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3 पाठ 3 भारत एवं विश्व व्यापार संगठन

पाठ 3

 भारत एवं विश्व व्यापार संगठन

अर्थ:-

विश्व व्यापार संगठन (WTO) एक बहुपक्षीय संगठन है जो विश्व के विभिन्न देशों के मèय वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार की सुविधा एवं निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा प्रदान करता है। यह 149 सदस्य देशों का संगठन है, जो वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात-निर्यात को सरल बनाते हैं। WTO का प्रमुख उíेश्य विश्व-आय को व्यापार के जरिए बढ़ावा एवं सदस्य देशों के समृ)ि के स्तर को ऊँचा उठाना हैं। WTO जनवरी 1ए1995 को असितत्व में आया। WTO पूर्ववर्ती तटकर एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (GENERAL AGREEMENT ON TARIFF AND TRADE) का ही नया रूप है, जिसे GATT से अèािक शकितयां एवं कार्य सौंपे गए, GATT की स्थापना सन 1948 में द्वितीय विश्व यु) के तुरन्त बाद 23 सदस्य देशों ने मिलकर की थी। GATT के अन्तर्गत सन 1994 तक आठ व्यापार वार्ताएँ हो चुकी हैं। अंतिम व्यापार वार्ता उरूग्वे दौर थी, जिससे विश्व व्यापार संगठन (WHO) की स्थापना हुर्इ।

WTO के उíेश्य

WTO का उíेश्य विश्व व्यापार को मुक्त सरल एवं निष्पक्ष बनाना है। इन उíेश्यों को प्राप्त करने हेतु ज्व् ने कुछ कार्य सुनिशिचत किए हैं जो इस प्रकार से हैं-

•             WTOव्यापार समझौता के प्रशासक के रूप में।

•             व्यापारिक बातचीत के लिए फोरम (Forum) के रूप में।

•             व्यापारिक मतभेदों को सम्भालना एवं हल करना।

•             राष्ट्रीय व्यापारिक नीतियों में परिवर्तन एवं उन्हें सुचारू रूप से लागू करना।

•             सदस्य देशों की व्यापारिक नीतियों को तकनीकी एवं ट्रेनिंग कार्यक्रमों की सहायता से सुचारू बनाना।

•             विकासशील देशों को तकनीकी एवं कुशल सहायता मुहैया कराना

•             अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के मèय समन्वय स्थापित करना।

 

सि)ान्त

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अन्तर्गत लगभग सभी तरह की वस्तुओं, सेवाओं एवं कृषि संबंधित वस्तुओं के व्यापारी समझौतों को शामिल किया जाता है। ये सभी समझौते निम्नलिखित सि)ान्तों पर आधारित हैं- 

(1) गैर विभेदात्मक (Non Discrimination) - इस सि)ान्त की मूल धारणा Most favoured Nation (MFNT) की रही है जिसमें यह कहा गया है कि अगर कोर्इ देश अन्य देश में उत्पादित किसी भी वस्तु पर कोर्इ लाभ, समर्थन या सुविधा प्रदान करता है तो यह लाभ, समर्थन या सुविधा स्वत: और तुरन्त इस वस्तु के उत्पादक अन्य सभी सदस्य देशों को बिना शर्त प्राप्त हो जाएंगी। 

(2) परस्परता (Reciprocity) - इस सि)ान्त के अनुसार एक देश द्वारा दी गर्इ छूटसुविधा दूसरे देश को समान रूप से मिलनी चाहिये ताकि उनके भुगतानों में ज्यादा अन्तर न हो सके। यह सुविधा उन विकासशील देशों को भी मिलनी चाहिए जो भुगतान संतुलन के संकट का सामना कर रहे हैं। यह सि)ान्त पहले गैर विभेदात्मक के साथ लागू हो ताकि विश्व व्यापार ज्यादा से ज्यादा उदारीकरण को अपना सके तथा मुक्त व्यापार अन्य सदस्य देशों के बीच में भी परस्परता से लागू हो सके। 

(3) पारदर्शिता (Transparency) - इस सि)ान्त के अनुसार सभी सदस्य देशों में लागू घरेलू व्यापार नीतियों में पारदर्शिता होनी चाहिए। सदस्य देशों को आपसी बातचीत से समयब) तरीके से टैरिफ तथा नान टैरिफ बाधाओं को दूर करना चाहिए। 

इस सि)ान्तों का यह उíेश्य है कि विश्व व्यापार मुक्त एवं सही तरीके से संचालित हो सके ताकि बाजार में प्रतियोगिता के वातावरण को बढ़ावा मिल सके।

भारत और विश्व व्यापार संगठन

भारत विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य देश है तथा विकासशील देशों के समूह को प्रस्तुत करता है, इसलिए कुछ प्रमुख समझौते जो कि भारत द्वारा हस्ताक्षरित किए गए है उनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार से हैं-

(1) टैरिफ एवं नान टैरिफ अवरोधों में कमी - इस समझौते के अन्तर्गत विनिर्माण वस्तुओं के संदर्भ में ऊँची टैरिफ दरों को समयब) तरीके से कम किया जाए तथा परिणामात्मक प्रतिबंधों को हटा लिया जाए, जिससे दीर्घकाल में प्रतियोगी वातावरण विश्व व्यापार में स्थापित हो सके।

(2) व्यापार संबंध निवेश उपाय -

इस समझौते के अनुसार मेजबान देश को विदेशी निवेश एवं घरेलू निवेश की विभेदात्मक नीतियों को दूर करना चाहिए। अर्थात सभी देशों के मध्य मुक्त विदेशी निवेश नीतियों का पालन होना चाहिए।

(3) व्यापार संब) बौ)िक संपदा अधिकार (TRIPS)

भारत के दृषिटकोण से एक अत्यन्त चिन्ता का विषय ज्त्प्च्ै का क्षेत्रा है। उरूग्वे दौर में विकसित देशों ने इन अèािकारों के संरक्षण के लिए कर्इ कड़ी शर्तों को विकासशील देशों पर थोपा है। इसका उíेश्य विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुँचाना है। भारत के 1970 पेटेंट एक्ट के अèाीन औषèाियों पर केवल प्रक्रिया पेटेंट लेने की जरूरत होती थी, अर्थात किसी भी भारतीय कम्पनी के लिए केवल इतना काफी था कि वह कोर्इ औषèाि बनाने की अपनी प्रक्रिया या रीति विकसित करे और फिर उस पर पेंटट ले ले। औषधियों का उत्पादन वही कंपनियाँ कर पाएंगी जिन्हें उनका उत्पाद पेटेंट प्राप्त हो, क्योंकि उत्पाद पेटेंट अधिकार विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास हैं इसलिए इसका अर्थ यह है कि यही कम्पनियाँ उत्पाद पेटेंट वाली औषधियों का उत्पादन कर सकेगी फलस्वरूप इससे भारतीय औषधि उत्पादक इकार्इयों को गहरा झटका लगेगा तथा बहुत.सी महत्त्वपूर्ण दवार्इयों की कीमते बढ़ जाएगीं और गरीब व्यäयिें की पहुँच से औषèाियाँ बाहर हो जाएगी, जिससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक सर्वे के अनुसार औषèाियों में उत्पाद पेटेंट के लागू होने से भारत को प्रतिवर्ष 1ण्4 विलियन डालर से 4ण्2 विलियन डालर के बीच कल्याण Ðास (मसंितम.समेे) हो सकता है।

(1) (Nagesh kumar, "Intellectual Property Rights Technology and Economic Development". Economic and Political Weekly January 18,2003.PP221-22)

(4) कृषि पर समझौता (Agreement on Agriculture)

- इस समझौते के अन्तर्गत सभी सदस्य देशों को बाजार पहुँच, निर्यात सहायता, सरकारी सहायता को कृषि वस्तुओं के संदर्भ में कम करना होगा ताकि विश्व व्यापार मुक्त एवं प्रतियोगी वातावरण में आगे बढ़ सके, जिसके फलस्वरूप भारतीय कृषि वस्तुओं को विदेशी बाजार प्राप्त हो सके एवं वस्तुओं की गुणवत्ता बढ़ सके।

(5) बहु फार्इबर समझौता (Multi-Fiber Agreement) - WTO के विशेषज्ञों का मानना है कि जनवरी 1,2005 में बहु-फार्इबर समझौते के समाप्त होने से विकासशील देशों को बहुत लाभ मिलेगा, क्योंकि भारत कपड़ों का काफी निर्यात करता हैं, इसलिए श्डथ्।श् के समाप्त होने से उसे विकसित देशों का एक बड़ा बाजार मिल जायेगा, परन्तु भारत को विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा। इसलिए भारत को अन्य देशों जैसे चीन, वियतनाम, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया इत्यादि के वस्त्रा उधोगों की तुलना में उत्पाद की किस्म (गुणवत्ता) एवं लागत को प्रतियोगी बनाना होगा। संभवत: कोटा-मुक्त वातावरण में सबसे अधिक लाभ चीन को मिलेगा, क्योंकि वह अपेक्षाकृत अधिक प्रतियोगी (गुणवत्ता एवं कीमत से संदर्भ में) है।

निष्कर्ष

भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ज्व् के अन्तर्गत यह उम्मीद की जाती हैं कि वस्त्रा उधोग क्षेत्रा, चमड़ा एवं चमड़ा उत्पाद क्षेत्रा, टेक्सटाइल क्षेत्रा, खाधक्षेत्रा, पेय पदार्थ क्षेत्रा, तम्बाकू इत्यादि क्षेत्राों में उत्पादन एवं निर्यात विकास की प्रचुर संभावनाएँ निहित हैं। हालांकि, बदलते वातावरण में जिसमें प्रतियोगी एवं मुक्त बाजार में हमें नर्इ नीतियों को पारदर्शिता से तथा विकासशील देशों के संदर्भ में पुन: विचार करते हुए गम्भीरता से दृषिट डालने की आवश्यकता है।