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3 (2): संज्ञानात्मक विकास दृषिटकोण

(2): संज्ञानात्मक विकास दृषिटकोण

-नीलम दलाल

जवाहरलाल नेहरू विश्वविधालय, दिल्ली

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संज्ञानात्मक विकास का अर्थ- संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत बच्चे का चिंतन, बु(ि तथा भाषा में परिवर्तन आता है। इन तीनों परिवर्तनों में संवेदन, प्रत्यक्षीकरण, प्रतिमा-धरणा, धरणा, प्रत्याàान, समस्या-समाधन, चिन्तन, प्रक्रिया, तर्क-शकित जैसी महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। संज्ञानात्मक विकास प्रक्रियाएँ ही विकासमान बालक को कविताएँ याद करने, गणित की समस्या को हल करने के तरीके के बारे में सोचने व निर्णय लेने, कोर्इ अच्छी व सृजनात्मक रणनीति बनाने व क्रमागत अर्थपूर्ण वाक्य बनाने जैसे कायो± हेतु योग्य बनाती हैं। इस प्रकार संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य बालकों में संवेदी सूचनाओं को ग्रहण करके उस पर चिन्तन करने तथा क्रमिक रूप से उसे इस लायक बना देने से होता है जिसका प्रयोग विभिन्न परिसिथतियों में करके वे तरह-तरह की समस्याओं का समाधन आसानी से कर सकते हैं।

1. जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सि(ान्त-

जीन पियाजे (1896-1980)एक प्रमुख सिवस मनोवैज्ञानिक थे। जिन्होंने प्राणि-विज्ञान में शिक्षा प्राप्त की थी। अल्पेफड बिने के साथ (1922-23)बु(ि-परीक्षणों पर कार्य करते समय ही उन्होंने बालकों के संज्ञानात्मक विकास पर कार्य किया।

वस्तुत: पियाजे ने बालक के संज्ञानात्मक विकास के संदर्भ में शिक्षा मनोविज्ञान में क्रांतिकारी संकल्पना को उदघाटित किया है। जिसके परिणामस्वरूप इन्हें प्रतिषिठत नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पियाजे ने अधिगम के व्यवहारवादी सि(ान्तों की आलोचना करते हुए संज्ञानात्मक विकास का गत्यात्मक माडल प्रस्तुत किया जिसे कन्स्ट्रटिविजम, के नाम से जाना जाता है।

जीन पियाजे के अनुसार मनुष्य आरंभिक बाल्यावस्था से ही क्रियात्मक तथा स्वतंत्रा अर्थ-रचियता होता है जो स्वयं ज्ञान का निर्माण करता है न कि उसे दूसरों से ग्रहण करता है। तथा उसका बौ(िक विकास उसके स्वयं की बौ(िक क्रियाओं द्वारा प्रभावित होता है। पियाजे के अनुसार जब बच्चे अपने चारों के ज्ञान को संगठित करने का प्रयास करते है तो इस दौरान- बच्चे मुख्यत: बाá वस्तुओं पर अपने द्वारा की गर्इ क्रिया द्वारा सीखते तथा विचारों की श्रेणियों का निर्माण करते हैं। बच्चे सतत रूप से नए ज्ञान व कौशलों संबंध्ी सूचनाओं केा इकटठा करते रहते हैं इन सूचनाओं को क्रमगत जटिल सुसंगत तथा अपनी समझ के पूर्ण ढ़ाँचे में समायोजित करने में लगातार प्रयासरत रहते हैं। पियाजे के अनुसार बच्चा अपने वातावरण के साथ इस अन्तक्र्रिया के परिणामस्वरूप ही सीखता है। संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य चिंतन में गुणात्मक  परिवर्तन से है तथा यह परिवर्तन पहले से उपसिथत संज्ञानात्मक संरचनाओं में अनुकूलन द्वारा होता है। यह परिवर्तन अपरिहार्य व अपरिवर्तनीय तथा जैव-निर्धरित होता है।

संक्षेप में पियाजे के अनुसार बालकों में वास्तविकता के स्वरूप में चिंतन करने, उसकी खोज करने, उसके बारे में समझ बनाने तथा उनके बारे में सूचनाएँ एकत्रित करने की क्षमता, बालक के परिपक्वता स्तर तथा बालक के अनुभवों की पारस्परिक अन्त: क्रिया द्वारा निèर्ाारित होती है।

बालक अपने विश्व की ज्ञान रचना में 'स्कीमा का प्रयोग करता है। 'स्कीमा से तात्पर्य ऐसी मानसिक संरचना से है जो व्यकित विशेष के मसितष्क में सूचनाओं को संगठित तथा व्याख्यायित करने हेतु विधमान होती है। यह 'स्कीमा दो प्रकार का होता है पहला साèाारण तथा दूसरा जटिल। साधरण 'स्कीमा मोटरकार या खिलौने के 'स्कीमा से समझा जा सकता है। इसी प्रकार अंतरिक्ष का निर्माण कैसे हुआ का 'स्कीमा, जटिल 'स्कीमा का उदाहरण होगा।

पियाजे के अनुसार बच्चे 'स्कीमा के संशोधित व समायोजित करने में दो प्रक्रियाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।

(1)आत्मसातीकरण- वह प्रक्रिया है जिसमें बालक नए ज्ञान को पूर्ण ज्ञान योजनाओं में शामिल कर लेता है, अर्थात बालक नए ज्ञान का आत्मसात अपने पुराने 'स्कीमा में कर लेता है।

(2)समायोजन -वह मानसिक प्रक्रिया है जिसमें बालक नर्इ सूचना के अनुसार समायोजन करता है अर्थात 'स्कीमा को वातावरण के अनुसार समायोजित कर लेता है। साथ ही जब बालक के सामने ऐसी परिसिथति या समस्या आती है, जिसका उसे कभी अनुभव नहीं हुआ, तो इससे उसमें एक तरह का संज्ञानात्मक असंतुलन उत्पन्न होता जाता है। जिसे दूर करने के लिए या उनमें संतुलन लाने के लिए बालक आत्मसातीकरण या समायोजन या दोनो प्रक्रियाएँ करना आरंभ कर देता है। इस प्रक्रिया को साम्यधरण कहते हैं। इसे पियाजे ने बच्चे द्वारा एक अवस्था से दूसरी अवस्था में पहुँचने की प्रक्रिया को समझाने हेतु प्रयुक्त किया है। पियाजे के अनुसार जब बालक विचारों में असंतुलन से संतुलन की ओर जाता है (साम्यधरण प्रक्रिया द्वारा), तो बालक में संज्ञानात्मक परिवर्तन आता है जो कि गुणात्मक होता है। उदाहरण के लिए अगर बच्चा यह मानता है कि पानी की मात्राा में परिवर्तन केवल इसलिए हो जाता हैं क्योंकि यह एक अलग रूप के बर्तन (छोटे व चौड़े बर्तन से लम्बे व अपेक्षाकृत संकरे)में डाल दिया गया है, अत: इस सिथति में वह बालक हमेशा ही इस बात को लेकर असमंजस की सिथति में होगा कि यह अतिरिक्त या ज्यादा पानी कहाँ से आया? और क्या वास्तव पानी की ज्यादा मात्राा उपलब्ध् है? बच्चे इस असमंजस को तभी सुलझा (कि पानी की मात्राा समान है,)पाते हैं जब उनके विचारों में उच्च क्षमता विकसित हो पाती है।

पियाजे का यह मानना था कि बच्चें ज्ञान के निर्माण में क्रियाशील रहते हैं इसके साथ उनका कहना था कि उनका संज्ञानात्मक विकास चार क्रमागत अवस्थाओं से होकर गुजरता है। प्रत्येक अवस्था आयु-विशेष में होती है तथा प्रत्येक में चिंतन के विशेष प्रकार पाए जाते हैं, और चिंतन का भिन्न एवं उच्च प्रकार ही एक अवस्था को दूसरी अवस्था से अलग व विभेदित करता है। पियाजे के अनुसार केवल सूचनाएँ एकत्राण से बच्चा ऊपरी अवस्था में नहीं पहुँचता अपितु उनका प्रयोग, समस्या समाधन व तर्क देने में कितने बेहतर एवं गुणात्मक रूप से कर पाता है, यह निर्धरित करता है कि वह किस अवस्था में है।

पियाजे द्वारा बालकों के संज्ञानात्मक विकास की व्याख्या हेतु बतार्इ गर्इ चार अवस्थाओं का संक्षेप में विवरण निम्न है:-

1. संवेदी-पेशीय अवस्था (सेंसरी मोटर स्टेज)

यह अवस्था बालक में जन्म से लेकर लगभग 2 वर्ष तक की अवधि में होती है। इस अवस्था में बालक अपनी इनिद्रयों के अनुभवों तथा उन पर पेशीय कार्य करके समझ विकसित करते हैं, (जैसे देखकर छूना, पैर मारना आदि)अत: इसे संवेदी-पेशीय अवस्था कहते हैं।

प्रारंभ में बालक प्रतिवर्ती क्रियाएँ करता है। (जैसे-चूसना)तथा ध्ीरे-ध्ीरे जटिल संवेदी पेशीय कार्य पैटर्न दिखाता है (जैसे चीजों को बार-बार गिराना, जिनके गिरने की आवाज उसे रोचक लगे।

इस अवस्था की सबसे बड़ी उपलबिध् बालक द्वारा वस्तु स्थायित्व (व्इरमबज च्मतउंदंदबम)का संज्ञान होना है। इसके द्वारा बालक यह जान पाता है कि घटनाएँ एवं वस्तुएँ तब भी उपसिथत रहती हैं जब वे हमारे सामने (देखी, सुनी या महसूस)नहीं होती है। साथ ही बालक स्वयं व विश्व में (कि दोनों अलग असितत्व रखते हैं)अन्तर स्पष्ट कर पाने की सिथति में आ जाता है।

2. प्राकसंक्रियात्मक अवस्था-पियाजे के अनुसार दूसरी अवस्था लगभग जो 2 से 7 वर्ष तक होती है। इस अवस्था को पुन: दो भागों में बाँटा जा सकता है। (1)प्राकसंप्रत्यात्मक (2)अन्तर्दर्शी अवधि।

(1)प्राकसंप्रत्यात्मक अवधि-यह अवधि लगभग 2 से 4 वर्ष तक की होती है। इस अवधि में बालक वस्तु सामने उपसिथत न होने पर भी उसकी मानसिक छवि बना लेता है। बालक बाá जगत की विभिन्न वस्तुओं एवं व्यकितयों की मानसिक उपसिथति हेतु। विभिन्न संकेतों का विकास कर लेते है।

भाषा का विस्तृत प्रयोग तथा आभासी क्रियाएँ बच्चों में सांकेतिक विचारों के विकास को दिखाती हैं (जैसे लकड़ी को ट्रक समझकर चलाते हुए खेलना)। बच्चों के द्वारा की गर्इ ड्राइंग में भी उनके द्वारा प्रयोग किए गए संकेतों को देखा जा सकता है।

पियाजे ने इस अवधि की दो परिसीमाएँ भी बतार्इ है आत्मकेनिद्रता और जीववाद। आत्म केनिद्रता से तात्पर्य स्वयं के दृषिटकोण व अन्य के दृषिटकोण में विभेद न कर पाने की सिथति है। उदाहरण के लिए- 4 वर्षीया अनिता जो घर पर है तथा उसकी माँ जो कार्य स्थल से पफोन कर रही हैं, के बीच बातचीत-

- पियाजे के अनुसार सभी बालक इन क्रमागत अवस्थाओं से होकर ही विकसित होते हैं,

- कोर्इ बालकबालिका किसी भी अवस्था को लांघकर आगे नहीं बढ़ सकता। यह हो सकता है कि किसी अवस्था विशेष में वह अन्य बालकों की अपेक्षा थोड़ा जल्दी पूर्ण करके अगली अवस्था में चलाचली जाए।

- पियाजे के अनुसार बालक प्राकृतिक रूप से, प्रगतिशील रूप से (च्तवहतमेेपअमसल)विकसित होता रहता है। उसमें वातावरण से प्रभावित हुए बिना आन्तरिक विकासात्मक प्रक्रिया चलती रहती है।    

माँ- अनिता, क्या घर पर है?

अनिता-(चुपचाप सिर हिलाकर हामी भरती है।)

माँ- क्या मैं भार्इ से बात कर सकती हूँ?

अनिता- (पिफर से सिर हिलाकर)हामी भरती है।

यहाँ पर अनिता सिर हिलाती है क्योंकि उसे लगता है कि माँ को वह दिखार्इ और सुनार्इ पड़ रहा है। वह यह समझ पाने की सिथति में नहीं है कि माँ को उसका सिर हिलाना दिखार्इ नहीं पड़ रहा है।

जीववाद-यह भी प्राकसंक्रियात्मक चिन्तन की एक अन्य सीमा है। इसमें बालक सभी वस्तुओं को 'सजीव समझता है तथा सोचता है कि ये सभी सजीवों की भांति 'कार्य करती हैं। जैसे कहना कि उस पेड़ ने पत्ते को तोड़ दिया और पत्ता नीचे गिर गया जीववाद का उदाहरण है। बच्चा बादल, पंखा, कार आदि को 'सजीव मानता है।

(2)अन्तर्दर्शी अवधि-यह अवधि लगभग 4 साल से 7 साल की होती है। इस अवधि में बच्चे में प्रारंभिक तर्कशकित आ जाती है तथा इससे संबंधित विभिन्न प्रश्नों को जानना चाहता है। पियाजे ने इसे अन्तर्दर्शी अवधि इसलिए कहा है क्योंकि बच्चा इस अवधि में अपने ज्ञान व समझ के बारे में पूर्णतया जानते हैं। किन्तु वो कैसे जानते हैं और क्या जानते हैं इससे कापफी हद तक अनभिज्ञ होते हैं। अर्थात वे बहुत सी बातें जानते हैं किंतु उनमें तर्कसंगत चिन्तन नहीं होता। उदाहरण के लिए वे गणितीय घटाना व गुणा, कर पाते हैं, किन्तु कहाँ प्रयोग करना है और क्यों प्रयोग करना है इसे नहीं समझ पाते हैं।

3. मूर्त संक्रियात्मक की अवस्था-पियाजे के सि(ान्त के अनुसार ज्ञानात्मक विकास की यह तीसरी अवस्था लगभग 7 साल से प्रारंभ होकर 12 साल तक चलती है। हालांकि इस अवस्था में बच्चों के विचारों में संक्रियात्मक क्षमता आ जाती है और अन्तर्दर्शी तर्कशकित की जगह तार्किकता (स्वहपबंस त्मेंवदपदह)आ जाती है। परन्तु बालक समस्या समाधन हेतु मूर्त परिसिथतियों पर ही निर्भर करता है। उदाहरण के लिए दो ठोस वस्तुओं से संबंधित समस्या हेतु बालक आसानी से मानसिक संक्रिया कर लेता है किन्तु यदि उन वस्तुओं को न देकर उनके बारे में शाबिदक कथन दिए जाएँ तो ऐसी समस्याएँ अमूर्त होने के कारण वे इसे हल नहीं कर पाएँगें।

इस अवस्था में बच्चा किसी वस्तु की विभिन्न विशेषताओं पर एक साथ विचार कर सकता है। वे मूर्त संक्रियाँ का मानसिक रूप में व्युत्क्रम कर पाते है। बच्चे यह समझने लगते हैं कि 2 × 2 ¾ 4 हुआ तो 4 ÷ 2 ¾ 2 होगा। इस अवधि के बालक के समस्या-समाधन को देखने हेतु निम्न परीक्षण किया जा सकता है। जैसे पदार्थ के संरक्षण के परीक्षण में बच्चे को मिटटी के दो समान गोले दिखाए जाते हैं। उसमें से एक गोले को लम्बा व पतला आकार का बना देते हैं तत्पश्चात बच्चे से पूछा जाता है कि अब दोनों (मिटटी का मूल गोला एंव लम्बी व पतली आकृति)में से किसमेंं ज्यादा मिटटी है? 8-9 वर्षीय बच्चे आसानी से बता पाते हैं कि मिटटी की मात्राा समान हैं, जबकि प्राकसंक्रियात्मक अवधि के बच्चे लम्बे व पतले में मिटटी की मात्राा ज्यादा बताते हैं। इस समस्या का उत्तर देने में बालक को मानसिक रूप से यह सोचना होता है कि गोले से ही लम्बी व पतली आकृति बनार्इ गर्इ जिससे यदि है, पुन: गोला बनाएंगे तो वह दूसरे गोले के समान ही होगा।

इस समस्या में प्राकसंक्रियात्मक अवस्था का बच्चा केवल एक ही विशेषता, लम्बार्इ या चौड़ार्इ पर ही èयान रखता है जबकि मूर्त संक्रियात्मक अवस्था का बच्चा दोनों विशेषताओं पर èयान रखता है।

पियाजे के अनुसार, इस अवस्था में बालक तीन महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय विकसित कर लेते हैं।

संरक्षण बालक तरल, लम्बार्इ, भार इत्यादि के संरक्षण से संबंधित समस्याओं का समाधन करते पाए जाते हैं।

संबंध् क्रमिक संबंधें संबंध्ी समस्याओं का समाधन करते पाए जाते हैं। जैसे घटते या बढ़ते क्रम में वस्तुओं को लगाने की क्षमता।

वर्गीकरण वस्तुओं के गुण के अनुसार वगो± या उपवगो± मे बाँट पाने की क्षमता का विकास भी बच्चों में आ जाता है।

4. औपचारिक संक्रिया की अवस्था-पियाजे के अनुसार यह चौथी अवस्था है जो कि लगभग 11 वर्ष से आरंभ होती है, और पयस्कावस्था तक चलती है। इस अवस्था में बालक का चिन्तन अधिक अमूर्त, अधिक क्रमब(, लचीला और तार्किक हो जाता है।

औपचारिक संक्रिया अवस्था में चिन्तन की अमूर्त गुणवत्ता, मौखिक कथनों की समस्या हल करने की क्षमता में देखी जा सकती है उदाहरण के लिए यह तार्किक उत्तर। कि अगर । त्र ठ तथा ठ त्र ब् तो । त्र ब् है, को उनके सामने कथन स्वरूप में रखा जाए तो वे आसानी से निष्कर्ष तक पहुँच जाते हैं। पियाजे के अनुसार इस अवस्था में बच्चे वैज्ञानिकों की तरह तार्किक सोच रखते हैं। वे निगमात्मक पूर्वकल्पना तर्क का प्रयोग समस्या हल में करते हैं अर्थात वे समस्या के संभावित उत्तरों का परीक्षण करके बेहतर संभावित उत्तर को निष्कर्ष के रूप में खोजते हैं।

2. लिव सिमनोविच वाइगोत्सकी:संज्ञानात्मक विकास उपागम-

लिव सिमनोविच वाइगोत्सकी (1896-1934)का सामाजिक दृषिटकोण संज्ञानात्मक विकास का एक प्रगतिशील विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वस्तुत: रूसी मनोवैज्ञानिक वाइगोत्सकी ने बालक के संज्ञानात्मक विकास में समाज एवं उसके सांस्कृतिक संबन्धें के बीच संवाद को एक महत्त्वपूर्ण आयाम घोषित किया। पियाजे की तरह के वाइगोत्सकी (1896-1934)भी यह मानते थे कि बच्चे ज्ञान का निर्माण करते हंै। किन्तु इनके अनुसार संज्ञानात्मक विकास एकाकी नहीं हो सकता, यह भाषा विकास, सामाजिक विकास, यहाँ तक कि शारीरिक विकास के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में होता है।

वाइगोत्सकी के अनुसार बच्चे के संज्ञानात्मक विकास को समझने के लिए एक विकासात्मक उपागम की आवश्यकता है जो कि इसका शुरू से परीक्षण करे तथा विभिन्न रूपों हुए परिवर्तन को ठीक से पहचान पाएं। इस प्रकार एक विशिष्ट मानसिक कार्य जैसे- आत्म-भाषा को विकासात्मक प्रक्रियाओं के रूप में मूल्यांकित किया जाए न कि एकाकी रूप से।

वाइगोत्सकी के अनुसार यह आवश्यक है कि संज्ञानात्मक विकास को समझने के लिए उन औजारों का परीक्षण (जो कि संज्ञानात्मक विकास में मèयस्थता करते हैं तथा उसे रूप प्रदान करते हैं)अति आवश्यक है। इसी के आधर वह यह भी मानते हैं कि भाषा संज्ञानात्मक विकास का महत्त्वपूर्ण औजार है। इनके अनुसार आरमिभक बाल्यकाल में ही बच्चा अपने कायो± के नियोजन एवं समस्या समाèाान में भाषा का औजार की तरह उपयोग करने लग जाता है।

इसके अतिरिक्त वाइगोत्सकी का यह भी मानना है कि संज्ञानात्मक कौशल आवश्यक रूप से सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंधें में बुने होते हैं।

वाइगोत्सकी के अनुसार जैविक कारक मानव विकास में बहुत ही कम किंतु आधरभूत भूमिका निभाते हैं, जबकि सामाजिक कारक उच्चतर संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं (जैसे- भाषा, स्मृति व अमूर्त चिंतन)में लगभग सम्पूर्ण व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पियाजे के सि(ान्त (जिसमें जैविकता तथा विकास, अधिगम में अग्रणी भूमिका निभाते हैं)के विपरीत वाइगोत्सकी के सि(ान्तानुसार अधिगम व विकास सांस्कृतिक व सामाजिक वातावरण की मèयस्थता के साथ चलते हैं। संभावित विकास का क्षेत्रा र्(च्क्ए जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे)इस प्रक्रिया को और स्पष्ट करता है। उनका कहना है कि बालक के विकास को सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से अलग नहीं किया जा सकता, वह इन गतिविधि यों में अन्तर्निहित होता है।

वाइगोत्सकी के अनुसार अधिगम पहले बच्चे तथा वयस्क (या कोर्इ भी अधिक ज्ञानवान व्यकित)के बीच होता है तथा बाद में इनके अनुसार स्मृति èयान, तर्कशकित के विकास में, समाज की खोजों को सीखना (जैसे-भाषा, गणितीय प्रविधियाँ तथा स्मृति रणनीतियाँ इत्यादि)शामिल होता है मसलन किसी एक संस्कृति में कम्प्यूटर द्वारा गिनना अथवा किसी अन्य में अंगुलियों या मोतियों द्वारा गिनना। अत: इन तरीकों को ही बच्चा सीखता है।

वाइगोत्सकी के सि(ान्त के अनुसार ज्ञान बाहय वातावरण में सिथत तथा सहयोगी होता है, अर्थात ज्ञान विभिन्न व्यकितयों एवं वातावरण (जैसे- वस्तुओं, औजार, किताबें, मानवीय निर्मित्तियों इत्यादि)तथा समुदायों (जिनमें व्यकित रहता है)में वितरित होता है। यह सि(ान्त सुझाता है कि दूसरों के साथ अन्तक्र्रिया तथा सहयोगात्मक क्रियाओं द्वारा जानने की प्रक्रिया गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ होती है।

इन दावों के आधर पर वाइगोत्सकी अधिगम तथा विकास के बारे में विशिष्ट तथा प्रभावी विचार प्रकट करते हैं। अत: वे इस बात पर जोर देते हैं कि संज्ञानात्मक विकास की प्रकृति वस्तुत: सामाजिक है न कि संज्ञानात्मक, जैसा कि पियाजे का मानना है। इस प्रकार पियाजे का सि(ान्त निर्मितिवाद है जबकि वाइगोत्सकी का सि(ान्त सामाजिक निर्मितिवाद है। वाइगोत्सकी के इन शब्दों से यह और भी अधिक स्पष्ट होता है। ''हमारे स्वयं का विकास दूसरों के द्वारा होता है।

अत: वाइगोत्स्की के अनुसार सभी मानसिक या बौ(िक क्रियाएँ पहले बाहरी समाज की दुनिया में घटित होती हैं तथा अन्त: क्रियाओं द्वारा बच्चे अपने समुदाय की संस्कृति (सोचने और व्यवहार करने क तरीके)को सीखते हैं और इसी के चलते वाइगोत्सकी ने सामाजिक वातावरण के विभिन्न पक्षों, जैसे- परिवार, समुदाय, मित्रा तथा विधालय की बच्चों के विकास में भूमिका पर बल दिया।

संभावित विकास का क्षेत्रा —

वाइगोत्सकी द्वारा प्रयुक्त यह संप्रत्यय उस अन्तर को परिभाषित करता है जो कि बच्चे के द्वारा बिना किसी सहायता के किए गए निष्पादन तथा किसी वयस्क या अधिक कुशल साथी की मदद से किए गए निष्पादन में होता है। दूसरे शब्दों में बच्चा जो कर रहा है तथा जो करने की क्षमता रखता है के बीच के क्षेत्रा कोर् च्क् कहा जाता है। वाइगोत्सकी ने सामाजिक प्रभाव, मुख्यत: निर्देशन (बच्चे के संज्ञानात्मक विकास में योगदान)को दर्शाने हेतुर् च्क् के संप्रत्यय प्रयोग किया।

बच्चे कार् च्क् आँकने हेतु (उदाहरण के लिए)बु(ि परीक्षण में 2 बच्चों की मानसिक आयु 8 वर्ष आँकी गर्इ। इसके पश्चात यह देखने का प्रयास किया गया। कि बच्चे किस स्तर तक अपने से उम्र में बड़े बच्चों के लिए तैयार की गर्इ समस्याओं पर कार्य कर सकते हैं। इसके लिए बच्चों की करके दिखाना विधि, समस्या-समाधन विधि, प्रश्न विधि तथा समधन के शुरुआती चरण का प्रारम्भ करना आदि के साथ मदद की गर्इ। इस प्रयोग में देखा गया कि वयस्क की मदद एवं साथ से एक बच्चा 12 वर्षीय बच्चे के लिए बनार्इ गर्इ समस्या भी हल कर पाया तथा दूसरा बच्चा 9 वर्षीय बच्चे के लिए बनार्इ गर्इ समस्या को हल कर पाने में सपफल रहा।

ढाँचा निर्माण — ढाँचा निर्माण, विकास के संभावित क्षेत्रा से संबंधित संप्रत्यय है। ढाँचा निर्माण एक तकनीक है जो सहायता के स्तर में परिवर्तन करती है। शिक्षण करते समय या सहयोगी अधिगम में शिक्षक या अधिक कौशल वाले सहयोगी को अधिगमकत्र्ता के समसामयिक निष्पादन के अनुसार अपने परामर्श को समायोजित करना पड़ता है। जैसे कि यदि कोर्इ नयी तरह की समस्या है तो अधिक निर्देशन देने पड़ते है, परन्तु जैसे-जैसे छात्रा की क्षमता व कार्य अभ्यास बढ़ता जाता है निर्देशनों की संख्या कम हो जाती है।

वाइगोत्सकी के अनुसार संवाद (क्पंसवहनम)ए ढाँचा निर्माण (ैबंविसकपदह)का महत्त्वपूर्ण औजार है। बच्चों के पास अव्यवसिथत तथा असंगठित संप्रत्यय होते हैं जबकि कुशल सहायक के पास क्रमब( तार्किक एवं बु(ि संगत विचार होते हैं। बच्चे तथा कुशल सहायक के बीच संवाद के परिणाम स्वरूप बच्चे के विचार ज्यादा क्रमब( संगठित , तर्कसंगत एवं औचित्यपूर्ण हो जाते हैं।

भाषा और विचार-वाइगोत्सकी के अनुसार बच्चे भाषा का प्रयोग न केवल सामाजिक संप्रेषण अपितु स्व-निर्देशित तरीके से कार्य करने के लिए, अपने व्यवहार हेतु योजना बनाने, निर्देश देने व मूल्यांकित करने में भी करते हैं। स्व-निर्देशन में भाषा के प्रयोग को आन्तरिक स्व-भाषा या निजी भाषा कहा जाता है। पियाजे ने निजी भाषा को आत्म केनिद्रत तथा अपरिपक्व माना है, परन्तु वाइगोत्सकी के अनुसार आरंभिक बाल्यावस्था में यह बालक के विचारों का एक महत्त्वपूर्ण साध्न है।

जीन पियाजे एवं वाइगोत्सकी के संज्ञानात्मक विकास दृषिटकोण में कुछ आधरभूत विभेद है। जिनको संक्षिप्त रूप में निम्न तालिका में स्पष्ट गया है।     

पियाजे व वाइगोत्सकी के सि(ान्तों की तुलना:

विषय जीन पियाजे वाइगोत्सकी

1. सामाजिक इन्होंने बालक के विकास में इन्होंने बालक के विकास में सामाजिक सांस्कृतिक सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भ सांस्कृतिक संदर्भ का योगदान महत्त्वपूर्ण संदर्भ का बहुत कम योगदान माना है। माना है।

2. निर्मितवाद ज्ञानात्मक निर्मितिवाद सामाजिक निर्मितिवाद

3. अवस्थाएँ संज्ञानात्मक विकास की चार सज्ञानात्मक विकास के लिए कोर्इ अवस्थाएं निर्धरित की सामान्य अवस्थाएँ नहीं

4. मुख्य प्रक्रियाएँ स्कीमा, अनुकूलन आत्मसातीकरण,र् च्क्ए ैबंविसकपदह साम्यधरण समायोजन, संक्रिया भाषा, सांस्कृतिक औजार, संवाद

5. भाषा की अल्प भूमिका, संज्ञानात्मक भाषा की महत्पूर्ण भूमिका होती है भूमिका विकास भाषा को तथा वह विचारों को आकार प्रदान निर्देशित करता है करती है।

6. शिक्षा की शिक्षा बालक के संज्ञानात्मक शिक्षा की प्रक्रिया संज्ञानात्मक विकास में भूमिका कौशलों (जो उसमें पहले विकसित महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है यह बच्चे हो चुके हैं)को बेहतर बनाने का को सांस्कृतिक औजार प्रदान करती है। काम करती है।

7. शिक्षा हेतु शिक्षक को सुविध प्रदायक तथा ये भी शिक्षक को सुविध प्रदायक तथा निहितार्थ मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। साथ ही

न कि निर्देशक के रूप में। शिक्षक बच्चों को वह अवसर प्रदान जो कि बच्चों को विश्व के करता है जिसमें बच्चा अपने से अधिक बारे में जानने व खोजने में कुशल साथी, वयस्क अथवा शिक्षक सहायता करता है। के साथ सीखता है।