SM-1

8 अर्थ-विज्ञान

अर्थ-विज्ञान

- डा. मीनाक्षी व्यास

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'अर्थ और उसे संप्रेषित करने वाला शब्द दोनों ही भाषा के अविचिछन्न अंग हैं। 'अर्थ 'शब्द से अभिन्न है। किसी भी अर्थ की अभिव्यकित और अर्थ का बोध् किसी शब्द विशेष से ही संभव है। 'अर्थ का लक्षण देते हुए भतर्ृहरि ने अपने ग्रंथ 'वाक्यपदीय में कहा है कि जिस शब्द के उच्चारण से जिस अर्थ की प्रतीति होती है, वही उसका 'अर्थ है। शब्द और उससे निर्मित विभिन्न भाषिक इकाइयों के माèयम से ही हम सोच पाते हैं और अपने भावों-विचारों को व्यक्त कर पाते हैं। 'अर्थ की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए भाषाशास्त्राी प्रो. भोलानाथ तिवारी ने कहा है-''किसी भी भाषिक इकार्इ (उपसर्ग, प्रत्यय, शब्द, रूप, पदबंध्, उपवाक्य, वाक्य या प्रोकित) को पढ़ या सुनकर हमारा मसितष्क जो समझता या ग्रहण करता है, वही अर्थ है। यदि भाषिक इकार्इ से संकेतित वस्तु मूर्त या स्थूल है तो उसका मूर्त या स्थूल बिंब मसितष्क ग्रहण करता है और यदि वह सूक्ष्म है (जैसे- दया) तो सूक्ष्म या अमूर्त बिंब।

इससे स्पष्ट है कि सभी भाषिक तत्त्वों के द्वारा जो भी संप्रेष्य है उसे हम अर्थ और उसके विश्लेषण की परिधि में माने सकते हैं। किसी भी शब्द का यह संप्रेष्य अर्थ-प्रयोक्ता और श्रोता दोनों पर निर्भर करता है। इसीलिए अर्थभेद की सिथति बनती है।

श्री नरेश मेहता के अनुसार-''एक ही वाध और एक ही राग बजाए जाने पर भी, विभिन्न वादकों को केवल सुनकर पहचाना जा सकता है। इसका कारण है उन वादकों का स्वरों के प्रति जो निजत्व है, वही प्रमुख है। इसी प्रकार भाषा में भी यह निजत्व तथा अर्थभेद उसके प्रयोक्ता पर निर्भर करता है।

श्री नरेश मेहता - 'प्रवाद पर्व, (भूमिका)

स्पष्ट है कि वक्ता और श्रोता दोनों रूपों में भाषा के प्रयोक्ता अपनी-अपनी सांस्Ñतिक पृष्ठभूमि, शिक्षा, प्रसंग आदि के अनुरूप शब्द और अर्थ को ग्रहण करते हैं। अत: शब्द विशेष से उनके मसितष्क में उभरने वाले अर्थ-बिंब या अर्थ-छवि में पर्याप्त अंतर या भेद हो सकता है। इससे स्पष्ट है कि किसी शब्द का उसके अर्थ से सिथर या नित्य संबंध् नहीं होता। साथ ही, यह भी आवश्यक नहीं कि किसी शब्द विशेष का एक ही अर्थ हो। एक शब्द के एक से अधिक अर्थ भी हो सकते हैं जो कि संदर्भ विशेष में प्रयोग किए जाने पर ही पूर्ण रूप से समझे जा सकते हैं। जैसे- 'अर्थ शब्द- अभिप्राय, ध्न, हेतु, कारण, प्रयोजन आदि के लिए प्रयुक्त होता है। इसीलिए 'अर्थशास्त्रा (म्बवदवउपबे) के संदर्भ में जब हम 'अर्थ का प्रयोग करते हैं तो वहां इसका संबंध् 'ध्न से होता है। जबकि 'भाषाविज्ञान के संबंध् में इसी 'अर्थ का प्रयोग 'अभिप्राय के लिए होता है।

साथ ही एक ही अर्थ के लिए अनेक शब्द अभिव्यंजक होते हैं। लेकिन सभी शब्दों में पूर्ण पर्यायता संभव नहीं। -''शब्द का पर्याय स्वयं वही शब्द हुआ करता है। शब्द के अतिरिक्त पर्याय की तलाश का तात्पर्य है-काम चलाना।

श्री नरेश मेहता - 'प्रवाद पर्व, (भूमिका)

अत: शब्द अर्थों के वाहक मात्रा नहीं होते, उनमें पारस्परिक संबंध् भी होता है। इस शाबिदक संबंध् से ही सही अर्थ-प्रापित संभव है। शाबिदक संबंधें के कुछ रूप इस प्रकार हैं -

1. पर्यायता :- भाषा में एक ही अर्थ के लिए एकाधिक शब्द भी प्रयुक्त किए जाते हैं, जिन्हें पर्याय शब्द कहा जाता है। जैसे - आकाश के लिए - गगन, नभ, व्योम, अंबर, अंतरिक्ष, शून्य, आसमान आदि अनेक शब्द प्रयोग में लाए जाते हैं। लेकिन इन पर्यायवाची शब्दों में भी अर्थ की छाया में बारीक अंतर रहता है। इन विभिन्न आर्थी ध्रातलों के कारण पर्याय शब्दों का चुनाव विषय और प्रसंग के अनुसार सावधनी से करना ज़रूरी है।

''यह संभव है कि संदर्भ विशेष में एक शब्द की जगह उसका कोर्इ विशेष पर्याय रखने पर अर्थ में विशेष अंतर न आए, परन्तु अन्य संदर्भों में ऐसा करने पर अंतर आ सकता है। - ('सामान्य हिंदी - डा. भोलानाथ तिवारी व डा. गाबा - पृष्ठ - 55)

अत: पर्याय शब्द दो प्रकार के माने गए हैं -

1. पूर्ण पर्याय

2. अपूर्ण पर्याय

1. पूर्ण पर्याय - पूर्ण पर्याय वे शब्द होते हैं जिनका प्रयोग हम सभी प्रकार के संदर्भों में एक-दूसरे के स्थान पर कर सकें और एक के स्थान पर दूसरे पर्याय के आने से अर्थ में कोर्इ अंतर न आए। उदाहरण के लिए, गणेश, गजानन, वक्रतुंड, एकदंत, गणाधिपति, विनायक, लम्बोदर आदि शब्दों को हम एक दूसरे के स्थान पर बिना किसी अर्थ परिवर्तन के प्रयुक्त कर सकते हैं क्योंकि सब एक ही का बोध् कराते हैं।

इसी प्रकार 'सत्य के लिए हिंदी में सच, यथार्थ, यथातथ्य, र्इमानदार, विश्वस्त, विशु(, दूध् का ध्ुला, सच्चा, प्रमाणित, खरा, सि(, सच्चार्इ आदि अनेक पर्याय हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी की इन पंकितयों को देखा जा सकता है-

'क्या शानदार कहानी रची है। जो सत्य है, वह सर्जना-शकित के सुनहरे पात्रा में मुँह बंद किए ढंका ही रह जाता है। एक पर एक गप्पों की परतें जमती जा रही हैं।

यहाँ 'सत्य की जगह 'सच, यथार्थ, सच्चार्इ, यथातथ्य, खरा, प्रमाणित आदि को पूर्ण पर्याय के रूप में रखा जा सकता है।

2. अपूर्ण पर्याय - अपूर्ण पर्यायों में पर्यायता पूर्ण रूप से नहीं होती। ये उपरी तौर पर तो पूर्ण पर्यायवाची प्रतीत होते हैं लेकिन सभी संदर्भों में एक के स्थान पर दूसरे का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

उदाहरण के लिए - 'विधुत के अर्थ में चपला, तडि़त, सौदामिनी, ऐरावती, अशनि, बिजली आदि अनेक पर्याय हैं। लेकिन इनमें से प्रत्येक शब्द हर प्रसंग में प्रयुक्त नहीं हो सकता। बिजली के बिल की जगह तडि़त का बिल या विधुत-विभाग के स्थान पर चपला विभाग कहना उचित नहीं।

इसी प्रकार 'अच्छा और 'प्रशंसनीय दोनों पर्यायवाची शब्द हैं, लेकिन दोनों में सूक्ष्म आर्थी अंतर हैं। जिसके कारण 'प्रशंसनीय का प्रयोग प्राय: किसी गुण, भाव, विचार और कार्य (जैसे प्रशंसनीय कार्य) के साथ ही किया जाता है। जबकि 'अच्छा का प्रयोग - (अच्छा) व्यकित, (अच्छी) वस्तु आदि के लिए भी होता है।

इस प्रकार पर्यायता प्राय: आंशिक होती है। इसके कर्इ अन्य रूप भी हैं। जैसे- सूक्ष्मांतरी पर्याय (गर्व-दंभ-अहंकार-घमंड-अभिमान), मूल्यांतरी पर्याय (अज्ञ-मूर्ख-अनभिज्ञ), शैलीय पर्याय (अधिकारी-अपफसर), सहप्रयोगान्तरी पर्याय (निर्णय-न्याय), आदरान्तरी पर्याय (तुम-आप) आदि। भाषा में कुछ छदम पर्याय भी होते हैं, जो पयार्य न होते हुए भी पर्याय प्रतीत होते हैं। जैसे- आधि (मानसिक कष्ट), व्याधि (शारीरिक कष्ट), बु(ि (अक्ल), ज्ञान (अनुभव, जानकारी) इत्यादि।

2. विलोमता- शब्द में विलोमता या विपरीतार्थता को भी संदर्भ और अर्थीय घटकों की दृषिट से देखा जा सकता है। जैसे 'गुण के संदर्भ में 'दोष विपरीत अर्थ देता है। अत: 'गुण-दोष विलोम है। इसी प्रकार 'आदमी और 'औरत के घटक विषम हैं -

आदमी (+ मानव + पुरुष + वयस्क)

औरत (+ मानव - पुरुष + वयस्क)

विलोमता उपसर्ग-प्रत्यय के स्तर पर भी मिलती है। जैसे- ज्ञान-अज्ञान, सभ्य-असभ्य, पूर्ण-अपूर्ण, स्वार्थ-नि:स्वार्थ आदि। विषय और प्रसंग के अंतर से एक ही शब्द के अनेक विलोम शब्द हो सकते हैं। जैसे-               

1. काला - 1. सफेद (वस्तु)

काला 2. गोरा (व्यकित)

2. सूखा - 1. गीला (वस्त्रा)

सूखा - 2. हरा-भरा (बाग)

3. सभ्य - 1. असभ्य

2. बर्बर

4. संकोच - 1. असंकोच

2. प्रसार

5. श्र(ा - 1. अश्र(ा

2. घृणा

6. सृषिट - 1. संहार

2. प्रलय

7. सिथर - 1. असिथर

2. चंचल

3. गतिशील

8. स्वार्थ - 1. नि:स्वार्थ

2. परमार्थ

9. बहिष्कार - 1. स्वीकार

2. अंगीकार

10. पूर्ण - 1. अपूर्ण

2. रिक्त

हिंदी में शब्दों के अर्थ में भिन्नता अनुनासिकता के कारण भी देखने को मिलती है। जैसे-

सवार - संवार

कहा - कहाँ

गर्इ - गर्इं

इसी प्रकार हिंदी में द्वित्व वर्ण के आ जाने से भी शब्दों के अर्थ में अंतर आ जाता है। जैसे-

पक्का - पक्का

पता - पत्ता

बचा - बच्चा

3. अनेकार्थता- एक कोशगत इकार्इ के एक से अधिक अर्थों का होना - अनेकार्थता या बहुअर्थकता (च्वसलेमउल) कहलाता है। उदाहरणार्थ - 'कर शब्द के हिंदी में कर्इ अर्थ हैं - हाथ, किरण, हाथी की सूंड, टैक्स। अलग-अलग संदर्भो या प्रसंगों में प्रयुक्त होने पर 'कर के अलग-अलग अर्थ स्वत: ही स्पष्ट हो जाते हैं।     

 भतर्ृहरि के अनुसार इस प्रकार के शब्दों का कहां पर क्या अर्थ लिया जाए, यह प्रयोक्ता पर निर्भर है। प्रयोक्ता जहां जिस अर्थ में उस शब्द का प्रयोग करता है, वही अर्थ उसका अभिध्ेय है। श्रृंग-सींग, चोटी। नग-कृक्ष, पर्वत। पानी-कांति, सम्मान, जल आदि इसी प्रकार के शब्द हैं।

4. समनामिता- ऐसे पद, जिनके मौखिक-लिखित रूप तो एक से या समान लगें लेकिन अर्थ भिन्न-भिन्न हों-समनामी (भ्वदवदलउ) कहलाते हैं।

हिन्दी में अनेक अन्य भाषाओं के शब्द समनिवत हैं। अलग-अलग भाषा स्रोतों से आने वाले एक से शब्द भी अर्थ की दृषिट से अनेकार्थी बन जाते हैं। जैसे- एक 'आम शब्द दो अलग-अलग स्रोतों से आने के कारण एक से अधिक अर्थ वाला बन जाता है।

आम- 1. संस्Ñत - आम्र (पफल विशेष)

2. अरबी - आम (साधरण या सामान्य)

इसी प्रकार - सोना (स्वर्ण, निद्रा) स्पअम (रहना, सजीव), (चमगादड़, बल्ला) आदि में सहनामिता है।

5. अवनामिता- जब एक शब्द का अर्थ दूसरे शब्द में समाहित हो, तो इस संबंध् को अवनामिता कहते हैं। इससे विशिष्ट और सामान्य शबिदक इकार्इयों का बोध् होता है। जैसे- 'गोभी एक सब्जी है -वाक्य में गोभी और सब्जी के बीच आर्थी स्तर पर अवमानिता है। गोभी 'सब्जी का अवनाम है। अर्थात इसके साथ-'............का एक प्रकार की संकल्पना संब( है। गेहूँ - अनाज, पीपल-वृक्ष, दौड़ना या भागना-चलना, गोरैया-चिडि़या आदि में पूर्ववर्ती शब्द का अर्थ - उत्तरवर्ती शब्द में समाहित है।

6. समस्वनता - स्वन का अर्थ èवनि है। समस्वन शब्दों का लिखित रूप और अर्थ भिन्न होते हैं लेकिन अन्यात्मक उच्चारण समान होता है। जैसे- कत्र्ता (उíेश्य) - करता (करना, क्रिया का वर्तमानकालिक Ñंदत रूप)

ठमंत (बिना ढंका) - ठमंत (भालू)

च्तपदबपचंस (प्रधन) - च्तपदबपचसम (सि(ांत) आदि।

अर्थ के प्रकार

अर्थ के कर्इ प्रकार माने गये हैं -

1. संरचनार्थ- शब्द आदि इकाइयों की रूप-रचना जिन संरचनाओं के द्वारा होती है, उनसे संबंधित अर्थ संरचनार्थ कहलाता है। जैसे- 'जलज, शब्द की रूप-रचना, 'जल और 'ज तथा 'पंकज शब्द की 'पंक और 'ज - के सहारे हुर्इ है। इनके आधर पर इन दोनों शब्दों का संरचनापरक अर्थ है-

'जलज (जल+ज) अर्थात - जल से उत्पन्न हुआ।

'पंकज (पंक+ज) अर्थात - पंक कीचड़ से उत्पन्न हुआ।

लेकिन यह जरूरी नहीं कि भाषा में शब्द का प्रयोग उसके संरचनार्थ के आधर पर हो। ये शब्द 'कमल के सांकेतिक अर्थ में रुढ़ हो चुके हैं और सिपर्फ इसी अर्थ में हिंदी में प्रयुक्त होते हैं।

2. मुख्यार्थ या समान्यार्थ - शब्द कोश के अनुसार किसी शब्द का जो सामान्य या निशिचत अर्थ है वही उसका सामान्य अर्थ है। जैसे-

अन्न - अनाज

वायु - हवा

कीमत - मूल्य

3. लक्ष्यार्थ- जब प्रयोजन या रूढि़ के आधर पर शब्द के सामान्य मुख्यार्थ से अलग हटकर किसी भिन्न अर्थ को ग्रहण किया जाता है तो उसे लक्ष्यार्थ कहते हैं। जैसे 'उल्लू से मूर्ख, 'गाय से सीधपन, 'शेर स बहादुर अर्थ लक्षित होते हैं। मुहावरों के भी प्राय: लक्ष्यार्थ ही प्रयुक्त होते हैं।

4. व्यंग्यार्थ - जब किसी शब्द से मुख्यार्थ व लक्ष्यार्थ से भी आगे कोर्इ अन्य अर्थ èवनित या व्यकित हो, तो उसे व्यंग्यार्थ कहते हैं। उदाहरणार्थ -

'रोज ही तो

कुछ नयी हवाएं

कुछ नये पूफल और

कुछ नये दृश्य लेकर, दिन आता है ('चैत्या - श्री नरेश मेहता)

यहां 'हवा, पूफल, दृश्य में 'नयापन का व्यंग्यार्थ-नया उत्साह और नर्इ संभावनाएं हैं।

5. प्रयोगार्थ या सामाजिक अर्थ - अर्थ सामाजिक होता है। जैसे- 'तू, 'तुम और 'आप का व्याकरण की दृषिट से प्रयोग एक ही अर्थ में होता है लेकिन इनके सामाजिक अर्थ अलग-अलग हैं। सामाजिक स्तर में और आयु में बड़े-छोटे व्यकितयों की भिन्नता से इनके अर्थ में अंतर आ जाता है।