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9 उपन्यास गबन (प्रेमचन्द)

उपन्यास

गबन (प्रेमचन्द)

- डा. प्रेमलता भसीन

प्रेमचन्द : साहितियक परिचय

प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के उन प्रगतिशील लेखकों में से हंै, जिन्होंने भारत के जन-जीवन को निकट से देखा और उनकी समस्याओं में पैठकर उन्हें पूरी गंभीरता और र्इमानदारी से अपने साहित्य में उतारा। उनकी दृषिट मुख्यत: भारत के निधर््न ग्रामीण वर्ग पर रही और उसी के संघर्षपूर्ण जीवन का यथातथ्य अंकन उन्होंने किया। प्रेमचंद का जन्म सन 1880 में बनारस के समीप लमही नामक ग्राम में हुआ। इनके पिता अजायबराय निम्न मèयवर्गीय व्यकित थे, जो डाकखाने की क्लर्की में 20 रुपया महीना वेतन पाते थे। इसलिए प्रेमचंद (पिता का दिया नाम ध्नपतराय) का बचपन गहरी आर्थिक तंगी में बीता। आठ वर्ष की आयु में माँ का देहान्त होने पर सौतेली माँ के कठोर व्यवहार ने उन्हें मातृ-स्नेह से भी वंचित कर दिया। जीवन की इन विपरीत परिसिथतियों में उनका झुकाव पढ़ने-लिखने की ओर हुआ। उस समय पाठशालाओं में हिन्दी नहीं पढ़ार्इ जाती थी इसलिए उस समय के प्रसि( उदर्ू उपन्यासकारों और अंग्रेज़ी उपन्यासों के उदर्ू अनुवादों को उन्होंने खूब पढ़ा। स्वयं प्रेमचंद ने कहा है-''दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे-वहीं मुझे लिखने का भी शौक हुआ। मैं लिखता और पफाड़ता। 13 वर्ष की उम्र से शुरू हुआ लिखने का यह क्रम और हार्इ स्कूल की पढ़ार्इ साथ-साथ चलते रहे। 15 वर्ष की उम्र में हुए विवाह और पिता की मृत्यु ने आर्थिक दबाव को और कस दिया। आर्थिक तंगी और पारिवारिक दायित्वों के बीच झूलते प्रेमचंद ने मैटि्रक पास की और सन 1899 में सहायक अèयापक की नौकरी मिली। सन 1908 में इनकी पदोन्नति हुर्इ और वे मदरसों के सब डिप्टी इंस्पेक्टर हो गये। इस बीच सन 1905 में इन्होंने पहली पत्नी को छोड़कर शिवरानी देवी नामक विध्वा से विवाह किया, जो सामाजिक रूढि़यों और परंपराओं के प्रति उनके विद्रोह का प्रथम संकेत है।

प्रेमचंद का आरंभिक लेखन उदर्ू में था। वे उदर्ू में नवाबराय के नाम से लिखते थे और उनका पहला कहानी-संग्रह 'सोज़े वतन उदर्ू में ही छपा। पाँच कहानियों के इस संग्रह में लेखक का विषय स्वदेश-प्रेम था, जिसे बि्रटिश सरकार ने आपत्तिजनक मानकर जब्त कर लिया। साथ ही यह हुक्म भी हुआ कि वे सरकार की अनुमति के बिना कुछ न लिखें। पर प्रेमचंद के भीतर का लेखक चुप कब बैठ सकता था? उन्होंने अब प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया और उनकी पहली कहानी 'ममता थी जो सन 1909-10 में 'ज़माना पत्रिका में छपी। इसके बाद प्रेमचंद का लेखन अबाध् गति से चलता रहा।

साहित्य-क्षेत्रा में प्रेमचंद का आगमन इस दृषिट से और भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य को तिलिस्मी और ऐयारी रचनाओं से मुकित दिलाकर समाज-हित का व्यापक आधर प्रदान किया। मात्रा मनोरंजन की दृषिट से लिखे जा रहे सस्ते साहित्य की अपेक्षा ग्रामीण जीवन के अधिक निकट होने के कारण प्रेमचंद ने उनकी समस्याओं को ही मुख्य रूप से उभारा। कुछ समय तक बम्बर्इ में रहने के कारण वे महानगर की विषमताओं और जटिलताओं को भी पहचान गये थे। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि औधोगिक सभ्यता और पूँजीवाद के विकास के परिणामस्वरूप नगरों का प्रसार होगा और गाँव लुप्त होते जायेंगे। इस सिथति से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का चित्राण उनके उपन्यासों में हुआ है। ग्रामीण जीवन के विभिन्न पहलुओं का अंकन उनकी कहानियों में विशेष रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने लगभग 300 कहानियाँ लिखीं जो सप्त सरोज, नवनिधि, प्रेम पचीसी, प्रेम-द्वादशी, कपफन, 'मानसरोवर (आठ भाग) में संकलित हैं। प्रेमचंद ने कर्बला, प्रेम की वेदी नामक नाटक लिखे तथा कर्इ अनुवाद भी किये पर उपन्यास के तो वे सम्राट कहे जाते हैं।

'सेवासदन उपन्यास में उपन्यासकार ने समाज की उन समस्याओं को उठाया है जिसे अभी तक कोर्इ लेखक छूने का साहस नहीं कर पाया था। इसमें उन्होंने विवाह-समस्या की ओर समाज का èयान आकर्षित किया है।

जहाँ दहेज के नाम पर होने वाला लेन-देन र्इमानदार मनुष्य को बेर्इमानी और रिश्वतखोरी के लिए मजबूर करता है। इसके अतिरिक्त इसमें ध्र्म, जमींदारी-प्रथा, वेश्या-समस्या आदि ऐसे पहलुओं को उठाया गया है, जो अभी तक हिन्दी साहित्य के लिए अनछुए थे। प्रेमचंद ने इन महत्त्वपूर्ण और गंभीर समस्याओं को केवल उठाया ही नहीं, उन्हें उनके आदर्शपूर्ण अंत की ओर भी पहुँचाया।

'प्रेमाश्रम प्रेमचंद का वह उपन्यास है, जिसमें उन्होंने गाँव के जमींदार के शोषण के विरु( किसानों की जागृत चेतना को स्वर दिया है। सामंतवाद, पूँजीवाद और समाजवाद का विशिष्ट विवेचन 'प्रेमाश्रम में किया गया है। जमींदारी राज्य में किसानों की दुरवस्था और पिफर शोषकों के विरु( उनका आंदोलन प्रेमचंद का नये समाज का स्वप्न है, जो आने वाले समय के लिए नींव के पत्थर के समान सि( हुआ।

'निर्मला उपन्यास में प्रेमचंद ने विवाह-समस्या के उस महत्त्वपूर्ण पहलू को उठाया है, जहाँ परिसिथतिवश एक कन्या का विवाह उससे उम्र में तिगुने विध्ुर से कर दिया जाता है। ऐसे बेमेल विवाह से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं के विविध् रूपों को प्रेमचंद ने बड़े प्रभावात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार उनके वरदान, प्रतिज्ञा, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि और गोदान उपन्यासों में उनकी क्रमश: परिपक्व होती चिंताधरा को देखा जा सकता है। उनके उपन्यासों में शोषित किसान, मज़दूर, नारियाँ जागृति की नर्इ करवट लेते दिखार्इ देते हैं। 'मंगलसूत्रा उनका अध्ूरा और अंतिम उपन्यास है।

'जो जन-साधरण का है, वह जन-साधरण की भाषा में लिखता है-साहित्य की भाषा के संबंध् में व्यक्त किये गये प्रेमचंद के ये विचार उनके संपूर्ण साहित्य में स्पष्ट हैं। उनकी आरंभिक Ñतियों में यधपि किलष्ट उदर्ू भाषा का प्रयोग हुआ है, पर ध्ीरे-ध्ीरे उनकी भाषा आम आदमी की भाषा के बिल्कुल निकट आ गयी है। प्रेमचंद इस तथ्य से परिचित थे कि अपने साहित्य में उन्होंने जिन सामाजिक समस्याओं को उठाया है, उन्हें जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिए उसी की भाषा का प्रयोग करना नितांत आवश्यक है। आम आदमी की भाषा को लोकोकितयों और मुहावरे सप्राण बनाते हैं। प्रेमचंद के साहित्य में लोकोकितयों और मुहावरों का विशाल भण्डार देखा जा सकता है।

वास्तव में हिन्दी कथा-साहित्य को कथ्य और शिल्प दोनों दृषिटयों से नया आयाम प्रदान करने वाले प्रेमचंद ही हैं। अपने जीवन की कठिन परिसिथतियों से जूझते हुए उन्होंने बहुत कुछ सीखा और बहुत पढ़ने की लालसा ने उन्हें व्यापक अनुभव दिये। उन्होंने जो लिखा, अपने अनुभवों से लिखा। इस बात को उनके ये शब्द स्पष्ट करते हैं-''लेखक जो कुछ लिखता है, अपनी कुरेदन से लिखता है... मेरे अंदर जितनी कुरेदन, तड़पन होगी, उतना ही अच्छा है। प्रेमचंद की दृषिट में साहित्य का उíेश्य केवल मनोरंजन नहीं अपितु 'वह जीवन की समस्याओं पर भी विचार करता है और उन्हें हल करता है। और समस्याओं को हल करने की प्रेमचंद की दृषिट यथार्थवादी न होकर आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी रही है। उन्हें जीवन के सत्पक्ष पर विश्वास था और इसी कारण उन्होंने नग्न यथार्थवाद की अपेक्षा आदर्श-प्रेरित यथार्थवाद पर बल दिया। साहित्य-संबंध्ी उनकी यह दृषिट उनके इन शब्दों में स्पष्ट है-''मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि मैं और चीज़ों की तरह कला को भी उपयोगिता की तुला पर तौलता हूँ। यह प्रेमचंद की इसी साहित्य-संबंध्ी दृषिट का परिणाम है कि उनकी रचनाएँ सत्य, शिव और सुंदर-तीनों कसौटियों पर खरी उतरती हैं।

ग़बन : कथानक और समीक्षा

प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों के लिए जो कथानक चुने हैं, उनका आधर भारतीय नागरिक और ग्रामीण समाज के विविध् वर्ग हैं। 'गबन में उन्होंने नगरीय मèयवर्ग के जीवन की समस्याओं को आधर बनाया है। इस उपन्यास के प्रारंभ में प्रमुख नारी पात्रा जालपा के बचपन की एक घटना का रोचक वर्णन है, जिसमें वह, उसकी सखियाँ तथा उनकी माताएँ एक बंजारे पफेरी वाले से अपनी-अपनी पसन्द की वस्तुएँ खरीदती हैं। जालपा को एक चंद्रहार पसन्द आता है पर उसकी माँ मानकी बिसाती से चंद्रहार की चमक ज्यादा दिन न रहने की शंका प्रकट करती है तो पफेरी वाला-''चार दिन में तो बिटिया को असली चंद्रहार मिल जाएगा-कह कर उसके मन में चंद्रहार के प्रति तीव्र लालसा को और तीव्र करता है।

शीघ्र ही वह दिन आता है जिसकी जालपा को बहुत प्रतीक्षा थी। उसके पिता दीनानाथ प्रयाग के एक प्रतिषिठत सज्जन दयानाथ के पुत्रा रमानाथ से उसका विवाह तय करते है। बारात आती है पर चढ़ावे के आभूषणों में चंद्रहार नहीं होता। इससे जालपा बहुत निराश होती है, पर सखियों के समझाने पर निश्चय करती है कि वह पति और ससुर से आग्रहपूर्वक यह हार लेकर रहेगी। ससुराल में जाते ही वह घोषणा करती है कि जब तक हार नहीं मिलता, तब तक वह किसी भी आभूषण को नहीं पहनेगी।

दयानाथ कचहरी में पचास रुपये मासिक पर काम करता है। वह रिश्वतखोरी को समाज के लिए अभिशाप समझता है इसलिए उसे र्इमानदारी का संतोष तो है पर आर्थिक दृषिट से वह बहुत खोखला जीवन व्यतीत कर रहा है। अपने पुत्रा रमानाथ के विवाह में उसने न चाहते हुए भी, सीमा से अधिक व्यय कर दिया था। इतना ही नहीं, आभूषण भी उधर लेकर बनवाए गए थे और जालपा के मायके से मिला नकद रुपया भी रमानाथ की इच्छानुसार व्यर्थ की ध्ूमधम में खर्च हो गया था। इध्र महाजन पैसों के लिए बार-बार तंग कर रहा था, उध्र रमानाथ के लिए यह भी संकट था कि वह जालपा से अपने घर की झूठी अमीरी की चर्चा कर चुका था। ऐसे में जालपा से गहने लौटाने की बात कहना तो बहुत कठिन था। अंतत: उसने एक उपाय सोचा। रात को चुपके से जालपा की अलमारी से गहनों की संदूकची निकालकर पिता को दे दी। यहीं से उस पर संकट की घड़ी शुरू हो गर्इ। जालपा इस चोरी से बहुत दुखी हुर्इ। रमानाथ भी यह कहकर कि उसके पिता पैसा निकालना ही नहीं चाहते, अपने को बचाने के प्रयास में लगा रहा। एक दिन जब जालपा ने अपने घर जाने की जिद पकड़ ली तो रमानाथ ने उसे यह कहकर रोका कि वह जल्दी ही कोर्इ नौकरी करेगा। अंतत: उसे अपने एक मित्रा रमेश की सहायता से म्यूनिसिपैलिटी में चुँगी क्लर्क की नौकरी मिल गर्इ जहाँ ऊपरी आमदनी की भी अधिक सुविध थी। अब रमानाथ को विश्वास हो गया कि वह जल्दी ही जालपा के लिए गहने जुटा सकेगा। इस बीच उसने जालपा के एक पत्रा के द्वारा, जो उसे डाक में डालने के लिए दिया गया था, उसे खोलकर पढ़ने से उसे पता चला कि जालपा कितनी वेदना सह रही है। तब उसने निश्चय किया कि वह जल्दी ही जालपा को गहनों से लाद देगा। गंगू नामक एक सर्रापफ ने उसे एक जड़ाऊ चन्द्रहार और शीशपफूल उधर दे दिया। एक बार उधर की चीज़ लाकर रमानाथ की तो आदत ही बदल गर्इ। गहने, साड़ी, घड़ी-जो उसे ठीक लगता, उधर खाते से ले लेना उसे बुरा नहीं लगता था।

ध्ीरे-ध्ीरे इन दोनों के संपर्क क्षेत्रा में भी वृ(ि होती गर्इ। एक पार्टी में मिले इन्द्रभूषण नामक अध्ेड़ वकील और उनकी युवा पत्नी रतन से उनकी मित्राता क्रमश: गहरी होती गर्इ। एक दिन रतन ने जालपा के जड़ाऊ कंगन पर रीझकर वैसे ही कंंगन बनवाने का निश्चय किया। उसके लिए दिए गए छ: सौ रुपये लेकर रमानाथ जब गंगू सर्रापफ के पास पहुँचा तो उसने रुपये रमानाथ के पिछले हिसाब में जमा कर दिए और कंगन के झूठे वायदे करके उसे बार-बार टालने लगा। रमानाथ अब विकट समस्या में पफँस गया था। एक दिन रतन ने आग्रहपूर्वक रमानाथ से पैसे वापिस लौटा देने की बात की। या पिफर वह स्वयं उस सर्रापफ के पास जाना चाहती थी। ऐसे में रमानाथ ने उस दिन की चुंगी की आमदनी आठ सौ रुपये खजाने में जमा न करके, रतन को दिखा कर विश्वास दिलाना चाहा कि उसके पैसे सुरक्षित हैंऋ पर रतन ने अपने पैसे वापिस ले लिये। जैसे-तैसे करके उसने पाँच सौ रुपये तो जमा कर लिए। तीन सौ के लिए वह अपने मित्राों के पास इध्र-उध्र भटकता पिफरा, लेकिन सभी प्रयत्न व्यर्थ हो गए। जालपा को पत्रा लिखकर सारी परिसिथति समझानी चाहीऋ पर उसे पत्रा मिलता, इससे पहले ही शर्मिन्दगी को न छुपा पाने के कारण, उसने घर से भागना ही उचित समझा। बिना सोचे समझे रेल में बैठ गया। वहीं देवीदीन खटीक नामक एक विनोदी और समझदार वयोवृ( से उसकी मुलाकात हुर्इ जो रमानाथ को अपने साथ कलकत्ते ले गया। देवीदीन और उसकी पत्नी जग्गो ने उसे वापिस लौटने के लिए बहुत समझाया, पर पुलिस के डर से उसने न जाने का ही निश्चय किया क्योंकि वह अपने को गबन का अपराध्ी समझता था।    

 इस बीच एक समाचार पत्रा में छपे शतरंज-पहेली को हल करने से उसे पचास रुपये की प्रापित भी हुर्इ। उन रुपयों से उसने जग्गो के साथ ही चाय की दुकान खोल ली, पर एक दिन अपनी ही नासमझी से वह पुलिस के हाथ पड़ गया। रमानाथ की मजबूरी से लाभ उठाकर उसे सरकारी गवाह बनने के लिए भी विवश किया गया। वह नहीं जानता था कि इस बीच उसकी पत्नी ने अपने गहने बेचकर उसके द्वारा गबन की गर्इ समूची रकम चुका दी है। स्वयं पुलिस ने इलाहाबाद में हुर्इ इस घटना की जाँच करवायी तो उसे भी इस बात का पता चल गया, पर उन्होंने रमानाथ को अंध्ेरे में ही रखा।

रमेश बाबू को जब रमानाथ के कलकत्ते में होने का समाचार मिला तो उसने रमानाथ के घर यह सूचना भिजवा दी और उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जालपा यह सब कुछ जानती है क्योंकि जिस पहेली को रमानाथ ने हल किया था, वह जालपा के द्वारा ही भेजी गर्इ थी। बाद में जालपा रतन और देवर गोपी के साथ कलकत्ता पहुँची। रात्रि के समय देवीदीन के साथ उस बंगले में गर्इ जहाँ रमानाथ को पुलिस ने ठहराया हुआ था। सख्त पहरे के होते हुए भी उसने पत्थर में पत्रा लपेटकर रमानाथ को वास्तविक सिथति से अवगत कराया। निशिचंत होकर रमानाथ ने इंस्पैक्टर से कह दिया कि वह झूठी गवाही नहीं देगा। पर एक बार छोटी अदालत में निर्दोष व्यकितयों के विरु( वह गवाही दे चुका था, अत: उन्होंने जालपा को भी तंग करने की ध्मकी दी तो उसे झुकना पड़ा उसकी गवाही से निर्दोष लोगों को कठिन करावास तो मिला ही, दिनेश नामक युवक को पफाँसी की सजा हो गर्इ। प्रायशिचत करने के उíेश्य से जालपा उस युवक के घर रहकर उसका सारा काम करने लगी। जोहरा से सभी कुछ जानकर रमानाथ ने जज के घर जाकर सारी असलियत स्पष्ट कर दी। पिफर से मुकदमा चलने पर सभी निर्दोष लोगों के साथ-साथ रमानाथ भी छूट गया।

अब रमानाथ पूरी तरह से बदल चुका था। उसने खेती करना ही जीवन का èयेय बना लिया। जालपा के साथ ही जोहरा, दयानाथ, गोपी और रतन भी उसके पास आकर रहने लगे। दयानाथ, जोहरा और रतन, जो अलग-अलग कष्टमय जीवन जी रहे थे, अब साथ रहकर जीवन के सुखद अनुभवों से गुजरने लगे पर एक दिन बाढ़ की सिथति में जोहरा एक बच्चे को बचाने के लिए नदी में कूद पड़ी और गहरी लहरों में सदा के लिए समा गर्इ।

कथानक : समीक्षा

'गबन उपन्यास की मूल कथा रमानाथ और जालपा, या यूँ कहें रमानाथ से संबंधित है, जो प्रयाग में जालपा और दयानाथ आदि तथा कलकत्ते में देवीदीन, जग्गो, जोहरा आदि के संसर्ग से विकसित होती है। कुछ समीक्षकों ने प्रयाग और कलकत्ते की कथाओं को दो स्वतंत्रा कहानी माना है और कहा है कि इन दो स्थानों की घटनाओं पर दो स्वतंत्रा उपन्यासों का निर्माण हो सकता था। (नंददुलारे वाजपेयी, 'प्रेमचंद-साहितियक विवेचन) पर वास्तव में ऐसा नहीं है। जीवनक्रम के अनुसार पात्रा अनेक परिसिथतियों और संदर्भों से गुजरता है, इसी प्रकार रमानाथ भी ऐसी ही भिन्न घटनाओं और सिथतियों से गुजरता है। ये परिवर्तन आरोपित न होकर, पूर्वापर-क्रम से जुड़े हुए हैं। विस्तार और प्रतिपाध से प्रमुख रूप से जुड़े हुए होने के कारण रमानाथ की कथा 'आधिकारिक कथा है। वह ऐसा नवयुवक है जो पिता के खर्च न देने पर कालिज छोड़ देता है और कालिज के अन्य युवकों की भाँति पफैशनपरस्त, पिफजूलखर्च, प्रदर्शनप्रिय और मूलत: दुर्बल प्रÑति का है। अपने पफैशन के शौक को वह दोस्तों की सहायता से ही पूरा करता है। उसके अपने ही शब्दों में-''मैं जरा सापफ सुथरे कपड़े पहनता हूँ, जरा नर्इ प्रथा के अनुसार चलता हूँ, इसके सिवा आपने मुझमें कौन सी बुरार्इ देखी है? लेकिन दयानाथ उसकी अंग्रेजियत से परेशान है। वह उस वर्ग का प्रतिनिधि है जिसे देवीदीन 'भद्र समाज समझते हैं। सपफार्इ वकील के शब्दों में 'ग़बन उपन्यास की कथा 'विलासप्रिय पदलोलुप युवक के 'ध्र्मनिष्ठ और कत्र्तव्यशील युवक बनने की कथा है। प्रयाग में उसकी चारित्रिक दुर्बलता उसे 'ग़बन की सीढ़ी तक पहुँचाती है, उसी प्रकार परिसिथति के दबाव में आकर वह कलकत्ते में सरकारी गवाह बनने के लिए विवश है। इस प्रकार परवर्ती घटनाएँ रमानाथ के पूर्ववर्ती इतिहास से ही जुड़ी हुर्इ है।            

रमानाथ के साथ-साथ जालपा की कथा भी महत्त्वपूर्ण है। यह कथा रमानाथ की कथा के विस्तार तथा प्रतिपाध से प्रमुख रूप से जुड़ी हुर्इ है। जालपा मूलत: एक आभूषण-प्रेमी, प्रदर्शनप्रिय तथा (प्रारम्भ में) आत्मकेनिद्रत स्त्राी की कहानी है जो बाद में कर्तव्यपरायण तथा सेवानिष्ठ नारी बनती है। रमानाथ के घर से भागने से पूर्व की जालपा एक अत्यन्त साधरण और सामान्य गुणावगुणों से युक्त नारी है जो रमानाथ के घर से भाग जाने के बाद एक भिन्न रूप में दिखार्इ देती है। चंद्रहार बेचकर रमानाथ के आपिफस के रुपये चुकाना, सर्रापफ को रुपये देने के लिए रतन को कंगन बेचना आदि के साथ-साथ शतरंज की पहेली प्रकाशित करवाना, पति को कलकत्ते पहुँचकर सिथतियों का निर्भय होकर सामना करना तथा रमानाथ की गवाही के कारण पफाँसी की सजा पाने वाले दिनेश के परिवार की सेवा आदि घटनाएँ जालपा के चारित्रिक वैशिष्टय का ही संकेत हैं। यधपि रमानाथ के द्वारा 'गबन की घटना जालपा की आभूषणप्रियता तथा रतन से घनिष्ठ सम्पर्क बनने का ही परिणाम है, तथापि यह भी स्पष्ट है कि रमानाथ के अंतर-परिमार्जन के लिए जालपा का परिवर्तित व्यवहार एक प्रेरणा बनकर उसके सम्मुख आता है।

इनके अतिरिक्त देवीदीन के आगमन से कथा एक नया मोड़ लेती है। उसकी नकली हस्ताक्षर करके मनीआर्डर को हड़प लेने की घटना रमानाथ की कथा से बहुत साम्य रखती है। लेकिन उसका 'स्वदेशी के लिए पुत्राों का बलिदान, उसके देशभकितपूर्ण उदगार रमानाथ के मन में राष्ट्रीय भावना उद्वेलित करने का आधर बने हैं। रतन और जोहरा की कथाएँ प्रधन कथा में सहायक कथाएँ हैं। रतन के पैसे वापिस करने के लिए ही रमानाथ आपिफस की रकम घर लेकर आता है। रमानाथ के घर से जाने के बाद जालपा का शतरंज की पहेली प्रकाशित करवाना और कलकत्ते जाना रतन की ही सहायता से संभव हो सका। इतना अवश्य है कि उसकी मृत्यु का प्रसंग दुखद और प्रतिपाध से सर्वथा असंब( है। जोहरा का समावेश रमानाथ और जालपा से संपर्क सूत्रा बनाने के लिए हुआ है। ये सभी गौण कथाएँ मूल अथवा आधिकारिक कथा के विकास में समुचित योगदान करती हैं।

समीक्षा की दृषिट से मूल कथानक के पाँच सोपान होते हैं-प्रारम्भ, विकास, संघर्ष, चरमबिन्दु और उपसंहार। आरम्भ जिज्ञासावधर््क तथा कौतूहल बढ़ाने वाला हो तो पाठक की रोचकता उपन्यास में निरन्तर बनी रहती है। 'ग़बन उपन्यास का आरम्भ बहुत प्रभावशाली ढंग से हुआ है। 'बरसात के दिन है, सावन का महीना। ...सबके दिल उमंगों से भरे हुए हैं। धनी साडि़यों ने प्रÑति की हरियाली से नाता जोड़ा है। इसी समय ...। पढ़कर पाठक आने वाली सिथतियों से अनायास ही जुड़ जाता है। झूला झूलती जालपा का बिसाती के पास जाकर चंद्रहार लेना उसकी रुचियों से परिचय कराता है। 'चार दिन में तो बिटिया को असली चंद्रहार मिलि ही जायेगा- बिसाती का यह कथन जालपा के मन में दबे-ढके चंद्रहार के प्रति आकर्षण भाव को और बढ़ावा देता है। इस छोटी सी घटना का प्रभाव आगे आने वाली परिसिथतियों पर बहुत गहरा पड़ता है।

विवाहोपरान्त चंद्रहार न मिलने की सिथति से कथानक का विकास होता है। जालपा का चंद्रहार के लिए हठ करना, रमानाथ का आश्वासन देना और आभूषण-चोरी इत्यादि कथानक के विकास की सिथतियाँ हैं। रतन को केवल रुपये दिखाने की भावना से म्यूनिसिपैलिटी का ध्न घर लाना और रतन के पैसे वापिस ले लेने की सिथति में खजाने में वापिस न जमा कराने के कारण रमानाथ का घर से भागना संघर्ष का सूत्रापात है। पुलिस के पंजे में पफँसकर रमानाथ बाहरी और भीतरी संघर्ष से जूझता है। जालपा रमानाथ की खोज के लिए अनेक प्रयत्न करती है। उसे ढूँढ़कर न्याय के मार्ग पर लाने के लिए अनेक संघर्ष करती है। दूसरी ओर रमानाथ आन्तरिक संघर्ष से जूझता है। एक ओर गबन के कारण मिलने वाला दण्ड तथा दूसरी ओर झूठी गवाही। जालपा की प्रेरणा से वह झूठी गवाही बदलने का प्रयत्न भी करता है पर असपफल रहता है। कथानक का चरमबिन्दु है वह सिथति, जब रमानाथ को पता चलता है कि उसकी झूठी गवाही के कारण पफाँसी का दण्ड पाने वाले दिनेश की वृ(ा माँ, बेबस पत्नी और नन्हे बच्चों की सेवा करने के लिए जालपा ने अपने को पूरी तरह लीन कर दिया है। यह सिथति रमानाथ के लिए असá है। वह सारी उलझनों को छोड़कर हर विपत्ति को सहने के लिए उत्सुक हा उठता है और अपनी गवाही बदल देता है। उपसंहार में सभी समस्याओं का समाधन हो जाता है। जोहरा का त्यागपूर्ण बलिदान अंत में पाठक के मन को करुणा से भर देता है, पर अंतत: रमानाथ और जालपा शानितमय जीवन की ओर अग्रसर होते हैं।

ग़बन के कथा-शिल्प में लेखक ने कथा-संकेत, संयोग आदि का भी प्रयोग किया है। रमेश बाबू के साथ शतरंज खेलते हुए, एक-एक पफर्जी (मोहरे) का पिटना रमानाथ की आने वाली हार का प्रतीक है। इसी प्रकार जालपा के द्वारा सर्रापफ के लाए गहने रख लिए जाने पर लेखक की टिप्पणी है-''हम क्षणिक मोह और संकोच में पड़कर अपने जीवन के सुख और शांति को कैसे होम कर देते हैं। अगर जालपा मोह के इस झोंके में अपने को सिथर रख सकती, अगर रमा संकोच के आगे सिर न झुका देता, दोनों के âदय में प्रेम का सच्चा प्रकाश होता तो वे पथ-भ्रष्ट होकर सर्वनाथ की ओर न जाते। अन्यत्रा रमेश द्वारा लिखे पत्रा को, जिसमें पैसे न देने की बात थी, रमानाथ पफाड़कर एकाग्रचित हो दीपक को देखने लगता है। इस सिथति के लिए प्रेमचन्द ने लिखा है-''इतनी ही एकाग्रता से वह कदाचित आकाश की काली, अभेध मेघराशि की ओर ताकता। संयोग की घटनाएँ प्रस्तुत उपन्यास में अधिक नहीं हैं। समाचार-पत्रा में शतरंज की पहेली प्रकाशित करवाकर जालपा-रमानाथ का पता लगाती है। इसी प्रकार घूमते हुए रमानाथ जालपा को दिनेश के घर का कार्य करते हुए देखता है। ये आकसिमक संयोग तो नहीं है, लेकिन इसके द्वारा कथानक में रोचकता के साथ-साथ घटनाक्रम में परिवर्तनशीलता देखी जा सकती है।

नाटकीय व्यंग्य कथानक में रोचकता की वृ(ि करते हैं। रमानाथ आपिफस के रुपये रतन से वापिस लेने जाता है तो घोर अन्तद्र्वन्द्व से घिरा हुआ है। दूसरी ओर रतन मस्ती से झूला ही नहीं झूल रही, वरन रमानाथ से झूलने-झुलाने की बात कहती है। ऐसे में रमानाथ की व्याकुलता और रतन की रसिकता सिथति को और भी जटिल और विचित्रा बना देती है। इसी प्रकार रमानाथ का अनजाने ही स्टेशन पर आ जाना, टिकट के लिए कुलियों के जमादार को अंगूठी देना, जमादार का वापिस न आना और गाड़ी के चलते ही टिकट-चैकर का वहाँ आना सिथति की नाटकीयता और रमानाथ की बैचेनी को दर्शाता है। प्रेमचन्द इस प्रकार के दृश्यों से कथानक को सहज ही रोचक, आकर्षक और स्वाभाविक बनाने में कुशल रहे हैं।

पूर्वदीपित-शैली अर्थात फ्रलैश बैक का प्रयोग भी कथानक में कौतूहल की वृ(ि करता है। देवीदीन का खादी प्रेम का पूर्व इतिहास, रमानाथ द्वारा शतरंज-पहेली हल करने की घटना, रतन के पति वकील बाबू की मृत्यु के समय उनकी स्मृति में अपने स्वर्गीय पुत्रा की स्मृति आदि घटनाएँ उपन्यास में मार्मिकता की वृ(ि करती हैं। रतन, देवीदीन, जोहरा से संबंधित उपकथाओं में अनेक स्थलों पर मार्मिकता की प्रस्तुति हुर्इ है।

सुगठितता कथानक का आवश्यक तत्त्व है। उसमें वर्णित घटनाएँ और सिथतियाँ सुव्यवसिथत और क्रमब( होनी चाहिए। प्रेमचन्द के उपन्यासों में प्राय: घटना-बहुलता होते हुए भी एक क्रमब(ता और सुगठित कथानक के दर्शन होते हैं। सर्वत्रा एक कार्य कारण-श्रृंखला को देखा जा सकता है। बचपन में जालपा का चंद्रहार के लिए स्वप्न संजोना, ससुराल में चंदहार न मिलने पर निराशा, गहनों की चोरी से आभूषणप्रियता में वृ(ि, रमानाथ का उधर पर गहने बनवाना और पिफर एक-एक विपत्तियों का आगमन-सभी घटनाएँ परस्पर एक नियमित श्रृंखला में बँध्ी हुर्इ हैं।

स्वाभाविकता या विश्वसनीयता कथानक की सपफलता के लिए अत्यंत आवश्यक तत्त्व है। घटनाएँ काल्पनिक होते हुए भी स्वाभाविक प्रतीत होती हैं तो कथानक विश्वसनीय बन जाता है। 'गबन में निम्न मèयवर्गीय परिवार की आर्थिक, सामाजिक सिथति, ऊँची कल्पनाओं के कारण झूठी शान, मिथ्या अभिमान की वृत्ति आज समाज को रसातल की ओर ले जा रही है। उनका संकट स्वयं उनके ही द्वारा लाया जाता है जैसे कि रमानाथ का जीवन-वृत्त। मिथ्याभिमानी युवक का एक झूठ को छिपाने के लिए निरन्तर झूठ के जाल में पफँसते जाना, और अपनी ही मूर्खता के कारण घर परिवार को संकट में डाल देना अस्वाभाविक नहीं। इसके अतिरिक्त जालपा का आभूषणों के प्रति आवश्यकता से अधिक रुचि दिखाना, रतन का अनमोल विवाह, देवीदीन जैसे निस्वार्थी पात्रा आज भी हमारे समाज में देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार सरकारी दफ्रतरों में रिश्वत की परंपरा, पुलिस की चालें, अदालतों में बेकसूरों को पफँसाने के लिए दी जाने वाली झूठी गवाहियाँ आदि दिन-रात समाचार पत्राों में आज भी पढ़ी जाती हैं।

कुछ समीक्षकों की दृषिट में प्रस्तुत उपन्यास की कुछ घटनाएँ विश्वसनीय नहीं हैं। जैसे जालपा का इतने बड़े कलकत्ता शहर में रमानाथ को ढूँढ निकालना, जोहरा जैसी नर्तकी का रमानाथ और जालपा से प्रभावित होकर उनका मैत्राी-संबंध्, रमानाथ का जज के घर आध्ी रात को जाकर अपना बयान बदलना आदि। पर èयान से देखा जाय तो इन सभी घटनाओं के पीछे कोर्इ-न-कोर्इ कारण निहित है। जालपा रमानाथ को शतरंज की एक पहेली के माèयम से ढूँढ़ने में सपफल होती है। जोहरा जालपा के त्याग और न्याय के लिए संघर्षशील स्वभाव से प्रभावित होती है और जज का एक व्यकित के बयान बदलने पर विश्वास करना, किसी निर्दोष को जीवनदान के प्रश्न से जुड़ा है।

अंतत: 'ग़बन उपन्यास का कथानक प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरा है।

पात्रा योजना और चरित्रा-चित्राण

पात्रा योजना

'गबन में पात्राों की संख्या 50 से भी अधिक है, जिनमें प्रमुख पात्रा 10 ही हैं-5 पुरुष पात्रा : रमानाथ, दयानाथ, देवीदीन, रमेश बाबू और इन्द्रभूषण वकील। तथा 5 स्त्राी पात्रा हैं-जालपा, रतन, जोहरा, जग्गो तथा जागेश्वरी। अनेक पात्रा ऐसे भी हैं जिनकी यधपि कोर्इ निजी विशेषता नहीं है, लेकिन प्रमुख कथा विस्तार तथा मूल भाव की प्रस्तुति में ये सहायक सि( हुए हैं।

स्थूल रूप से पात्राों को दो वर्गों में बाँट सकते हैं-वर्गगत और व्यकितगत। वर्गगत पात्रा अपने वर्ग के अनुसार ही व्यवहार करते हैं। उनका जीवन, स्वभाव और कर्म अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। प्रस्तुत उपन्यास में रमानाथ, दयानाथ, दीनदयाल, इन्द्रभूषण वर्गगत पात्रा हैं। रमानाथ आज के उन युवकों का प्रतिनिधि पात्रा है जो अपनी हैसियत से ऊँची कल्पनाएँ करते हैं, आर्थिक अभाव को समझते हुए भी आकाश को छूना चाहते हैं और अपने इस प्रयत्न में न केवल स्वयं वरन अपने साथ सभी को संकट में डाल देते हैं। दयानाथ निम्नमèयवर्गीय नौकरीपेशा लोगों की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो अपनी र्इमानदारी पर अडिग रहते हैं। दीनदयाल जमींदार का मुखितयार है वह वर्गीय शान, शाही खर्च आदि को यथावत प्रस्तुत करता है। इन्द्रभूषण वकील, जो रतन का पति है, उच्चवर्गीय लोगों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है। रतन उन मèयवर्गीय महिलाओं की प्रतिच्छवि है जो आर्थिक दृषिट से सम्पन्न होने पर भी अनमोल विवाह के अभिशाप को झेलती है।

व्यकितगत पात्रा चारित्रिक दृषिट से अनेक विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं। जालपा, देवीदीन, जोहरा इसी श्रेणी के पात्रा हैं। जालपा प्रारंभ में एक मèयवर्गीय परिवार की साधरण गुणों से सम्पन्न एक ऐसी महिला है जो आभूषण-प्रेम को ही जीवन का सर्वस्व मानती है, किन्तु रमानाथ के घर छोड़कर जाने के बाद उसका विशिष्ट व्यकितत्व उभरकर सामने आता है। देवीदीन एक मस्त, निर्भीक और विनोदी व्यकित है। निम्नवर्ग के व्यकित प्राय: ऐसे गुणों से युक्त नहीं होते हैं। जोहरा वेश्या वर्ग से जुड़ी होने पर भी भिन्न गुणों से युक्त है और रमानाथ तथा जालपा की सरलता और सादगी से प्रभावित होकर भिन्न रूप प्रदर्शित करती है।

इसके अतिरिक्त पात्राों को 2 अन्य दृषिटयों से भी देखा जा सकता है-सिथर पात्रा और गतिशील पात्रा। जो पात्रा आदि से अंत एक ही साँचे में ढले हुए प्रतीत हों (इस रूप में वे कभी-कभी प्रभावहीन और अनुभूति रहित भी हो जाते हैं) सिथर पात्रा होते हैं। गतिशील अर्थात जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ-साथ उत्तरोत्तर विकास। इस रूप में ये पात्रा सजीव और प्रभावशाली होते हैं। गबन के प्राय: अधिकतर पात्रा गतिशील हैं। रमानाथ परिसिथतियों के परिवर्तन के साथ-साथ अनेक प्रकार की मानसिकता से गुजरता तो है ही, साथ ही अच्छार्इ और बुरार्इ के भिन्न पक्षों से जुड़ता जाता है। एक समय चंद्रहार के लिए अड़ जाने वाली जालपा भिन्न परिसिथतियों में चंद्रहार को आध्े मूल्य पर बेचकर परिवार की मर्यादा बचाती है। पैसे-पैसे को बचाकर रखने वाला दयानाथ अपने पुत्रा के विवाह में खुला खर्च करता है। अपने पति को पफटकारने वाली जग्गो, बाद में उसी के लिए दिन भर दुकानदारी करती है। पुलिस के कहने से रमानाथ का मन बदलने के लिए प्रयत्नशील जोहरा पहले नृत्य और मदिरा का आधर ग्रहण करती है पर बाद में वह स्नेही और सेवामयी स्त्राी के रूप में दिखार्इ देती है। मानकी, रामेश्वरी, गोपी, दारोगा आदि पात्रा सिथर कहे जा सकते हैं। यूँ भी ये पात्रा थोड़े समय के लिए तो आते हैं, पर जितना समय वे उपन्यास के रंगमंच पर प्रकट होते हैं, इसी रूप में दिखार्इ देते हैं।

प्रेमचंद से पूर्व उपन्यासों में प्राय: घटनाओं आदि के चित्राण पर अधिक èयान दिया जाता था, पर प्रेमचंद ने पात्राों के चरित्रा-विश्लेषण पर अधिक èयान दिया था। ''मानव चरित्रा पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना-उपन्यास का मूल तत्त्व मानने वाले प्रेमचन्द ने 'गबन में मानव गुणों और अवगुणों के सजीव चित्रा अंकित किए हैं। पात्राों की चारित्रिक विविधिताओं को संवादों और घटनाओं के माèयम से प्रस्तुत किया है। प्रेमचन्द ने अधिकांश पात्राों का प्रथम परिचय औपचारिक रीति से दिया है। इसे लेखकीय वर्णन कह सकते हैं। देवीदीन का प्रारमिभक परिचय उसकी रूपाÑति के साथ-साथ उसकी चारित्रिक प्रवृत्तियों की ओर भी संकेत करता है। दयानाथ और रमानाथ का स्वभावगत परिचय इस रूप में दिया गया है-''दयानाथ बहुत ऊँचे आदर्श का आदमी न होने पर रिश्वत को हराम समझता था, जबकि रमानाथ को शतरंज खेलने, सैर सपाटे करने, मित्राों की मदद से विभिन्न पफैशन करने के अतिरिक्त और कोर्इ कार्य नहीं था।

उपन्यासकार ने पात्राों की शारीरिक चेष्टाएँ अथवा अनुभवों की अभिव्यकित से भी पात्राों की मानसिकता को प्रस्तुत किया है। सिर हिलाकर, मुस्कुराकर, तीव्र नेत्राों से कातर स्वर में आदि के माèयम से पात्रा की इच्छा, आकांक्षाओं को वर्णित किया है। चंद्रहार न मिलने की सिथति में जालपा का यह चित्राण बिम्बात्मक शैली में प्रस्तुत हुआ है-'वह उन्माद की-सी दशा में अपने कमरे में आयी और पफूट पफूटकर रोने लगी। इसी प्रकार रमानाथ का बयान सुनते हुए-''पहला ही वाक्य सुनकर जालपा सिहर उठी, दूसरे वाक्य ने उसकी त्यौरियों पर बल डाल दिए। तीसरे वाक्य ने उसके चेहरे का रंग पफक कर दिया...। लेखक ने पात्राों के अनेक कार्य मनोविज्ञान की मानसिक कार्य-प(तियों से संचालित किए हैं। 'आरोपण यानि आरोप लगाने की प्रवृत्ति रमानाथ, दयानाथ, रतन आदि में है। 'क्षतिपूर्ति की प(ति रमा, जालपा और रतन के कार्यों में परिलक्षित होती है। रतन का रमानाथ और जालपा की ओर आÑष्ट होना भी इसी के अन्तर्गत आता है। रमानाथ का जालपा को सोने के स्थान पर पफूलों के आभूषण पहनाना भी इसी का ही उदाहरण है। 'दमन (अपने को बलात रोकना) की प्रवृत्ति रमानाथ, रतन के जीवन में बहुत गहरी है। पलायन (जीवन से भागना) की वृत्ति रमानाथ और रतन में दिखार्इ पड़ती है। रमानाथ कपड़े खरीदने के लिए बाजार जाने से मना कर देता है, जबकि उसका मूल कारण पुलिस का भय है। प्रायशिचत, परिशोध्न की प्रवृत्ति रमानाथ, जालपा, रतन और वकील साहब में विधमान है। इसके अतिरिक्त पात्रा अपने सम्वादों से स्वयं अपना, सम्मुख उपसिथत पात्रा अथवा अनुपसिथत पात्रा का चरित्राोदघाटन करते हैं। इस प्रकार गबन का चरित्रा-चित्राण प्रेमचन्दीय शैली का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

प्रमुख पात्राों का चरित्रा-चित्राण

रमानाथ

रमानाथ 'ग़बन उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा है। समूची कथावस्तु, सभी पात्रा और परिसिथतियाँ इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। वह एक साधरण व्यकित है सामान्य गुणों से सम्पन्न युवक। उसमें न तो आदर्शों के लिए कोर्इ आग्रह है, न ही हीन व्यकितयों की भाँति आचारणहीनता का संकेत है। इतना अवश्य है कि मèयमवर्ग से संबंध् रखने के कारण वह कल्पना के घोड़े दूर-दूर तक दौड़ाता है, हवार्इ किले बनाता है। ''वह ऐसा कोर्इ उपाय सोचकर निकालना चाहता था जिससे वह जल्द से जल्द अतुल सम्पत्ति का स्वामी हो जाए। कहीं उसके नाम कोर्इ लाटरी निकल आती? पिफर तो वह जालपा को आभूषणों से मढ़ देता। सबसे पहले चंद्रहार बनवाताऋ उसमें हीरे जड़े होते। लेकिन वह कल्पनाओं के ही लोक में विचरण करता रहता है, ऐसा नहीं है। नौकरी की तलाश में दर-दर भटकता है, और परिसिथतियों के साथ समझौता करने का प्रयत्न भी करता है। रमानाथ के चरित्रा की प्रारमिभक विशेषताओं में महत्त्वपूर्ण है-उसकी पफैशनपरस्ती और स्वच्छन्द

विचारधरा। उसमें किसी भी सामाजिक परम्परा या नैतिक मर्यादा के प्रति कोर्इ विशेष आस्था नहीं है। इतना ही नहीं, दोस्तों से उधर माँगकर मौज मस्ती करने में उसे तनिक भी हिचक नहीं है। उसकी पफैशनप्रियता का तो यह हाल है कि उसका पफैशन का शौक-''दोस्तों की बदौलत पूरा होता था। किसी का चेस्टर माँग लिया, और शाम को हवा खाने निकल गए। किसी का पम्प शू पहन लिया किसी की घड़ी कलार्इ में बाँध् ली। कभी बनारसी पफैशन में निकले कभी लखनवी पफैशन में। दस मित्राों ने एक-एक कपड़ा बनवा लिया, तो दस सूट बदलने का साध्न हो गया। सहकारिता का यह बिल्कुल नया उपयोग था। इतना ही नहीं, विवाह के बाद उसका यह शौक और भी बढ़ गया। वह टेनिस रैकेट लिए बाहर से आया। सपफेद टेनिस शर्ट था, सपफेद पतलून, कैनवश का जूता। अपने विवाह पर भी उसने दिखावे और नुमाइश को परमावश्यक मानकर सापफ कह दिया कि 'बारात ऐसे ध्ूम से जानी चाहिए कि गाँव भर में शोर मच जाए। और इसीलिए उसने अपने लिए पालकी के स्थान पर मोटर पर जोर दिया। आतिशबाजियो, नाच, बाजे-गाजे सभी अव्वल दर्जे के रखे गए। म्यूनिसिपैलिटी में नौकरी लगने के बाद जब उसे ऊपरी आमदनी होने लगी तो उसके इस शौक में और भी बढ़ोतरी होती गर्इ। पत्नी के साथ खूब घूमने जाना, सिनेमा, खेल-तमाशे आदि के शौक में ही सारा पैसा चला जाता था। ग़बन की घटना के बाद भी जब कलकत्ता में उसे छोटा-मोटा काम करके पैसे मिलने लगे तो उसकी ''भोग लालसा और भी प्रचण्ड हो गर्इ। रुपये आते ही सैर सपाटे की ध्ुन सवार हो गर्इ। ऐसी ही प्रवृत्ति के कारण वह पिफर से ध्ीरे-ध्ीरे दुर्भाग्य का शिकार होने लगा।

अहंवादी होने के कारण रमानाथ अपने जीवन में सदैव असिथर ही बना रहा। वह किसी के सामने छोटा बने, या उसकी दीन-हीन आर्थिक दशा किसी के सम्मुख प्रकट हो-यह उसे कभी सá ही नहीं था। मित्राों से माँगी गर्इ वस्तुओं के आधर पर 'ऐश का जीवन जीना उसे प्रिय था। विवाह में आवश्यकता से अधिक न का खर्च होना भी उसकी ही इच्छा के अनुकूल था। इतना ही नहीं 'रमानाथ ने जवानों के स्वभाव के अनुसार जालपा से खूब जीट उड़ायी थी। जमींदारी से उससे कर्इ हज़ार का नपफा है। बैंक में रुपये हैं, अब उनका सूद आता है। घर का किराया पाँच रुपये था, पर रमानाथ ने पंद्रह बताए थे। लड़कों की शिक्षा का खर्च मुशिकल से दस रुपये था, रमानाथ ने चालीस बताए थे। डींग मारने के कारण ही वह अनेक मुसीबतों में पफँसता है। वकील इन्द्रभूषण के सामने अपना महत्त्व बढ़ाने के लिए वह कहता है-''जी हाँ! म्यूनिसिपल आपिफस में हूँ। अभी हाल ही में आया हूँ। कानून की तरपफ जाने का इरादा था पर नये वकीलों की यहाँ जो हालत हो रही है, उसे देखकर हिम्मत न पड़ी। वस्तुत: इस प्रवृत्ति का शिकार व्यकित कभी भी न तो वास्तविकता को स्वीकार सकता है ओर न ही उसकी दूसरों के सामने सच्चार्इ प्रकट करने की हिम्मत होती है। यही हाल रमानाथ का भी हुआ। वह बाहर के लोगों के सम्मुख ही नहीं, अपने पिता और पत्नी को भी वास्तविकता न बता सका और एक दिन जब उसके झूठ की पोल खुली तो वह किसी के भी सामने आँख उठाने के लायक न रहा।

प्रदर्शनप्रियता उसके व्यकितत्व का एक अभिन्न रूप है। विवाह में अधिक खर्च उसकी इसी आदत के कारण हुआ था। तीस रुपये की नौकरी में वह शान बड़े-बड़े साहबों जैसी रखता है-''रमा कोट-पैंट पहनकर और हैट लगाकर निकला, तो उसकी शान ही कुछ और हो गर्इ। चपरासियों ने झुकझुककर सलाम किए। पफटी हुर्इ मैली दरी पर बैठना उसको अपमानजनक जान पड़ा। इसी कारण वह रमेश बाबू से रोष में आकर 'अच्छी-सी मेज और कुर्सी दिलवाने का आग्रह करता है। इतना ही नहीं, वह जालपा से भी इसी भाव की उपेक्षा करता है। रतन के पहली बार उन्हें निमंत्रित करने पर वह चाहता है कि जालपा कीमती साड़ी और सुन्दर घड़ी पहनकर ही उनके यहाँ जाए। यधपि घर का यह हाल था कि गहनों का उधर अभी चुकाना भी प्रारंभ नहीं किया था, पर उसे 'यह भी सहन नहीं था कि जालपा पफटे हाल चाय-पार्टी पर जाए। जब वे दोनों रतन को अपने यहाँ बुलाते हैं तब वह मेज-कुर्सियों और चाय के सैट आदि रमेश बाबू के यहाँ से मँगवाकर अपनी शान दिखाने में तनिक भी नहीं झिझकता।

मिथ्या गर्व में सदा डूबे रहने वाले और झूठी शान की वृत्ति जिनमें होती है वे प्राय: असत्यवादी और कायर होते हैं। रमानाथ अपने साहबी ठाठ दिखाने के लिए लगातार झूठ बोलता जाता है। विवाहोपरान्त जालपा से अपने पिता की जमींदारी होने तथा बैंक में हजारों रुपये होने की बात बिल्कुल असत्य है। उधर के रुपये चुकाने के लिए उसने अनेक उपाय सोचे, 'लेकिन कोर्इ ऐसा न था जो आगे चलकर उसे उलझनों में न डाल देता, दलदल में न पफँसा देता। पिफर उसके दिमाग में एक कपट-चाल ने जन्म लिया। उसने स्वयं गहने चोरी करके, चोर-चोर की आवाज लगाकर बिगड़ी हुर्इ सिथति को सुधरने का प्रयत्न किया। इसके अतिरिक्त गंगू सर्रापफ के पास रतन के रुपये पफँस गये तो बार-बार सर्रापफ के पास रतन से झूठ बोलने के अतिरिक्त उसके पास और कोर्इ मार्ग न था। रतन ने जब अपने रुपये वापिस लेने के लिए रमानाथ को बार-बार कहना शुरू किया तो उसने अपने आपिफस के रुपये से उसे शांत करना चाहा पर रतन ने जब उन्हें अपना ही मानकर रख लिया तो रमानाथ बुरी तरह पफँस गया और घर से भागने के अतिरिक्त उसके पास और कोर्इ मार्ग न रहा था। कलकत्ते पहुँचकर उसने देवीदीन को स्वयं के ब्राह्राण होने की बात कही। कलकत्ता में पुलिस को अपना नाम और पता भी गलत बताया क्योंकि उसे भय था कि वह उसके वास्तविक नाम से परिचित होकर पुलिस उसके गबन के आरोप को भी जान जाएगी। इस प्रकार रमानाथ स्वयं अपने ही हाथों अपने को लगातार नीचे ही गिराता चला गया और इसी कारण सच्चार्इ जानने के बाद भी वह पुलिस की गिरफ्रत से बच नहीं पाया।

असत्यवादिता व्यकित को आन्तरिक दृषिट से शकितहीन कर देती है और वह कायर हो जाता है। रमानाथ की दुर्बल चित्तवृत्ति उसे कभी सत्य बोलने के लिए प्रेरित न कर सकी। उसे अपनी भूल सुधरने के अनेक अवसर मिलते हैं लेकिन उसकी दुर्बलता उसे आगे बढ़ने से रोक लेती थी। न जाने किन भयंकर परिणामों को झेलना पड़ेगा?-सोचकर वह कभी भी चाहकर भी सत्य नहीं बोल पाया। एक आशंका अनेक आपत्तियों की जननी होती है और इस आशंका के कारण ही साहस की कमी भी हो जाती है। गहनों की चोरी का निश्चय करके जब वह जालपा के पास जाता है तो उसके मन में विचार उठता है-''मैं कितना बड़ा कायर हूँ। क्या मैं बाबूजी को सापफ-सापफ जवाब न दे सकता? मैंने हामी ही क्यों भरी? क्या जालपा से घर की दशा सापफ-सापफ कह देना मेरा कर्तव्य न था? इतना ही नहीं उसकी साहसहीनता का ही यह परिणाम होता है कि वह तीन बार अपना बयान बदलने से रोक लेता है। यहाँ तक कि जब उसे पता चलता है कि उस पर अब किसी भी ग़बन का कोर्इ आरोप नहीं है, पिफर भी धेखादेही के दण्ड के भय से वह बयान नहीं बदल पाता है। अंत में भी वह जालपा के ही प्रयत्नों से इस भय के जाल को काट पाता है।

रमानाथ एक साधरण मानव है। उसमें जहाँ बुराइयाँ है वहाँ अनेक ऐसे भी गुण हैं जो उसके चरित्रा के उज्जवल पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। इतना तो स्पष्ट है कि उसने जो कुछ भी अनुचित व्यवहार किया था केवल अपने ही लाभ के लिए था। किसी को सताने, ठगने या लूटने के लिए नहीं। इस दृषिट से देखने पर उसके चरित्रा की अच्छाइयों को भी जाना जा सकता है।

रमानाथ एक निश्छल प्रेमी है, इसमें कोर्इ सन्देह नहीं है। या यूँ कहें कि पत्नी के प्रति प्रेम की अधिकता ही उसे अनेक बार सीमा से अधिक खर्च करने के लिए विवश करती है। गहनों की चोरी करने से पहले जब वह जालपा के पास जाता है तो उसके मासूम व्यवहार से उसके मन में कचोट उठती है-''यह चंद्रहार के लिए इतनी विकल हो रही है। इसे क्या मालूम कि दुर्भाग्य इसका सर्वस्व लूटने का सामान कर रहा है। जालपा से अलग रहने की कल्पना से भी वह काँप उठता है। घर से भागने के विचार के साथ उसके मन में यह कसक भी उठती है-''जालपा किस की होकर रहेगी? उसकी रक्षा कौन करेगा? कलकत्ता में भी पुलिस की गाड़ी में से जालपा की एक झलक पाकर उसके मन में प्रेम का तीव्र ज्वार उठता है और वह किसी भी बाध को पार करके उससे मिलने के लिए विकल हो उठता है।

स्वाभिमानी होना रमानाथ के चरित्रा का उदात्त पक्ष है। वह प्रारंभ से ही अपने प्रति किसी की दया या सहानुभूति को स्वीकार नहीं कर पाता। अपने मित्राों से भले ही वस्तुएँ माँग कर पहनने का उसे शौक रहा हा लेकिन नौकरी के लिए वह किसी से कुछ भी नहीं कह पाता। कलकत्ते में बहुत अधिक शीत से जब वह बहुत परेशान था तो एक स्थल पर किसी सेठ के द्वारा कम्बल बाँटे जाने की सिथति में वह चाहकर भी कम्बल न ले पाया, क्योंकि इस प्रकार भिखारियों के बीच खड़े होकर दान लेना उसके अहं को आहत कर रहा था। ऐसे में मुनीम ने उसके भाव को समझकर, उसे ब्राह्राण मानते हुए आदरपूर्वक 'अच्छा कम्बल दिया, तो भी उसकी विकलता शांत नहीं हुर्इ। इस बात से उसकी जन्म-जन्मान्तर की संचित मर्यादा आहत हो उठती है।

प्रायशिचत की भावना व्यकित के सभी दुष्Ñत्यों को दूर कर देती है। रमानाथ में भले ही कितनी कमियाँ क्यों न हों, वह जब प्रायशिचत के भाव से भर उठता है तो उसका चरित्रा पवित्रा हो जाता है। गैर कानूनी काम करते हुए ''रमानाथ की आँखों से आँसू तो न निकले थे, पर उसका रोआँ-रोआँ रो रहा था। जालपा को वास्तविकता न बता सकने की सिथति में वह सोचता है-''ऐसी प्रेम की मूर्ति और दया की देवी के साथ कितना बड़ा विश्वासघात किया। अगर मैं निष्कपट होकर रहता तो मेरा जीवन कितना आनन्दमय होता। गवाही न बदल पाने की दुर्बल चित्तवृत्ति में वह अपनी कमजोरी 'अपनी स्वार्थ लोलुपता और कायरता पर बहुत पछताता है। अंतत: सभी के सम्मुख जब अपने अपराध् बोध् को स्वीकार करके क्षमा माँगता है तो उसका चरित्रा पूर्णत: निर्मल और पवित्रा हो जाता है।

जालपा

जालपा 'ग़बन उपन्यास की प्रमुख नारी पात्रा है। उसका प्रारमिभक परिचय एक ऐसी बालिका के रूप में है जो 'बड़ी-बड़ी आँखों वाली, बालिकाओं में विधमान सामान्य वृत्ति से अलग भावनाओं से सम्पन्न है। वह रमानाथ की पत्नी है और उसकी सत्प्रेरणा का स्रोत भी है। उपन्यास की सभी प्रमुख घटनाओं से जुड़ी होने के कारण तथा मूल संवेदना की ध्ुरी होने के कारण उसे उपन्यास की नायिका कहा जा सकता है।

उसके व्यकितत्व का महत्त्वपूर्ण पक्ष है-उसका अनुपम सौन्दर्य। उसकी अनुपम छवि ने पहले ही दिन रमानाथ पर मोहिनी डाल दी थी। उसका कोमल कण्ठ-स्वर, मध्ुर भाषण, शीलता, विनयी स्वभाव किसी को भी मोहित कर लेते हैं। जालपा उन मèयवर्गीय नारियों में से है जिनमें स्त्राी सुलभ आभूषणप्रियता, आत्मप्रदर्शन की भावना से युक्त होने के साथ-साथ सरल प्रेमभाव, स्वाभिमान और सेवाभाव जैसे गुण भी विधमान हैं।

जालपा का जो प्रारंभ में परिचय मिलता है, उसमें वह एक आभूषणप्रिय नारी है। वह अल्पायु में ही बिसाती से चंद्रहार खरीदने की इच्छा को व्यक्त करती है। लेकिन ससुराल से चंद्रहार न मिलने की सिथति में उस पर मानो वज्रपात होता हैै-''उस निराशा के आवेश में उसका ऐसा जी चाहने लगा कि अपना मुँह नोच डाले। उसका वश चलता तो चढ़ावे को उठाकर आग में पफेंक देती। ''इस आभूषण मंडित संसार में जालपा का यह आभूषण प्रेम स्वाभाविक ही था, क्योंकि जब वह तीन वर्ष की ही थी, उस वक्त उसके लिए सोने के चूड़े बनाए गए थे। दादी भी जब उसे गोद में खिलाती, तो गहनों की ही चर्चा ज्यादातर होती। विवाह के बाद जब उसे आशा के विपरीत भिन्न वातावरण और इच्छानुसार चद्रहार नहीं मिला तो उसके स्वभाव में कटुता आना स्वाभाविक ही था। उसे ऐसा प्रतीत होता था जैसे मानो उसका संसार ही उजड़ गया हो। उसकी इसी बात से परेशान होकर रमानाथ 'जैसे-तैसे गहनों का ही जुगाड़ करता रहा। इसी कारण उसे एक-के बाद एक ऐसे कार्य करने पड़े कि बात गबन तक पहुँच गर्इ।

यूँ जालपा एक सरल स्वभाव वाली युवती है। किसी भी प्रकार का छल कपट मन में न होने के कारण वह रमानाथ की प्रत्येक बात पर विश्वास कर लेती है। रमानाथ के पिता की जमींदारी की बात हो या बैंक में रखे रुपयों की, गहनों की चोरी का प्रसंग हो अथवा रतन के कंगन बनवाने की बात-वह हर बात को सहज रूप में ही लेती है, संदेह का कोर्इ कारण ही उसे नहीं दिखार्इ देता। वह रमानाथ के द्वारा उसके आपिफस से लाए गए रुपये बिना गिने ही रतन को दे देती है। उसकी सरलता सभी पात्राों को अभिभूत कर देती है। वह अपनी इसी निष्कपट वृत्ति और कोपल स्वभाव के कारण महिला-समाज में आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। रमानाथ अनुभव करता है-''जालपा का निष्कपट स्नेहपूर्ण âदय मानो उसके मुखमंडल पर अंकित हो रहा था।

वाकपटुता जालपा की एक बहुत बड़ी विशेषता है। इस दृषिट से वह सदा ही प्रभावशालिनी रही है। तभी पहली बार में ही रतन उससे कहती है-''न जाने क्यों तुम्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। तुम्हें पाकर रमानाथ जी अपना भाग्य सराहते होंगे। रमानाथ भी कभी उसकी बात को नकार नहीं सकता। वह इच्छा होते हुए भी रमानाथ से कभी सीध्े आभूषणों के लिए नहीं कहती, पर अवसर आने पर उसे अपने भाव का संकेत अवश्य दे देती है-''मैं उन सित्रायों में नहीं हूँ जो गहनों पर जान देती हैं, हाँ, इस तरह किसी के घर आते-जाते शरम आती ही है, यहाँ प्रकारान्तर से वह रमानाथ को जल्दी गहने बनवा लाने का ही अनुरोध् है। इसी प्रकार चरणदास जब गहने लेकर आता है तो जालपा कुशलता से कंगन और रिंग के दाम कम करवा लेती है, जबकि रमानाथ सोचता ही रह जाता है। रतन को भी जब उसे कंगन बेचने पड़ते हैं तो उसे यह आभास करा देती है कि वह (जालपा) उसे (रतन को) दोस्ती के नाते कंगन बेच रही है जबकि रुपयों के लिए यह सौदा करना उसकी विवशता थी। जब रमानाथ पुलिस की मार से तंग आकर झूठी गवाही देने को तैयार हो जाता है, तब उन्हीं की दी हुर्इ मोटर में जग्गो के पास आता है। तब जालपा गुस्से से भड़कती हुर्इ कहानी है-''झूठी गवाही झुठे मुकदमे बनाना और पाप का व्यापार करना ही तुम्हारे भाग्य में लिख गया। ...मैं औरत हूँ। अगर कोर्इ ध्मकाकर मुझसे पाप कराना चाहे, उसे न मार सकूँ, अपनी गर्दन पर छुरी चला दूँगी। क्या तुममें औरतों के बराबर भी हिम्मत नहीं है? यधपि वह जानती है कि उसकी तीखी बातें रमानाथ के âदय को छलनी कर देंगी, लेकिन इसके माèयम से वह उसे झकझोर देना चाहती हैऋ ताकि उसका सोया हुआ अहं जागृत हो। और, वह अपने इस भाव में सपफल भी होती है। अंतत: रमानाथ की बु(ि पर पड़ा हुआ पर्दा जालपा के क्रोध् की अगिन में भस्म होता है और वह सत्य के मार्ग पर चलने के लिए तैयार हो जाता है।

यधपि जालपा में अनेक नारी-सुलभ कमियाँ हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि वह एक साधरण नारी नहीं है। वह एक बु(िमती नारी है, जो संकट पड़ने पर सदैव सिथति को संभालने में सपफल रही है। प्रारंभ में वह गहनों के लिए बहुत आग्रह करती है तो उसका कारण है कि रमानाथ ने उसे यह बताया था कि उनके पास बैंक में बहुत पैसे हैं। पर जब उसे वास्तविकता का पता चलता है तो वह रमानाथ को बहुत पफटकारती है-''नहीं, मेरे लिए कर्ज लेने की जरूरत नहीं मुझे तुम्हारे साथ जीना और मरना है। अगर मुझे सारी उम्र बेगहनों के रहना पड़े, तो भी मैं कुछ लेने को न कहूँगी। रमानाथ के पिता से और पत्नी से झूठ बोलने पर वह उसे समझाती है-''आदमी सारी दुनिया से परदा रखता लेकिन अपनी स्त्राी से परदा नहीं रखता। रमानाथ उसके सौन्दर्य और विचारशीलता पर इतना मुग्ध् था कि उसकी इच्छा-पूर्ति के लिए उचित-अनुचित का भी विचार नहीं करता।

जालपा का प्रारमिभक रूप पूरी तरह से वर्गगत है। पर जैसे-जैसे परिसिथतियाँ परिवर्तित होती हैं वह एक भिन्न, एक आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत होती है। इस रूप में वह विशिष्ट पात्रा बन जाती है। पहले जहाँ आभूषणों के प्रति अत्यधिक आकर्षण के कारण वह अनेक प्रकार से रूढ़-मनोबल की सिथति उत्पन्न करती है, वहीं वह सिथति की गंभीरता को समझकर अपने आभूषण, विशेषकर वे कंगन-जिन पर वह बहुत जान छिड़कती थी, रतन को आध्े दामों पर बेच देती है। जालपा के आदर्श रूप के सम्मुख रतन भी नतमस्तक हो उठती है। रमानाथ के घर से भाग जाने के बाद की सिथतियों में उसका जो निखरा रूप प्रस्तुत हुआ है, निश्चय ही अनुकरणीय है। रमानाथ जैसा भी हो, उसका पति है और उसे जैसे भी हो सुधरना उसका कत्र्तव्य है-यह मानकर उसे कभी सीध्े कभी कटाक्षवाणों से भेदकर उसकी अंतरात्मा को जगाने का प्रयास करती है। ''क्या तुम इतने गए बीते हो कि अपनी रोटियों के लिए दूसरों का गला काटो?-जैसे तीखे वाक्यों से उसे झिंझोड़ने का भरसक प्रयास करती है। इतना ही नहीं, पति की झूठी गवाही के कारण पफाँसी का दण्ड पाने वाले निर्दोष दिनेश के परिवार की सेवा का पूरा भार अपने ऊपर ले लेती है। इस प्रकार आत्म संयम और कुशलता से वह बिगड़ी हुर्इ बात को संभालने में सपफल होती है। रमानाथ से कहा गया उसका यह संवाद उसके मन को प्रतिबिमिबत करता है-''मेरी सभी अभिलाषाएँ ज्यों की त्यों हैं। पुरुषार्थ से, अपने परिश्रम से, सदुपयोग से उन्हें पूरा कर सको, तो क्या कहनाऋ लेकिन नीयत खोटी करके, आत्मा को कलुषित करके एक लाख भी लाओ-तो मैं ठुकरा दूँगी।

इस रूप में जालपा का चरित्रा प्रेमचंद के आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद का सटीक उदाहरण है।

रतन

रमानाथ और जालपा की मुख्य कथा को उभारने में रतन की उपकथा का बहुत बड़ा हाथ है। प्रस्तुत उपन्यास में वह ऐसी नारी के रूप में चित्रित हुर्इ है जो भाग्य की मार से जीवन के अनेक सुख और दु:ख के रंगों को जीती है। एक ओर वह जीवन की अपार सुख-समृ(ि को भोगती है तो बाद में लाचारी और असहाय सिथति का भी शिकार बनती है।

रतन एक निर्मल, सरल और निष्कपट नारी है। उसका विवाह एक अध्ेड़ व्यकित के साथ होता है जिसे वह भाग्य की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेती है। ध्न-धन्य से समृ( होने पर भी न तो उसके मन में किसी प्रकार का लालच है और न ही उसका कोर्इ गर्व है। वह एक पतिव्रता नारी है, जिसके लिए पति की कामना सर्वोच्च है। यधपि वकील इन्द्रभूषण उससे आयु में बहुत बड़े हैं लेकिन पिफर भी पति के प्रति उसके श्र(ा-भाव में कोर्इ कमी नहीं है। वह चाहती है कि उसके पति निरोगी और सुखी जीवन व्यतीत करें। इसके लिए वह उन्हें कलकत्ता भी लेकर जाती है। उसकी मनोकामना है-''अगर कोर्इ मेरा सर्वस्व लेकर भी इन्हें अच्छा कर दे...। पति के लिए उसके मन में सदैव उच्च विचार ही रहे। वह जानती है कि वे (वकील) बाहर से जितने कठोर है, भीतर से उतने ही नर्म और कोमल हैं। पति के द्वारा वसीयत लिखे जाने पर रतन की हड़बड़ाहट और आशंका की प्रतिक्रिया उसके पति-प्रेम का स्पष्ट प्रभाव है।

रतन एक स्वाभिमानी नारी है। आत्म-सम्मान बनाए रखने की कला उसे बखूबी आती है। रमानाथ जब बार-बार कहने पर सर्रापफ के बारे में उसे नहीं बताता, तो वह बड़े अभिमान से कह उठती है कि जो सर्रापफ इस प्रकार से टालमटोल कर रहा है उसकी दूकान नीलाम करवाकर वह, उसे जेल भिजवा सकती है। कुछ स्थलों पर रतन और जालपा का चरित्रा समान ऊँचार्इ को छूता हुआ प्रतीत होता है। मैत्राी के क्षणों में दोनों ही एक दूसरे का सहारा बनकर चरित्रा की उदात्त मनोभूमि प्रस्तुत करती हैं। जालपा की कठिन परिसिथतियों में रतन सदा उसके साथ रही, इसी प्रकार रतन के साथ जालपा भी अपने को प्रस्तुत करती है। इसीलिए रतन जालपा से कहती है-''मैत्राी परिसिथतियों का विचार नहीं करती। अगर यह विचार बना रहे, तो समझ लो मैत्राी नहीं है। पति की मृत्यु के उपरांत उसे वास्तविकता का ज्ञान होता है। और मणिभूषण जब उसका सब कुछ हड़प लेने का प्रयत्न करता है तो भी वह नहीं घबराती। सुख सुविधओं में लंबे समय तक रहने वाली रतन परिसिथतियों से समझौता करना भी बखूबी जानती है। तभी तो उसके मन में ये विचार उठते हैं-''मैं क्यों अपने को अनाथिनी समझ रही हूँ। क्या मैं कोर्इ काम नहीं कर सकती। यही होगा ना कि लोग हँसेंगे मगर मुझे हँसी की क्या परवा?

रतन के चरित्रा में किंचित मात्रा प्रदर्शनप्रियता का भी अंश है। यूँ व्यर्थ का प्रदर्शन वह कभी नहीं करती। जब आत्म-प्रदर्शन के उसे सभी साध्न उपलब्ध् हों तो वह उनका उपयोग क्यों न करे? हँसी विनोद, सैर-सपाटा, खाना-पीना-ये सभी उसके विवाहित जीवन का आवश्यक अंग बन गर्इ थीं। उसमें आभूषणों के लिए भी विशेष आकर्षण था और यह आभूषणप्रियता हर नारी में स्वाभाविक रूप से होती ही है। जालपा के कंगन उसे इतने भाते हैं कि वह वैसे ही कंगन लेने के लिए लालायित रहती है। किंतु उसकी इस भावना से किसी प्रकार की कोर्इ समस्या उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि आर्थिक दृषिट से वह इस आदत की पूर्ति सहज ही कर सकती है।

इस प्रकार रतन एक ऐसा नारी चरित्रा है जो समाज की दूषित वृत्तियों की शिकार नारियों का प्रतिनिधित्व करता है। जीवन की सहज भावनाएँ प्रेम, ममता आदि विपरीत परिसिथतियों की झोंक में कुचली जाती हैं। इतना ही नहीं, असाèय विध्वा के रूप में वह नारकीय यातना सहन करने के लिए विवश की जाती है। इस रूप में रतन पाठक की सहानुभूति का पात्रा बन गर्इ है।

देवीदीन

देवीदीन 'ग़बन उपन्यास का महत्त्वपूर्ण पात्रा है। यधपि यह उपन्यास के उत्तरार्( में आता है, लेकिन थोड़े में बहुत की भावना इस पात्रा के माèयम से ही प्रस्तुत हुर्इ है। यह पात्रा प्रमुखत: लेखक के विचारों का प्रतिनिधि पात्रा है-देशभक्त, साहसी, कर्मवीर।

देवीदीन रमानाथ को रेलगाड़ी में उस समय मिलता है जब रमानाथ विपरीत परिसिथतियों से घबराकर रेल में बिना टिकट बैठ जाता है। टिकट चैकर के आने पर रमानाथ की घबराहट देखकर-''किराए के पैसे मुझसे ले लेना-कहता है, तो रमानाथ पाता है कि उसके सामने 60-70 साल का बूढ़ा घुला हुआ आदमी था। माँस तो क्या हडिडयाँ तक गल गर्इ थीं। मूँछ और सिर के बाल मुँडे हुए थे। एक छोटी-सी बकुची के सिवा उसके पास और असबाब भी न था। देवीदीन उस समय बदरीनाथ की यात्राा करके लौट रहा था। ऐसे बुजुर्ग को मित्रा के रूप में पाकर रमानाथ èान्य हो उठता है। कलकत्ते में वह रमानाथ की भरसक सहायता करता है। वस्तुत: देवीदीन मानवीय आदर्श का साकार रूप है। दुखी पीडि़त की सहायता करना उसका जीवन-लक्ष्य है।

जीवन को उसने बहुत गहरार्इ से देखा है। यही कारण है कि उसे मानव-मन की सहज परख है। रमानाथ को देखकर वह तुरंत समझ जाता है कि वह किसी आपत्ति में पकड़कर घर से भागा हुआ युवक है। पुलिस के हथकण्डों से भी वह अनजान नहीं है इसीलिए रमानाथ को उससे बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक और धर्मिक क्षेत्रा के पाखणिडयों को वह भली-भाँति जानता है। इसीलिए रमानाथ के मुँह से सेठ करोड़ीमल की दानवीरता की बात सुनकर वह कहता है-''उसे पापी कहना चाहिए, महापापी। ...अगर साल में दो चार हजार का दान न कर दे, तो पाप का ध्न पचे कैसे? साथ ही उसका यह भी विचार प्रकट होता है-''आदमी चाहे और कुछ न करे, मन में दया बनाए रखे। यही सौ ध्रम का एक ध्रम है।

देवीदीन की सदभावना से प्रेरित होकर रमानाथ उससे कुछ भी नहीं छिपाता। उसकी दयनीय दशा से द्रवित होकर देवीदीन उसकी भरसक सहायता करता है। वह एक ऐसा देशभक्त है जो समय पड़ने पर देश के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। वह अपनी देशभकित का प्रचार नहीं करता, कोर्इ मूल्य नहीं चाहता और न ही किसी पर किसी प्रकार की कृतज्ञता प्रकाशित करता है। वह भोग-विलास में अन्ध्े हो रहे, देशभकित के नाम को कलंकित करने वाले बड़े-बड़े आदमियों से सख्त नाराज है। उन्हीें के लिए देवीदीन का रोष इस रूप में प्रकट होता है-''अरे तुम क्या देस का उ(ार करोगे? पहले अपना उ(ार तो कर लो। गरीबों को लूटकर बिलायत का घर भरना तुम्हारा काम है। इसीलिए तुम्हारा इस देस में जनम हुआ है। हाँ रोये जाव, विलायती सरावें उड़ाओ, बिलायती मोटरें दौड़ाओ, बिलायती मुरब्बे और अचार चक्खो, बिलायती बरतनों में खाओ, बिलायती दवाइयाँ पियो, पर देस के नाम को रोए जाव। इस रूप में देवीदीन प्रेमचन्द की उत्कट देशभकित का साकार रूप है।

जीवन के खटटे मीठे अनुभवों से गुजरकर देवीदीन का व्यकितत्व निखर गया है। उसमें साहस और उत्साह का अपूर्व भण्डार है। रमानाथ के लिए वह सभी से, यहाँ तक कि दारोगा से भी उलझने की हिम्मत रखता है-''हूँ तो दो टके का आदमी, पर बड़े बड़े अपफसरों तक पहुँच है... जिस दिन मेरा घर खुदेगा, उस दिन यह पगड़ी और यह चपरास भी न रहेगी हजूर। कलकत्ता से प्रयाग आकर खेतीबाड़ी करने में उसका रूप और भी तेजस्वी हो उठता है। जमीन लेकर, बाग लगाने, गाय-भेंस खरीदकर वह सुख और शांति का अनुभव करता है।

देवीदीन के चरित्रा का महत्त्वपूर्ण पक्ष है उसका विनोदी स्वभाव। जीवन की गहरार्इ को गंभीरतापूर्वक समझने और विभिन्न क्षेत्राों में अपने कौशल से धक जमाने वाले ही देवीदीन की ऊर्जा का स्रोत है उसका हंसमुख स्वभाव-''वह बात बेबात पर भी हँस देता है। जिस बात पर और लोग रोते हैं, उस पर उसे हँसी आती है।     

 पत्नी सर्वत्रा ओजस्वी गंभीरता दिखाने वाला यह वृ( अपनी 'बुढि़या के आगे भीगी बिल्ली बन जाता है उसके सामने डरकर कान पकड़ लेने में भी उसे तनिक हिचक नहीं है। इस रूप में यह पात्रा एक ऐसा चरित्रा है जो समाज में बहुत कम, लेकिन पिफर भी देखने को मिल जाते हैं।

जोहरा

जोहरा एक नर्तकी (वेश्या) है जो समाज से ठुकरार्इ हुर्इ कुपथ पर चलने के लिए विवश है। पुरुषों की वासना-वृत्ति उसके जीवन की लाचारी है। लेकिन वह अपने जीवन के इस कुरूप पक्ष की गहरार्इ को भली-भाँति समझती है। रमानाथ के द्वारा उस जैसी नारियों पर व्यंग्य का उत्तर वह इस रूप में देती है-''वहाँ आप लोग दिल-बहलाव के लिए जाते हैं, महज ग़म ग़लत करने के लिए, महज़ आनन्द उठाने के लिए। जब आपको वपफा की तलाश ही नहीं होती, तो वह मिले क्योंकर? लेकिन इतना मैं जानती हूँ कि हममें जितनी बेचारियाँ मरदों की बेवपफार्इ से निराश होकर अपना आराम-चैन खो बैठती हैं, उनका पता अगर दुनिया को चले, तो आँखें खुल जायें।

जोहरा पैसे की मोहताज या वासना की मूर्ति नहीं, जीवन की सच्ची परख रखने वाली विचारशीला नारी है। प्रेम के महत्त्व को वह भली-भाँति समझती है। रमानाथ के पास उसे इसलिए भेजा गया था कि वह अपनी पत्नी को भूल जाय। पर रमानाथ के अनुराग से प्रेरित होकर, उसकी इच्छा-पूर्ति के लिए वह जालपा को खोज निकालने के लिए प्राणपण से जुट जाती है। रमानाथ जालपा का पता मिलते ही घर से निकल पड़ता है तो उसके âदय में रमानाथ के प्रति सातिवक प्रेम इस रूप में व्यक्त हुआ है-''रमा के प्रति ऐसा प्यार, ऐसा विकल करने वाला प्यार उसे कभी न हुआ था, जैसे कोर्इ बीर बाला अपने प्रियतम को समरभूमि की ओर जाते देखकर गर्व से पफूली न समाती हो। रमानाथ इस अमर प्रेम से अनभिज्ञ नहीं है। वह उसका अनुचित लाभ नहीं उठाता है। उसके उदगार इन शब्दों में व्यक्त हुए हैं-''मैं इसे अपना सौभाग्य हूँ कि मुझे उस तरपफ से प्रकाश मिला, जिध्र से औरों को अन्ध्कार मिलता है। विष में भी मुझे सुध प्राप्त हो गर्इ।

यह एक ऐसा चरित्रा है जो जीवन-पथ में नीचे से ऊपर की ओर उठती गर्इ है। गोद में बच्चे को लिए डूबती हुर्इ स्त्राी को बचाने के लिए वह गंगा की तेज़ लहरों में सदा के लिए लीन हो जाती है। इस रूप में उसके पापमय जीवन का प्रायशिचत है। इस रूप में उसने अपने असिथर जीवन का एक 'सिथर अंत स्वीकार किया। यह प्रेमचन्द का आदर्श भाव है जो यदा कदा पात्राों के माèयम से पाठक तक पहुँचता ही है।

दयानाथ

दयानाथ रमानाथ के पिता हैं। वे एक सिथर पात्रा हैं, जो जीवन में सदैव सुनिशिचत आदर्शों पर ही चलते हैं। र्इमानदारी जिसके जीवन का मूल आदर्श है। वह चाहते तो अपने पद का लाभ उठाकर हजारों रुपये कमा सकते थे। पर ऐसा सोचना भी उनके लिए अनुचित है। पुत्रा के विवाह पर आवश्यकता से अधिक खर्चा करना उनकी नीति के विरु( है, पर रमानाथ की इच्छा जानकर उन्हें विवशतापूर्वक ऐसा करना पड़ता है। बाद में रुपये न दे पाने के कारण वे जालपा से गहने वापिस करने की बात जब अपनी पत्नी से कहते हैं, तो उससे उनकी यह विचारधरा और भी स्पष्ट हो जाती है-''जो बात जिन्दगी-भर नहीं की, वह अब आखिरी वक्त नहीं कर सकता। बहू से सापफ-सापफ कह दो उससे पर्दा रखने की जरूरत क्या है और पर्दा रह भी कितने दिन सकता है।

लेकिन जब सन्तान नालायक हो तो पिता को लाचारी में अनुचित मार्ग पर चलना भी पड़ सकता है। पुत्रा द्वारा बहू को गहनों के चोरी की घटना को स्वीकार करके वे बुजदिली का प्रमाण देते हैं, लेकिन देखा जाय, तो परिसिथति ही ऐसी थी कि इसके अतिरिक्त उनके पास कोर्इ और मार्ग ही नहीं रह गया था।

दयानाथ एक र्इमानदार व्यकित है जो अचानक बीमार हो जाने के कारण ठीक समय पर आवेदन पत्रा नहीं भेज पाता। इसका कारण है सर्जन का अनुचित ढंग से पफीस माँगना, जिसे पूरा करना दयानाथ को उचित नही लगता। ऐसे में परिसिथतियाँ उसका साथ नहीं देती और उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है। वह एक ऐसा पात्रा है जो मèयवर्गीय नौकरी पेशा लोगों की कारुणिक सिथति को प्रस्तुत करता है।

इन्äभूषण

वकील इन्द्रभूषण रतन का पति है, जिसकी कथा मूल कथा के साथ-साथ चलती है। यह अपने क्षेत्रा का प्रसि( वकील होने के साथ ही समाज सेवी व्यकित है। वह साठ वर्ष की अवस्था में छोटी आयु की युवती से विवाह करता है। इस रूप में उसे विलासी या अन्यायी कहा जा सकता है, लेकिन उसके चरित्रा के ऐसे अन्य भी पक्ष हैं, जो उसे सत्पात्राों की कोटि में खड़ा करते हैं।

इन्द्रभूषण का अधिक आयु में विवाह करने का एक मनोवैज्ञानिक कारण है। पहली पत्नी की मृत्यु के उपरांत अपने बेटे के कारण उसने विवाह नहीं किया था, लेकिन बेटे को भी जब काल के क्रूर हाथों ने छीन लिया, तो जीवनाधर के लिए उसे दूसरा विवाह करना पड़ा। आयु का अधिक अंतर होने के कारण वह एक तरह से पत्नी के सर्वथा अयोग्य है, इस तथ्य से वह परिचित है। इस खार्इ को पाटने के लिए वह रतन के प्रति सदैव स्नेह और सम्मान का भाव रखता है। ''वकील साहब को रतन से पति का-सा प्रेम नहीं, पिता का-सा स्नेह था। उनके पास उसे प्रसन्न करने के लिए ध्न के सिवा और चीज ही क्या थी? उन्हें अपने जीवन में एक आधर की जरूरत थी, सदैव आधर की जिसके सहारे वह इस जीर्ण दशा में भी जीवन-संग्राम में खड़े रह सके। इसीलिए वे भरसक ही रतन की इच्छाओं की पूर्ति करने का प्रयास करते थे।

इन्द्रभूषण एक सâदय मानव है। ''देखने में जितने कठोर मालूम होते हैं, भीतर से इनका âदय उतना ही नर्म है। कितने ही अनाथों, विध्वाओं और गरीबों के महीने बाँध् रखे हैं। पत्नी के प्रति भी उनके उदगार हैं-''मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया है, प्रिये! ओह! कितना बड़ा अन्याय! मैंने तुम्हारे जीवन का सर्वनाश कर दिया, क्षमा करना। वे जानते थे कि उनकी मृत्यु के बाद रतन का जीवन अनेक संकटों से घिर सकता है इसलिए वे वसीयत करना चाहते थे, पर रतन ने उन्हें इसका अवसर ही नहीं दिया, क्योंकि वह परिसिथति की गंभीरता को ही नहीं समझ पार्इ थी। इसी कारण पति की मृत्यु के बाद उसे अनेक संकटों को झेलना पड़ा। इन्द्रभूषण का चरित्रा इस एक पंकित से जाना जा सकता है-''इनके लिए जीवन में कौन सा सुख था-न खाने पीने का सुख, न मेले, तमाशे का शौक। जीवन क्या दीर्घ तपस्या थी जिसका मुख्य उíेश्य कत्र्तव्य-पालन था।

रमेश

रमेश रमानाथ का मित्रा है, जो सरलता, सादगी, सच्ची मित्राता के गुण से युक्त है। उम्र चालीस वर्ष, मन से शौकीन, शतरंज के खिलाड़ी। खेलने बैठ जाते तो दफ्रतर भी जाना भूल जाते थे। पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। अत: मन बहलाव के लिए यह विनोद ही एकमात्रा आधर था। म्यूनिसिपैलिटी में हेड क्लर्क है। इस पद पर हजारों के वारे न्यारे हो सकते थे, पर वह रिश्वत को हराम समझता है। मित्राता के लिए कुछ भी कर गुजरना उसकी प्रÑति में है। रमानाथ को नौकरी वही दिलवाता है। पहले वह रमानाथ को रिश्वत लेने से नहीं रोकता लेकिन जब पाता है कि पानी सर से ऊँचा जा रहा है तो सच्चे मित्रा की भाँति उसे रोकने का पूरा प्रयास करता है।

अनुचित सहायता को वह सही नहीं मानता इसीलिए रमानाथ के उधर माँगने पर वह उसे सापफ मना कर देता है-''मेरे तुम प्यारे दोस्त हो, तुमसे दुश्मनी नहीं करना चाहता, इसलिए मुझे क्षमा करो। वह रमानाथ को सचेत भी करता है कि उसे म्यूनिसिपैलिटी के पैसे समय पर जमा करवा देने चाहिए। अन्यथा वह बुरे परिणाम के लिए तैयार रहे। इस रूप में वह मित्राता से अधिक कर्तव्यपरायणता को महत्त्व देता है।

जग्गो

जग्गो देवीदीन की पत्नी है जिसका प्रारंभिक परिचय एक कटु-भाषिनी और रूढ़ परंपराओं की अनुगामिनी के रूप में है। देवीदीन जैसे पति को छोटी-छोटी बात पर डाँटना-पफटकारना उसकी प्रÑति बन गर्इ है-''इनस कौन नसा छूटा है, चरस यह पियें, गांजा यह पियें, सराब इन्हें चाहिए, भांग इन्हें चाहिए। जग्गो के इस आक्रोस के पीछे उसके जीवन का दुर्भाग्य छुपा हुआ है। जीवन में जब अधिक कुछ न हो और जो कुछ हो वह भी छिन जाय, तो व्यकित का स्वभाव कटु हो ही जाता है। जग्गो और देवीदीन युवा पुत्राों को आँखों के आगे अपने से हमेशा के लिए दूर जाते हुए देख चुके हैं। देवीदीन ने जहाँ स्वयं को इन सब बातों से तटस्थ करने का प्रयास किया है, वहाँ जग्गो अन्दर की इस आग में सदैव झुलसती रहती है। उसकी ममता की चरम सीमा है जब वह अपने बेटों के मुग्दर की जोड़ी को रमानाथ को दिखाते हुए कहती है-''यह जोड़ी मेरे लालों की जुगल जोड़ी है। यही मेरे दोनों लाल हैं रमानाथ को तब अनुभव होता है कि 'बुढि़या में कितना पावन

ध्ैर्य, विशाल वत्सलता है। उसका 'âदय कितना स्नेहमय, कितना कोमल कितना मनस्वी है।

रमानाथ के प्रति उसके âदय में अपार वत्सल है। जालपा को वह पूरी तरह से पुत्रावध्ू के रूप में ही अपनाती है। यहाँ उसका रूढि़वादी व्यवहार अवश्य उभरता है। वह उसे अपने चूल्हे-चौके से दूर ही रखती है। रमानाथ से वह कहती है-''बेटा खटिक कोर्इ नीच जात नहीं है। हम लोग बराम्हन के हाथ का भी नहीं खाते। कहार का पानी तक नहीं पीते। मांस-मछरी हाथ से नहीं छूते... लेकिन मेरी रोटियाँ तुम्हें अच्छी लगेंगी। रमानाथ के कहने पर-''प्रेम की रोटियों में अमृत रहता है अम्मां... -तो उसका मन ऐसे भरा-भरा सा हो जाता है जैसे मानो 'आँचल में वह आनन्द की निधि भरे हो।

जग्गो साहसी नारी है। वह बड़ी उम्र में भी अपनी जिम्मेदारी पर दुकान चलाती है। स्वयं मंडी से सब्जी तरकारी के टोकरे भरवाकर लाती है। वह स्वाभिमानी और निर्लोभी है। रमानाथ के सरकारी गवाह बनने पर, जब वह जग्गो के लिए सोने की चूडि़याँ लाता है तो वह उसे दूर पफेंक देती है। निश्चय ही यह व्यकितत्व साधरण होते हुए भी असाधरण और âदयस्पर्शी बन गया है।

प्रतिपाध

प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के ऐसे प्रतिभावान लेखक थे, जिन्होंने अपने मौलिक चिंतन से तत्कालीन कथा-साहित्य की धरा को एक दिशा दी। प्रेमचंद से पूर्व हिन्दी उपन्यास तिलस्मी और एÕयारी कथाओं के बंध्न से जकड़ा था और उसमें जासूसी और काल्पनिक घटनाक्रमों की प्रधनता थी। प्रेमचंद ने हिन्दी उपन्यास को काल्पनिकता से हटाकर यथार्थ से जोड़ा। उन्होंने आम आदमी की रोज़मर्रा की समस्याओं को अपने उपन्यासों का विषय बनाया और उन्हें एक ठोस आधर प्रदान किया। उनके उपन्यासों में ग्रामीण Ñषक वर्ग और मजदूर वर्ग के साथ-साथ भारतीय मèयमवर्गीय जीवन की समस्याओं को भी वाणी मिली है। मèयमवर्गीय समाज में व्याप्त दिखावे की भावना, झूठी शान और आर्थिक कठिनाइयों की जिस सच्चार्इ को प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया, उसने उन्हें जन-जन का लेखक बना दिया।

'ग़बन प्रेमचंद का ऐसा उपन्यास है, जिसके द्वारा भारत के मèयमवर्गीय समाज के अनेक पहलुओं को उजागर करना और उसकी समस्याओं को उभारना लेखक का मूल प्रतिपाध है। इसमें लेखक ने एक मèयमवर्गीय परिवार को केन्द्रबिंदु बनाकर उन कमियों और दुर्बलताओं को रेखांकित किया है, जिनके कारण वह जीवन के मूलतत्त्व को भुलाकर दिखावे की जिं़दगी जी रहा है। उपन्यास के आरंभ में सित्रायों की आभूषणप्रियता के प्रश्न को उठाया गया है। सावन के महीने में झूला झूलती महिलाओं के बीच एक बिसाती रंग-बिरंगी गुडि़याँ, चूडि़याँ और गहने लेकर आता है। सभी महिलाएँ अपनी पसंद के मुताबिक कर्इ चीज़ें खरीदती हैं। इनमें एक छोटी बालिका अपनी माँ से पिफरोजी रंग का चंद्रहार लेने की जि़द करती है। माँ द्वारा उस नकली हार की गुणवत्ता का प्रश्न उठाए जाने पर बिसाती का यह कथन 'बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चंद्रहार मिल जाएगा इस उपन्यास की मूल समस्या के आरम्भ की ओर संकेत करता है। इस छोटी बच्ची का नाम जालपा है, जो प्रयाग के एक छोटे से गाँव के मुख्तार दीनदयाल की इकलौती संतान है। दीनदयाल जब भी काम से प्रयाग जाते हैं, अपनी बेटी के लिए कोर्इ न कोर्इ आभूषण जरूर लाते हैं-क्योंकि उन्हें लगता है कि ये आभूषण ही उनकी बेटी क लिए सबसे अच्छे खिलौने हैं। वास्तव में माता-पिता की यही सोच लड़कियों के मन में उठने वाली आभूषण प्रियता का मूल कारण है, जिसे वह सारी जि़दगी भुला नहीं पाती। जालपा के मन को उसकी ससुराल से आने वाले चंद्रहार की कल्पना इतने गहरे तक प्रभावित करती है कि वह उससे बाहर किसी अन्य वस्तु की कल्पना ही नहीं कर पाती। अपने विवाह के समय भी उसका èयान केवल इसी बात पर लगा रहता है कि ससुराल की ओर से आए चढ़ावे में क्या-क्या गहने हैं और उनमें चंद्रहार है या नहीं। जब उसे ज्ञात होता है कि चढ़ाव के गहनों में चंद्रहार नहीं आया तो उसकी आशाओं पर वज्रपात हो जाता है। जैसे-जैसे वह अपने मन को मना भी लेती, पर यहीं उसकी सखी शहज़ादी उसके इस ज़ख्म पर चोट करती हुर्इ कहती है-''सास ससुर को बार-बार याद दिलाती रहना। बहनोर्इ जी से दो-चार दिन रूठे रहने से भी बहुत कुछ काम निकल सकता है... उन्हें मालूम हो जाए कि बिना चंद्रहार बनवाये कुशल नहीं। तुम जरा भी ढीली पड़ी और काम बिगड़ा।

यही सिथति वर-पक्ष के घर की भी है। अपने पुत्रा रमानाथ का विवाह बड़े घर में करने के कारण दयानाथ को भी लोगों के सामने अपनी नाक ऊँची रखने के लिए होने वाली पुत्रावध्ू के लिए कर्इ गहने बनवाने पड़ते हैं। अपनी आर्थिक सिथति अच्छी न होने के कारण वह न चाहते हुए भी उधर पर गहने बनवाते हैं। शादी के सात दिन के अंदर सर्रापफ को एक हज़ार रुपए चुकाने का वादा पूरा करने में असमर्थ होने पर उन्हें अपने ही घर में बहू के गहने चोरी करवाने का नाटक करना पड़ता है। इसी प्रकार आगे भी अपनी नवविवाहिता पत्नी के आग्रह पर उसे प्रसन्न करने के लिए रमानाथ द्वारा अपनी हैसियत से बढ़कर गहने बनवाना और निरंतर कर्ज़ में डूबते जाना हमारे समाज में व्याप्त आभूषण प्रियता की इस समस्या को बड़ी तीव्रता से अंकित करता है। सर्रापफ लोग भी समाज की इस कमज़ोरी को पहचानते हैं और अपनी मीठी-मीठी बातों से ऐसा कपटजाल बुनते हैं कि आदमी पफँसे बिना नहीं रहता। रमानाथ जालपा के लिए गहने देखने बाज़ार जाता है पर अपनी आर्थिक सिथति पहचानकर उन गहनों को खरीदने से इनकार कर देता है तो सुनार का यह कथन ''रुपयों का मुँह न देखिए बाबूजी, जब बहूजी पहनकर बैठेंगी, तो एक निगाह में सारे रुपये तर जायेंगे-''उसे न चाहते हुए भी उन गहनों को उधर पर लेने के लिए मजबूर कर देता है। इसी प्रकार वकील इंäभूषण की पत्नी रतन और खटिक देवीदीन की पत्नी जागेश्वरी भी इस आभूषण मोह के जाल में जकड़ी हैं। यह सित्रायों का आभूषण-प्रेम ही है जो रमानाथ को रिश्वत लेने, उधर लेने और ग़बन करने पर मजबूर करता है। उपन्यास के एक पात्रा रमेश का यह कथन लेखक के मन की व्यथा को व्यक्त करता है-''गहनों का मरज़ न जाने इस दरिद्र देश में कैसे पफैल गया। जिन लोगों के भोजन का ठिकाना नहीं, वे भी गहनों के पीछे प्राण देते हैं। ''हर साल अरबों रुपये केवल सोना-चाँदी खरीदने में व्यय हो जाते हैं... जिस देश के लोग जितने ही मूर्ख होंगे, वहाँ ज़ेवरों का प्रचार भी उतना ही अधिक होगा। इसी प्रकार देवीदीन भी समाज में पफैले गहनों के इस रोग का खुलासा इस प्रकार करता है-''जहाँ देखो-हाय गहने! हाय गहने! गहने के पीछे जान दे दें, घर के आदमियों को भूखा मारें, घर की चीज़ें बेचें। और कहाँ तक कहूँ अपनी आबरू तक बेच दें। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबको यही रोग लगा हुआ है। 'गबन के पात्राों के ये कथन लेखक की विचारधरा के साथ-साथ हमारी सामाजिक सिथति को भी प्रतिबिंबित करते हैं।

गहनों के मोह के कारण सित्रायाँ अपने पुरुषों पर अनुचित दबाव डालती हैं और पुरुष सित्रायों को प्रसन्न करने के लिए येन-केन-प्रकारेण ध्न जुटाकर उन्हें गहने गढ़वाकर देते हैं। सीध्े रास्ते से ध्न न मिलने पर वे रिश्वत और उधर का सहारा लेते हैं। प्रेमचंद ने प्रस्तुत उपन्यास 'ग़बन के माèयम से रिश्वतखोरी और कर्ज की आदत को आभूषणप्रियता के साथ जुड़ी हुर्इ समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है। जब रमानाथ का विवाह दीनदयाल की पुत्राी जालपा के साथ होना निशिचत होता है तो उसके पिता पुत्रा के विवाह के लिए कर्ज लेकर जीवन भर के लिए अपनी सुख-शांति से हाथ धे बैठते हैं। इसी प्रकार रमानाथ भी एक बार उधर पर गहने खरीदकर उस चक्रव्यूह में इस प्रकार पफँसता है कि उससे बाहर नहीं निकल पाता। व्यापार-कुशल जौहरियों के वाक-जाल में वह ऐसा उलझता है कि हाथ में पैसे न होते हुए भी उधर पर तरह-तरह के आभूषण लेता चलता है पत्नी को आभूषण देकर उसे प्रसन्न करने का नशा उस पर इतना हावी हो जाता है कि वह उधर चुकान

की बात को नजरअंदाज करते हुए निरंतर कर्ज में डूबता जाता है। यही नहीं, जब उसे म्युनिसिपैलिटी के दफ्रतर में नौकरी मिल जाती है तो तीस रुपए तनख्वाह वाली जगह को भी वह इसलिए स्वीकार कर लेता है कि वह 'जगह आमदनी की थी। नौकरी मिलते ही वह इस कल्पना में खो जाता है कि उसे ऊपरी आमदनी कितनी होगी जिससे वह जालपा के लिए अन्य गहनों के साथ-साथ चंद्रहार भी बनवा सकेगा।

रिश्वतखोरी की समस्या समाज के हर क्षेत्रा में पफैली हुर्इ है। चाहे वह म्युनिसिपैलिटी का दफ्रतर हो या पुलिस महकमा, हर जगह यह दानव की तरह अपने विकराल पंजे पफैलाए है। कोर्इ इसे रिश्वत न कहकर दस्तूरी कहता है तो कोर्इ इसे अपना काम करवाने के लिए दी गयी भेंट। रिश्वत लेने वालों के तो लालच का अंत नहीं, पर देने वाले भी इस बुरार्इ को बढ़ाने में बराबर के जिम्मेवार हैं। व्यापारी लोग अपना काम निकलवाने के लिए बाबू को अपने लाभांश का एक छोटा हिस्सा खुशी-खुशी देते हैं और बाबू लोग भी उनकी धंध्ली को समझकर उनसे ज़्यादा से ज़्यादा माल निकलवाने की पिफ़राक में रहते हैं। यह बात अब छिपी-दबी नहीं है बलिक खुले आम होती है। खाँ साहब रमानाथ को इस जगत-व्यवहार के बारे में बताते हुए कहते हैं-''हर एक बिल्टी पर एक आना बँध हुआ है, खुली हुर्इ बात है। लोग शौक से देते हैं। ...इस एक आने में

आध चपरासियों का हक़ है। जो बड़े बाबू पहले थे, वह पच्चीस रुपया महीना लेते थे।

यही सिथति पुलिस-विभाग में भी है। रमानाथ को छुड़ाने के लिए देवीदीन जब दारोगा को पाँच गिनिनयाँ भेंट करता है तो ऊपर से र्इमानदार बने रहने का ढोंग करते हुए भी वह उससे पचास गिनिनयाँ लाने को कहता है। मामला सच हो या झूठ, एक बार जो पुलिस के हत्थे चढ़ा, वह बग़ैर खिलाये-पिलाये छूट नहीं सकता। यह रोग हमारे समाज में इतनी गहरार्इ से पैठ चुका है कि हर आदमी को कहीं-न-कहीं इसका सामना करना ही पड़ता है। रिश्वतखोरी की इस समस्या को बेबाक ढं़ग से सबके सामने रखना और उसके प्रति आम आदमी को जगाना 'गबन के प्रतिपाध का महत्त्वपूर्ण पहलू है।

दिखावा और मिथ्याडंबर की बुरार्इ भी हमारे समाज के प्रत्येक वर्ग को जकड़े हुए है। शादी-ब्याह का अवसर हो या अन्य कोर्इ सामाजिक उत्सव, लोग बढ़-चढ़कर अपने ध्न-वैभव का प्रदर्शन करना चाहते हैं। होड़ा-होड़ी भी यह वृत्ति इतनी बढ़ जाती है कि उतनी हैसियत न होते हुए भी सभी प्रदर्शन-भावना से पीछे नहीं हटते। पिफर इसके लिए चाहे कर्ज-उधर का सहारा ही क्यों न लेना पड़े। प्रेमचंद ने 'गबन में दयानाथ, जालपा आदि सभी पात्राों में दिखावे और मिथ्या आत्मप्रदर्शन की भावना का चित्राण किया है। दयानाथ जानते हैं कि शादी में खर्च करने के लिए उनके पास बहुत ध्न नहीं है और वे इसके लिए कर्ज लेने के भी हिमायती नहीं हैं पर टीके में कन्या पक्ष की ओर से एक हजार रुपये पाकर वे भी समाज में अपनी हेकड़ी नहीं कराना चाहते। वह भी ऐसी बारात ले जाना चाहते हैं कि लोग लंबे समय तक याद करें। उन्होंने नाच-तमाशे, आतिशबाजी, दूल्हे के लिए मोटर, दुल्हन के लिए शानदार चढ़ाव का ऐसा इंतजाम किया कि सबके मुँह से 'वाह, वाह निकल गयी। इस एक क्षण की वाहवाही के लिए उन्होंने जीवन भर के लिए संकट मोल लिये यदि वे 'जितनी चादर, उतने पैर पसारने वाले अपने आदर्श पर टिके रहते और सामथ्र्य से अधिक दिखावा न करते तो न उन्हें कर्ज में डूबना पड़ता और न ही पुत्रावध्ू के गहने स्वयं चोरी करवाने की नौबत आती। इसी प्रकार रमानाथ नौकरी लगने पर दफ्रतर में पहनने के लिए नया सूट बनवाता है हैट और पफैशन की कितनी ही चीजें खरीदता है ताकि वह अपने साहबी ठाठ दिखाकर सब पर रौब जमा सके। इसी प्रकार पैसे न होते हुए भी वह उधर पर पत्नी के लिए नये-नये गहने बनवाता है ताकि उस पर उसके ध्नी होने का रुआब बना रहे। जालपा भी, जब तक उसके पास गहने नहीं हैं, गली मुहल्ले के किसी उत्सव में शरीक नहीं होती, पर जैसे ही उसके पास गहने आते हैं, उसे घर में बैठना अच्छा नहीं लगता क्योंकि ''वस्त्रााभूषण कोर्इ मिठार्इ तो नहीं, जिसका स्वाद एकांत में लिया जा सके। जालपा का रोज सैर-सपाटे, सिनेमा, पार्क जाना और साथवालियों पर अपने रूप और अमीरी का रंग जमाने के लिए कर्इ रुपये खर्च कर देना उसके आत्मप्रदर्शन का ही रूप है, जिसने उसके पति को सरकारी रुपये खर्च करने पर मजबूर किया। स्पष्ट है कि यह रमानाथ और जालपा की आडंबरप्रियता ही थी। जिसके कारण वे जीवन-भर संकटों से जूझते रहे। यह मिथ्याडंबर समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए दु:खदायी है, जिसके प्रति प्रत्येक को निर्भीक और जागरूक बनना होगा, यह संदेश देना भी 'गबन के लेखक का उíेश्य है।

प्रेमचंद ने समाज के पतन के लिए आर्थिक विषमता को भी कापफी सीमा तक जिम्मेवार माना है। प्रेमचंद ने स्वयं अपने जीवन में आर्थिक तंगी को भोगा था और इस बात से परिचित थे कि निधर््नता ही सभी बुराइयों की जड़ है। 'ग़बन में आर्थिक विषमता को उजागर करना लेखक का मुख्य उíेश्य तो नहीं है, पर बीच-बीच में कुछ पात्राों के माèयम से उन्होंने इस ओर भी पाठकों का èयान आकर्षित किया है। 'गबन का एक पात्रा रमेश रिश्वतखोरी का मूल कारण गरीबी को मानते हुए कहता है-''रिश्वत बहुत खराब है, मगर बाल-बच्चों वाला आदमी क्या करे। तीस रुपए में तो गुजर नहीं हो सकती है... मैं अकेला हूँ। मेरे लिए डेढ़ सौ कापफी हैं... लेकिन जिस घर में बहुत से आदमी हों, लड़कों की पढ़ार्इ हो, लड़कियों की शादियाँ हों, वहाँ आदमी क्या कर सकता है? जब तक छोटे-छोटे आदमियों का वेतन इतना न हो जाएगा कि वह भलमंसी के साथ निर्वाह कर सके तब तक रिश्वत बंद न होगी। यह दाल-रोटी, घी-दूध् तो वह भी खाते हैं। पिफर एक को तीस और दूसरे को तीन सौ क्यों देते हो? लगभग यही भाव रमानाथ के इन शब्दों में भी दिखार्इ पड़ते हैं-''निधर््न रहकर जीना मरने से भी बदतर है। मैं केवल इतना ध्न चाहता हूँ कि जरूरत की मामूली चीज़ों के लिए तरसना न पड़े।

इनके अतिरिक्त कतिपय अन्य सामाजिक समस्याओं को उठाना भी 'गबन का उíेश्य है। अभावग्रस्त निधर््न परिवार किस प्रकार अपनी युवा बेटियों का विवाह अध्ेड़ अथवा वृ( पुरुष से करने को विवश होते हैं, इसे प्रेमचंद ने रतन और वकील इन्äभूषण के बेमेल विवाह से स्पष्ट किया है। परिसिथति के हाथों मजबूर लड़कियाँ अपने जीवन के विषय में निर्णय लेने में स्वतंत्रा नहीं होती। शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्राता के अभाव में वे प्राप्त अधिकारों की रक्षा करने में भी अक्षम होती हैं। उम्र में पिता के समान इंäभूषण से विवाह करके रतन को अपना जीवन व्यर्थ प्रतीत होता है तो उनकी मृत्यु के पश्चात वह और भी असहाय हो जाती है। वकील साहब का भतीजा मणिभूषण किसी वसीयत के न होने पर समिमलित परिवार की संपत्ति में पत्नी का हक न होने के कानून का सहारा लेकर उनकी सारी संपत्ति अपने नाम कराकर रतन को बेसहारा छोड़ देता है। जीवन भर बेमेल विवाह के दु:ख की मारी रतन विध्वा होकर और भी दु:खी एवं बेघर बार हो जाती है। ऐसे लचर कानून और समिमलित परिवार की सार्थकता पर प्रश्नचिß लगाती हुर्इ वह कहती है-''मगर ऐसा कानून बनाया किसने? क्या स्त्राी इतनी नीच, इतनी तुच्छ, इतनी नगण्य है? क्यों... अगर मेरी जबान में इतनी ताकत होती कि सारे देश में उसकी आवाज पहुँचती तो मैं सब सित्रायों से कहती-बहनो! किसी समिमलित परिवार में विवाह मत करना... अगर तुम्हारे पुरुष ने कुछ छोड़ा है तो अकेली रहकर तुम उसे भोग सकती हो परिवार में रहकर तुम्हें उससे हाथ धेना पड़ेगा। परिवार तुम्हारे लिए पफूलों की सेज नहीं, काँटों की शÕया है।

वास्तव में प्रेमचंद हमेशा स्त्राी-शिक्षा के पक्षध्र थे क्योंकि शिक्षा के अभाव में वह अपने स्वतंत्रा असितत्व एवं स्वाध्ीनता की रक्षा नहीं कर सकती। शिक्षित होने पर ही स्त्राी अपने अधिकारों को समझ सकती है और समय आने पर उनका इस्तेमाल अपनी रक्षा के लिए कर सकती है। यदि स्त्राी को स्वयं कार्य करने और निर्णय लेने की स्वतंत्राता दी जाए तो वह भी रचनात्मक कार्य करके समाज को नयी दिशा दे सकती है। आरंभ में आभूषणप्रिय जालपा यदि अपनी बु(ि और आत्मविश्वास के बल पर घर से बाहर न निकलती, तो न रमानाथ का पता लगा सकती और न ही अपने सदविचारों से उसे प्रेरित कर उसे पतन के मार्ग पर चलने से रोक पाती। इस प्रकार 'गबन उपन्यास में लेखक ने बहुत विस्तार से तो नहीं, किन्तु यथावसर अनमेल विवाह, विध्वा विवाह, संयुक्त परिवार में नारी की सिथति और स्वाध्ीनता आदि सामाजिक समस्याओं को भी स्वर दिया है।

इसी प्रकार समाज की एक महत्त्वपूर्ण समस्या वेश्या समस्या को उठाना भी 'गबन के प्रतिपाध का एक अन्य पहलू है। प्रेम में निराशा, आर्थिक तंगी अथवा अर्थलोभ तथा कर्इ बार परिसिथति-वश किन्हीं गलत हाथों में पड़ जाना आदि अनेक कारणों के वशीभूत कर्इ सित्रायाँ वेश्यावृत्ति के कुमार्ग पर चल पड़ती है। बाá रूप स समाज द्वारा घृणा और हिकारत की दृषिट से देखे जाने पर भी संभ्रान्त वर्ग के कर्इ लोग ऐसी सित्रायों के पास जाकर वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने में सहायक होते हैं। 'गबन की जोहरा अपने मन की व्यथा और विवशता व्यक्त करती हुर्इ कहती है-'हममें जितनी बेचारियाँ मर्दो की बेवपफार्इ से निराश होकर अपना चैन-आराम खो बैठती हैं, उनका पता अगर दुनिया को चले तो आँखें खुल जाय। परंतु ऐसी भाग्यहता सित्रायों के मन में भी स्नेह का प्रच्छन्न स्रोत बहता है, जो कहीं से भी सहानुभूति और सम्मान पाकर नयी दिशा पा लेता है। प्रेमचंद ने रमानाथ, जालपा और रतन के सच्चे स्नेह को पाकर जोहरा के चरित्रा में परिवर्तन दिखाकर यह सि( किया है कि बुरार्इ के बीच भी अच्छार्इ का अंकुर विधमान रहता है, जो अनुकूल वातावरण पाकर पफूट उठता है।

प्रेमचंद ने अपनी Ñतियों में युगीन सामाजिक समस्याओं को ही वाणी नहीं दी अपितु राजनीतिक समस्याओं को भी समाज के सामने रखा। उनका 'ग़बन भी इसका अपवाद नहीं है। मुख्य रूप से सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का चित्राण करते हुए भी उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक सिथति के कुछ पहलुओं को भी उजागर किया है। इनमें सर्वप्रमुख है-स्वदेशी की भावना। गांध्ीजी के आàान पर उस समय के लोगों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी को अपनाने की कसम खार्इ थी। 'गबन के एक पात्रा देवीदीन के माèयम से प्रेमचंद ने इसी स्वदेशी भावना को गौरवानिवत किया है। वह बताता है कि लोग विदेशी वस्तुओं और कपड़ों के मुकाबले स्वदेशी वस्तुएँ लेना पसन्द करते थे चाहे उनके लिए ज़्यादा पैसे क्यों न देने पड़ें-''जिस देश में रहते हैं, जिसका अन्न-जल खाते हैं, उसके लिए इतना भी न करें तो जीने को धिक्कार है। दो जवान बेटे इसी सुदेसी की भेंट कर चुका हूँ-दोनों विदेसी कपड़ों की दूकान पर तैनात थे। क्या मजाल थी कि कोर्इ ग्राहक दूकान पर आ जाये...नौवें दिन दूकानदारों ने कसम खार्इ कि विलायती कपड़े अब न मँगावेंगे... तब से विदेसी दियासलार्इ तक घर में नहीं लाया।

इसी प्रकार कतिपय अन्य प्रसंगों के माèयम से तथाकथित नेताओं में सच्ची देशभकित का अभाव, पुलिस विभाग की अकर्मण्यता और झूठे मुकदमे बनाकर निरपराध् लोगों को दंड दिलवाने का नाटक करना आदि सिथतियों का यथार्थ चित्राण करना भी 'गबन के प्रतिपाध के अन्य पक्ष हैं।

भाषा-शिल्प

प्रेमचंद के अन्य उपन्यासों की भाँति 'ग़बन की भाषा भी आम-बोलचाल की भाषा है। इस उपन्यास के सभी पात्रा जिस-जिस वर्ग से संबंध् रखते हैं, उनकी भाषा का रूप भी वैसा ही है। उपन्यास के प्रमुख पात्रा दयानाथ, रमानाथ, जालपा, मानकी, दीनदयाल आदि इलाहाबाद के मèयवर्ग के नौकरीपेशा परिवार से संबंध् रखते हैं। अत: उनकी भाषा उसी वर्ग की व्यावहारिक भाषा है। ये पात्रा उच्चशिक्षित भी नहीं हैं, अत: उनकी भाषा का रूप जन सामान्य की भाषा के बिल्कुल निकट दिखार्इ पड़ता है। उपन्यास के आरंभ में ही एक बिसाती वाले से मोल-भाव करती मानकी की भाषा में साधरण शब्दों का प्रयोग होते हुए भी उनकी सहज विश्वसनीयता प्रेमचंद की भाषा के सामथ्र्य की धोतक है-

माँ ने बिसाती से पूछा-बाबा, यह हार कितने का है?

बिसाती ने हार को रूमाल से पोंछते हुए कहा-''खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें।

माता ने कहा-यह तो बड़ा महँगा है। चार दिन में इसकी चमक-दमक जाती रहेगी।

बिसाती ने मार्मिक भाव से सिर हिलाकर कहा-बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चन्द्रहार मिल जाएगा।

सहज, सरल भाषा से युक्त यह संवाद पाठक के सामने अनायास ही एक चित्रा खींच देता है, जिसमें खरीददार की सस्ता माल खरीदने की मानसिकता और बेचने वाले की प्रभावपूर्ण तर्कशीलता स्पष्ट दिखार्इ देते हैं। इसी प्रकार जालपा के विवाह के अवसर पर उसकी सखियों की बातचीत तथा विवाह के पश्चात सर्रापफ के तगादों से झल्लाए दयानाथ का अपनी पत्नी से वार्तालाप आम बोलचाल की भाषा के सटीक उदाहरण हैं।

 दफ्रतरों में, बाजारों में और पुलिस थानों में जैसी भाषा का प्रयोग किया जाता है, 'ग़बन में अवसर और सिथति के अनुरूप वैसी ही भाषा का प्रयोग किया गया है। पुलिस स्टेशन पर रमानाथ से उसकी असलियत जानने के लिए पूछताछ करते दारोगा और कांस्टेबल की भाषा का यह उदाहरण देखिए-

दारोगा ने गंभीर भाव से कहा-मामला कुछ संगीन है, क्या कुछ शराब का चस्का पड़ गया था?

''मुझसे कसम ले लीजिए, जो कभी शराब मुँह से लगायी हो।

कांस्टेबल ने विनोद करके कहा-मुहब्बत के बाज़ार में लुट गये होंगे, हुजूर।

रमा ने मुस्कराकर कहा-मुझसे पफ़ाके़मस्तों का वहाँ कहाँ गुज़र?

दारोग़ा-तो क्या जुआ खेल डाला? या, बीबी के लिए ज़ेवर बनवा डाले।

पुलिस वालों की यह भाषा उनके चरित्रा और मुजरिमों से उनका अपराध् कबूल कराने के उनके ढंग का सही ख़्ााका खींचती है। इसी प्रकार रमानाथ के दफ्ऱतर का एक चपरासी सरकारी रुपये अपने पास रखने की जि़म्मेदारी से इनकार करता हुआ कहता है-''नहीं बाबू साहब, मैं यहाँ रुपये नहीं रखने दूँगा। सब घड़ी बराबर नहीं जाती। कहीं रुपये उठ जाएँ तो मैं बेगुनाह मारा जाऊँ। सुभीते का ताला भी तो नहीं है यहाँ। स्पष्ट है कि 'गबन की भाषा में पात्राानुकूल स्वाभाविकता है जो प्रेमचंद की भाषायी पकड़ के साथ-साथ सभी चरित्राों में गहरी पैठ की भी सूचक है।

प्रेमचंद आम जनता के लेखक थे। उन्होंने उनकी भाषा में उन्हीं की समस्याओं को प्रस्तुत किया। इसलिए उनकी भाषा में जिस शब्द-समूह का प्रयोग हुआ है, वह भी जनसाधरण की भाषा का है। उनकी भाषा में वह स्वाभाविकता और सहजता है, जो सोच-समझकर प्रयोग नहीं की जाती। यही कारण है कि प्रेमचन्द की अन्य Ñतियों की भाँति 'ग़बन में भी तत्सम, तदभव, देशज और विदेशी सभी शब्दों का प्रयोग हुआ है। जहाँ इस उपन्यास में मार्मिक, आनन्द, अनुराग, कातर, प्रसन्न, पुरुषार्थ, त्रिया, आकांक्षा, रोदन, विÑत जैसे तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है, वहीं टीम-टाम, अकारथ, कलेवा, कनबतियाँ, लहलहाना, संदूकची, जड़ाऊ, सुलगना, मुरझाना जैसे देशज और तदभवशब्दों की भी बहुतायत है। चूँकि प्रेमचंद का आरंभिक लेखन उदर्ू में था इसलिए हिन्दी-लेखन में भी उदर्ू शब्दों का आना स्वाभाविक ही था। 'ग़बन में भी आर्इना, सूरत, तकाज़े, तहरीर, शहादत, जिरह, ज़हीन, इलजाम, रंजीदा, तरíुद, शुबहा, सबब आदि अरबी-पफारसी शब्दों का इतनी सहजता से प्रयोग हुआ है कि वह आम आदमी की भाषा प्रतीत होती है। इसी प्रकार अल्टरनेटिव, गवर्नमेंट, डाइरक्टरी, डिग्री, एप्रूवर, प्राउड आदि अंग्रेजी शब्द भी भाषा में घुले-मिले हैं।

मुहावरे और लोकोकितयाँ भाषा के वे अवयव हैं, जो उसे अधिक प्रभावशाली और मार्मिक बनाते हैं। इनमें प्रयुक्त सीध्े-सरल शब्द भी इतने अर्थव्यंजक हो उठते हैं कि कथ्य बहुत गहरा और पैना हो जाता है। 'ग़बन में भी आम आदमी द्वारा प्रयुक्त मुहावरों और लोकोकितयों का इतना व्यापक और सटीक प्रयोग हुआ है कि वे कहीं भी आरोपित नहीं जान पड़ते। रमानाथ की उच्छृंखलता से चिंतित पिता दयानाथ को ढांढस बंधती रामेश्वरी का यह कथन देखिए-''रामेश्वरी को अपने विवाह की बात याद आयी। दयानाथ भी तो गुलछर्रे उड़ाते थे, लेकिन उसके आते ही उन्हें चार पैसे कमाने की पि़फक्र कैसी सिर पर सवार हो गयी थी। ...बोली-''बहू आ जायेगी, तो उसकी आँखें भी खुलेंगी... जब तक गले में जुआ नहीं पड़ा है, तभी तक यह कुलेलें हैं। जुआ पड़ा और सारा नशा हिरन हुआ।

इस एक संवाद में प्रयुक्त गुलछर्रे उड़ाना, सिर पर सवार होना, आँखें खुलना, गले में जुआ पड़ना, कुलेंले करना, नशा हिरन होना आदि मुहावरों का एक साथ प्रयोग जहाँ एक ओर रामेश्वरी जैसी आम गृहिणी द्वारा प्रयुक्त भाषा का नमूना प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर अर्थ को अधिक सार्थक एवं व्यंजक बनाता है। यही नहीं 'ग़बन में ऐसे अनेक प्रसंग और स्थल हैं जहाँ 'मन डाल-डाल दौड़ना, मेंढकी को जुकाम, कंगाल को पारस मिलना, भीगी बिल्ली बनना, आटे-दाल का भाव मालूम होना, मुँह देखे की प्रीत, आँख ओट पहाड़ ओट, जले पर नमक छिड़कना, मियाँ की जूती मियाँ के सिर, तबेले की बला बंदर के सिर आदि मुहावरों और लोकोकितयों का प्रयोग इस उपन्यास की भाषा को सहजता एवं अर्थवत्ता प्रदान करते हैं। किसी भाषा के शब्द भंडार को समृ( करने में मुहावरों और लोकोकितयों के अतिरिक्त सूकितयों का भी महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। सूकितयाँ जीवन की वास्तविकताओं और अनुभवों पर आधरित वे यथार्थ कथन होते हैं, जो अपने भीतर गहरा अर्थ लिये होते हैं। प्रेमचंद मानव जीवन के पारखी थे, अत: उनकी Ñतियों में सूकितयों का अथाह भण्डार अनायास ही देखा जा सकता है। 'ग़बन भी इसका अपवाद नहीं है। उपन्यास में अपने कथन को पुष्ट करने, पात्राों की मन:सिथतियों को उजागर करने अथवा सिथतियों को उनके यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने के लिए 'ग़बन में कर्इ सूकितयों का प्रयोग लेखक ने किया है। उदाहरण-स्वरूप कुछ सूकितयाँ इस प्रकार हैं-

1. अनुराग स्पूफर्ति का भंडार है।

2. जो अपना पेट भी न पाल सके उसे जीते रहने का, दूसरों का बोझ बनने का कोर्इ हक नहीं है।

3. हम क्षणिक मोह और संकोच में पड़कर अपने जीवन के सुख और शांति का कैसे होम कर देते हैं।

4. यौवन में प्रेम की क्षुध इतनी नहीं होती, जितनी आत्मप्रदर्शन की।

भाषा यदि विचारों और भावों के संप्रेषण का साध्न है, तो शैली उसकी प्रस्तुति की प(ति। लेखक अपनी रुचि और कथ्य की आवश्यकता के अनुसार अनेक शैलियों का प्रयोग अपनी रचना में करता है। उपन्यासों में प्राय: वर्णनात्मक, विवेचनात्मक, विश्लेषणात्मक, शैलियों का प्रयोग देखा जाता है। 'ग़बन में प्रेमचंद ने मुख्य रूप से वर्णनात्मक, विवेचनात्मक, काव्यात्मक और संवाद शैलियों का प्रयोग करते हुए कथा को विस्तार दिया है। वर्णनात्मक शैली में लेखक विविध् पात्राों, घटनाओं और सिथतियों का वर्णन करता है। पुत्रा के विवाह में अपनी हैसियत से बढकर खर्च करने के पश्चात वास्तविकताओं से दो-चार होते दयानाथ की मनोदशा का वर्णन लेखक ने इस प्रकार किया है-''महाशय दयानाथ जितनी उमंगों से ब्याह करने गये थे, उतना ही हतोत्साह होकर लौटे। दीनदयाल ने खूब दिया, लेकिन वहाँ से जो कुछ मिला, वह सब नाच-तमाशों, नेग-चार में खर्च हो गया। बार-बार अपनी भूल पर पछताते, क्यों दिखावे और तमाशे में इतने रुपये खर्च किये। ये पंकितयाँ सिथतियों के वर्णन के साथ-साथ कथा में आगे आने वाले मोड़ की भी संकेतक हैं।

विवेचनात्मक शैली में लेखक प्रस्तुत पात्राों, सिथतियों और घटनाओं का विवेचन करता है। अपने पति वकील साहब की बिगड़ती सिथति वर्णन करते हुए रतन जालपा को पत्रा लिखती है। इस पत्रा में लेखक ने होने वाले अनिष्ट की शंका से कंपित रतन के âदय की मानसिक अवस्था का चित्राण करते हुए कहा है-''बहन, नहीं कह सकती, क्या होने वाला है-दिल घबड़ा रहा है बहन, जी चाहता है, थोड़ी सी संखिया खाकर सो रहूँ। विधता को संसार दयालु, Ñपालु, दीनबंध्ु और जाने कौन-कौन सी उपलबिध्याँ देता है। मैं कहती हूँ उससे निर्दयी, निर्मम, निष्ठुर कोर्इ शत्राु भी नहीं हो सकता... जिस दंड का हेतु ही हमें मालूम न हो, उस दंड का मूल्य ही क्या। वह तो जबरदस्त की लाठी है, जो आघात करने के लिए कोर्इ कारण गढ़ लेती है।

पत्राात्मक शैली का प्रयोग भी 'गबन में अनेक स्थानों पर हुआ है। जैसे रमानाथ द्वारा घर छोड़ने से पूर्व अपने मन के ऊहापोह और विचारों के अंतर्मथन की सूचना पत्रा द्वारा देना, जालपा द्वारा अपनी सखियों को पत्रा लिखकर अपने विवाहित जीवन के विषय में बताना, रतन द्वारा जालपा को पत्रा लिखकर अपने पति के बिगड़ते स्वास्थ्य के विषय में सूचित करना और रमानाथ को अपने निर्दोष होने की सूचना जालपा के पत्रा से प्राप्त होना आदि।

इसी प्रकार काव्यात्मक शैली का प्रयोग उपन्यास की कथात्मकता में सरसता का संचार करता है। 'ग़बन का आरम्भ लेखक ने इसी शैली में किया है-''बरसात के दिन हैं, सावन का महीना। आकाश में सुनहरी घटाएँ छायी हुर्इ हैं। रह-रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है... ये पफुहारें मानो चिन्ताओं को âदय से धे डालती हैं, माना मुरझाये हुए मन को भी हरा कर देती हैं। इसी प्रकार उपन्यास के अंत में मृतप्राय रतन की दशा का वर्णन अत्यंत âदयग्राही है, मानो एक चित्रा साकार हो गया हो-''वह सूर्य मुखी का-सा खिला हुआ चेहरा मुरझाकर पीला हो गया था। वह रंग जिन्होंने चित्रा को जीवन और स्पन्दन प्रदान कर रखा था, उड़ गये थे, केवल आकार शेष रह गया था। वह श्रवणप्रिय, प्राणप्रद, विकास और आÈाद में डूबा हुआ संगीत मानो आकाश में विलीन हो गया था।

संवाद शैली को भी इस उपन्यास में पर्याप्त स्थान मिला है। इस शैली के प्रयोग से कथा में रोचकता और प्रभविष्णुता का समाहार हुआ है। 'ग़बन के अधिकांश संवाद संक्षिप्त, कथा-विकास में सहायक और पात्राों की चरित्रागत विशेषताओं को उभारने वाले हैं। जालपा और रमानाथ के प्रेम-प्रसंग, दयानाथ और रमानाथ की पारस्परिक नोक-झोंक, रमानाथ और देवीदीन के आत्मपरिचयात्मक विवरण, जालपा और रतन तथा जोहरा और रमानाथ का चरित्राांकन संवादों के माèयम से ही हुआ है। इसी प्रकार दारोगा और देवीदीन तथा दारोगा और रमानाथ के संवाद संक्षिप्त और सारगर्भित हैं। एकाध् अपवाद को छोड़कर संक्षिप्तता और सार्थकता की दृषिट से 'ग़बन की संवाद योजना का विशिष्ट स्थान है। कहीं-कहीं हास्य-व्यंग्य से युक्त चटपटे और रोचक संवादों ने उपन्यास की शैली को पूर्णता प्रदान की है।

प्रमुख स्थलों की व्याख्या

1. ''मुंशी दीनदयाल उन आदमियों में से थे, जो सीधें के साथ सीध्े होते हैं, पर टेढ़ों के साथ टेढ़े ही नहीं, शैतान हो जाते हैं। दयानाथ बड़ा सा मुँह खोलते, हजारों की बातचीत करते, तो दीनदयाल उन्हें ऐसा चकमा देते कि वह उम्र भर याद करते। दयानाथ की सज्जनता ने उन्हें वशीभूत कर लिया।

प्रसंग-प्रस्तुत गधांश युग और समाज की सच्चार्इ को व्यक्त करने वाले महान उपन्यासकार प्रेमचन्द द्वारा लिखित 'ग़बन नामक उपन्यास से लिया गया है। मèयवर्गीय समाज की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं को इस उपन्यास में बहुत ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास के प्रमुख पात्रा रमानाथ और जालपा के विवाह से पूर्व उन दोनों के परिवार में विवाह-संबंध्ी, विशेष रूप से दहेज से सम्बनिध्त जो प्रतिक्रियाएँ थीं, उनकी प्रस्तुति इन पंकितयों के माèयम से की गर्इ है।

व्याख्या-मुंशी दीनदयाल जालपा के पिता हैं। अर्थ की दृषिट से प्राय: सम्पन्न और व्यवहार में सीध्े और स्पष्ट रहते हैं। वे अच्छे लोगों की प्रत्येक बात को स्वीकार करते हैं लेकिन जहाँ भी उन्हें किसी की चालाकी का आभास हो जाए, तो वे अपने व्यवहार से उसे सीध करने में कोर्इ भी कोर-कसर बाकी नहीं रखते। उसके लिए वे मानो 'शैतान हो जाते हैं। जब उनकी पुत्राी जालपा के विवाह की बात दयानाथ के बेटे रमानाथ से चली, तो पैसों के लेन-देन की भी बात आयी। ऐसे में अगर दयानाथ पुत्रा के पिता होने के नाते लंबी-चौड़ी माँग रखते तो, निश्चय ही दीनदयाल उनका दिमाग ठिकाने लगा देते, लेकिन जब उन्होंने देखा कि लड़के वालों की ओर से कोर्इ भी माँग नहीं है, तो वे उनकी सज्जनता को स्वीकार करके, शांत हो गए। उनके इस सदव्यवहार से इतना प्रभावित हुए कि जहाँ वे विवाह में केवल एक हजार रुपये देने की बात सोच रहे थे, वहाँ टीके (सगार्इ) में ही उन्होंने एक हजार रुपये दे दिए।

विशेष-इन पंकितयों में प्रमुख रूप से जालपा के पिता और रमानाथ के पिता के चरित्रा का प्रस्तुतीकरण हुआ है। रमानाथ के पिता एक सज्जन पुरुष हंै और परिसिथतियों से अनुचित लाभ उठाना उन्हें गलत लगता है। जालपा के पिता उनके इस व्यवहार से प्रभावित होकर अपनी सज्जनता का परिचय देते हैं।

पात्राों के चरित्रा को स्पष्ट करते हुए, प्रस्तुत गधांश में प्रेमचंद की भाषा सरल, सहज और व्यावहारिक रही है। मुहावरे इस गधांश की जान है। 'सीधें के साथ सीध्े, टेढ़ों के साथ टेढ़े, बड़ा सा मुँह खोलना, चकमा देना-आदि के माèयम से पंकितयों का शिल्प-सौष्ठव बढ़ा है।   

 2. नाटक उस वक्त 'पास होता है, जब रसिक समाज उसे पसन्द कर लेता है। बारात का नाटक उस वक्त पास होता है, जब राह चलते आदमी उसे पसन्द कर लेते हैं। नाटक की परीक्षा चार-पाँच घण्टे तक होती रहती है, बारात की परीक्षा के लिए केवल इतने ही मिनटों का समय होता है। सारी सजावट, सारी दौड़-ध्ूप और तैयारी का निबटारा पाँच मिनटों में हो जाता है। अगर सबके मुँह से 'वाह वाह निकल गया, तो तमाशा पास, नहीं पफेल! रुपया, मेहनत, पिफक्र, सब अकारथ।

प्रसंग-प्रेमचन्द द्वारा लिखित 'ग़बन उपन्यास समाज के मèयवर्ग की अनेक समस्याओं को प्रस्तुत करता है। जिनका एक पक्ष है-विवाह में किया गया आर्थिक दुरुपयोग। विवाह के समय लड़के की बारात एक नाटक के समान है। यहाँ लेखक ने रंगमंच पर प्रस्तुत किए जाने वाले नाटक और बारात के नाटक का तुलनात्मक रूप प्रस्तुत किया है।

व्याख्या-नाटक एक दृश्य काव्य हंै और रसिक-समाज, यानि जो इसका आनन्द उठाना चाहते हैं, उनके लिए नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है। उस नाटक की सपफलता इसी बात में निहित होती है कि दर्शक उसे इतना पसन्द करें कि उनके मुँह से अनायास ही 'वाह वाह निकले। प्राय: नाटक तीन-चार घंटे के होते हैं और अंतिम दृश्य तक अगर नाटक की प्रस्तुति दर्शक को जिज्ञासा और आनंद से बाँध्े रखती है तो नाटक सपफल कहलाता है। दूसरी ओर बारात का 'नाटक है। इसकी तैयारी भी असली नाटक की तरह बहुत समय पहले से ही शुरू हो जाती है। पैसों को जितना खुले हाथों लुटाया जाय, इस नाटक में उतना ही आनंद आता है। बाजे-गाजे, पफुलवारियों के तख्त, जगह-जगह छूटती हुर्इ हवाइयाँ, आतिशबाजी आदि राह-चलते लोगों का मनोरंजन करती हैं। अगर यह सारा ध्ूम ध्ड़ाका लोगों को पसंद आ गया तो समझो नाटक सपफल है।

यहाँ इन पंकितयों के माèयम से बारात की तैयारी में की गर्इ पिफजूलखर्जी पर व्यंग्य किया गया है। बाáाडम्बर मèयवर्गीय समाज की ऐसी मनोवृत्ति है, जो उसके अपने ही संकट का कारण बनती है। रमानाथ की इच्छापूर्ति के लिए दयानाथ इस दिखावे में न चाहते हुए भी पूरा साथ देते हैं और इसी के कारण उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ता है।

विशेष-किसी साधरण बात को असाधरण ढं़ग से प्रस्तुत करने में प्रेमचन्द सपफल रहे हैं। यहाँ बारात से नाटक की तुलना करने में भाषा सरल, व्यावहारिक और तर्कसंगत है।

3. ''यह मान-सम्मान उसी वक्त तक है, जब तक किसी के सामने मदद के लिए हाथ नहीं पफैलाता। यह आन टूटी, पिफर कोर्इ बात भी न पूछेगा। कोर्इ ऐसा भलामानस न दीखता था, जो सब कुछ बिना कहे ही जान जाय और उसे कोर्इ अच्छी-सी जगह दिला दे। आज उसका चित्त बहुत खिन्न था। मित्राों पर ऐसा क्रोध् आ रहा था कि एक-एक को पफटकारे, आयें तो द्वार से दुत्कार दे।

प्रसंग-प्रस्तुत गधांश प्रेमचंद के सामाजिक उपन्यास 'ग़बन में से लिया गया है। आभूषण-मंडित संसार में पत्नी जालपा के गहने जब स्वयं उसके पति रमानाथ के द्वारा उठा लिए जाते हैं, तो वह बहुत दु:खी और चिंतित रहने लगती है। उसकी परेशानी दूर करने के लिए रमानाथ नौकरी की तलाश में इध्र-उध्र मारा पिफरता है, लेकिन सपफलता हाथ नहीं लगती। उसकी इसी मन:सिथति का इन पंकितयों में वर्णन किया गया है।

व्याख्या-अगर कोर्इ व्यकित अपने मान-सम्मान को बचाए रखना चाहता है तो उसकी पहली शर्त है कि उसे किसी के सामने झुकना न पड़े, किसी भी सिथति में नहीं। हाथ पफैलाना यानि कुछ माँगना यानि झुकना-इस सिथति में किसी के आगे छोटा बनना पड़ता है। ऐसी सिथति आने के बाद तो कोर्इ पास भी नहीं आना चाहेगा। रमानाथ के अनेकानेक कहे जाने वाले मित्रा तो अनेक थे, पर उसके मन की बात जानकर उसका अपना कह जाने वाला कोर्इ भी 'मित्रा न था। इसी बात को बार-बार सोचकर रमानाथ बहुत ही परेशान हो रहा था। अपने इन दोस्तों पर उसे बहुत क्रोध् आ रहा था। उसका दिल चाह रहा था कि वह ऐसे प्रत्येक व्यकित को दरवाजे से ही भगा दे जो उसका अपना मित्रा बनने का ढाेंग कर रहे थे।

विशेष-सामाजिक समस्या प्रधन इस उपन्यास में प्रेमचंद ने कथानायक रमानाथ के चित्त का मनोवैज्ञानिक चित्राण प्रस्तुत किया है। समय की मार से व्यकित किस प्रकार बैचैन हो जाता है-इसका लेखक ने अत्यंत सहज, सरल शब्दावली में वर्णन किया है।

4. उन्नत देशों में ध्न व्यापार में लगता है जिससे लोगों की परवरिश होती है और ध्न बढ़ता है। यहाँ ध्न श्रृंगार में खर्च होता है, उसमें उन्नति और उपकार की जो दो महान शकितयाँ हैं, उन दोनों ही का अन्त हो जाता है। बस यही समझ लो कि जिस देश के लोग जितने मूर्ख होंगे, वहाँ जेवरों का प्रचार भी उतना अधिक होगा।

प्रसंग-ये पंकितयाँ प्रेमचंद के प्रसि( उपन्यास 'ग़बन से ली गर्इ हैं। प्रस्तुत उपन्यास की मूल संवेदना मèयवर्गीय नारियों में व्याप्त आभूषणप्रियता से जुड़ी हुर्इ हैं। इस प्रवृत्ति के कारण समाज की अर्थ-व्यवस्था भी बहुत प्रभावित होती है-इसी भाव की प्रस्तुति इन पंकितयों के माèयम से की गर्इ है।

व्याख्या-रमानाथ का मित्रा रमेश उसे समझाता हुआ कहता है कि आभूषण-प्रेम अपने आप में बुरार्इ नहीं है। पर उससे पहले अपनी आर्थिक सिथति अवश्य देखनी चाहिए। भारत मूलत: एक ऐसा देश है जिसका आम आदमी अपनी जरूरत को ही कठिनार्इ से पूरा कर पाता है, ऐसे में गहनों की चाह रखना, अपने को कर्जे के बोझ से दबाना है। अर्थ की दृषिट से विकसित देशों में ध्न को व्यापार में लगाया जाता है, जिससे ध्न तो बढ़ता ही है देश प्रगति के पथ पर भी बढ़ता जाता है। लेकिन भारत में यह ध्न श्रृंगार आदि में लगाया जाता है जिससे आर्थिक प्रगति में बाध उत्पन्न होती है। वास्तव में गहनों का अत्यधिक आकर्षण मूर्खता की निशानी है क्योंकि यह तो अपने ही हाथों अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने वाली बात है।

विशेष-थोड़े शब्दों में ही सहजता से गंभीर बात को प्रस्तुत करने में प्रेमचन्द सदैव सपफल रहे हैं। यहाँ भी दो मित्राों की पारस्परिक बातचीत के माèयम से देश की आर्थिक दशा के लिए उत्तरदायी सामाजिक वृत्ति को अत्यंत स्वाभाविक शब्दावली में प्रस्तुत किया गया है।

5. हम क्षणिक मोह और संकोच में पड़कर अपने जीवन के सुख और शानित कैसे होम कर देते हैं। अगर जालपा मोह के इस झोंके में अपने को सिथर रख सकती, अगर रमा संकोच के आगे सिर न झुका देता, दानों के âदय में प्रेम का सच्चा प्रकाश होता, तो वे पथ-भ्रष्ट होकर सर्वनाश की ओर न जाते।

प्रसंग-प्रेमचन्द Ñत गबन उपन्यास के प्रमुख पात्रा रमानाथ और जालपा जब विपत्ति के भँवर में पफँस जाते हैं तो उनकी मानसिक दशा किस प्रकार की होती है, इसी का सटीक वर्णन इन पंकितयों में प्रस्तुत किया गया है।

व्याख्या-व्यकित के जीवन में थोड़े से समय के लिए मोह या संकोच का भाव जागृत होता है, अगर वह उसे पहचानकर उस पर विजय पा लेता है तो उसका संकट टल जाता है, लेकिन अगर वह इनके चक्कर में आ जाता है तो उसके जीवन से सुख और शांति स्वयं उसके ही हाथों नष्ट हो जाती है। जालपा के मन में आभूषणों के प्रति बहुत ही आकर्षण था। अगर वह इस लालसा को नियंत्राण में रखती तो निश्चय ही वह एक सुखी जीवन जी रही होती, क्योंकि उसके जीवन में विपत्ति का मूल कारण उसका आभूषण प्रेम ही था। दूसरी ओर रमानाथ सदा ही सत्य बताने में संकोच करता रहा। अगर वह ऐसा न करता तो उसके जीवन में गबन जैसी घटना भी न घटी होती। वास्तव में उसे जालपा को पहले ही अपनी आर्थिक दशा की वास्तविकता बता देनी चाहिए थी, पर वह सदैव यह अपनी पत्नी से छुपाता ही रहा। पति-पत्नी के संबंध् में एक खुलापन अपेक्षित होता है। इसके मूल में सच्चे प्रेम की भावना रहती है। पर रमानाथ और जालपा के संबंधें में संभवत: प्रेम का वह उज्जवल प्रकाश नहीं था, जिसकी चमक में दोनों एक दूसरे को पहचान पाते। इस अभाव के कारण दोनों ही विपत्ति के भँवर में निरन्तर डूबते चले गए।

विशेष-जीवन के दार्शनिक पक्ष के उदघाटन के द्वारा उपन्यास के पात्राों की वर्तमान सिथति, और उसके माèयम से भविष्य की आशंका व्यक्त की गर्इ है। इन पंकितयों में रमानाथ और जालपा के चरित्रा की न्यूनताओं को भी देखा जा सकता है। भाव गंभीर लेकिन भाषा सहज और प्रवाहमयी है।

6. रमा ने इस पत्रा को भी पफाड़कर पेंफक दिया और कुर्सी पर बैठकर दीपक की ओर टकटकी लगाकर देखने लगा। दीपक उसे दिखार्इ देता था, इसमें संदेह है। इतनी ही एकाग्रता से वह कदाचित आकाश की काली, अभेध् मेघराशि की ओर ताकता! मन की एक दशा वह भी होती है, जब आँखें खुली होती हैं और कुछ नहीं सूझता, कान खुले होते हैं और कुछ सुनार्इ नहीं देता।

प्रसंग-प्रेमचन्द ने अपने 'ग़बन नामक उपन्यास में सामाजिक समस्याओं का विस्तार से वर्णन किया है। समस्या का एक रूप है, आवश्यकता से अधिक ध्न-खर्च। इसका परिणाम सदैव दुखद ही होता है। कथानक रमानाथ अपनी इसी भावना के कारण किस प्रकार संकट में पड़ता है, इन पंकितयों में उसी का मनोवैज्ञानिक अंकन किया गया है।

व्याख्या-रमानाथ ने रतन के पैसे लौटाने के लिए अपने मित्राों के पास सहायता माँगी, पर सभी ने किसी न किसी बहाने से इन्कार कर दिया। रमेश ने पत्रा लिखकर स्पष्ट किया कि वह मित्राों के बीच ध्न के लेन-देन को अनुचित समझता है क्योंकि इससे पारस्परिक विरोध् ही बढ़ता है। इस पत्रा को पफाड़कर पेंफकने के बाद रमानाथ बहुत ही चिंता में पड़कर सामने रखे दीपक की ओर èयान से देखने लगा। प्राय: परेशानी में पड़कर व्यकित अपने चेतन से कट जाता है। ऐसे में विचारों में गहनता से लीन होने के कारण वह यह भी नहीं जान पाता कि वह क्या कर रहा है। रमानाथ की इस समय ऐसी ही अवस्था थी। वह दीपक देख तो रहा था, पर मन कहीं और होने के कारण वह संभवत: यह नहीं जान पा रहा था कि वह दीपक की ओर लगातार देख रहा है। उसकी इसी मानसिक दशा पर लेखक टिप्पणी करता है कि वह इस समय जितनी तल्लीनता से अपनी परेशानी के बारे में सोच रहा था, उतनी ही एकाग्रता से अपने जीवन रूपी आकाश में छायी मेघघटा जैसी विपत्ति को जान पाता, तो निश्चय संकट टल सकता था।

रमानाथ की इस आन्तरिक दशा को प्रस्तुत करते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं कि मन की इसी बेचेनी और उद्विग्नता की सिथति में आँखें सामने के दृश्य को देखकर भी नहीं देख रही होती हैं और कानों में किसी èवनि के सुनने पर भी उस ओर èयान नहीं जाता है।

विशेष-रमानाथ की मानसिक चिंतातुर सिथति का अत्यंत सजीव एवं सटीक वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

7. जिस देश में सित्रायों की जितनी अधिक स्वाध्ीनता है, वह देश उतना ही सभ्य है। सित्रायों को कैद में, या परदे में, या पुरुषों से कोसों दूर रखने का तात्पर्य यही निकलता है कि आपके यहाँ जनता इतनी आचार-भ्रष्ट है कि सित्रायों का अपमान करने में जरा भी संकोच नहीं करती।

प्रसंग-प्रस्तुत पंकितयों प्रेमचन्द द्वारा लिखित उपन्यास 'ग़बन से ली गर्इ हैं। प्रस्तुत संवाद रतन के पति वकील इन्द्रभूषण द्वारा कहा गया है जिसमें सित्रायों की वर्तमान दशा पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किया गया है।     

 व्याख्या-रमानाथ के यह कहने पर कि 'योरप में सित्रायों का आचरण बहुत अच्छा नहीं है, वकील इन्द्रभूषण कहता है कि सित्रायों को स्वाध्ीनता देने से देश का गौरव बढ़ता है। क्योंकि स्वाध्ीनता उनके व्यकितत्व में निखार लाती है, उन्हें उन्नति के नए-नए अवसर प्रदान करती है। अत: देश की सभ्यता के विकास के लिए सित्रायों को स्वतंत्रा चिंतन, मनन और आचरण का पूरा अधिकार मिलना ही चाहिए। सित्रायों को अनुशासन और सामाजिक मर्यादा के नाम पर कैद करना, परदे में रखना या पुरुषों से अलग करना उनका अपमान है। सित्रायों को अगर स्वतंत्रा जीवन जीने की प्रेरणा दी जाय तो वे भी पुरुषों के समान राजनीति, ध्र्म-कला, साहित्य आदि विभिन्न देशों में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर सकती हैं।

यहाँ वकील के इस संवाद के माèयम से प्रेमचन्द की नारी विषयक भावना को स्पष्टत: जाना जा सकता है। वे गाँध्ी जी की भाँति स्त्राी-स्वाध्ीनता के समर्थक थे और अवसर मिलने पर वे अपने इन आदर्श विचारों की प्रस्तुति अवश्य करते थे।

विशेष-एक वकील के माèयम से प्रस्तुत यह संवाद तार्किक एवं चुस्त भाषा शैली का उत्Ñष्ट उदाहरण है।

8. रुदन में कितना उल्लास, कितनी शांति, कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर किसी की स्मृति में, किसी के वियोग में, सिसक-सिसक और बिलख-बिलख नहीं रोया, वह जीवन के ऐसे सुख से वंचित है, जिस पर सैकड़ों हंसियाँ न्यौछावर हैं। उस मीठी वेदना का आनंद उन्हीं से पूछो, जिन्होंने यह सौभाग्य प्राप्त किया है। हँसी के बाद मन खिन्न हो जाता है, आत्मा क्षुब्ध् हो जाती है, मानो हम थक गए हों, पराभूत हो गए हों। रुदन के पश्चात एक नवीन स्पूफर्ति, एक नवीन जीवन, एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है।

प्रसंग-प्रस्तुत पंकितयाँ प्रेमचन्द के उपन्यास ग़बन से उदगृहीत हैं। घर से दूर चले गए रमानाथ की खोज के लिए जालपा जब शतरंज की एक पहेली समाचार-पत्रा के माèयम से प्रकाशित करवाती है तो उसका उत्तर मिलने पर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। 'प्रजा-मित्रा नामक समाचार पत्रा के कार्यालय से प्राप्त पत्रा को पाकर जालपा की जो मानसिक दशा होती है, इन पंकितयों में उन्हीें का चित्राण किया गया है।

व्याख्या-रमानाथ को जब जालपा किसी भी प्रकार न ढूँढ़ पार्इ तो शतरंज की पहेली ही उसे एक ऐसा उपाय सूझा, जिसके माèयम से वह अपने खोए पति का पता पा सकती थी, पर उसे इसकी सपफलता में संदेह था। अत: जब कार्यालय से उसके पास पत्रा पहुँचा तो वह अपनी इस 'आशातीत सपफलता पर प्रसन्नता के मारे रो उठी। रुदन यानि रोना-व्यकित के जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके माèयम से मन की आकुलता, व्यर्थ के आवेग आँसुओं के रूप में बाहर आ जाते हैं और मन उल्लास और शांति भाव से पूर्ण हो जाता है। लेखक का विचार है जीवन में व्यकित जब किसी की याद में रोता है, या पिफर उससे किसी प्रिय का वियोग सहन नहीं होता है, तो यह सिथति दुख का कारण अवश्य बनती है, पर इसके साथ ही प्रेम और अपनेपन की अनमोल भावना भी छुपी हुर्इ है। जो इन अनुभवों से परे है, या जिसने अपने जीवन में कभी प्रेम की तड़प को अनुभव ही नहीं किया है, उसका जीवन, उसकी हँसी एकदम व्यर्थ है। प्रिय की स्मृति में âदय जीवन की अनमोल पूँजी है। हँसी का भाव थोड़े समय के लिए है पर रोने के बाद एक नर्इ जीवन चेतना का आभास होता है और इसे वही अनुभव कर सकता है जो इसकी प्रक्रिया से गुजर चुका हो।

विशेष-हँसी से अधिक जीवन में रुदन का महत्त्व है, क्योंकि वह मनोवैज्ञानिक दृषिट से व्यकित के जीवन को तो संतुलित करता है साथ ही उसमें प्रेम की गहरार्इ का भी परिचायक है। इस भाव को लेखक ने अत्यंत सहज, व्यावहारिक भाषा के माèयम से प्रस्तुत किया है।  

अन्य व्याख्या योग्य प्रसंग

1. वह लालसा जो आज ................................ अवलम्बर भी छीन लिया। (पृ. 10)

2. उसकी आँखें भर आयीं ............................. असá थी। (पृ. 21)

3. उस वक्त यदि रमा ने ............................... प्रहार किया हो। (पृ. 85)

4. मेरे âदय में जितना प्रेम ............................. छोटी बात है। (पृ. 136)

5. बुढि़या के प्रति आज रमा ........................... मनस्वी है। (पृ. 164)

6. यहाँ आकर अनुभव होता है ....................... नहीं हो गया है। (पृ. 167)

7. विधता को संसार दयालु ............................ बाँह पकड़ेगा। (पृ. 177)

8. मानव-जीवन की सबसे महान .................... आश्चर्य है। (पृ. 181)