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1 पाठ 1 शिक्षा : अर्थ, उíेश्य तथा प्रक्रिया

 पाठ 1

शिक्षा : अर्थ, उíेश्य तथा प्रक्रिया

- नीलम दलाल

प्रवक्ता, आर्इ.एच.र्इ.,

दिल्ली विश्वविधालय

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मनुष्य जब पैदा होता है तो वह केवल जैविक प्राणी होता है, परन्तु जल्द ही वह एक सामाजिक प्राणी बनने लग जाता है। जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी में बदलाव उसमें समाजीकरण व शिक्षा की प्रक्रिया के द्वारा होता है। शिक्षा समाज की एक पीढ़ी द्वारा अपने से निचली पीढ़ी को अपने ज्ञान के हस्तांतरण का प्रयास है। इस विचार से शिक्षा एक संस्था के रूप में काम करती है, जो व्यकित विशेष को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा समाज की संस्Ñति की निरंतरता को बनाए रखती है। Úैंच समाजशास्त्राी इमार्इल दुर्खिम के अनुसार शिक्षा वयस्कों द्वारा उन पर, जो अभी वयस्क जीवन के लिए तैयार नहीं हैं, प्रभाव डालने की प्रक्रिया है। उनके अनुसार कोर्इ समाज तभी बना रह सकता है जब उनके सदस्यों में एक हद तक एकरूपता हो और यही एकरूपता शिक्षा द्वारा निरंतर बनार्इ व पुनर्बलित की जाती है। बच्चा शिक्षा द्वारा समाज के आèाारभूत नियमों, व्यवस्थाओं, समाज के प्रतिमानों एवं मूल्यों को सीखता है। बच्चा समाज से तभी जुड़ पाता है जब वह उस समाज विशेष के इतिहास से रूबरू होता है।

शिक्षा व्यकित की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यकितत्त्व का विकसित करने वाली प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया उसे समाज में एक वयस्क की भूमिका निभाने के लिए समाजीÑत करती है तथा एक जिम्मेदार नागरिक एवं समाज के सदस्य बनने के लिए व्यकित को आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्èा कराती है।

शिक्षा शब्द संस्Ñत भाषा की 'शिक्ष èाातु में 'अ प्रत्यय लगाने से बना है। 'शिक्ष का अर्थ है सीखना और सिखाना। 'शिक्षा शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया। यदि हम शिक्षा के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द एज्यूकेशन पर विचार करें तो भी यही अर्थ निकलता है। 'एज्यूकेशन शब्द लैटिन भाषा के 'एज्यूकेटम शब्द से बना है जिसे 'ए तथा 'डयूको से जोड़कर बनाया गया है। 'ए का अर्थ है 'अन्दर से तथा 'डयूको का अर्थ 'आगे बढ़ना अत: एज्यूकेशन का अर्थ हुआ, बच्चे व्यकित की आन्तरिक शकितयों को बाहर की ओर प्रकट करना। इसी प्रकार जब हम शिक्षा शब्द के प्रयोग को देखते हैं तो मोटे तौर पर यह दो रूपों में प्रयोग में लाया जाता है, व्यापक रूप में तथा संकुचित रूप में।

शिक्षा का व्यापक अर्थ

व्यापक अर्थ में शिक्षा किसी समाज में सदैव चलने वाली सोíेश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शकितयों का विकास, उसके ज्ञान एवं कौशल में वृ(ि एवं व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उसे सभ्य, सुंस्Ñत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है। मनुष्य क्षण-प्रतिक्षण नए-नए अनुभव प्राप्त करता है व करवाता है जिससे उसका दिन-प्रतिदन का व्यवहार प्रभावित होता है। उसका यह सीखना-सिखाना विभिन्न समूहों, उत्सवों, पत्रा-पत्रिकाओं, दूरदर्शन आदि से अनौपचारिक रूप से होता है। यही सीखना-सिखाना शिक्षा के व्यापक तथा विस्तृत रूप में आते हैं।

शिक्षा का संकुचित अर्थ

संकुचित अर्थ में शिक्षा किसी समाज में एक निशिचत समय तथा निशिचत स्थानों ;विधालय, महाविधालयद्ध में सुनियोजित ढंग से चलने वाली एक सोíेश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा छात्रा निशिचत पाठयक्रम को पढ़कर अनेक परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना सीखता है।       

 शिक्षा के व्यापक व संकुचित रूपअर्थ में अन्तर

शिक्षा के दोनों अथो± में समय, उíेश्य, पाठयचर्या, शिक्षण विèाियों व व्यवस्था के स्वरूप में अन्तर को निम्न प्रकार से देखा जा सकता है।

व्यापक अर्थ में शिक्षा संवुफचित अर्थ में शिक्षा

• जीवन भर चलने वाली शिक्षा • एक निशिचत काल में चलने वाली शिक्षा

• अनियोजित व नियोजित दोनों प्रकार की शिक्षा • केवल नियोजित शिक्षा।

समिमलित होती है।

• उíेश्य हैं, सीमाओं में नहीं बाँèा सकते। • उíेश्य निशिचत तथा सीमाब( होते हैं।

• अतिव्यापक पाठयचर्या • सुनिशिचत पाठयचर्या।

• विविèा शिक्षण विèाियाँ, कुछ तो वर्णित ही नहीं हो • कुछ शिक्षण विèाियाँ होती हैं जो पूर्णतया वर्णित सकती हैं। हो सकती हैं।

• स्थान एवं समय की कोर्इ बाèयता नहीं। • स्थान व समय दोनों की बाèयता, शिक्षण स्थान समय पूर्व निèर्ाारित होते हैं।

• किन्हीं भी दो व्यकितयों के बीच की प्रक्रिया। • शिक्षक व विधार्थी के बीच की प्रक्रिया।

शिक्षा संबंèाी विभिन्न विचार

विभिन्न दार्शनिकों, समाजशासित्रायों, मनोवैज्ञानिकों व नीतियों ने 'शिक्षा क्या है? इस पर अपने विचार दिए हैं। शिक्षा के अर्थ को समझने मेें ये विचार भी हमारी सहायता करते हैं। कुछ शिक्षा सम्बन्èाी मुख्य विचार यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं : µ

• स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निर्माण ही शिक्षा है। ;अरस्तूद्ध

• शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा के सवा±गीण एवं सर्वोत्Ñष्ट विकास से है। ;मोहनदास कर्मचन्द गांèाीद्ध

• मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। ;स्वामी विवेकानन्दद्ध

• शिक्षा व्यकित की उन सभी भीतरी शकितयों का विकास है जिससे वह अपने वातावरण पर नियंत्राण रखकर अपने उत्तरदायित्त्वों का निर्वाह कर सके। ;जान डयूवीद्ध

• शिक्षा व्यकित के समनिवत विकास की प्रक्रिया है। ;जिददू Ñष्णमूर्तिद्ध

• शिक्षा का अर्थ अन्त: शकितयों का बाá जीवन से समन्वय स्थापित करना है। ;हर्बट स्पैन्सरद्ध

• शिक्षा मानव की सम्पूर्ण शकितयों का प्राÑतिक, प्रगतिशील और सामंजस्यपूर्ण विकास है। ;पेस्तालाजीद्ध

• शिक्षा बच्चों को व्यावहारिक जीवन जीने की कला सिखाने की प्रक्रिया है। ;माèयमिक शिक्षा आयोग, 1952-53द्ध

• शिक्षा राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक विकास का शकितशाली साèान है, शिक्षा राष्ट्रीय सम्पन्नता एवं राष्ट्र कल्याण की कुंजी है। ;राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, 1964-66द्ध

• शिक्षा हमारे भौतिक और आèयातिमक विकास की आवश्यकता पूर्ति करने का साèान है। ;राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, 1986द्ध

• शिक्षा बच्चे की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का साèान है। ;सभी के लिए शिक्षा पर विश्वव्यापी घोषणा, 1990द्ध

शिक्षा के मूल उíेश्य

शिक्षा का मूल उíेश्य समाज को बनाए रखना एवं व्यकितयों के व्यकितत्त्व को विकसित करना है। इन उíेश्यों को विस्तार से निम्न प्रकार से समझा जा सकता है 

1. सांस्Ñतिक विरासत का हस्तांतरण µ शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोक चलन, लोक-नीतियों तथा सामाजिक संगठन के संस्थागत प्रतिमान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं। शिक्षा का यह कार्य कर्इ साèानोंसंस्थाओं द्वारा प्रतिपादित होता है µ परिवार, विधालय, èाार्मिक संंप्रदायों के औपचारिक साèानों, राज्य व समुदाय के अनौपचारिक साèानों की अन्योन्यक्रिया द्वारा।

2. नये सामाजिक प्रतिमानों का विकास करना µ सामाजिक प्रगति जितनी सामाजिक विरासत के परिवर्तनों पर निर्भर होती है उतनी ही प्राचीन संस्Ñति और परंपराओं को एक समूह से दूसरे समूह तक और बड़े बूढ़ों से युवकों तक पहुँचाने पर निर्भर करती है। वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के लिए Ñषि और उधोग की रीतियों में, विधियों, कार्यप(तियों में परिवर्तनों की आवश्यकता होती है। स्वास्थ्य, अवकाश, व्यवसाय व घर की जीवनचर्या में भी नयी जीवन-प(ति के निर्माण की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक विकास के लिए भी यह आवश्यक है कि नये व्यवहार-प्रतिमान बनें। यह कार्य अंतर्निविष्ट अथवा नियोजित शिक्षा द्वारा ही संभव है। शिक्षा नए सामाजिक प्रतिमानों के विकास के लिए अनुभव को समृ( करने का क्षेत्रा उपलब्èा कराती है।

3. सृजनात्मक योजनाओं के प्रोत्साहन के लिए परिसिथतियाँ उत्पन्न करना µ शिक्षा का तीसरा उíेश्य सृजनात्मक एवं रचनात्मक परिसिथतियाँ उपलब्èा कराना है। इसके अन्तर्गत ऐसे खुले मसितष्क का विकास करना है जो उन परिवर्तनों को, जो हो चुके हैं तथा जो हमारे गतिशील जगत में अवश्यंभावी रूप से और भी अèािक होंगे, हमारा मन सरलता से ग्रहण करता है। साथ ही उनका अनुकरण मात्रा न करके अèािकाèािक सामाजिक उत्कर्ष के लिए आवश्यक परिवर्तन लाने के उíेश्य से सृजनात्मक कार्य भी कर सकें।

सच बात तो यह है कि शिक्षा के अपने में कोर्इ उíेश्य नहीं होते, किसी समाज के जो उíेश्य होते हैं वही उसकी शिक्षा के उíेश्य होते हैं। और चूँकि भिन्न-भिन्न समाजों के उíेश्य भिन्न-भिन्न होते हैं इसलिए उनकी शिक्षा के उíेश्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इतना ही नहीं अपितु ये देश-काल के साथ-साथ बदलते रहते हैं। ये उíेश्य अनेक और विविèा है, इन सबकी अलग-अलग व्याख्या नहीं की जा सकती। हमने किसी भी समाज अथवा राष्ट्र की किसी भी समय की शिक्षा के समस्त उíेश्यों को नौ सामान्य शीर्षकों में संजोने-पिरोने का प्रयत्न किया है, जो प्रस्तुत हैं µ

;1द्ध शारीरिक विकास का उíेश्य µ शारीरिक विकास शिक्षा का सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक उíेश्य है, यह बात दूसरी है कि भिन्न-भिन्न समाजों में भिन्न-भिन्न समय पर इसे भिन्न-भिन्न रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। आज शिक्षा के क्षेत्रा में बच्चों के शारीरिक विकास से तात्पर्य उनकी मांस-पेशियों को सशक्त बनाने, कमे±निद्रयों एवं ज्ञानेनिद्रयों के विकास एवं प्रशिक्षण और जन्मजात शकितयों के विकास एवं उदात्तीकरण से लिया जाता है और इस सबके लिए उन्हें उत्तम स्वास्थ्य के नियम बताए जाते हैं, उनके लिए आसन, व्यायाम और खेल-कूद की व्यवस्था की जाती है, उन्हें इनिद्रयों के प्रयोग के अèािक से अèािक अवसर दिए जाते हैं, उन्हें रोगों से बचने के उपाए बताए जाते हैं और रोगग्रस्त होने पर उसके उचित उपचार के लिए जागरुक किया जाता है।

;2द्ध मानसिक विकास का उíेश्य µ यह भी शिक्षा का सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक उíेश्य है परन्तु इसे भी भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न अथो± में लेते हैं। प्राचीन भारत में मानसिक विकास से अर्थ मनुष्य के ज्ञान में वृ(ि से लिया जाता था। हमारे देश में एक समय ऐसा भी आया जब ज्ञान के लिए ज्ञान का नारा बुलन्द हुआ।

आज शिक्षा के क्षेत्रा में मानसिक विकास से तात्पर्य बच्चों के विचारों के आदान-प्रदान हेतु भाषा ज्ञान कराने एवं वस्तु जगत एवं अèयात्मक जगत को जानने हेतु विविèा विषयों का ज्ञान करानेऋ   मानसिक शकितयों µ स्मृति, निरीक्षण, कल्पना, तर्क, चिन्तन, मनन, सामान्यीकरण, निर्णय आदि का विकास करने, बु(ि को तर्क आदि की सहायता से सत्य-असत्य में भेद करने में प्रशिक्षित करने, मनुष्य में विवेक शकित के विकास करने और बच्चों को मानसिक रोगों ;भय, निराशा, हीनता आदिद्ध से बचाने तथा मानसिक प्रेरकों ;अभय, आशा, आत्मविश्वास आदिद्ध को उनमें उत्पन्न करने से लिया जाता है। और इस सबके लिए हम बच्चों को अभिव्यकित के स्वतंत्रा अवसर देते हैं µ इसके द्वारा विचारों का आदान-प्रदान और भाषा का विकास, दोनों एक साथ विकसित होते हैं। विभिन्न विषयों का ज्ञान एवं विभिन्न क्रियाओं में प्रशिक्षण बच्चों के बौ(िक विकास में सहायक होता है। आज बच्चों को स्वयं करके स्वयं सीखने के अवसर दिए जाते हैं। इससे बच्चों की मानसिक शकितयों µ स्मृति, निरीक्षण, कल्पना, तर्क आदि का विकास होता है। आज बच्चों के साथ प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाता है। इससे वे भय से बचते हैं, अभय होते हैं, निराशा से बचते हैं, आशावादी होते हैं और हीनता से बचते हैं, आत्मविश्वासी होते हैं।

;3द्ध सामाजिक विकास का उíेश्य µ जब हम शिक्षा के क्षेत्रा में सामाजिक विकास की बात करते हैं तो उसकी सीमा में बच्चों को समाज की भाषा, रहन-सहन की विèाि, रीति-रिवाज व आचार-विचार सिखाकर उन्हें समाज में समायोजन करने योग्य बनाना, उन्हें समाज की अच्छार्इ-बुरार्इ के प्रति संवेदनशील बनाना और समाज की बुराइयों को दूर करने तथा उसमें नर्इ-नर्इ अच्छाइयों को लाने के लिए नेतृत्व शकित का विकास करना, सब कुछ आता है। समाज में समायोजन करने में प्रेम, सहानुभूति और सहयोग का महत्त्व होता है और सामाजिक परिवर्तन हेतु प्रेम, सहानुभूति और इन सब भावनाओं का सापेक्षिक विकास करना आवश्यक होता है और यह भी सामाजिक विकास की सीमा में आता है। इन सबके विकास के लिए हम विधालयों में सामूहिक कार्य की विèाियों का प्रयोग करते हैं। बच्चे विधालय में समाज की भाषा व आचार-विचार सीखकर विधालयी समाज में समायोजन करते हैं और सब प्रेम, सहानुभूति और सहयोग से विभिन्न कायो± का सम्पादन करते हैं, वे ही अपने समूह विशेषों का नेतृत्व करते हैं और इस प्रकार उनका सच्चे अथो± में सामाजिक विकास होता है।

बच्चों का सामाजिक विकास करना अति आवश्यक है। बिना सामाजिक विकास के न तो बच्चे अपने समाज में समायोजन कर सकते हैं और न वे सामाजिक परिवर्तन ला सकते हैं। सामाजिक परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए भी मनुष्य का सामाजिक विकास आवश्यक है।

;4द्ध सांस्Ñतिक विकास का उíेश्य µ प्रत्येक समाज की अपनी संस्Ñति होती है और वह अपनी इस संस्Ñति को आने वाली पीढ़ी में संक्रमित करता है। यह एक सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक तथ्य है। तब किसी भी समाज की शिक्षा का यह उíेश्य होना स्वाभाविक है कि वह उसके द्वारा बच्चों का सांस्Ñतिक विकास करे।

परन्तु सांस्Ñतिक विकास के अन्तर्गत किस समाज को क्या करना है, यह सुनिशिचत न होने के कारण शिक्षाशासित्रायों को इसकी व्याख्या करने और इसकी प्रापित के उपाय खोजने में कठिनार्इ होती है। पिफर केवल सांस्Ñतिक विकास से मनुष्य की रोटी-कपड़े-मकान की समस्या तो हल होगी नहीं।

निर्णय रूप में हम यह कह सकते हैं कि प्रत्येक समाज की शिक्षा का एक उíेश्य सांस्Ñतिक विकास भी होना चाहिए। इसके अन्तर्गत हमें बच्चों को समाज की संस्Ñति विशेष अथवा समाज की विशेष संस्Ñतियों के मूल तत्त्वों का ज्ञान कराना चाहिए और इस ज्ञान का तब तक कोर्इ अर्थ नहीं जब तक वह उनके व्यवहार में परिलक्षित न हो।

;5द्ध नैतिक एवं चारित्रिक विकास का उíेश्य µ बच्चों के नैतिक एवं चारित्रिक विकास करना शिक्षा का प्रमुख उíेश्य है। शिक्षा के क्षेत्रा में आज जब हम अपने नैतिक एवं चारित्रिक विकास की बात  करते हैं तो हमारा आशय बच्चों को अपने समाज द्वारा निशिचत आचार-विचार सम्बन्èाी नियमों का दृढ़ इच्छाशकित के साथ पालन करने की ओर प्रवृत्त करने से होता है और आचार-विचार तो समाज की अपनी भौगोलिक सिथति, दार्शनिक विचारèाारा, सामाजिक संरचना, राज्यतन्त्रा, अर्थतन्त्रा, वैज्ञानिक प्रगति और उसकी भौतिक एवं आèयातिमक उपलबिèायों पर निर्भर करते हैं। èार्मप्रèाान समाजों में नैतिकता का आèाार èार्म होता है और चूँकि संसार के अèािकतर लोग किसी न किसी èार्म को मानते हैं और उनके आचार-विचार उनके èार्म पर आèाारित होते हैं इसलिए प्राय: लोग èार्म और नैतिकता में भेद नहीं करते।

हम अपने देश में नैतिक एवं चारित्रिक विकास के नाम पर अपने बच्चों को केवल मानवतावादी सामाजिक नियमों के पालन एवं मानवतावादी गुणों को ग्रहण करने की ओर प्रवृत्त कर सकते हैं। यदि हम अपने बच्चों में र्इमानदारी, कर्तव्य-परायणता, परोपकार और दृढ़ इच्छा शकित आदि चारित्रिक गुणों का विकास कर सकें और उन्हें प्रेम, सहानुभूति और सहयोग के साथ रहना सिखा सकें तो समझिए हमने उनका नैतिक एवं चारित्रिक विकास कर दिया।

;6द्ध व्यावसायिक विकास का उíेश्य µ आज हम अपनी जीविका चलाने के लिए अनेक उत्पादन एवं औधोगिक कार्य करते हैं, अत: शिक्षा के द्वारा हम अपनी सन्तान को इन सब क्रियाओं में दक्ष करने में लगे हैं। इसीलिए आज जीविकोपार्जन का उíेश्य व्यावसायिक उíेश्य कहलाता है।

शिक्षा में व्यावसायिक उíेश्य स्वीकार करने का अर्थ है बच्चों को उनकी रुचि, रुझान, योग्यता और आवश्यकतानुसार किसी उत्पादन कार्यऋ जैसे µ खेती, किसी व्यवसायऋ जैसे µ दुकानदारी, वकालत, अèयापन तथा डाक्टरी, किसी लघु उधोगऋ जैसे µ कतार्इ, बुनार्इ, बढ़र्इगिरी, लुहारगिरी, चमड़े का कार्य अथवा किसी बड़े उधोग को चलाने हेतु तकनीकी, संगठन और प्रशासन आदि की शिक्षा देना।

शिक्षा का व्यवसायिक उíेश्य एक महत्त्वपूर्ण उíेश्य है। मनुष्य की सबसे पहली आवश्यकताएँ रोटी, कपड़ा और मकान हैं। शिक्षा को हमारी इन प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करनी ही चाहिए। कला, साहित्य और संगीत की उन्नति के लिए भी èान की आवश्यकता होती है। आज के युग में हमारी भौतिक आवश्यकताओं की कोर्इ सीमा नहीं है, हमें अपेक्षाÑत बहुत èान की आवश्यकता होती है। इस èान को हम उत्पादन अथवा उधोग द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा के द्वारा यदि हम अपने बच्चों को किसी उत्पादन अथवा उधोग की शिक्षा देते हैं और उससे वे लाभ उठाते हैं तो निशिचत रूप से देश से बेकारी तथा भुखमरी दूर होगी और हमारा देश èान-èाान्य से पूर्ण होगा।

;7द्ध शासनतंत्रा एवं नागरिकता की शिक्षा का उíेश्य µ शिक्षा के क्षेत्रा में शासन तंत्रा की शिक्षा से तात्पर्य जनता को अपने देश के शासनतंत्रा के गुणों से परिचित कराने से लिया जाता है। पर किसी भी शासनतंत्रा के ज्ञान का तब तक कोर्इ अर्थ नहीं जब तक देशवासियों में उसके प्रति आस्था न हो और वे उसके अनुसार व्यवहार न करें। किसी भी देश के शासनतंत्रा में उसकी जनता के अèािकार एवं कर्तव्य सुनिशिचत होते हैं। देश की जनता को अपने इन अèािकारों एवं कत्र्तव्यों का ज्ञान कराना और उन्हें तदनुकूल आचरण की ओर प्रवृत्त करना ही नागरिकता की शिक्षा है। उदाहरण के लिए एकतन्त्रा शासन प्रणाली वाले देशों में जनता को शासक की आज्ञा का पालन करना होता है, उनमें अन्èो राष्ट्रभक्त तैयार किये जाते हैंऋ जबकि लोकतन्त्रा में जनता के नियमों के पालन करने के साथ-साथ स्वतंत्रा चिन्तन और स्वतंत्रा अभिव्यकित के अवसर दिए जाते हैं, उनमें जागरुक नागरिक तैयार किए जाते हैंऋ लोकतंत्रा में जनता को नियमों के पालन करने के साथ-साथ स्वतंत्रा चिन्तन और स्वतंत्रा अभिव्यकित के अवसर भी दिए जाते हैं, उनमें जागरुक नागरिक तैयार किए जाते हैं। लोकतन्त्रा में नागरिक शासन द्वारा निशिचत नियमों का पालन तो करते हैं पर जब इन नियमों से जनता को लाभ नहीं होता तो वे उनमें परिवर्तन करने के लिए आवाज उठाने का अèािकार भी रखते हैं।       

 आज के इस युग में किसी भी देश की शिक्षा का यह एक अनिवार्य उíेश्य है। इसके द्वारा कोर्इ भी राष्ट्र अपनी मान्यताओं के अनुसार नागरिकों का निर्माण करता हैऋ वह उन्हें अपने अèािकारों एवं कर्तव्यों का ज्ञान कराता है और तदनुकूल व्यवहार करने की ओर प्रवृत्त करता है। इससे नागरिकों में राष्ट्र के प्रति कत्र्तव्य बोèा होता है, वे उसके उत्थान के लिए क्रियाशील होते हैं। राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए तो शासनतन्त्रा और नागरिकता की शिक्षा परम आवश्यक होती है।

;8द्ध राष्ट्र की आवश्यकता एवं आकांक्षाओं की पूर्ति का उíेश्य µ शिक्षा के क्षेत्रा में राष्ट्र की आवश्यकताओं की आकांक्षाओं की पूर्ति का अर्थ है ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करना कि यथा आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ति हो। उदाहरणार्थ आज हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या पिछड़ेपन की हैऋ इसके लिए हम वैज्ञानिक प्रवृत्ति के विकास पर बल दे रहे हैं, विज्ञान और तकनीकी के प्रयोग से देश के आèाुनिकीकरण पर बल दे रहे हैं। हमारे देश के सामने दूसरी बड़ी चुनौती देश की बढ़ती हुर्इ जनसंख्या की हैऋ इसके लिए हमने जनसंख्या शिक्षा की व्यवस्था की है। तीसरी बड़ी समस्या साम्प्रदायिकता की हैऋ देश के नेताओं ने साम्प्रदायिकता का शोर मचाकर इसे और अèािक तूल दे दिया हैऋ इसके लिए हम èार्मनिरपेक्षता की शिक्षा की बात कर रहे हैं, सर्वèार्म समभाव की बात कर रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या तो विश्व समस्या है। औधोगिकीकरण के चक्कर में हम भी इसके शिकार हो रहे हैं। इस समस्या के समाèाान हेतु संसार भर में पर्यावरण शिक्षा की व्यवस्था की जा रही है। हमारे सामने सबसे अèािक गम्भीर समस्या है µ अलगाववाद और आंतकवाद की। इस समस्या के समाèाान के लिए हम राष्ट्रीय एकता के विकास पर बल दे रहे हैं। यह आज हमारी शिक्षा का एक प्रमुख उíेश्य है। हम जानते हैं कि यह युग अन्तर्राष्ट्रीयता का युग है अत: अन्तर्राष्ट्रीय अवबोèा की भावना का विकास भी अतिआवश्यक है और आज यह भी हमारी शिक्षा का एक उíेश्य है।

;9द्ध आèयातिमक चेतना के विकास का उíेश्य µ शिक्षा के क्षेत्रा में विकास से तात्पर्य मनुष्य को इस पूरे ब्रह्रााण्ड की वास्तविकता से परिचित कराना है, उसे अपनी आत्मशकित का ज्ञान करना है, उस परमसूक्ष्म पर परमशकितशाली सत्ता का ज्ञान कराना है। यूँ, आज राज्य द्वारा संचालित औपचारिक शिक्षा द्वारा प्रत्यक्ष रूप में इस उíेश्य की प्रापित के लिए कोर्इ प्रयत्न नहीं किया जाता परन्तु साहित्य, इतिहास, सभ्यता और संस्Ñति की शिक्षा के साथ इस सबका ज्ञान हो ही जाता है। अनौपचारिक शिक्षा में तो इसकी शिक्षा स्वाभाविक रूप से होती है। बु(, महावीर, र्इसा, महुम्मद साहब और गुरु नानक ने हमें आèयातिमक ज्ञान ही कराया है।

इसमें दो मत नहीं कि मनुष्य जीवन के तीन पक्ष हैं µ प्राÑतिक, सामाजिक और आèयातिमक। और कोर्इ व्यकित कितनी भी भौतिक उन्नति क्यों न कर लेे और कितना भी सुèाार क्यों न कर ले अपने जीवन की कला में परन्तु वह वास्तविक सुख और शानित का अनुभव तब तक नहीं कर सकता जब तक उसका आèयातिमक विकास नहीं किया जाताऋ उसे आत्मा-परमात्मा का ज्ञान नहीं कराया जाता। मनुष्य का यह तीसरा पक्ष ;आèयातिमकद्ध ही उसके प्रथम दो पक्षों µ प्राÑतिक और सामाजिक के विकास के लिए सच्चा आèाार प्रस्तुत करता है। वास्तविकता के इन तीनों पक्षों का विकास एक दूसरे पर निर्भर करता है, अत: मनुष्य के इस आèयातिमक पक्ष का विकास अवश्य होना चाहिए।

अत: हर समाज अपनी जरूरतों, इच्छाओं के अनुसार बदलाव आदि की दृषिट से अपनी शिक्षा व्यवस्था को रूप देता है। यह जरूर है कि अपनी नर्इ इच्छाओं और जरूरतों के होते हुए भी वह अपनी पुरानी परम्पराओं, मान्यताओं आदि से भी लगातार प्रभावित होता रहा है और शिक्षा की प्रक्रिया इन सभी तत्त्वों से जुड़कर कुछ पाने के लिए, समाज को देने के लिए, बच्चों के विकास के लिए आगे का रास्ता तय करती है। यही 'जो कुछ वह पाना चाहती है, शिक्षा के उíेश्य कहलाते हैं। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि शिक्षा क  उíेश्य µ

• शिक्षा की प्रक्रिया द्वारा पाए जाने वाले लक्ष्य हैं।

• ये शिक्षा को एक निशिचत दिशा देते हैं।

• ये इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हम शिक्षा के द्वारा किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं।

भारत में शिक्षा के उíेश्य

हर समाज की तरह भारत में शिक्षा के उíेश्य समय की माँग के अनुसार बदलते रहे हैं। असल में जैसे-जैसे समय बीतता है, समाज का रूप भी बदलता है और उसी के अनुसार शिक्षा का भी रूप बदल जाता है। मोटे तौर पर हम देखते हैं कि प्राचीन भारत में शिक्षा का मुख्य उíेश्य 'मुकित की चाह रही है तो बाद में समय के रूप बदलने से शिक्षा ने भी उसी तरह उíेश्य बदल लिए। अंग्रेजों के आने के बाद शिक्षा की मुख्य èाारा मुख्य रूप से अंग्रेजी शिक्षा की ओर मुड़ गर्इ और कुछ लोगों को ही शिक्षित करना उसका एक मुख्य उíेश्य बन गया।

गाँध्ी जी के समय शिक्षा को स्वदेशी जामा पहनाने की कोशिश के साथ-साथ शिक्षा को सब तक पहुुँचाने की बात हुर्इ। साथ ही यह भी माना गया कि शिक्षा आदमी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का साèान होनी चाहिए।

स्वतंत्राता के बाद, अपने संविèाान को लागू करने के बाद तो शिक्षा को सब तक पहुँचाना राज्य के कामों का जहाँ एक जरूरी हिस्सा बन गया, वहीं बराबरी, प्रजातंत्रा, भार्इ-चारा, वैज्ञानिक दृषिटकोण आदि जैसे उíेश्यों को पाने का साèान माना गया। अभी हाल ही ;यशपाल समिति 1993द्ध में शिक्षा को बच्चे में एक गहरी सोच पैदा करने वाली प्रक्रिया के रूप में जिम्मेदार माना है।

शिक्षा : एक प्रक्रिया के रूप में

अपने शाबिदक अर्थ में 'शिक्षा व्यकित एवं समाज के 'समन्वयात्मक विकास की दृषिट से सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं, कायो±, अपेक्षाओं, प्रभावों और वास्तविकताओं के परिप्रेक्ष्यों में यह एक बहुत ही व्यापक और जटिल प्रक्रिया है। सामान्य शब्दों में शिक्षा, अèयापक एवं छात्रा के बीच चलने वाली एक उíेश्यपरक प्रक्रिया है। औपचारिक रूप से अèयापक और छात्राों के बीच का संबंèा, सीखने-सिखाने का संबंèा है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि छात्रा सीखता है ;तकनीकी शब्दावली में इसे अèािगम कहते हैंद्ध और अèयापक सिखाता है ;तकनीकी शब्दावली में सिखाने की प्रक्रिया को शिक्षण कहा जाता हैद्ध। जान एडम शिक्षा को द्विèाु्रवीय प्रक्रिया मानते हैं। उनके अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया शिक्षार्थी और शिक्षक के बीच चलती है।

शिक्षा

शिक्षार्थी शिक्षक

जान डी.सी. भी शिक्षा को द्विèाु्रवीय प्रक्रिया मानते हैं। उनके अनुसार शिक्षा प्रक्रिया के दो èाु्रव µ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक हैैं।

शिक्षा

मनोवैज्ञानिक सामाजिक

  रायबर्न ने शिक्षा को त्रिèाुव्रीय प्रक्रिया माना है। उनके अनुसार शिक्षा के तीन èाु्रव हैं µ शिक्षार्थी, शिक्षक, और पाठय-चर्या। शैक्षिक तकनीकी के विकास से पूर्व तक शिक्षा के यही तीन अंग अथवा èाु्रव माने जाते रहे। इन्हें हम निम्न रूप से प्रकट कर सकते हैं।

शिक्षार्थी

शिक्षा

शिक्षक पाठयचर्या

शैक्षिक मूल्यांकन विशेषज्ञों ने शैक्षिक प्रक्रिया को, शैक्षिक लक्ष्यों, उनकी प्रापित के लिए सीखने-सिखाने की परिसिथतियों और मूल्यांकन विèाियों के बीच विभाजित किया है। उनके अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया इन तीनों के बीच ही चलती है।

शैक्षिक लक्ष्य

सीखने-सिखाने की परिसिथतियाँ मूल्यांकन प्रविèाियाँ

इस आèाुनिक युग में शैक्षिक तकनीशियनों ;शैक्षिक तकनीकी विशेषज्ञद्ध ने शिक्षा को निम्न रूप से दर्शाया है।

शिक्षार्थी

शिक्षक सीखने-सिखाने की परिसिथतियाँ

इस प्रकार शिक्षा प्रक्रिया को इन्हीं तीनों ;शिक्षार्थी, शिक्षक व सीखने-सिखाने की परिसिथतियोंद्ध के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

शिक्षार्थी जिसे सिखाया जाना है, महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सभी गतिविèाियों का आयोजन उसी को केन्द्र में रखकर किया जाता है। सिखाने में शिक्षक की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है तथा भौतिक मानसिक वातावरण, शिक्षण विèाियाँ, शिक्षण सामगि्रयाँ आदि मिलकर सीखने-सिखाने की परिसिथतियों को बनाती हैं। अत: शिक्षा की प्रक्रिया इनमें से किसी एक भी अनुपसिथति में पूर्ण नहीं हो सकती है।

शिक्षा को प्रक्रिया के रूप में समझने के लिए यह भी आवश्यक है कि इसके अनेक रूपों की चर्चा की जाए। व्यवस्था की दृषिट से देखें तो शिक्षा के तीन रूप होते हैं µ

• औपचारिक शिक्षा

• अनौपचारिक शिक्षा

• निरौपचारिक शिक्षा

• औपचारिक शिक्षा ;थ्वतउंस म्कनबंजपवदद्ध µ वह शिक्षा जो विधालयों, महाविधालयों और विश्वविधालयों में चलती हैं, औपचारिक शिक्षा कही जाती है। इस शिक्षा के उíेश्य, पाठयचर्या और शिक्षण विèाियाँ, सभी निशिचत होते हैं। यह योजनाब( होती है और इसकी योजना बड़ी कठोर होती है। इसमें सीखने वालों को विधालय, महाविधालय अथवा विश्वविधालय की समय सारणी के अनुसार कार्य करना होता है। इसमें परीक्षा लेने और प्रमाण पत्रा प्रदान करने की व्यवस्था होती है। इस शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह व्यकित, समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। यह व्यकित में ज्ञान और कौशल का विकास करती है और उसे किसी व्यवसाय अथवा उधोग के लिए योग्य बनाती है।

 परन्तु यह शिक्षा बड़ी व्यय साèय होती है। इससे èान, समय व ऊर्जा सभी अèािक व्यय करने पड़ते हैं।

• निरौपचारिक शिक्षा ;छवद.थ्वतउंस म्कनबंजपवदद्ध µ वह शिक्षा जो औपचारिक शिक्षा की भाँति विधालय, महाविधालय, और विश्वविधालयों की सीमा में नहीं बाँèाी जाती है। परन्तु औपचारिक शिक्षा की तरह इसके उíेश्य व पाठयचर्या निशिचत होती है, पफर्क केवल उसकी योजना में होता है जो बहुत लचीली होती है। इसका मुख्य उíेश्य सामान्य शिक्षा का प्रसार और शिक्षा की व्यवस्था करना होता है। इसकी पाठयचर्या सीखने वालों की आवश्यकताओं को èयान में रखकर निशिचत की गर्इ है। शिक्षणविèाियों व सीखने के स्थानों व समय आदि सीखने वालों की सुविèाानानुसार निशिचत होता है। प्रौढ़ शिक्षा, सतत शिक्षा, खुली शिक्षा और दूरस्थ शिक्षा, ये सब निरौपचारिक शिक्षा के ही विभिन्न रूप हैं।

इस शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके द्वारा उन बच्चों  व्यकितयों को शिक्षित किया जाता है जो औपचारिक शिक्षा का लाभ नहीं उठा पाए जैसे : µ

• वे लोग जो विधालयी शिक्षा नहीं पा सके ;या पूरी नहीं कर पाएद्ध।

• प्रौढ़ व्यकित जो पढ़ना चाहते हैं।

• कामकाजी महिलाएँ

• जो लोग औपचारिक शिक्षा में ज्यादा व्यय ;èान समय या ऊर्जा किसी स्तर पर खर्चद्ध नहीं कर सकते।

इस शिक्षा द्वारा व्यकित की शिक्षा को निरन्तरता भी प्रदान की जाती है, उन्हें अपने-अपने क्षेत्रा के नए-नए आविष्कारों से परिचित कराया जाता है और तत्कालीन आवश्यताओं की पूर्ति के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।

• अनौपचारिक शिक्षा ;प्दवितउंस म्कनबंजपवदद्ध µ वह शिक्षा जिसकी कोर्इ योजना नहीं बनार्इ जाती हैऋ जिसके न उíेश्य निशिचत होते हैं न पाठयचर्या और न शिक्षण विèाियाँ और जो आकसिमक रूप से सदैव चलती रहती है, उसे अनौपचारिक शिक्षा कहते हैं। यह शिक्षा मनुष्य के जीवन भर चलती है और इसका उस पर सबसे अèािक प्रभाव होता है। मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षण में इस शिक्षा को लेता रहता है, प्रत्येक क्षण वह अपने सम्पर्क में आए व्यकितयों व वातावरण से सीखता रहता है। बच्चे की प्रथम शिक्षा अनौपचारिक वातावरण में घर में रहकर ही पूरी होती है। जब वह विधालय में औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने आता है तो एक व्यकितत्त्व के साथ आता है जो कि उसकी अनौपचारिक शिक्षा का प्रतिपफल है।

व्यकित की भाषा व आचरण को उचित दिशा देने, उसके अनुभवों को व्यवसिथत करने, उसे उसकी रुचि, रुझान और योग्यतानुसार किसी भी कार्य विशेष में प्रशिक्षित करने तथा जन शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के लिए हमें औपचारिक और निरौपचारिक शिक्षा का विèाान करना आवश्यक होता है।