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1 पाठ-1 वेद का परिचय एवं महत्त्व

पाठ-1

वेद का परिचय एवं महत्त्व

वेद भारतीय èार्म, दर्शन और संस्कृति के मूल आèाार हैं। 'वेद के अन्तर्गत अनेकों ग्रन्थ आते हैं जिनको ही 'वैदिक साहित्य  कहा जाता है। वैदिक साहित्य को विश्व के प्राचीनतम साहित्य होने का गौरव प्राप्त है। भारतीयों के आचार-विचार, रहन-सहन, èार्म-कर्म को भली-भांति समझने के लिए वेद का ज्ञान परम आवश्यक है। आèाुनिक सन्दर्भ में भी ज्ञान-विज्ञान के आदिस्रोत के रूप में वेद के अèययन की महत्ता स्वीकार की जातीहै।

1. 'वेद का अर्थ

'वेद शब्द ज्ञान अर्थ वाली विद धातु से घ×ा प्रत्यय लगकर बना है, इसलिए इसका शास्त्राीय अर्थ है 'ज्ञान। वेद वह ज्ञान-राशि है, जिससे विद्वान परमात्मा और जगत का स्वरूप जानते हैं। प्राचीन ऋषियों द्वारा अर्जित किये गये समस्त ज्ञान के संग्रहभूत ग्रन्थों को भी 'वेद ही कहते हैं। अत: 'वेद शब्द वैदिक ग्रन्थों में प्रतिपादित ज्ञान का वाचक होने के साथ ही सम्पूर्ण वैदिक वा³मय का भी बोèाक है।

एक दूसरी व्याख्या के अनुसार 'वेद शब्द चार èाातुओं से विभिन्न अथो± में बनता है:-

1. विद सत्तायाम, 2. विद ज्ञाने, 3. विद विचारणे, और 4. विद लाभे। इन अथो± का समन्वय करते हुए ऋक-प्रातिशाख्य की व्याख्या में विष्णुमित्रा ने वेद का अर्थ किया है-

विधन्ते ज्ञायन्ते लभ्यन्ते एभिर्धर्मादि-पुरुषार्था इति वेदा:।

अर्थात वेद का भावार्थ है-

(1) जिन ग्रन्थों से èार्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी पुरुषाथो± के असितत्व का बोèा होता है;

(2) जिन ग्रन्थों से इन चारों पुरुषाथो± का ज्ञान होता है;

(3) जिन ग्रन्थों से इन चारों पुरुषाथो± की प्रापित होती है;

(4) जिन ग्रन्थों में इन चारों पुरुषाथो± का विवेचन किया जाता है।

तात्पर्य है कि 'वेद पुरुषार्थ-चतुष्टय का विवेचन करने वाले ग्रन्थ हैं।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेद-भाष्य-भूमिका में 'वेद शब्द की व्याख्या में लिखा है-'जिनके द्वारा या जिनमें सारी सत्यविधाएं जानी जाती हैं, विधमान हैं या प्राप्त की जाती हंै, वे वेद हैं।

2. वेद की परिभाषा

वेद के सुप्रसिद्ध भाष्यकार आचार्य सायण के अनुसार वेद इष्ट-प्रापित और अनिष्ट-परिहार के अलौकिक उपाय को बताने वाले ग्रन्थ हैं-

इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयो: अलौकिकम उपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेद:।

-तैत्तिरीयसंहिता, सायणभाष्यभूमिका

'वेद का 'वेदत्व इसी में है कि वे उस उपाय का ज्ञान कराते हैं, जिसको प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं जाना जा सकता।      

प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुèयते।

एतं विदनित वेदेन तस्माद वेदस्य वेदता।।

-ऐतरेय ब्राह्राण, सायणभाष्यभूमिका

मनु ने वेद को पितरों, देवों तथा मनुष्यों का सनातन एवं सर्वदा विधमान रहने वाला चक्षु कहा है-

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षु: सनातनम।

-मनुस्मृति

वस्तुत: वेद सर्वज्ञानमय हैं। वे मानव मात्रा के कर्तव्य-बोèा का आèाार हैं। अलौकिक तत्त्वों के रहस्य को जानने में वेद की परम उपयोगिता है।

वेद की स्वरूपपरक एक परिभाषा है-

मन्त्राब्राह्राणात्मक: शब्दराशिर्वेद:।

तदनुसार वेद वह शब्दराशि है जिसमें मन्त्राों और ब्राह्राणवाक्यों का समन्वय होता है।

3. 'वेद के कुछ दूसरे नाम

वेद को 'श्रुति, 'निगम, 'त्रायी, 'छन्दस, 'आम्नाय, 'स्वाèयाय, 'ब्रह्रा आदि कुछ दूसरे नामों से भी जाना जाता है। वेद का ज्ञान गुरु-शिष्य-परम्परा से सुरक्षित रखा गया। गुरुमुख से सुनकर प्राप्त होने के कारण यह 'श्रुति कहलाया। सार्थक, सुसंगत और उत्तम अर्थ को बताने के कारण इसके लिए 'निगम नाम का प्रयोग हुआ। ऋक, यजुष और सामन-इन तीन रूपों में होने से वेद का एक नाम 'त्रायी प्रचलित हुआ। मनोभावों को आच्छन्न करने के कारण वेद को 'छन्दस नाम दिया गया। 'आम्नाय नाम वेद के प्रतिदिन के अभ्यास पर बल देता है। वेदों का भली-भांति प्रतिदिन अèययन किये जाने को महत्त्व देने से वेद को 'स्वाèयाय कहा गया। ब्रह्रा के सत, चित और आनन्द रूपों का प्रतिपादक होने से वेद को 'ब्रह्रा नाम से भी जाना जाता है।

4.वेद की अपौरुषेयता

वैदिक ज्ञान मन्त्राों में अभिव्यक्त हुआ है। इन मन्त्राों का वैदिक ऋषियों ने प्रथम बार तपोबल से दर्शन किया था, इसलिए परम्परा के अनुसार वे ऋषि मन्त्राæष्टा हैं, मन्त्राकर्ता नहीं। वैदिक मन्त्राों से ज्ञात होता है कि ऋषियों को अलौकिक सामथ्र्य प्राप्त था। उन्होंने दैवी प्रतिभा के सहारे अपने प्रातिभ चक्षुओं से वेद के मन्त्राों का दर्शन किया था। तभी निरुक्त में आचार्य यास्क का कथन है-

साक्षात्कृतèार्माण ऋषयो बभूवु:।

तपस्या में मग्न रहते हुए ऋषियों को यह ज्ञान हुआ, यह बात अनेक स्थलों पर कही गर्इ है। मनु का कथन है-

युगान्ते•न्तर्हितान मन्त्राान सेतिहासान्महर्षय:।

लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता: स्वयंभुवा:।।

अर्थात 'युग की समापित पर अदृश्य हुए मन्त्रा उनके इतिहास के साथ ब्रह्रादेव की आज्ञा से महान ऋषियों को उनके अपने तपोबल से पुन: प्राप्त हुए।     

भारतीय दृषिटकोण के अनुसार किसी व्यकित विशेष ने वेदों की रचना नहीं की है। मन्त्राों के साथ जिन ऋषियों के नाम मिलते हैं वे इनके द्रष्टा हैं। ऋषियों ने वेद के ज्ञान को प्रकट भर किया है। ब्राह्राणग्रन्थों में परमेश्वर प्रजापति से वेदों की उत्पत्ति बतार्इ गर्इ है।

नाना दर्शनों ने वेद को अपौरुषेय, नित्य और स्वत: प्रमाण मानकर उनमें पूर्ण आस्था व्यक्त की है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में विराट पुरुष से ही वेदों की उत्पत्ति बतायी गयी है-

तस्माद यज्ञात्सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात यजुस्तस्मादजायत।।

-ऋग्वेद 10ध्90ध्8

वेद अपौरुषेय और स्वत: आविभर्ूत हैं; इसकी विवेचना में पूर्वमीमांसाकार जैमिनि की युकित है कि जो वस्तु जिसके द्वारा निर्मित होती है उसके साथ उसके कर्ता का स्मरण किया जाता है किन्तु वेद के कर्ता का आज तक किसी को स्मरण नहीं है।

वेद को भारतीय परम्परा में स्वत: प्रमाण माना जाता है। भारतीय मनीषा के अनुसार वेद सर्वथा नित्य है-'अनादिनिधना नित्या वाक।

5. वैदिक मन्त्रा के ऋषि, देवता और छन्द

वेद के मन्त्राों के अर्थ को सम्यक रूप से समझने के लिए उनके ऋषि, देवता और छन्द को जानना आवश्यक समझा जाता है। जैसा ऊपर कहा गया, मन्त्राों के साक्षात्कार करने वाले 'ऋषि कहलाते हैं। 'ऋषि शब्द दर्शनार्थक ऋष èाातु से निष्पन्न हुआ है। मन्त्राों के साथ प्राय: उसके द्रष्टा ऋषियों के नामों का उल्लेख किया गया है। मन्त्रा में जिनसे स्तुतियां की गर्इ हैं वे देवता हैं। एक परिभाषा के अनुसार 'जिसका वाक्य है वह ऋषि है और जिसके विषय में कहा गया है वह देवता है। देवता ही देव हैं जो दानशील, चमकनेवाले, चमकाने वाले या फिर धुस्थान में रहने वाले हैें। यास्क ने देवताओं को तीन स्थानों में बांटा है-धुस्थानीय देवता जैसे सूर्य आदि, अन्तरिक्षस्थानीय देवता जैसे इन्द्र, वायु आदि, और पृथिवी-स्थानीय देवता जैसे अगिन आदि। मन्त्रा के छन्द को जानना उसके सही उच्चारण के लिए आवश्यक है। वैदिक छन्द की विशेषता है कि वे अक्षर गणना पर नियत रहते हैं। मन्त्रा को किस कार्य के लिए पढ़ना चाहिएµउसे विनियोग कहते हैंं। इन चारों केे महत्त्व पर कात्यायन महर्षि का कथन है कि जो व्यकित ऋषि, देवता, छन्द और विनियोग के ज्ञान के बिना मन्त्रा का अèययन-अèयापन, यजन-याजन करता है उसका कार्य निष्फल होता है। विनियोग को यदि छोड़ भी दिया जाए, तब भी इतना तो निशिचत है कि ऋषि, छन्द और देवता का समुचित ज्ञान वेदमन्त्रा के अर्थ को समझने में सहायक होने से उपयोगीहै।

6.वेद के संरक्षण के उपाय

वेद की सुरक्षा श्रुति-परम्परा से हुर्इ है। वेद के उच्चारण में कोर्इ अन्तर न आए और मन्त्रा की क्षति भी न हो इसके लिए अनेक उपाय अपनाए गये थे। इन उपायों को विकृतियां कहते हैं। इनमें मन्त्राों के पदों को घुमा फिराकर अनेक तरह से उच्चारित किया जाता था। ये विकृतियां आठ हैं। इनके नाम हैं-जटा, माला, शिखा, रेखा, èवज, दण्ड, रथ और घन। इनमें घनपाठ सबसे कठिन होता है।

इन आठ विकृतियों के अतिरिक्त तीन पाठ और हैं-संहितपाठ, पदपाठ और क्रमपाठ। संहितापाठ में मन्त्रा अपने मूल रूप में रहता है और पदपाठ में मन्त्रा के प्रत्येक पद को अलग अलग करके पढ़ा जाता है।

इन पाठों के फलस्वरूप हजारों वषो± के बाद भी आज वेदमन्त्रा अपने मूलरूप में विधमान हैं।     

7. वैदिक साहित्य का वर्गीकरण

वैदिक वा³मय अत्यèािक विशाल है। इसके अन्तर्गत सहस्रों ग्रन्थ समाविष्ट हैं। सामान्य रूप से उनको दो भागों में रखा जा सकता है-(1) वेद और (2) वेदा³ग। 'वेद का लक्षण किया जाता है-

मन्त्राब्राह्राणयोर्वेदनामèोयम।

तदनुसार मन्त्रा और ब्राह्राण-दोनों का नाम वेद है। जिनमें देवताओं की स्तुतियां हैं, वे 'मन्त्रा कहलाते हैं और जिनमें यज्ञ की विविèा क्रियाओं का वर्णन है, वे ग्रन्थ 'ब्राह्राण कहलाते हैं। इस परिभाषा से ब्राह्राण के तीन भाग हैं-(1) ब्राह्राण, (2) आरण्यक, और (3) उपनिषद।

सुविèाा के अनसार 'वेद को चार भागों में बांटा जाता है-(1) मन्त्रा-संहिताएं, (2) ब्राह्राण-ग्रन्थ,(3) आरण्यक-ग्रन्थ, (4) उपनिषद-ग्रन्थ।

वास्तव में वेदरूप ज्ञान एक है। स्वरूप-भेद से वेद चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन चारों वेदों के अन्तर्गत मन्त्रासंहिता, ब्राह्राण, आरण्यक और उपनिषद नाम से चार प्रकार के एक या अनेक ग्रन्थ आते हैं। वैदिक वा³मय के परिशिष्ट के रूप में दूसरा भाग वेदा³ग साहित्य है। जिसके अन्तर्गत भी छह भागों में सैंकड़ों ग्रन्थ हैं। इस प्रकार वैदिक वा³मय एक विपुल साहित्य का नाम है। इस तालिका द्वारा उसके रूप को संक्षेप में समझा जा सकता है।

(1) वेद (संक्षेप में)

वेद मन्त्रासंहिता ब्राह्राण-ग्रन्थ आरण्यक उपनिषद

1. ऋग्वेद ऋग्वेद-संहिता ऐतरेय ब्राह्राण ऐतरेय आरण्यक ऐतरेय उपनिषद

2. यजुर्वेद (1) शुक्ल-यजुर्वेद-संहिता शतपथ ब्राह्राण बृहदारण्यक र्इशावास्य उपनिषद

(2) कृष्ण-यजुर्वेद-संहिता तैत्तिरीय ब्राह्राण तैत्तिरीय आरण्यक तैत्तिरीय उपनिषद

3. सामवेद सामवेद-संहिता प×चविंश ब्राह्राण तलवकार आरण्यक छान्दोग्य उपनिषद

4. अथर्ववेद अथर्ववेद-संहिता गोपथ ब्राह्राण - मुण्डक उपनिषद

(2) वेदा³ग

1. शिक्षा 2. कल्प 3.व्याकरण

4. निरुक्त 5. छन्द 6. ज्योतिष

वण्र्य विषय की दृषिट से समस्त वैदिक वा³मय को दो भागों में बांटा जाता है: 1. कर्मकाण्ड, और 2. ज्ञानकाण्ड। वैदिक संहिताओं और ब्राह्राणग्रन्थों को कर्मकाण्ड के अन्तर्गत रखा जाता है क्योंकि इसमें विविèा यज्ञों के कर्मकाण्ड की पूरी प्रक्रिया दी गयी है। संहिताओं में कर्मकाण्ड के मन्त्रा हैं और ब्राह्राणग्रन्थों में उसकी विस्तृत व्याख्या। ज्ञानकाण्ड के अन्तर्गत आरण्यक ग्रन्थ और उपनिषदें हैं। आरण्यकों में जहां यज्ञिय क्रियाकलाप की दार्शनिक व्याख्याएं मिलती हैं, वही उपनिषदों का तो मुख्य विषय ही आèयातिमक विवेचन है।

चारों वेदों के अनुसार यज्ञ में चार ऋतिवज होते हैं-होता, अध्वर्यु, उदगाता और ब्रह्राा। होता ऋग्वेद का ऋतिवज है जो ऋग्वेद के मन्त्राों का पाठ करता है। अध्वर्यु यजुर्वेद का ऋतिवज है जो यज्ञ की प्रक्रिया करवाता है। उदगाता सामवेद का ऋतिवज है अत: सामवेद के मन्त्राों का पाठ वही करता है। ब्रह्राा यज्ञ का अधिष्ठाता है, वह यज्ञ का संचालन करता है। ऋग्वेद के एक मन्त्रा (10ध्71ध्11) में इन चारों ऋतिवजों के कामों का उल्लेख किया गया है।

पुराणों के आèाार पर ज्ञात होता है कि पितामह ब्रह्राा की आज्ञा से 'वेदव्यास ने वैदिक संहिताओं को अनेक खण्डों में बांटा था और विविèा मन्त्राों को विषय के अनुसार क्रमबद्ध किया था। वेद का विभाजन करने के कारण ही इन्हें कृष्ण द्वैपायन व्यास कहा जाने लगा।

8.वेद का काल-निèर्ाारण

वेद के कालनिèर्ाारण के सम्बन्èा में मनीषियों में अत्यèािक मतभेद हैं। इतने अèािक मतभेद शायद ही संसार के किसी अन्य ग्रन्थ या साहित्य के रचनाकाल के सम्बन्èा में हों, जितने वेद के काल को लेकर हैं। प्राचीन भारतीय विद्वान वेद को अनादि और अपौरुषेय मानते थे और उनके अनुयायी अब भी ऐसा ही मानते हैं कि वेदों का न कोर्इ रचयिता है और न कोर्इ समय। एक मत में ब्रह्राा के चार मुखों से चार वेदों की रचना हुर्इ है। अत: प्राचीन भारतीय मत में चारों वेद समानरूप से प्राचीन हैं और उनमें पौर्वापर्य नहीं है।

वेद को अत्यèािक प्राचीनकाल का मानकर भी भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों ने उनके रचनाकाल पर तरह-तरह से विचार किया है, जिनमें से कुछ मुख्य मत उल्लेखनीय हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार में वेदों का आविर्भाव परमात्मा से हुआ है, इसलिए वेद सृषिट के आरम्भ से हैं। अविनाशचन्द्र दास ने ऋग्वेद के भूगोल और भूगर्भ-सम्बन्èाी अन्त:साक्ष्य के आèाार पर ऋग्वेद का रचनाकाल 25 हजार वर्ष र्इ0 पूर्व बताया है। बालगंगाèार तिलक ने ज्योतिष गणना को आèाार बनाकर ऋग्वेद का समय 6000 र्इ0 पूर्व से लेकर 4000 र्इ0 पूर्व तक निशिचत किया है। शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने ज्योतिष के आèाार पर ऋग्वेद का रचनाकाल 3500 र्इ0 पूर्व बताया है। पाश्चात्य विद्वान याकोबी ने èा्रुवतारा को लक्ष्य बनाकर ज्योतिष के आèाार पर ही ऋग्वेद का समय 4500र्इ0 पूर्व माना है। विण्टरनिटज़ ने मिटानी शिलालेख के प्रमाण पर ऋग्वेद का समय 2500 र्इ0 पूर्व ठहराया है, तो मैक्समूलर ने बुद्ध को आèाार बनाकर ऋग्वेद को 1200 र्इ0 पूर्व का बताया है। इस प्रकार वेद के काल को लेकर अनेक मत प्राप्त हैं, परन्तु पुष्ट प्रमाणों के अभाव में किसी भी निष्कर्ष पर निशिचत रूप से पहुंचना सम्भव नहीं है। केवल व्यावहारिक दृषिट से वैदिक वा³मय के संकलन को रामायण, महाभारत और महात्मा बुद्ध आदि से पूर्व विधमान होने के कारण लगभग चार हजार वर्ष र्इ0 पूर्व से लेकर एक हजार वर्ष र्इ0 पूर्व के मèय में अवश्य रखा जा सकता है।

9. वेद-व्याख्या की परम्परा

वेद के गूढ़ अर्था±े को स्पष्ट करने के लिए प्राचीन काल से ही मनीषियों ने अनेक प्रयास किये। वेद के भाष्यकारों की लम्बी परम्परा है। इसके प्रथम प्रमुख आचार्य यास्क माने जा सकते हैं जिन्होंने 'निरुक्त नामक वेदा³ग लिखा। इस ग्रन्थ में यास्क ने अपने समय में प्रचलित अनेक व्याख्या-पद्धतियों का उल्लेख किया है। ऋग्वेद के मèययुगीन भाष्यकारों में स्कन्दस्वामी, उदगीथ, माधव, वेंकटमाèाव और सायण उल्लेखनीय हैं। सायण ने अट्टारह वैदिक ग्रन्थों पर भाष्य लिखा जो उपलब्èा होता है। वेद के अर्थ समझने में ये भाष्य अत्यन्त उपयोगीहै।

यजुर्वेद के भाष्यकारों में उवट और महीèार का विशेष महत्त्व है। माधव, भरतस्वामी और गुणविष्णु के नाम सामवेद के भाष्यकारों के रूप में याद किये जाते हैं।

आèाुनिक भारतीय वेद भाष्यकारों में महर्षि दयानन्द सरस्वती का नाम अग्रगण्य हैं जिन्होंने वेदार्थ को एक नयी दिशा दी और वेदों के अध्ययन पर जोर दिया। योगिप्रवर श्री अरविन्द ने अपने मौलिक दृषिटकोण से वेद के अर्थ और व्याख्या का प्रवर्तन किया। श्रीपाद दामोदार सातवलेकर ने सुबोèा भाष्य लिखे। पाश्चात्य विद्वानों ने वेद के अर्थ और अèययन में रुचि दिखार्इ और अंग्रेजी, जर्मन और फ्रैंच में वैदिक ग्रन्थों के सम्पादन, अनुवाद और समीक्षाकार्य किये। वेदों पर कार्य करने वाले महत्त्वपूर्ण पाश्चात्य विद्वानों के नाम हैं-राथ, मैक्समूलर, हाँग, वेबर, कीथ, मैकडानल, ग्रासमान, हिलेब्राण्ट, हिवटनी, ब्लूमफील्ड, विलसन और गि्रफिथ।   

10. वेदों का महत्त्व

वेद का महत्त्व अनेक दृषिटयों से माना जाता है। वेद तो हिन्दू èार्म और भारतीय संस्कृति की आèाारशिला हैं। भारतीय जनमानस में र्इश्वरीय ज्ञान के रूप में वेदों में परम आस्था देखी जाती है। पारम्परिक मत में 'आसितक वह है जो वेद की प्रामाणिकता में विश्वास रखता है, और 'नासितक वह है जो वेद की निन्दा करता है।

(क) èाार्मिक महत्त्व - भारतीय èार्म, संस्कृति और चिन्तन में वेद को अत्यèािक गौरवपूर्ण पद प्राप्त है। हिन्दुओं के समस्त आचार-विचार, èार्म-कर्म का आèाार वेद हंै। वेद की महत्ता èाार्मिक दृषिट से सर्वोपरि है। मनु ने कहा भी है-वेदो•खिलो èार्ममूलम।

èार्म के जिज्ञासुओं के लिए वेद परम प्रमाण हैं। वे èार्म के मूल तत्त्वों को जानने का एकमात्रा साèान हैं। वस्तुत: वेद समस्त èामो± के श्रेष्ठ तत्त्वों से संवलित हैं इसलिए मनु ने इनको èार्ममात्रा का मूल स्रोत कहा है-

य: कशिचत कस्यचिदèार्मो मनुना परिकीर्तित:।

स सर्वो•भिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि स:।।

मनु ने साथ ही वेद को देवों, पितरों और मनुष्यों सभी का 'सनातन चक्षु कहा है।

यज्ञ, संस्कार, वर्णाश्रम-व्यवस्था, पुरुषार्थ-चतुष्टय, तीन ऋण, प×च महायज्ञ आदि सभी मुख्य èाार्मिक सिद्धान्तों का निरूपण वेद में प्राप्त होता है।

(ख) दार्शनिक महत्त्व - सभी 'आसितक दर्शनों का आदिस्रोत वेद ही हैं। वेद की सहायता से भारतीय दर्शनों के विकास को समझा जा सकता है। उपनिषद ग्रन्थ समस्त आèयातिमक और दार्शनिक विचारों के मुख्य स्रोत माने जाते हैं। विश्ेाषकर वेदान्त एवं सांख्य दर्शन के प्रèाान ग्रन्थ वेद (उपनिषद) ही हैें। वेद के गौरव को बढ़ाने के लिए मीमांसा दर्शन का आविर्भाव हुआ है।

(ग) सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक महत्त्व - भारतवर्ष के अनेक सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक सिद्धान्त और विश्वास वेद पर ही प्रतिषिठत हैं। मानवमात्रा के कर्तव्यबोèा के लिए सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ वेद हैं। इनमें गुरु, शिष्य, पिता-पुत्रा, पति-पत्नी, माता-पिता, समाज और व्यकित, राष्ट्र और राष्ट्रीयता, विश्व-बन्èाुत्व, परोपकार, दान, दया, अतिथि-सत्कार आदि का विस्तृत प्रतिपादन मिलता है।

प्राचीन भारत के समाज, सभ्यता और संस्कृति की जानकारी के लिए वेदाèययन अनिवार्य है। तत्कालीन व्यवसाय, उधोग-èांèो, वाणिज्य, शिल्प आदि की जानकारी के अतिरिक्त समाज के विभिन्न वगो± के कर्तव्यों और विशेषताओं के विवरण वेद में प्राप्त होते हैं।

राजा, राज्य, सभा, समिति, शासन-प्रणाली, शासन के सिद्धान्त आदि की जानकारी भी वेदों में उपलब्èा होती है, जिससे प्राचीन भारत के राजनैतिक चिन्तन और व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है।

(घ) ऐतिहासिक महत्त्व - वेद भारतीय इतिहास के प्रारमिभक काल का उदघाटन करने में सहायक हैं। इनमें भारतीय इतिहास और भौगोलिक विवरण ही नहीं, अपितु यदु, तुर्वश आदि जनसमूहों के विवरण भी मिलते हैं। गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री आदि नदियों के नाम तत्कालीन भूगोल का परिचय देते हैं, तो 'दाशराज्ञ युद्व के उल्लेख को ऐतिहासिक महत्त्व दिया जाता है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि कर्इ विद्वान वेद के गंभीर अर्थ को èयान में रखकर वेद में इतिहास ढूंढ़ने को अनुचित और असंगत बताते हैं।

(³) भाषावैज्ञानिक महत्त्व - वेद का महत्त्व भाषाशास्त्राीय अèययन की दृषिट से भी कम नहीं, क्योंकि ये प्राचीनतम भाषा की जानकारी देते हैं। वैदिक भाषा की लौकिक संस्कृत भाषा से तुलना करने पर अनेक भाषापरक रोचक तथ्य प्रकाश में आते हैं।     

निरुक्त और प्रातिशाख्य ग्र्रंथों में èवनि, पद, वाक्य और अर्थ-सभी इकार्इयों की दृषिट से भाषा का विशद विश्लेषण किया गया है।

(च) साहितियक और काव्यशास्त्राीय महत्त्व - वेद का साहितियक महत्त्व सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है। वेद के मन्त्राों में अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक आदि अलंकारों का यथास्थान प्रयोग हुआ है। उषादेवी के सूक्त उत्कृष्ट काव्य के उदाहरण माने जाते हैं। महाकाव्य, नाटक, गध, कथा, गीतिकाव्य आदि साहितियक विèााओं का उदगम वेद से दिखार्इ देता है।

(छ) शास्त्राीय और वैज्ञानिक महत्त्व - वेद सभी ज्ञान-विज्ञान का आदि स्रोत है; इसलिए यह स्वाभाविक है कि वेद में दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्रा, समाजशास्त्रा, मनोविज्ञान, गणित, जीवविज्ञान, वनस्पति-विज्ञान, आयुर्विज्ञान, भौतिकी, पर्यावरण आदि विभिन्न विèााओं और संगीत, नृत्य, चित्राकला आदि सभी कलाओं की सामग्री विकीर्ण रूप में प्राप्त हो। इसी तथ्य को èयान में रखकर स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेद को सभी सत्यविधाओं से युक्त बताया है। मनु ने भी 'सर्वज्ञानमयो हि स: कहकर वेदों की इस महत्ता पर प्रकाश डाला है। कुछ विद्वानों के अनुसार वैज्ञानिक दृषिट से यदि वेदों का अèययन किया जाये तो वेद मन्त्राों में अनेक वैज्ञानिक सिद्धान्तों के संकेत प्राप्त होते हैं।

वेद की महत्ता के विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट बात यही है कि भारतीय संस्कृति, धर्म और दर्शन का भव्य प्रासाद वेद की आèाारशिला पर ही प्रतिषिठत हुआ है। इसलिए प्रारम्भ से ही शिक्षा और ज्ञानार्जन के अन्तर्गत वेदाèययन की उपयोगिता एकमत से स्वीकार की गर्इ है।