SM-2

1 (ग) हिन्दी कविता का प्रवृत्तिगत इतिहास

(ग) हिन्दी कविता का प्रवृत्तिगत इतिहास

-डा. मंजुला मोहन

-डा. शुभलक्ष्मी

Audio


हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल 1850 र्इ. के लगभग से प्रारंभ होता है। इसे 'आधुनिक इसलिए कहा जाता है कि विश्व साहित्य और संस्Ñति में पाश्चात्य देशों के प्रभाव एवं राजनीतिक विचारधारा, विज्ञान की उन्नति और मशीनीकरण के कारण जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए, जिसका प्रभाव भारतीय जन-मानस पर भी पड़ा। अपनी प्राचीन मान्यताओं और रूढ़ परंपराओं के प्रति अरुचि हुर्इ और हमने स्वतन्त्रा चिंतन को अपना पथ-प्रदर्शक मान लिया। अंग्रेजी भाषा के माèयम से भारत के शिक्षित वर्ग पर उन्नीसवीं सदी की राष्ट्रीयता का प्रभाव पड़ना आरंभ होता है, तो दूसरी ओर पाश्चात्य विचारकों-माक्र्स, डार्विन और फ्रायड का भी प्रभाव पड़ता है। अंग्रेजों की जीवन-शैली, उनके सोचने समझने के ढंग तथा उनकी भाषा के अनुदित विश्व-साहित्य ने हमें वैज्ञानिक युग में ला खड़ा किया। सन 1857 के विæोह के बाद भारत की राजनीति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। भारतीय जनता जिस तरह की धारणाओं और विचारों के प्रभाव में थी, वह सभी इस विæोह के असफल होने के कारण निमर्ूल सिद्ध हुआ। तब उसे लगा कि अपनी दयनीय दशा को सुधारने के लिए उसे स्वयं ही प्रयत्न करना होगा। उसी समय में महारानी विक्टोरिया के शासन की घोषणा हुर्इ। यह घोषणा उदार नीति लिए हुए थी, जिसका भारतीयों पर फिर से राजभä कि असर पड़ा। एक ओर राजभä,ि दूसरी तरफ देशभä;ि इनकी मिश्रित भावना इस रूप में देखी जा सकती है-

''अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।

पे धन विदेश चलि जात, यहै अति ख्वारी।ß

इन पंäयिें के रचयिता भारतेन्दु हरिश्चन्æ ने इस युग की कविता को एक नर्इ दिशा प्रदान की। उन्होंने 'कविवचन सुधा पत्रिका के माèयम से नवयुग की चेतना का संचार और विस्तार किया। इससे पूर्व भäकिलीन कविता में जहाँ आèयातिमकता की प्रधानता थी और समाज को केन्æ में रखकर तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुरूप र्इश्वर भä किे महत्त्व दिया गया। तदुपरांत रीतिकालीन श्रृंगारिक कविता में दरबारी संस्Ñति की झलक मिलती है। आधुनिक कालीन कविता में जनता की, विशेष रूप में मèयम वर्ग की सांस्Ñतिक चेतना का विकास होता है।

भारतेन्दु और उनके सहयोगी कविगणों ने विषय और शिल्प की दृषिट से ब्रजभाषा काव्य की परंपराओं का प्रभाव तो ग्रहण किया, लेकिन साथ ही तत्कालीन देश काल के सामाजिक स्पंदन और जातीय जागरण से जुड़े आंदोलनों को भी अपनी कविता का विषय बनाया। भारतेन्दु युग को आधुनिक-काल का प्रवेश-द्वार भी कहा जा सकता है और प्रवृत्तियों की दृषिट से संधिकाल माना जा सकता है। वस्तुत: कविता की दृषिट से कवियों का जहाँ पुरानी परंपराओं से मोह अभी छूटा नहीं था और दूसरी ओर नवयुग की नवीन भावना भी अपना प्रभाव दिखाने लगी थी। आचार्य रामचन्æ शुक्ल के शब्दों में, ''प्राचीन और नवीन के इस संधिकाल में जैसी शीतल कला का संचार अपेक्षित था वैसी ही शीतल कला के साथ भारतेन्दु का उदय हुआ, इसमें संदेह नहीं। मातृभूमि प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, गोरक्षा, बालविवाह निषेध, शिक्षा-प्रसार का महत्त्व, मध निषेध आदि विषयों को कविगण अधिकाधिक अपनाने लगे थे। ब्रह्रासमाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, रामÑष्ण परमहंस और विवेकानंद के विचारों तथा थियासाफिकल सोसाइटी के सिद्धान्तों का प्रभाव भी जन जीवन पर जिस रूप से पड़ रहा था, वह भी कवियों का विषय बना। आर्थिक, औधोगिक, धार्मिक क्षेत्राों में पुनर्जागरण की प्रक्रिया का प्रारंभ होना, पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली के कारण वैयकितक स्वतंत्राता की प्रेरणा तथा अंग्रेजी भाषा के प्रचार प्रसार के कारण विश्वस्तरीय प्रभावों का जन मानस तक पहुँचना आदि सिथतियों के कारण देश में राष्ट्रीय भावना के विकास का उचित वातावरण बन रहा था। परिणामत: तत्कालीन साहितियक काव्यधारा मèयकालीन रचना प्रवृत्तियों तक ही सीमित न रहकर नवीन दिशाओं की ओर उन्मुख होने लगी थी।