के गृह-प्रवेश की भांति शोभा है, गरिमा है, पवित्राता है और सुकुमारता है। कहीं-कहीं उनके गध में ओजसिवता आ गयी है विशेषत: उन स्थलों पर जहाँ वह दूसरे के मत का खंडन और अपने मत का समर्थन करने लगते हैं, ''महाकाल के प्रत्येक पदाघात से ध्रती ध्सकेगी। उसके कुण्ठ नृत्य की प्रत्येक चारिका कुछ-न-कुछ लपेटकर ले जायेगी। सब बदलेगा, सब विÑत होगा-सब नवीन बनेगा। विपक्ष का खण्डन करने के लिए कभी वह प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं, ''क्या यह मनोहर पुष्प भुलाने की चीज थी? सâदयता क्या लुप्त हो गयी थी? कविता क्या सो गयी थी? तो कभी मीठी चुटकी तथा व्यंग्य का आशय ले उसे ध्राशायी कर देते हैं, ''वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अनितम मुहूर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृषिट इतनी दूर तक नहीं जाती। अथवा, ''वह अपने को पंडित समझता है। पंडितार्इ भी एक बोझ है-जितनी ही भारी होती है उतनी ही तेजी से डूबती है।

भाषा के संबंध् में स्वयं द्विवेदी जी का मत है, ''हमें ऐसी भाषा बनानी है जिसके द्वारा हम अधिक से अधिक व्यकितयों को शारीरिक, मानसिक और आèयातिमक सुध-निवृत्ति का सन्देश दे सकें। वह सहज-सरल भाषा के पक्षध्र हैं। उनका कहना है, ''सहज भाषा का अर्थ है, सहज ही महान बना देनेवाली भाषा ं ं ं ं ं अनायास लब्ध् भाषा को मैं सहज नहीं कहता, तपस्या, त्याग और आत्मबलिदान के द्वारा सीखी हुर्इ भाषा सहज भाषा है। भाषा का यह आदर्श उनके निबन्धें में सहज ही दृषिटगत होता है। वह सर्वत्रा विषय और लेखक के व्यकितत्व के अनुरूप है तथा उसका लक्ष्य है सम्पे्रषण तथा अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करना, उसमें प्रवाहमयता उत्पन्न करना। इसीलिए उनकी भाषा में कहीं तुलसी का पांडित्य है, कहीं सूर का माध्ुर्य तो कहीं कबीर का पफक्कड़पन।

द्विवेदी जी उच्च कोटि के शब्द-शास्त्राी एवं शब्द-शिल्पी हैं। यधपि उनकी रचनाओं में संस्Ñत-तत्सम शब्दावली की प्रधनता है पर कुछ अपवादों को छोड़कर उसमें जटिलता तथा किलष्टता नहीं आ पायी है। समस्त पदावली और शब्दाडम्बर कहीं-कहीं आ गया है पर अधिकांश निबन्धें में उनकी भाषा सहज, सरल तथा प्रवाहमय है, ''अशोक में पिफर पफूल आ गये हैं। इन छोटे-छोटे लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तवकों में कैसा मोहन भाव है! बहुत सोच-समझ कर कन्दर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिपर्फ पाँच को ही अपने तूणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है।

द्विवेदी जी मौजी लेखक हैं और भाषा के प्रति उनका दृषिटकोण संकीर्ण न होकर उदार है, ''मैं अन्य भाषाओं से शब्द लेने का बिल्कुल विरोध्ी नहीं हूँ। अत: भाषा-शैली में प्रवाह लाने के लिए उन्होंने उदर्ू, अंग्रेजी आदि के शब्दों का यथास्थान प्रयोग किया है वह शब्दों के कुशल पारखी हैं, उनकी आत्मा से परिचित हैं। वह जानते हैं कि अर्थ और èवनि के कारण कौन-सा शब्द कहाँ प्रयुक्त होना चाहिए। इसीलिए जहाँ एक ओर शानदार, गवाह, मस्तानी चाल, रर्इस, मौज, मस्ती, इज्जत आदि उदर्ू शब्दों का प्रयोग मिलता है वहाँ दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों जैसे पलटन, सोसायटी और पारिभाषिक शब्द भी अनायास आ गये हैं। पारिभाषिक शब्दों के हिन्दी पर्याय कोष्ठक में दे दिये गये हैं जैसे निवेटिव, कैरेक्टर (नकारात्मक चरित्रा), स्टैण्डर्ड (परिनिषिठत)।

स्थानीय और देशज शब्दों से भी उन्हें परहेज नहीं है बशर्ते उनसे भावों की अभिव्यकित में तथा विवेच्य विषयों को सरल और स्पष्ट बनाने में सहायता मिलती हो। कहीं-कहीं वे अभिव्यकित प्रवाह में अपने-आप आ गये हैं और लेखक की जिन्दादिली का परिचय देते हैं। भिड़ना, पिटना, झबरा, रटना आदि ऐसे ही शब्द हैं। यत्रा-तत्रा उन्होंने हिन्दी-उदर्ू मिश्रित शब्दावली का प्रयोग किया है-''इतने विद्रोह-भाव और इतनी चिनगारियाँ भरी थीं कि वे उन्हें संभाल नहीं सकती थीं।

भाषा में लय, संगीत, प्रवाह एवं वक्तृत्व-ओज उत्पन्न करने के लिए द्विवेदी जी कहीं शब्दों और वक्यांशों की आवृत्ति करते हैं, कहीं सहायक क्रियाओं का क्रम बदल देते हैं तो कहीं समानार्थक शब्दों का प्रयोग करते चले जाते हैं, ''उस प्रवेश में नववध्ू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्राता है और सुकुमारता है। अनेक स्थलों पर उनके वाक्यों में लयात्मक संगीत है, ''वह पफूलता था ं ं ं झूलता था ं ं ं सौगुना बढ़ा देता था, ं ं ं क्षोभ पैदा करता था, ं ं ं भ्रम पैदा करता था ं ं ं पफूट उठता था। èवन्यार्थ शब्दों के प्रयोग से भी कथन में शकित और दृढ़ता आ गर्इ है, ''मेरा मन उमड़-घुमड़ कर ं ं ं बरस जाना चाहता है। ''अथवा मशीन का रथ ध्धर््र चल पड़ता है। कुष्ठनृत्य, कुज्झटिकाच्छन्न आकाश भी ऐसे ही प्रयोग हैं। पूर्ण विराम, अधर््विराम, आश्चर्यबोध्क और प्रश्नार्थक चिहनों के सार्थक प्रयोग से भी उनके कथन में स्पष्टता और प्रभावोत्पादकता आ गर्इ है। द्विवेदीजी की वाक्य-रचना अपने सन्तुलन, सामंजस्य, सरलता-सâदयता और संक्षिप्तता के लिए विख्यात है। उन्होंने अधिकतर छोटे-छोटे और सरल वाक्यों का प्रयोग किया है। सरल और संक्षिप्त होने के साथ-साथ उनके वाक्य सुगठित, सुसम्ब( और सुनियोजित होते हैं, ''क्या यह मनोहर पुष्प भुलाने की चीज थी? सâदयता क्या लुप्त हो गर्इ थी? कविता क्या सो गर्इ थी? ना, मेरा मन यह सब मानने को तैयार नहीं है, जले पर नमक तो यह कि एक तरंगायित पत्रावाले निपफूले पेड़ को सारे उत्तर भारत में अशोक कहा जाने लगा। याद भी किया तो अपमान करके।

मुहावरों और लोकोकितयों का प्रयोग द्विवेदी जी के निबन्धें में कम ही हुआ है पर जहाँ भी हुआ है वहाँ वे बड़ी सटीक व्यंजना करते हैं। प्रस्तुत निबन्ध् में ''जले पर नमक, गला सुखा रहा हूँ, माया काटे कटती नहीं, आदि ऐसे ही प्रयोग हैं।

द्विवेदी जी ने कबीर के बारे में लिखा था, ''भाषा पर कबीर का जबर्दस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। यह बात स्वयं द्विवेदी जी पर भी चरितार्थ होती है। वह जब लेखनी चलाने लगते हैं तो भाषा की समस्त सि(ियाँ उनके आगे हाथ बाँध्कर खड़ी हो जाती हैं, सभी अनुगत भाव से उनकी भाषा-शैली का Üाृंगार करती चलती हैं। उनकी शैली में शालीनता और सरसता, उनके निबन्धें में बु(ित्तत्व और âदय-तत्त्व का मणिकांचन संयोग है। इसीलिए उनके निबन्धें की मानसिक दिवा-स्वप्न (प्दजमससमबजनंस तमअमअपमे) कहा जाना उपयुक्त ही है।

व्याख्या

(क) ''मेरा मन उमड़-घुमड़कर भारतीय रस-साध्न के पिछले हजारों वषो± पर बरस जाना चाहता है। क्या वह मनोहर पुष्प भुलाने की चीज थी। ना, मेरा मन यह सब मानने को तैयार नहीं है। जले पर नमक तो यह कि एक तरंगायिन वाले निपफूले पेड़ को सारे उत्तर भारत में अशोक कहा जाने लगा। याद भी किया तो अपमान करके।

यह गधांश आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ललित निबन्ध् 'अशोक के पफूल से उ(ृत किया गया है। अशोक वृक्ष पर छोटे-छोटे लाल-लाल पफूलों के गुच्छों को देखकर लेखक का मन मुग्ध् हो उठा। वह उसके प्राचीन गौरव, संस्Ñत साहित्य, ध्र्म-ग्रन्थों और पौराणिक कथाओं में वर्णित-चर्चित सौन्दर्य का स्मरण कर तथा वर्ममान काल में उसके प्रति जन-उपेक्षा को देख उदास हो जाता है। अशोक के वृक्ष और उसके पुष्पों को जो आदर-सम्मान हमारे पूर्वजों ने दिया था उसका उल्लेख करते हुए वह लिखता है -

जिस प्रकार वायुमंडल में दबाव बढ़ने पर मेघ उमड़ते-घुमड़ते हैं और पिफर जब वायु उनके भार को नहीं वहन कर पाती तो वे बरसने लगते हैं उसी प्रकार लेखक का मन अशोक वृक्ष के प्रति भारतीय जन-मन की उपेक्षा एवं उदासीनता को अनुभव कर उदास हो उठता हैऋ उदासी बढ़ती जाती है और वह हजारों वर्ष पूर्व के प्राचीन ध्र्म, साहित्य, मिथक, कला आमोद-प्रमोद के उत्सवों और समारोहों की स्मृति में डूब जाता है, उन दिनों को याद करता है जब यहाँ के साहित्य और जीवन दोनों में आनन्द व्याप्त था-कवि, कलाकार और सौन्दर्य पे्रमी नागरिक सभी रस की साध्ना करते थे, कवि और नाटककार अपनी रचनाओं में सरस प्रसंगों का रसपूर्ण वर्णन कर तथा नागरिक दैनंदिन जीवन में कलाओं की उपासना कर अत्यन्त उल्लास और उमंग के साथ पर्व, उत्सव एवं समारोहों में भाग ले चारों ओर आनन्द एवं प्रपफुल्लता का वातावरण पैदा करते थे। तब जीवन में आनन्द ही आनन्द था। उस समय अशोक लोगों का प्रिय था। उसकी पूजा होती थी। उसके किसलयों और पफूलों से सित्रायाँ अपना Üाृंगार करती थीं। कवि और नाटककार अपनी रचनाओं में उसका वर्णन करते समय भावोच्छवसित हो उठते थे। पर आज लोग उसे भूल गये हैं। आज के भारत में न कहीं उसकी पूजा होती है और न साहित्यकार अपनी रचनाओं में उसे स्थान देेते हैं। इस उपेक्षा का क्या कारण है? क्या हमारी सौन्दर्य-चेतना जड़ हो गयी है? क्या हम सौन्दर्य को पहचानते हैं और उस पर मुग्ध् होने की शकित खो बैठे हैं? क्या कवियों की कल्पना-शकित सâदयता एवं कवित्व शकित लुप्त हो गयी है जिसके पफलस्वरूप वे अशोक को अपनी Ñतियों में स्मरण तक नहीं करते? लेखक कहता है कि ऐसा नहीं हुआ। न तो जनसाधरण की सौन्दर्य-चेतना सोयी है, न कवियों और नाटककार âदयीन हुए हैं और न उनकी काव्यशकित लुप्त हुर्इ है। सब कुछ पहले जैसा ही है। पर यह भी सत्य है कि लोग अशोक के प्रति वह मोहन भाव नहीं दिखाते जो हमारे पूर्वजों के मन में उसके प्रति था। और सबसे अधिक दु:खदायी और क्लेशकर बात तो यह है कि आज लोग असली अशोक को पहचानते तक नहीं, असली अशोक की पहचान ही वह खो बैठे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे उत्तर भारत के लोग एक ऐसे पेड़ को अशोक कहने लगे हैं जिसमें पफूल तक नहीं आते। इससे बढ़कर उस महान वृक्ष का अपमान क्या होगा? किसी अनधिकारी को अèािकार देना, किसी कुपात्रा की प्रशंसा करना, किसी मूर्ख को विद्वान कहना अनुचित ही नहीं अधिकारी, सुपात्रा और विद्वान का अपमान करना है। इसी प्रकार ऐसे वृक्ष को जिसमें अशोक के अन्य गुण तो क्या पफूल तक नहीं आते, अशोक कहना उसका घोर अपमान है।

टिप्पणी

1. लेखक के भारतीय साहित्य और संस्Ñति के अपार ज्ञान का पता चलता है।

2. पहले वाक्य में रूपक अलंकार हैं

3. तरंग-शैली का प्रयोग।

4. प्रश्नवाचक वाक्यों से लेखक के भावावेश और तड़प का पता चलता है।

5. ''ना का प्रयोग शैली में सहजता तथा आत्मीयता लाता है।

6. ''निपफूले-निपूते के साम्य पर बताया गया शब्द है जिससे आक्रोश और क्षोभ व्यक्त होता है।

7. जले पर नमक - मुहावरा है।

(ख) ''ध्न्य हो महाकाल ! तुमने कितनी बार मदनदेवता का गर्व-गण्डन किया है, ध्र्मराज के कारागार में क्रांति मचायी है, यमराज के निर्दय तारल्य को पी लिया है, विधता के सर्वकतर्ृत्व के अभिमान को चूर्ण किया है। आज हमारे भीतर जो मोह है, संस्Ñति और कला के नाम पर जो आशकित है, ध्र्माचार और सत्य निष्ठा के नाम पर जडि़मा है, उसमें से कितना भाग तुम्हारे कुण्ठनृत्य से èवस्त हो जाएगा, कौन जानता है। मनुष्य की जीवन-छाप पिफर भी अपनी मस्तानी चाल से चलती जाएगी।

ये पंकितयाँ सुप्रसि( निबन्ध् ''अशोक के पफूल से उदध्ृत की गर्इ है जिसके लेखक हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। अशोक वृक्ष के प्रति लोगों की उदासीनता के कारणों के विषय में सोचते हुए लेखक को लगता है कि उसके प्रति अवज्ञा का एक कारण यह है कि सामन्त-सभ्यता से जुड़ा था और उसके ßास के साथ उसका गौरव भी लुप्त हो गया। राष्ट्रों, संस्Ñतियों और सभ्यताओं के उत्थान-पतन के विषय में सोचते-सोचते उसे कुछ निष्कर्ष हाथ लगते हैं- मानव जाति की धरा अखंड है क्योंकि मानव की जिजीविषा दुर्दम हैऋ संघर्ष से शकित प्राप्त होती हैऋ कोर्इ वस्तु शु( नहीं है, सबमें मिलावट हैऋ परिवर्तन-चक्र की इसी शकित को समझाते हुए लेखक कहता है-               

 काल की शकित अपरिमित है। वह अजेय है। परिवर्तन का चक्र रोके नहीं रुकता। वह अबाध् गति से आगे बढ़ता ही जाता है, संसार की कोर्इ शकित उसे नहीं रोक सकती। कामदेव रूप, सौन्दर्य और पे्रम का देवता माना जाता है परन्तु यमराज इनमें से किसी को नहीं बख्शता, सबका घमंड चूर-चूर कर देता है- रूपवतों का रूप-सौन्दर्य ढल जाता है, पे्रम भी पफीका पड़कर लुप्त हो जाता हैऋ ध्र्मराज सत्य, ध्र्म और न्याय के देवता हैं, पर काल इनको भी नहीं बख्शताऋ इतिहास में सत्य पर असत्य, ध्र्म पर अध्र्म एवं न्याय पर अन्याय हावी होते अक्सर देखा गया हैऋ यमराज मृत्यु का देवता है पर भारतीय ध्र्म और दर्शन आत्मा को अमर मानते हैं- जिसकी मृत्यु होती है, वह पुन: जन्म लेता है- ऐसा हमारा विश्वास है। अत: यमराज भी परिवर्तन के आगे झुकता है। ब्रह्राा या विधता को सृषिट का बनाने वाला बताया जाता हैऋ उन्हें शकितमान और सर्वÑतर्ृत्ववान कहा जाता है पर संसार की कोर्इ वस्तु, कोर्इ प्राणी अनश्वर नहीं है, सब नाशवान और क्षणभंगुर हैं। अत: ब्रह्रा का अभिमान भी मिथ्या है। ऐसी सिथति में मनुष्य का मोह, आसकित, क्षणभंगुर पदाथो± के प्रति आकर्षण भोग-विलास में प्रवृत्ति सब व्यर्थ है। संस्Ñति चाहे वह कितनी ही प्राचीन, समृ( और गौरवशाली क्यों न हो - बदलेगीऋ कलाओं की शैली और शिल्प में परिवर्तन होगाऋ ध्र्म कितना ही महान उदात्त और सातिवक विचारों से सम्पन्न क्यों न हो, विÑत होता। कोर्इ पूरी तरह बदलेगा, कोर्इ आंशिक रूप में। अत: संसार परिवर्तनशील है और उसमें परिवर्तन होंगे। हाँ, परिवर्तन की गति कभी ध्ीमी होगी और कभी वेगवती। केवल एक चीज अजर है, अमर है, शाश्वत है। वह है मानव की जीने की इच्छा और इसी कारण इतिहास में अनेक उथल-पुथल होने के बावजूद प्राÑतिक और मानव की स्वयं पैदा की गर्इ आपदाओं के बावजूद मानवजाति अब भी जीवित है और विकास के मार्ग पर चल रही है।   


2.4 (2) आत्मकथा एवं जीवनी

(2) आत्मकथा एवं जीवनी

(i) 'जूठन

(आत्मकथा)

(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

लेखक परिचय

सामाजिक सड़ाँध् को उजागर करने वाले दलित लेखक ओमप्रकाश बाल्मीकि का जन्म 30 जून 1958 को बरला, जनपद मुजफ्रपफर नगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। लेखक दलित-वर्ग का है और दलित-जीवन की पीड़ाएँ बड़ी ही असहनीय होती हैं। जहाँ उन्होंने आँखें खोली, वहाँ की समाज-व्यवस्था बेहद क्रूर और अमानवी थी। वहाँ सांसे लेना भी बड़ा मुशिकल था। अपनी इस व्यथा-कथा को उन्हें शब्दब( करना था। इसीलिए उन्होंने शिक्षा के प्रति अपनी रुचि जगार्इ और हिन्दी में एम.ए. करके एक जागरुक साहसी लेखक के रूप में साहित्य-जगत में उभरे।

इनके संबंध् में एक बात èयान देने योग्य है कि लेखक, जिसका संबंध् जाति-व्यवस्था के सबसे निचले सोपानों से है, जिन्हें सबसे पहले अपने मनुष्य होने और मनुष्य के रूप में जीवित रहने के लिए ही संघर्ष करना पड़ा हो, लेखक होने की बात तो दूर रही, दो अक्षर पढ़ने के लिए न जाने कितना अपमान और अनाचार से झेलना पड़ा हो। इन सबके बावजूद ये लेखक बन गए-यह उनका अदम्य साहस, दृढ़ आत्मसंकल्प और हर तरह की अमानवीय सिथतियों में भी आत्मा की ज्योति को जलाए रखने का ही परिणाम है।

इनकी अनेक Ñतियाँ प्रकाश में आर्इं। जैसे- 'सदियों का संताप (कविता संग्रह), 'बस! बहुत हो चुका (कविता-संग्रह), 'जूठन (आत्मकथा), इनके अलावा अनेक कथा-संकलनों एवं कविता-संग्रहों में इनकी रचनाएँ संकलित हैं। प्रज्ञा-साहित्य के दलित-साहित्य विशेषांक का 'अतिथि का संपादन भी इन्होंने किया। इसके अतिरिक्त अनेक पत्रा-पत्रिकाओं में इनके लेख, कहानियाँ और कविताएँ प्रकाशित हुइ±। विभिन्न कथाओं में इन्होंने कविताएँ, कहानियाँ भी अनूदित की।

बाल्मीकि जी को उनके लेखन-कार्य के लिए समय-समय पर अनेक पुरस्कार भी मिलते रहे। जैसे- डाú अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार-1993, परिवेश-सम्मान-1995 आदि। इसके अतिरिक्त प्रथम दलित-लेखक-साहित्य सम्मेलन (1993) में भी भाग लिया। नागपुर की अèयक्षता भी की। अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन का कार्य भी किया। इस समय वे भारत सरकार के संस्थान में सेवारत हैं। उनकी 'जूठन नाम की रचना में उनकी आपबीती का स्पष्ट बयान है।

'जूठन उनकी आत्मकथा है। इसमें कहा गया एक-एक शब्द सत्य है। सत्य इसलिए नहीं है कि यह एक लेखक ने लिखा है। सत्य इसलिए भी नहीं है कि रचना स्वयं अपने सत्य होने का प्रमाण देती है, बलिक सत्य इसलिए भी है कि इसमें जिन अनुभवों को पेश किया गया है, उनके साक्षी वे सभी हैं, जिनका जन्म सवर्ण परिवारों में हुआ है और जिन्होंने अपने ही आस-पास किसी-न-किसी ओमप्रकाश बाल्मीकि को अपमानित और प्रताडि़त होते देखा है, स्वयं अपने ही परिजनों द्वारा या जाने-अनजाने स्वयं अपने द्वारा ही। इसलिए इनकी सत्यता के सबसे बडे़ गवाह तो हम सभी हैं। हम जो दलित नहीं हैं और हम जो दलित हैं। इसलिए यह ज्यादा अहम मसला नहीं है कि ठीक-ठीक ऐसा लेखक के साथ हुआ था या नहीं, ज्यादा अहम यह है कि ऐसा ही होता रहा है और हो रहा है, बार-बार हर कहीं। और ठीक यही वजह है कि हम इस बात को नहीं स्वीकारते कि जीवन में जिन अपमान और प्रताड़ना को एक दलित को भोगना पड़ता है, उसे सवर्ण नहीं महसूस कर सकता। यह सही है कि दलित की पीड़ा दलित का ही भोगनी होती है। कोर्इ दूसरे की पीड़ा नहीं भोग सकता। लेकिन उसको वैसा ही महसूस तो किया जा सकता है। अगर महसूस नहीं किया जा सकता तो कबीर से लेकर दया पंवार तक और ओमप्रकाश बाल्मीकि तक के लिए लिखे हुए की ताकत का एहसास कैसे होता। उस पीड़ा की, उस अपमान की, उस निरंतर जलती हुर्इ आग की आंच हर वह व्यकित अनुभव कर सकता है जिसमें मानव संवेदनाओं के प्रति आदर शेष है। और अगर अनुभव किया जा सकता है तो शब्दब( भी किया जा सकता है। अगर मनुष्य में दूसरे के दुखों को महसूस करने, उन्हें समझने और शब्द-ब( करने की शकित नहीं होती तो लोग कविताओं और कहानियों में सिपर्फ अपना ही रोना रोते रहते। ओमप्रकाश वाल्मीकि की यह रचना किसी लेखक का व्यकितगत विलाप नहीं है, वह एक समाज का हाहाकार है, ऐसा हाहाकार जिसकी अनुगूँज हमारे घरों तक हमारे दिलों तक पहुंच रही है।1                

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                1. 'पहल - पृ. 290          

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                जूठन : जातीय बोध् की आत्मस्वीÑति का लम्बा सपफर

- डा. तेजसिंह

हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविधालय

मराठी में दलित आत्मकथाओं का लम्बा दौर चला जो आज तक जारी है। दलित आत्मकथाएँ मराठी साहित्य की श्रेष्ठतम उपलबिध् है जो एक सशक्त विध के रूप में प्रतिषिठत हुर्इ है। उसी परम्परा में ही इन दिनों हिन्दी में भी आत्मकथाएँ लिखने का सिलसिला चला है। मेहतर जाति के इतिहास को आत्मकथात्मक रूप में प्रस्तुत करने वाली भगवानदास की 'मैं भंगी हूँ के अब तक कर्इ संस्करण निकल चुके हैं। सन 1994 में 'आज के प्रश्न श्रृंखला के अंतर्गत राजकिशोर द्वारा सम्पादित पुस्तक - 'हरिजन से दलित में ओमप्रकाश वाल्मीकि के आत्मकथात्मक आलेख 'एक दलित की आत्मकथा के प्रकाशित होने तक उसकी कोर्इ खास चर्चा नहीं होती थी। पर सन 1995 में मोहनदास नैमिशराव की आत्मकथा - 'अपने-अपने पिंजरे के प्रकाशित होते ही 'मैं भंगी हूँ की सर्वत्रा चर्चा होने लगी। नये संस्करण के आते ही वह एक दलित आत्मकथा के रूप में प्रतिषिठत हो गयी और उसे ही हिन्दी की पहली आत्मकथा कहा जाने लगा। उसका वर्तमान संस्करण भी हाथों-हाथ बिक गया है।

इध्र कुछ साहितियक पत्रिकाओं में दलित लेखकों के 'आत्मकथ्य पढ़कर ऐसा लगता है कि एकाध् साल के भीतर ही कर्इ दलित आत्मकथाएँ सामने आएंगी। क्या इसका यह अर्थ लगाया जाए कि उपन्यास-लेखन की अपेक्षा दलित लेखकों को आत्मकथाएँ लिखना सहज और सरल काम लग रहा है? क्या उपन्यास-लेखन से विमुख होने का प्रमुख कारण यही है? लेकिन ओमप्रकाश वाल्मीकि का अनुभव कुछ और ही बयान करता है। अपने अनुभवों को लिखने के लिए लेखक को अनेक खतरों के बीच से गुजरना पड़ता है। उन्हें अपने 'आत्मकथ्य को विस्तार देने के लिए कर्इ साल लग गए। उन्होंने बताया है कि लम्बी जíोजहद के बाद जब सिलसिलेवार लिखना शुरू किया तो उन 'तमाम कष्टों, यातनाओं, उपेक्षाओं, प्रताड़नाओं को एक बार पिफर जीना पड़ा। उस दौरान गहरी मानसिक यंत्राणाएँ मैंने भोगीं। स्वयं को परत-दर-परत उध्ेड़ते हुए कर्इ बार लगा - कितना दुखदायी है यह सब।

उपन्यास लिखने के लिए लेखक को अपने जीवनानुभवों को सृजनात्मक स्तर पर अभिव्यक्त करने के लिए दोहरी मानसिक यंत्राणाओं से नहीं गुजरना पड़ता है जबकि आत्मकथा के लिए पुन: जीवन के कष्टों और यातनाओं से गुजरना पड़ता है। क्योंकि 'दलित-जीवन की पीड़ाएँ असहनीय और अनुभव दग्ध् हैं। ऐसे अनुभव साहित्य की अन्य विधओं में स्थान नहीं पाते हैं। इनके लिए साहित्य की 'आत्मकथा नामक विध ही सर्वथा उपयुक्त होती है। उस पर एक दलित लेखक ऐसी समाज-व्यवस्था में सांसें लेता है जो 'बेहद क्रूर और अमानवीय है। दलितों के प्रति असम्वेदनशील भी। इसलिए दलित लेखक उपन्यास-लेखन की बजाय आत्मकथा लिखने के लिए उन्मुख होते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन आत्मकथा इन्हीं सब कारणों से पे्ररित होकर लिखी गयी है। हालांकि किसी भी लेखक के लिए अपने जीवनानुभव लिखना आसान काम नहीं है। क्योंकि उसे दुहरी मानसिक यन्त्राणाओं से गुजरना पड़ता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा की रचना-प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट लिखा है कि 'अपनी व्यथा-कथा को शब्दब( करने का विचार कापफी समय से मन में था। लेकिन प्रयास करने के बाद भी सपफलता नहीं मिली थी। कितनी ही बार लिखना शुरू किया और हर बार लिखे गए पन्ने पफाड़ दिये। कहाँ से शुरू करूं और कैसे? यही दुविध थी। कुछ मित्राों की राय थी, आत्मकथा के बजाय उपन्यास लिखो। (लेखक की ओर से....) इस प्रकार वे अपनी दलित जीवन की पीड़ाओं यन्त्राणाओं, उपेक्षाओं और दु:खों को 'आत्मकथा में अभिव्यक्त कर सकते थे। 'जूठन उनके इन्हीं जीवनानुभवों की सृजनात्मक उपलबिध् है। दलित आत्मकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता और उपलबिध् यही है कि उसमें उनके लेखकों के जीवनानुभव सच्चे और प्रामाणिक रूप से अभिव्यकित पाते हैं।

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                 साभार 'दलित साहित्य - डा. तेजसिंह      

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 आत्मकथा की शुरुआत मुजफ्रपफरनगर जिले के बरला गाँव की जोहड़ी के किनारे बने उस एक चूहडे़ परिवार के मकान से होती है जिसमें ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म हुआ था। एक ओर सवर्ण तगाओं के मकान हैं तो दूसरे किनारे दलितों के मकान और मकानों के पीछे गाँव भर की जवान-बूढ़ी औरतों का खुला शौचालय है जहाँ वे गोलमेज कान्Úेंस की शक्ल में बैठकर गाँव-गली के लड़ार्इ-झगड़ों की चर्चा करती हैं। इस तरह चारों तरपफ गन्दगी भरी होती है। ऐसी दुर्गन्ध् उठती है कि मिनट भर में सांस घुट जाय। उनकी तंग गलियों में सुअर और कुत्तों के साथ नगं-ध्ड़ंग बच्चे घूमते हैं। वर्णव्यवस्था को आदर्शव्यवस्था कहने वाले सवणो± को यदि 'दो-चार दिन रहना पड़ जाय तो उनकी राय बदल जाए। ऐसे माहौल में ओमप्रकाश वाल्मीकि का बचपन बीता था जिसकी यादों भरी कड़वी सच्चाइयाँ उनके जेहन में अब तक मौजूद हैं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि के गाँव में कुछ मुसलमान त्यागी परिवारों को छोड़कर बाकी हिन्दू तगा ही रहते थे। मुसलमान-हिन्दू तगाओं का दलितों के प्रति एक जैसा व्यवहार था। क्योंकि उन्हें दो जून रोटी के लिए तगाओं के घरों में सापफ-सपफार्इ से लेकर खेती-बाड़ी और मेहनत-मजदूरी के सभी काम करने पड़ते। ऊपर से रात-बेरात बेगार करनी पड़ती थी जिस के बदले में 'कोर्इ पैसा या अनाज नहीं मिलता था। अगर बेगार करने से इन्कार किया तो पिफर गाली-गलौच के साथ-साथ प्रताड़ना भी सहनी पड़ती। नाम लेकर पुकारने की किसी भी सवर्ण को आदत नहीं थी इसलिए उनके लिए उम्र में बड़ा हो तो 'ओ चूहडे़, बराबर या उम्र में छोटा है तो 'अबे चूहडे़ के यही तरीका या सम्बोध्न था। (जूठन-पृú-12) वह जाति व्यवस्था के कारण उत्पन्न 'अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली, गाय-भैंस को छूना बुरा नहीं था लेकिन यदि चूहडे़ का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था। इस तरह उन्हें सामाजिक स्तर पर इंसानी दर्जा हासिल नहीं था। वे सिपर्फ उपभोग की वस्तु थे कि काम लिया और पफेंक दिया। पूरे भारत में दलितों की ऐसी ही सामाजिक-आर्थिक सिथति थी।

आजादी से पहले र्इसार्इ मिशनरियों ने पहले-पहल दलितों के लिए शिक्षा के द्वार खोले जिसकी वजह से दलितों में शिक्षा के प्रति जागरूकता आर्इ थी। शहरों के अलावा गाँव-कस्बों में भी र्इसार्इ मिशनरियों ने स्कूल खोले। भले ही उनमें अक्षर ज्ञान ही कराया जाता था। बालक ओमप्रकाश को मोहल्ले के एक र्इसार्इ सेवकराम मसीही के बिना कमरों और बिना टाट-पटटी वाले खुले स्कूल में दलितों के अन्य बच्चों के साथ प्रारमिभक शिक्षा के रूप में पहले-पहल अक्षरज्ञान हुआ। पिफर पिताजी से खटपट होने पर गाँव के ही बेसिक प्राइमरी स्कूल में भर्ती कराया गया। उसके पिताजी शिक्षा का महत्त्व समझते थे, इसलिए मास्टर हरपफूलसिंह के सामने गिड़गिड़ाकर कहा था, 'मास्टरजी, थारी मेहरबानी हो जागी जो म्हारे इस जाकत (बच्चा) कू बी दो अक्षर सिखा दोगे।

यह उस समय की बात थी जब देश को आज़ाद हुए आठ साल हो गए थे और सरकारी स्कूलों के द्वारा अछूतों के लिए खुलने शुरू तो हो गए थे, लेकिन जन सामान्य की मानसिकता में कोर्इ विशेष बदलाव नहीं आया था। दलितों को स्कूल में दूसरे सवर्ण बच्चों से दूर और अलग ज़मीन पर बैठना पड़ता था। और कभी-कभी एक दम पीछे दरवाजे के पास जहाँ से बोर्ड पर लिखे अक्षर ध्ुंध्ले दिखते थे और उस पर त्यागियों के बच्चों के द्वारा 'चूहडे़ का कहकर चिढ़ाना और बिना कारण पिटार्इ कर देना आम बात थी। अगर कभी वे नये सापफ-सुथरे कपडे़ पहन कर स्कूल आते तो सवर्ण लड़के उन पर पफबितयाँ कसते, 'अबे चूहडे़ का, नये कपडे़ पहनकर आया है। और अगर मैले-पुराने कपडे़ पहनकर स्कूल आते तो कहते, 'अबे चूहडे़ के, दूर हट, बदबू आ रही है। उन्हें इन दोनों ही सिथतियों में अपमानित होना पड़ता था। ओमप्रकाश वाल्मीकि बचपन की उन यातनाओं और अपमान भरे दिनों के बारे में लिखते हैं कि 'वह अजीब-सी यातनापूर्ण जिन्दगी थी जिसने मुझे अन्तमर्ुखी और चिड़चिड़ा, तुनकमिजाजी बना दिया था। (पृú-13) दलित समुदाय के लोगों का जीवन ऐसी ही सामाजिक-आर्थिक परिसिथतियों में बीतता है। ये परिसिथतियाँ उस ग्रामीण समाज की जातिवादी-संरचना पर अवसिथत होती है जिन्हें आज़ादी के इन पचास सालों में भी हम नहीं बदल पाए हैं।

आज भी किसी-न-किसी रूप में शिक्षा का ढांचा ग्रामीण क्षेत्राों में अपनी सामन्ती जड़े जमाए हुए है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की यह आत्मकथा शिक्षा के सामन्ती चरित्रा को बखूबी उदघाटित करती है। अèयापकों का आदर्श रूप अभी भी उनकी स्मृतिपटल पर अंकित है कि जब भी कोर्इ आदर्श गुरू की बात करता है तो उन्हें वे तमाम शिक्षक याद आ जाते हैं जो माँ-बहन की गालियाँ देते थे, सुन्दर लड़कों के गाल सहलाते थे और उन्हें अपने घर बुलाकर उनसे वाहियातपन करते थे। जब ओमप्रकाश चौथी कक्षा में था तो हेडमास्टर बिशम्बर सिंह की जगह पफलीराम आ गए तो उनके बुरे दिन आ गए। तथाकथित जातीय सभ्यता और संस्Ñति के संवाहक अèयापक कलीराम ने शिक्षा की बजाय ओमप्रकाश को खानदानी पेशे की याद दिलार्इ, '....वह जो सामने शीशम का पेड़ खड़ा है, उस पर चढ़ जा और टहनियाँ तोड़के झाडू बणा ले। पत्तों वाली झाडू बणाना। और पूरे स्कूल कू ऐसा चमका दे जैसा सीसा। तेरा तो यो खानदानी काम है। जा.... पफटापफट लग जा काम पे। घर में भाइयों का लाड़ला ओमप्रकाश दो दिन तक इसलिए झाडू लगाता रहा कि 'मन में एक तसल्ली थी कि कल से कक्षा में बैठ जाऊंगा। पर जब तीसरे दिन वह कक्षा में चुपचाप जाकर बैठ गया तो हैडमास्टर कलीराम की दहाड़ सुनार्इ पड़ी, 'अबे, ओ चूहडे़ के, मादरचोद कहां घुस गया.... अपनी माँ...., तभी एक त्यागी के लड़के ने चिल्लाकर बताया 'मास्साब,------- वो बैटठा है कोणे में तो उन्होंने भेडि़ये की तरह उसकी गर्दन दबोच कर बरामदे में लाकर पटक दिया और चिल्लाकर कहा, 'जा लगा पूरे मैदान में झाडू.... नहीं तो गांड में मिर्ची डालके स्कूल से बाहर काढ़ (निकाल) दूंगा। यह कौन से उच्च संस्कार हैं जो एक शिक्षक को ऐसा आचरण करने के लिए पे्ररित कर रहे थे? क्या यह सवर्ण मानसिकता नहीं थी जो जातिवाद के घेरे में बन्द थी। भयभीत ओमप्रकाश ने पूरे स्कूल में रोते-रोते झाड़ू लगायी। स्कूल के पास से गुजरते हुए पिताजी ने देखा तो उनकी आंखों में नमीं उतर आर्इ और लम्बी-लम्बी घनी मूछें गुस्से से पफड़पफड़ाने लगी - 'कौण-सा मास्टर है वो द्रोणाचार्य की औलाद, जो मेरे लड़के से झाडू लगवावे है....। यह एक दलित का साहस और हौसला था कि हेडमास्टर की ध्मकी का कोर्इ असर नहीं पड़ा, 'ले जा इसे यहां से.... चूहड़ा होके पढ़ाने चला है.... जा चला जा.... नहीं तो हाड़-गोड़ तुड़वा दूंगा तो अèयापक के पेशे की कदर करते हुए चुनौती भरे स्वर में कहा 'मास्टर हो, इसलिए जा रहा हूँ.... पर इतना याद रखिए मास्टर.... यो चूहडे़ का यहीं पढे़गा.... इसी मदरसे में। और वो ही नहीं इसके बाद और भी आवेंगे पढ़ने कू। (पृú-16) यह एक दलित का पूरी समाज-व्यवस्था के प्रति खुला विद्रोह था जो सदियों से अन्दर जमा हो रहा था और अवसर पाते ही विस्पफोटक पदार्थ की तरह पफट पड़ा।

आत्मकथा में ऐसी अनेक घटनाएँ और प्रसंग हैं जो ब्राह्राणवादी पोषकों के जातिवादी चरित्रा और उनकी परम्पराओं-प्रथाओं के विरु( खुला विद्रोह का संकेत देती हंै। सुखदेव सिंह त्यागी की बेटी की बारात आर्इ थी। हालांकि ऐसे मौकों पर जब मेहमान या बाराती खाना खा रहे होते तो चूहड़े दरवाजों के बाहर बडे़-बडे़ टोकरे लेकर बैठे रहते थे। टोकरों में डाली गर्इ जूठन चटखारे लेकर खार्इ जाती थी। बालक ओमप्रकाश अपनी माँ-बहन के साथ सुखदेव सिंह के दरवाजे पर बैठे थे। जब बारात खाना खाकर चली गयी तो माँ ने सुखदेव सिंह को बाहर आता देखकर कहा, 'चौध्री जी, र्इब तो सब खा-खाकर चले गए.... म्हारे जाकतों (बच्चों) कू भी एक पत्तल पर ध्र के कुछ दे दो। वो बी तो इस दिन का इन्तज़ार कर रे ते। सुखदेव सिंह ने जूठी पत्तलों से भरे टोकरे की तरपफ इशारा करके कहा, 'टोकरा भर तो जूठन ले जा री है.... ऊपर से जाकतों के लिए खाणा मांग री है? अपनी औकात में रह चूहड़ी। उठा टोकरा दरवाजे से और चलती बन। त्यागी के वे शब्द ओमप्रकाश के सीने में चाकू की तरह उतर गए जिसकी जलन से वे आज भी झुलस रहे हैं। उस रोज माँ का स्वाभिमान जाग गया था और उसकी आंखों में दुर्गा उतर आर्इ थी और टोकरा वहीं बिखेर कर सुखदेव सिंह से कहा, 'इसे ठाके अपने घर में ध्र ले। कल तड़के बारातियों को नाश्ते में खिला देणा। त्यागी उस पर झपटा तो बिना डरे माँ ने शेरनी की तरह सामना किया और पिफर 'उसके बाद माँ कभी उनके दरवाजे पर नहीं गर्इ और जूठन का सिलसिला भी उस घटना के साथ बन्द हो गया था। (पृú-21)

निश्चय ही इन घटनाओं से बालक ओमप्रकाश की चेतना में बदलाव आया होगा। कुशाग्र बु(ि का वह अपने सेक्शन में प्रथम आया तो कलास का मानीटर बना दिया गया, लेकिन कुछ अèयापकों का व्यवहार अभी भी ठीक नहीं था, उनके रवैये में प्रताड़ना और उपेक्षा का भाव निरन्तर बना रहा। इसलिए उसे स्कूल के सांस्Ñतिक कार्यक्रमों से दूर रखा जाता था। इसके बावजूद उसमें आत्मविश्वास की कमी नहीं थी। पहली बार किसी दलित बालक न साहस करके जिसे सवणो± की दृषिट में èाृष्टता कहा जाएगा, मास्टर जी के सामने द्रोणाचार्य के पाठ के संबंध् में एक सवाल किया था कि अगर द्रोणाचार्य ने भूख से तड़पते अश्वत्थामा को दूध् की जगह आटे का घोल पिलाया था तो 'हमें चावल का मांड। पिफर भी महाकाव्य में हमारा जिक्र क्यों नहीं आया? किसी महाकवि ने हमारे जीवन पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा? मास्टर ने उसकी इस ध्ृष्टता का जवाब उसे मुर्गा बनाकर चीखते हुए दिया, 'चूहडे़ के, तू द्रोणाचार्य से अपनी बराबरी करे है.... ले तेरे ऊपर मैं महाकाव्य लिखूंगा। और पिफर मास्टर जी ने उसकी पीठ पर सटाक-सटाक छड़ी से महाकाव्य रच दिया था जो आज भी 'भूख और असहाय जीवन के घृणित क्षणों में सामन्ती सोच का यह महाकाव्य मेरी पीठ पर नहीं, मेरे मसितष्क के रेशे-रेशे पर अंकित है। (पृú-35)

दलितों ने इसे साकार रूप में जीते-जी भोगा है। ग्रामीण जीवन की यह दारूण-व्यथा हिन्दी के महाकवियों को छू भी नहीं सकी थी। इसलिए सवर्ण साहित्य में नर्क की सिपर्फ कल्पना है जबकि दलितों ने इस नर्क को जीवन में भोगा है। सवर्ण साहित्य और दलित साहित्य में यही मूलभूत अन्तर है। गाँवों के जातिवादी सामाजिक ढाँचे में ही रहकर दलितों के नारकीय जीवन को और जाना-भोगा जा सकता है। जहाँ उन्हें मरे हुए जानवर उठाने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके बावजूद श्रम-साèय काम के बदले मात्रा गालियाँ मिलती हैं। इस क्रूर समाज में श्रम का कोर्इ मोल नहीं है बलिक निधर््नता को बरकरार रखने का ही षडयंत्रा किया जाता है और जातिवाद उसे बनाए रखने का सबसे बड़ा साध्न है। इसलिए आज़ादी के पचास साल बाद भी जाति-व्यवस्था को किसी-न-किसी रूप में बनाए रखा गया है। ग्रामीण समाज-व्यवस्था इसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष पोषण करती है। मास्टर बृजपाल त्यागी के घर पर घटी घटना सवणो± के उच्च संस्कारों की मानसिकता का वास्तविक रूप सामने ला देती है। ओमप्रकाश अपने सहपाठी मिक्खूराम के साथ मास्टर बृजपाल त्यागी के गाँव में गेहूँ का कटटा लेने जाता है। जहाँ बुजुर्ग ने उनकी मेहमान की तरह खूब खातिर की, परन्तु जैसे ही उन्हें मालूम हुआ कि वे चूहड़ा जाति के हैं तो उन दोनों को अश्लील गालियाँ देते हुए लाठी से मारने दौड़ा कि उन्होंने उनके बर्तनों में आदर के साथ बैठकर खाना खाने और चारपार्इ पर बैठने का दु:साहस कैसे किया? इस तरह सवणो± के 'अतिथि-सत्कार का खोखलापन खुल गया था। अतिथि की जाति ही उसे आदर दिलाती है। वैसे भी आदर पाने का हमें अधिकार ही कहां था। सच बोल कर लाठी खार्इ, बेइज्जती हुर्इ और 'जाति के नाम पर जो खरोंच मिली उन्हें भरने के लिए युग भी कम पडे़ंगे। (पृú-66)

इन सामाजिक घटनाओं से उनके मन में गहरी वितृष्णा भर गयी थी। वय: सनिध् की उस किशोरावस्था में मन पर एक खरोंच पड़ गयी थी जो कांच पर खिंची लकीर की तरह आज भी यथावत है। एक दलित लेखक की पीड़ा का अहसास उन्हें कैसे हो सकता था जिन्होंने घृणा और द्वेष की बारीक सुइयों का दर्द अपनी त्वचा पर कभी महसूस नहीं किया? जिन्हें अपमान नहीं भोगना पड़ा, वे अपमान-बोध् को कैसे जान पाएंगे? और जिस्म पर अपमान की सर्द लकीरे पाने वाले ओमप्रकाश को 'कभी-कभी लगता है जैसे क्रूर और आदिय सभ्यता में सांस लेकर पले-बढे़ हैं। इन सिथतियों ने उसके विरोध् को जनम दिया था। परीक्षा के समय में पफौज़ा त्यागी के खेत में बेगार करते वक्त भी जातिगत अपमान का दंश झेलना पड़ा था, 'अबे चूहडे़ के.... आज.... दो अच्छर क्या पढ़ लिए, सोहरे का दिमाग चढ़ गिया है.... अबे, औकात मत भूल। जबकि उसके पिता यही समझाते थे कि पढ़-लिखकर, अपनी 'जाति सुधरो। लेकिन क्या पता कि 'पढ़-लिखकर जातियां नहीं सुध्रतीं। वे सुèारती हैं जन्म से।

इन्टर कालिज में आने के बाद ओमप्रकाश ने डाú अम्बेडकर की पुस्तकें पढ़ी। इससे पहले वह गांध्ी, नेहरू, पटेल, विवेकानन्द, शरत और टैगोर से ही परिचित था। डाú अम्बेडकर की पुस्तकों के अèययन से उसके भीतर एक प्रवाहमयी चेतना जागृत हुर्इ और उसके गूंगेपन को शब्द मिल गए। व्यवस्था के प्रति विरोध् की भावना उसके मन में इन्हीं दिनों पुख्ता हुर्इ थी। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने आत्मकथा में स्पष्ट लिखा है कि 'अम्बेडकर को पढ़ लेने के बाद यह बात समझ में आ गयी थी कि गांध्ी ने 'हरिजन नाम देकर अछूतों को राष्ट्रीय धरा में नहीं जोड़ा बलिक हिन्दुओं को अल्पसंख्यक होने से बचाया था। उनके हितों की रक्षा की थी। लेकिन इस के साथ-साथ 'एक नया शब्द 'दलित भी मेरे शब्दकोश में जुड़ गया, जो 'हरिजन का स्थानापन्न नहीं बलिक करोड़ों अछूतों के आक्रोश की अभिव्यकित थी। इस एक 'दलित शब्द से उन्हें नयी दिशा मिल गयी और वह धरणा मजबूत होती गयी कि 'स्कूल-कालिजों में दी जाने वाली शिक्षा किसी भी रूप में राष्ट्रीय नहीं बनाती, बलिक कटटर संकीर्ण हिन्दू बनाती है।

इसलिए ओमप्रकाश वाल्मीकि के मन में बार-बार एक ही सवाल उठता था कि 'मैं हिन्दू भी तो नहीं हूँ। यदि हिन्दू होता तो हिन्दू मुझसे इतनी घृणा, इतना भेदभाव क्यों करते हैं? बात-बात पर जातीय-बोध् की हीनता से मुझे क्यों भरते हैं? एक अच्छा इंसान होने के लिए 'हिन्दू होना क्यों जरूरी है। जबकि 'हिन्दू की क्रूरता बचपन से देखी है, सहन की है। जातीय श्रेष्ठताभाव अभिमान बनकर कमजोर को ही क्यों मारता है? क्यों दलितों के प्रति हिन्दू इतना निर्भय और क्रूर है? ऐसे अनगिनत सवाल इस आत्मकथा में बेबाकी से उठाए गए हैं जिनका जवाब सवणो± के पास नहीं है।

अपनी पढ़ार्इ के दौरान ही ओमप्रकाश को एप्रेंटिस के रूप में आर्डिनेंस पफैक्टरी, देहरादून में प्रवेश मिल गया तो पिताजी की खुशी का ठिकाना न रहा। वे बार-बार एक ही बात दोहराते थे कि 'जात से तो पीछा छूटा, पर वे अन्त तक इस तथ्य से अपरिचित ही रहे कि 'जाति से मृत्युपर्यन्त पीछा नहीं छूटता है। टे्रनिंग के दौरान आर्डिनेंस पफैक्टरी प्रशिक्षण संस्थान, अम्बरनाथ, बम्बर्इ, के हास्टल में रहते समय कुलकर्णी परिवार से संपर्क हुआ था जिन्हें 'वाल्मीकि सरनेम में ब्राह्राण होने का भ्रम हो गया था। इसी कारण उस परिवार में आत्मीयता मिली और स्नेह भी, जो पारिवारिक संबंधें में बदलने लगा था कि एक दिन उनके घर में ही महार जाति के अèयापक के साथ जातिगत भेदभाव देखा तो मन में उनके प्रति घृणा हो गयी। कुलकर्णी की बेटी सविता जो वाल्मीकि से प्यार करने लगी थी, को जब यह बताया कि वह भी अछूत है तो उसे यकीन नहीं हुआ। सच जानकर सविता अपराध्-बोध् से पीडि़त हो गयी और 'हमारे बीच अचानक पफासला बढ़ गया था। हजारों साल की नपफरत हमारे दिलों में भर गयी थी। एक झूठ को हमने संस्Ñति मान लिया था। ओमप्रकाश उस समय तनाव-मुक्त था तो सविता अपराध्-बोध् से पीडि़त कि 'घर आओ या न आओ लेकिन यदि यह सच है तो बाबा से मत कहना....। यह आध्ुनिक समाज के उन ब्राह्राण परिवारों का चरित्रा है जो आध्ुनिकता, प्रगतिशीलता और जनतन्त्रा का ढोल पीटते हैं पर अपने अन्दर ब्राह्राणवादी-संस्कारों को ही पालते रहते हैं और अपने बच्चे को भी पारिवारिक स्तर पर ब्राह्राणी-संस्कारों को जन्म की तरह घुटटी पिलाते रहते हैं।

दूसरी तरपफ उन्हें महाराष्ट्र की ध्रती पर ही दलित आन्दोलन से पे्ररणा मिली। मराठी के दलित साहित्य से ही नहीं बलिक उसके लेखकों - दयापवार, नामदेव वाल, गंगाध्र पानतावणे, बाबूराव बागूल तथा केशव मेश्राम आदि से परिचय हुआ जिनके शब्द रंगों में चिंगारी भर रहे थे। ओमप्रकाश वाल्मीकि को इनसे नयी ऊर्जा मिली। जैसे-जैसे मराठी साहित्य में से परिचय बढ़ता गया उनका आक्रोश भी मुखर होने लगा। दलित आन्दोलन की ऊर्जा से उनमें दलित चेतना की अदभुत तेजसिवता के दर्शन हुए और उन्हें आत्मसन्तुषिट मिली। नागपुर की 'दीक्षा भूमि में भदन्त आनन्द कौसल्यायन से पे्ररणा मिली। बु( के मानवीय स्वतंत्राता के दर्शन से नयी ऊर्जा प्राप्त हुर्इ और मानव को ही सर्वोपरि मानकर उसकी मुकित के लिए साहित्य-सृजन की ओर प्रवृत्त हुए। जैसे-जैसे उनकी दलित आन्दोलन में सक्रियता बढ़ रही थी, आस-पास के लोग शक से निगाहों से देखने लगे थे, मानों वह उनके वर्चस्व को तोड़ने का काम कर रहा था। ऐसे लोगों में ज्यादातर सवर्ण ही थे।

इस आत्मकथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकांकी और सिपर्फ आत्मगत ही नहीं है बलिक समषिटगत भी है। भारतीय समाज का लगभग पूरा चरित्रा इसमें समाया हुआ है। एक तरपफ सवर्ण जाति के शिक्षकों से लेकर घरमों-कर्मचारी और अपफसरों की जातिगत भेदभाव और उससे उत्पन्न अपमान और यातनाओं का लम्बा सिलसिला दिखार्इ देता है तो दूसरी ओर सवर्ण जाति के छात्राों-कर्मचारी और अपफसरों का स्नेह और प्यार भरा सहयोग भी मिला है। जब पहली बार इस बस्ती के ओमप्रकाश ने हार्इस्कूल पास किया तो चमनलाल त्यागी उसके घर बधर्इ देने आया था। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने आत्मकथा में लिखा है कि 'ऐसा पहली बार हुआ था जब कोर्इ त्यागी चूहड़ों के घर बधर्इ देने आया था। बलिक इससे भी ज्यादा बड़ी बात यह हुर्इ थी कि चमनलाल त्यागी मुझ अपने घर ले गए थे। बेहद आत्मीयता के साथ पास बैठाकर दोपहर का खाना भी खिलाया था। वह भी अपने बर्तनों में। छुआछूत के माहौल में यह एक विशेष घटना थी (पृú-75) इसी तरह महाराष्ट्र पुलिस के सब-इंस्पेक्टर कुरेशी और उसके परिवार से भी उन्हें बहुत स्नेह और प्यार मिला। मेघदूत नाटय संस्था के कार्यक्रमों के दौरान अनेक सवणो± से संपर्क हुआ और अनेक लोगों से आत्मीय संबंध् भी बने। उनका सहयोग भी उन्हें बराबर मिलता रहा। आकाशवाणी नागपुर के विविध् भारती केन्द्र के वरिष्ठ उदघोषक किशन शर्मा से बडे़ भार्इ की तरह स्नेह और सहयोग मिला। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इस संबंध् में लिखा है, 'मुझे बनाने में किशन शर्मा जी का बहुत बड़ा योगदान है। वे जितने अच्छे कलाकार थे उतने ही सम्वेदनशील इंसान भी, जो मानवीय अनुभूतियों को परख लेने की क्षमता रखते थे। (पृú-145)

आत्मकथा का अन्त ओमप्रकाश के 'वाल्मीकि सरनेम को लेकर उठे विवाद के साथ उनके आत्मसंघर्ष से होता है और यह सरनेम उनके संघषो± और सरोकारों का साथी बन गया था, इसलिए उन्हें आत्मीय भी लगा था। कुछ मित्राों को 'वाल्मीकि सरनेम आकर्षक लगता है तो कुछ को 'जाति बोध् की हीनता का। स्कूल-कालेज में सहपाठियों से लेकर अèयापकों-गुरूजनों ने इस सरनेम पर बहुत बार छींटाकशी की थी और मजाक भी बनाया था तो कुछ लोगों ने इसे साहसिक कदम बताया। उनका तर्क था कि एक अछूत, निम्न जाति कही जाने वाली 'जाति का व्यकित अपने नाम के साथ अपनी 'जाति का सरनेम की तरह लगाए, वह भी श्रेष्ठता भाव के साथ तो साहसिक हुआ ही। एक सज्जन ने तो यहाँ तक कह दिया, 'साहस की क्या बात है.... है तो चूहड़ा ही अच्छा है, जाति पूछने की जहमत से बच जाए।

सच्चार्इ यही है कि भारत में 'जाति के साथ ही मान-सम्मान जुड़ा हुआ है। क्योंकि जाति का नाम जानते ही लोगों का व्यवहार और आचरण बदल जाता है और 'ऐसा कहने वालों में ज्यादातर मेरी ही 'जाति के पढ़े-लिखे, मेरे परिवारजन, नाते-रिश्तेदार होते हैं। तथाकथित दलित साहित्यकार भी हैं। कर्इ अधिकारी, वि(ान, अपफसर मुझसे पफासला रखने का प्रयास करते हैं। (पृú-149) बहरहाल, ओमप्रकाश के साथ जुड़कर 'वाल्मीकि शब्द जाति हीनता का नहीं बलिक उनकी अपनी जातीय असिमता और पहचान का प्रतीक बनकर उभरा है जो वर्ण-व्यवस्था, द्वेष और घृणा को नाकाम कर रहा है। स्पष्ट है कि यह आत्मकथा दलित जीवन की विडम्बनापूर्ण सिथतियों, जातिव्यवस्था से उत्पन्न छुआ-छूत के दंश को, यंत्राणाओं, यातनाओं और अपमान के विभिन्न पक्षों को उभारते हुए ओमप्रकाश 'वाल्मीकि सरनेम के जातीय-बोध् की आत्मस्वीÑति की लम्बी यात्राा तय करके दलित असिमता की पहचान कराने में अपनी सार्थकता सि( करती है।