Study Material-1

2 1. निबन्ध्

2.2 2. कविता क्या है? (रामचन्द्र शुक्ल)

2. कविता क्या है?

(रामचन्द्र शुक्ल)

लेखक-परिचय

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 र्इ. की आशिवन शुक्ल पूर्णिमा को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना ग्राम में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा मिर्षापुर में हुर्इ। उन दिनों हिन्दी के पठन-पाठन का विशेष-महत्त्व नहीं था, इसलिए शुक्ल जी की आरमिभक शिक्षा उदर्ू के माèयम से हुर्इ। यधपि उन्होंने इंटरमीडिएट तक ही शिक्षा ग्रहण की किंतु पढ़ने-लिखने में रुचि होने के कारण अंग्रेजी, हिन्दी, उदर्ू एवं संस्Ñत साहित्य का व्यापक ज्ञान इन्होंने स्वाèयाय से प्राप्त किया।

आरंभ में कुछ समय के लिए उनकी नियुकित एक सरकारी कार्यालय में 20 रु. मासिक वेतन पर हुर्इ परंतु उसका मन बहुत दिनों तक यहाँ नहीं रम पाया। कुछ समय बाद वे मिर्षापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग टीचर के रूप में नियुक्त हुए। यहीं से उनका साहित्य-प्रेम जाग्रत हुआ और पं. बदरीनारायण प्रेमध्न के संपर्क से उनके हिन्दी-प्रेम को प्रोत्साहन मिला। इसी समय वे लेखन-कार्य में पूरी तरह जुट गये। 'सरस्वती इत्यादि पत्रिकाओं में उनकी कहानी, कविता, निबंध् छपने लगे और उनकी पहचान हिन्दी के लेखक के रूप में होने लगी। 'नागरी प्रचारिणी सभा में सहायक संपादक के रूप में कार्य करने का आमंत्राण मिलने पर वे काशी आकर रहने लगे। कोश के संपादन का कार्य समाप्त होने पर वे बनारस हिन्दू विश्वविधालय के हिन्दी विभाग में प्राèयापक के रूप में नियुक्त कर लिये गये। बाद में उन्होंने अèयक्ष पद की गरिमा को बढ़ाया और अंत तक उसी पद पर बने रहे। अनेकमुखी साहितियक प्रतिभा के ध्नी इस साहित्यकार का देहावसान 2 पफरवरी 1941 को हुआ।

शुक्ल जी की साहितियक प्रतिभा अनेकमुखी थी। वे कवि, नाटककार, निबंध्कार, आलोचक, अनुवादक, संपादक, साहित्य के इतिहासकार और कोशकार-सभी कुछ थे। हिन्दी साहित्य का पहला और सर्वश्रेष्ठ इतिहास 'हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने का श्रेय शुक्ल जी को जाता है। उनका कोश 'हिन्दी शब्द सागर हिन्दी का पहला पूर्ण और प्रामाणिक कोश माना जाता है। इनकी कीर्ति का आधर-स्तंभ उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

निबंध्- विचारवीथि, चिन्तामणि (भाग 1 और 2)

समीक्षा- जायसी, सूर और तुलसी पर लिखी आलोचनाएँ, रसमीमांसा।

कहानी- ग्यारह वर्ष का समय।

अनुवाद- लाइट आपफ एशिया का 'बु(चरित नाम से काव्यानुवाद, 'दि मिस्ट्री आपफ युनीवर्स का विश्व प्रपंच नाम से अनुवाद और राखालदास बनर्जी के उपन्यासों का अनुवाद-शशांक एवं करूणा।

साहित्येतिहास- हिन्दी साहित्य का इतिहास।

कविता- âदय का मध्ुर भार तथा अन्य कविताएँ।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने यधपि साहित्य की अनेक विधओं पर अपनी लेखनी चलार्इ है तथापि हिन्दी साहित्य में उनकी निष्ठा मुख्यत: निबंध्कार के रूप में हुर्इ। 'चिंतामणि उनके निबंधें का संग्रह है, जिसमें उन्होंने विभिन्न विषयों पर बौ(िक निबंध् रखे हैं। श्र(ा, भकित, करूणा, लज्जा, उत्साह, क्रोध् आदि विषयों पर लिखे गये उनके निबंध् बौ(िक विवेचन से युक्त होने के साथ-साथ व्यंग्य विनोद की छुअन लिये हुए है। इसी प्रकार शुक्ल जी के आलोचनात्मक निबंधें-कविता क्या है, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, तुलसी का भकितमार्ग, काव्य में लोकमंगल की साध्वास्था, साधरणीकरण और व्यकित वैचिंत्रयवाद आदि में भी उनकी विद्वता दृषिट का परिचय मिलता है।

आचार्य शुक्ल : निबन्ध्-शैली

डा. नत्थन सिंह

मेरठ विश्वविधालय

शुक्ल जी की निबन्ध् विषयक मान्यता में पाश्चात्य लक्षणों का प्रभाव है। अर्थात निबन्ध् में व्यकितत्व और व्यकितगत विशेषता की संतुलित स्वीÑति वे मानते हैं। किन्तु सुसम्ब( विचार-श्रृंखला तथा प्रÑत अर्थ योजना के अभाव में उच्छृंखल-विचार प्रवाह को शुक्ल जी ने स्वीकार नहीं किया है। निबन्ध् लेखक स्वेच्छा से विषय की सीमाओं में विचरण करता हुआ अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्रा है, किन्तु किसी न किसी सम्बन्ध् सूत्रा का

आधर उसके पास होना चाहिए। निबन्ध् लेखक के लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपनी सम्पूर्ण मानसिक सत्ता के साथ-'अर्थात बु(ि और भावात्मक âदय दोनों के लिए हुए-अपने विषय-प्रतिपादन में प्रवृत हो। लेखक की प्रÑति का प्रभाव उसकी रचना पर पड़ना सहज है अत: करुण, विनोद, गम्भीर (आदि व्यवस्थाओं का प्रतिपफलन निबन्धें में यथा-स्थान देखा जा सकता है। अर्थगत विशेषता के आधर पर भाषा और अभिव्यंजना-शैली में परिवर्तन भी शुक्ल जी आवश्यक समझते हैं। शुक्ल जी के मन में निबन्ध्-लेखन एक गूढ़ और गम्भीर कार्य है। विचारोदभावना और विचारोत्तेजना करना निबन्ध् का प्रधन गुण होना चाहिए। ''निबन्ध् पढ़ते ही पाठक की बु(ि उत्तेजित होकर किसी नर्इ विचार प(ति पर दौड़ पड़े, वही निबन्ध् अपने उíेश्य में सपफल समझा जाएगा। इसी कारण विचारात्मक निबन्धें का शुक्ल जी सर्वश्रेष्ठ कोटि का निबन्ध् मानते हैं। शुक्ल जी ने अपने निबन्धें में उपयर्ुक्त मान्यताओं को पूरी तरह स्थान दिया है। उक्त मान्यताओं के आधर पर हम शुक्ल जी के 'चिन्तामणि में संकलित निबन्धें पर विचार करेंगे।

'चिन्तामणि में संकलित निबन्धें को हम विचारात्मक कोटि के निबन्धें में स्थान देते हैं-यधपि उन निबन्धें में विचार की कोटियां समान न होकर विविध् हैं। प्रथम कोटि में वे निबन्ध् आते हैं जिन्हें शुक्ल जी ने स्वयं भाव या मनोविकार शीर्षक से मनोवैज्ञानिक वृत्तियों, सिथतियों, और भावनाओं के प्रस्पुफटन के लिए लिखा है। उत्साह, श्र(ा भकित, करुणा, लज्जा और ग्लानि, लोभ और प्रीति, घृणा, र्इष्र्या भय और क्रोध्-ये नौ निबन्ध् इस प्रथम कोटि के विचार प्रधन मनोवैज्ञानिक निबन्ध् हैं। दूसरी कोटि साहित्य विचार प्रधन निबन्धें की है जिनको उíेश्य की दृषिट से दो भागों में विभक्त किया जाता है। प्रथम वर्ग में निबन्ध् हैं जो साहित्य के सै(ानितक (शास्त्राीय) पक्ष का विवेचण-विश्लेषण प्रस्तुत करने के उíेश्य से लिखे गये हैं। जैसे कविता क्या है, काव्य में लोक-मंगल की

साध्नावस्था, साधरणीकरण और व्यकित-वैचित्रयवाद तथा रसात्मक बोध् और विविध्-प्रकार। चिन्तामणि (द्वितीय भाग) के तीनों निबन्ध् भी सै(ानितक समीक्षा के अन्तर्गत आते हैं। अत: उनका विवेचन भी इसी कोटि के भीतर किया जाएगा। दूसरे वर्ग में हम उन निबन्धें को स्थान देंगे जो साहितियक समीक्षा के व्यवहारिक पक्ष को लेकर लिखे गये हैंऋ जिनमें 'भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, 'तुलसी का भकित मार्ग और 'मानस की ध्र्म-भूमि आते हैं। हम क्रमश: इन निबन्धें की शैली पर नीचे के पंकितयों में अपने विचार व्यक्त करेंगे।

शुक्ल जी ने भावों और मनोविकारों को निबन्ध् के लिए एक विशिष्ट उíेश्य से ग्रहण किया था। समस्त मानव जीवन के प्रवर्तक भाव या मनोविकार ही होते हैं अत: सामान्य क्रिया व्यापार से लेकर गम्भीर काव्यादि रचना तक इन्हीं को प्रभाव व्याप्त रहता है। जब तक इनके स्वरूप का बोध् न होगा तब तक मन की प्रवृत्तियों की प्रतीति भी सम्भव नहीं होगी। शुक्ल जी ने इस तथ्य को भली भांति समझकर इन विषयों के विश्लेषण का कार्य अपने हाथ में लिया। भाव और मनोविकार के साथ प्रत्येक मानव का परिचय होता है किन्तु उनके उदभव, विकास और गति को समझना बड़े-बड़े पंडितों और ज्ञानियों के लिए दुष्कर है। यही कारण है कि इन विषयों पर हिन्दी में तो किसी लेखक ने लिखने का साहस ही नहीं किया, अन्य भाषाओं में भी बहुत कम इन विषयों पर लिखा गया है। भारतेन्दु तथा द्विवेदी कालीन निबन्ध् लेखकों ने इन्हें दर्शन की परिधि में समझ कर स्पर्श नहीं किया। द्विवेदी जी ने भय और क्रोध् आदि विषयों पर दो-तीन निबन्ध् लिखें जो सतही स्पर्श के सिवा किसी गूढ़ अभिप्राय की व्यंजना नहीं कर सके। मनोवेगों की उत्पत्ति और उनके लक्षण तथा विकास की दृषिट में रख कर तो कोर्इ लेखक विचार ही नही कर सका था। मनोवैज्ञानिक आधर पर साहितियक शैली में मनोवेगों का सबसे पहली बार आचार्य शुक्ल ने ही विवेचन प्रस्तुत किया।

इन निबन्धें पर विचार करते समय सबसे पहला प्रश्न यह उपसिथत होता है कि मनोवेग या मनोविकार साहितियक परिधि के विषय हैं या मनोवैज्ञानिक होने के कारण दार्शनिक कोटि में रखे जाने योग्य हैं। कुछ विद्वानों ने इन्हें दर्शन का विषय समझकर यह व्यवस्था दे डाली है कि इन विषयों की मीमांसा शास्त्राीय चिन्तन है, साहितियक अभिव्यकित नहीं। इस शंका के निवारणार्थ हम इन निबन्धें के मौलिक स्वरूप का उदघाटन आवश्यक समझते हैं।

दर्शन या मनोविज्ञान चिन्तन-मनन की गूढ़ गम्भीर प्रक्रिया है। वस्तु तथ्य का बोध् और उदघाटन उसका उíेश्य है। तथ्यानुशीलन के कारण बौ(िक तर्क और प्रमाण की शुष्क प(ति उसका आधर बनती है। किन्तु इसके विपरीत काव्य या साहित्य आत्मानुभूति की सरस अभिव्यकित है जो भाव-सत्य पर केनिद्रत होकर मन की संवेदनशील गतियों का परिचय देती है। किसी बौ(िक तत्व की ग्रहण कर उसकी विवृति करना साहित्य का उíेश्य नहीं होता। âदय की रागातिमका वृत्ति के द्वारा सौंदर्य और आनन्द को मूत्र्त करना काव्य या साहित्य का èयेय है। अत: कोर्इ भी साहितियक उपक्रम दार्शनिक मतवाद के साथ अपना पूर्ण तादात्म्य करके जीवित नहीं रह सकता। शुक्ल जी इस तथ्य से भली भांति परिचित थे अत: वे अपनी आत्माभिव्यकित और अनुभूति को दर्शन की शुष्क और नीरस सीमाओं में आब( क्यों करते?

इन निबन्धें में शुक्ल जी ने विषय-प्रतिपादन करते समय यह èयान रखा है कि अपनी अनुभूति और प्रतिनिधि को प्रमुख स्थान मिले, शास्त्राीय वचनों का दामन पकड़कर किसी सि(ान्त की स्थापना न की जाय। किस भाव, विचार या मनोवृत्ति का स्वप्न प्रतिपादन करने में शुक्ल जी ने कहीं भी शास्त्रा का सहारा नहीं लिया। जीवन में प्रतिपफलित होने वाले व्यापारिक दर्शन को पकड़ कर भावों और मनोवेगों की व्याख्या की गर्इ है। कहीं व्यकित के माèयम से इनका वर्णन हुआ है तो कहीं सामाजिक प्रभाव दिखाकर इसका आकलन किया गया है। अत: इन निबन्धें का शास्त्राीय या दार्शनिक विवेचन समझना सरासर भूल है। शुक्ल जी जिस प्रकार साहित्य-विवेचना में रसवादी परिपादन के समर्थ थे वैसे ही इन निबन्धें में भी उनकी रसग्राहिता प्रतिबिमिबत होती दृषिटगत होती है।

मनोवेगों का हमारे जीवन के साथ शाश्वत सम्बन्ध् है। ये मनोवेग एक ओर जहाँ हमारे आèयातिमक जी का निर्माण करते हैं वहीं दूसरी ओर ये हमारे भौतिक अर्थात सांसारिक जीवन का भी नियन्त्राण और निर्माण करने वाले हैं। शुक्ल जी ने मनोविकार (इमोशन) तथा भाव-वृत्तियों (सेंटीमेंट) के वर्णन में उनकी इस द्विविध् कार्य क्षमता का èयान रखा है। साहित्य और जीवन को समपृक्त करके देखने की दिशा में इन निबन्धें का अपूर्व योगदान देकर शुक्ल जी ने अपनी साहित्य-समीक्षा में जिन मान्यताओं को स्थापित किया, यथार्थ में उनका मूलाधर इन मनोविकार-विषयक निबन्धें में ही है। आलोचना के मानदंड के रूप में शुक्ल जी ने इन भाववृत्तियों को स्वीकार किया था। इसी कारण इन पर प्रकाश डालना उन्हें अनिवार्य प्रतीत हुआ। दर्शन की गहन-गूढ़ जटिलता में इनका विश्लेषण उन्हें अभिप्रेत न था। जीवन के व्यवहार पक्ष और साहित्य के वण्र्य पक्ष को इन निबन्धें के मार्ग से एक सूत्रा में पिरोकर प्रस्तुत किया गया, यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता है।

विश्लेषण और व्याख्या का चरमोत्कर्ष इन निबन्धें का शैलीगत सौंदर्य है। विश्लेषण के लिए समता-मता प्रदर्शन, व्यास और समास शैली का ग्रहण, आगमन तथा नियमन-प(ति का सम्यक समन्वय स्थान-स्थान पर जा सकता है।

समास शैली से जहाँ भावाभिव्यकित हुर्इ है, वहाँ निबन्धें में सूत्रात्मक संक्षिप्तता, सौष्ठव और सुसम्ब(ता का सौंदर्य देखा जा सकता है। विशद भावखंड को सूत्रा के सीमित कलेवर में आब( करना एक दुरूह प्रक्रिया है।

लेखक ही इस शैली से विचार व्यक्त करने में सपफल होते हैं जो भाव को भली-भांति पचाकर उसके अनावश्यक विस्तार और अनपेक्षित आवरण को त्यागने में प्रवीण हों। सूत्राात्मक परिभाषाएं सिथर करना तो इससे भी एक कदम आगे की दुस्साèय कला है। शुक्ल जी ने अपने निबन्धें में इस प्रकार की बीसियों सूत्राात्मक परिभाषाए  प्रस्तुत करके अपनी तत्वाभि-निवेशिनी प्रतिभा का परिचय दिया है। उदाहरणार्थ सूत्रा-शैली की कतिपय परिभाषाएं मनन करने योग्य हैं :

(क) 'भकित ध्र्म की रसात्मक अनुभूति है। (चिन्तामणि पृ. 5)

(ख) 'साहसपूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है। (चिन्तामणि पृ. 6)

(ग) 'श्र(ा महत्व की आनन्दपूर्ण स्वीÑति के साथ-साथ पूज्य बु(ि का संचार है। (चिन्तामणि, पृ. 17)

(घ) 'वैर क्रोध् का अचार या मुरब्बा है। (चिन्तामणि, पृ. 138)

(Ä) 'काव्य में अर्थ ग्रहण मात्रा से काम नहीं चलता, बिम्ब ग्रहण अपेक्षित होता है। (चिन्तामणि, पृ. 145)

(च) 'श्र(ा, और प्रेम के योग का नाम भकित है। (चिन्तामणि, पृ. 32)

समास शैली का दूसरा रूप वहाँ मिलता है जहाँ लेखक ने दो भावों या मनोविकारों का पारस्परिक सम्बन्ध्, साम्य-वैषम्य, तारतम्य व्यक्त किया है। इस साम्य-वैषम्य प्रदर्शन में सूत्रा रचना का चातुर्य देखकर पाठक शुक्ल जी की मेध और प्रतिभा पर विस्मय-विमुग्ध् हुए बिना नहीं रह सकता। कुछ उदाहरणार्थ द्रष्टव्य हैं :

(क) श्र(ा का व्यापार स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकान्त। प्रेम में घनत्व अधिक है और श्र(ा में विस्तार। (चिन्तामणि, पृ. 18)

(ख) यदि प्रेम स्वप्न है तो श्र(ा जागरण है। (चिन्तामणि, पृ. 18)

(ग) लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख। (चिन्तामणि, पृ. 61)

(घ) साधरण बोलचाल में वस्तु के प्रति मन की जो ललक होती है उसे लोभ ओर किसी व्यकित के प्रति जो ललक होती है उसे प्रेम कहते हैं।

(चिन्तामणि, पृ. 85)

(Ä) वैर का आधर व्यकितगत होता है, घृणा का सार्वजनिक। (चिन्तामणि, पृ. 99)

(च) र्इष्र्या का संकर भाव है जिसकी सम्प्रापित आलस्य, अभिमान और नैराश्य के योग से होती है।

(चिन्तामणि, पृ. 107)

(छ) र्इष्र्या व्यकितगत होती है और स्पर्(ा वस्तुगत। (चिन्तामणि, पृ. 108)

(ज) दु:ख वर्ग में जो स्थान भय का है वही स्थान आनन्द-वर्ग में उत्साह का है।

(चिन्तामणि, पृ. 6)

शुक्ल जी ने अपने निबन्धें में सर्वत्रा समास शैली का ही आश्रय नहीं लिया है। अनेक स्थलों पर व्यास शैली से विषय की व्याख्या प्रस्तुत कर उसका अंत में संक्षेप में सार लिखा है। व्यास शैली की विशेषता व्याख्या और विषय के परिधि-विस्तार में देखी जा सकती है। व्यास शैली में भी दो रूप है, पहला रूप तो केवल किसी भाव या विचार की व्याख्या प्रस्तुत करके उसकी विशद-परिभाषा करना है, दूसरा रूप है उस भाव या विषय की सीमा में आने वाला विविध् विचारों का मूल विषम साम्य-वैषम्य का व्यावर्तन दिखाना। अत: व्यास शैली में भी दोनों प्रकार के अनेक स्थल उपलब्ध् होते हैं। व्यास शैली से विशद परिभाषात्मक प्रसंगों के दो तीन उादाहरण हम प्रस्तुत करते हैं :

(क) उत्साह की व्यास शैली से परिभाषा-

'जिस आनन्द से कर्म की उत्तेजना उत्पन्न होती है और जो आनन्द कर्म करते समय तक बराबर चलता रहता है उसी का नाम उत्साह है।

(ख) श्र(ा की व्यास शैली से परिभाषा-               

 ''किसी मनुष्य में जन-साधरण से विशेष गुण व शकित का विकास देख उसके सम्बन्ध् में जो एक स्थायी आनन्द प(ति âदय में स्थापित हो जाती है, उसे श्र(ा कहते है।

(चिन्तामणि, पृ. 17)

(ग) लज्जा की व्यास शैली से परिभाषा-

''दूसरों के चित्त में अपने विषय में बुरी या तुच्छ धरणा होने के निश्चय या आशंका मात्रा से वृत्तियों का संकोच होता है-उसकी स्वच्छन्दता के विधन का जो अनुभव होता है उसे लज्जा कहते हैं।

(चिन्तामणि, पृ. 56)

(घ) लोभ की व्यास शैली से परिभाषा-

''किसी प्रकार का सुख या आनन्द देने वाली वस्तु के सम्बन्ध् में मन की ऐसी सिथति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्रापित, सानिनèय या रक्षा की प्रबल इच्छा जाग पड़े, लोभ कहते हैं।

दो भावों या मनोविकारों का पार्थक्या प्रदर्शित करते हुए वृत्तियों के व्यावर्तन के लिए भी व्यास शैली का सुन्दर प्रयोग किया गया है। शुक्ल जी ने व्यावर्तक ध्र्म का निर्धरण जिस गहन अनुभूति और मनोवैज्ञानिक आधर पर किया गया है वह उनकी सारग्राही प्रतिभा और मनीक्षा का निदर्शन है। घृणा और क्रोध् में पार्थक्य-प्रदर्शित करते हुए शुक्ल जी ने दोनों विषयों की प्रवृत्ति-निवृति तथा प्रेरक शकित का सूक्ष्म छानबीन के साथ विवेचन किया है। घृणा में विषय से दूर ले जाने की प्रवृत्ति है, यह प्रवृत्ति एक तरह से विषय से निवृत्ति का ही रूप है। घृणा को इसलिए शान्तभाव से सिथर किया है। क्रोध् में हानि पहुँचाने वाले के पास जाते ही उद्वेगमयी (अर्थात) प्रवृति रहती है अत: उसे प्रेरक-उत्तेजक या उद्वेगक भाव कहा जाता है। इस विषय को व्यावर्तन के आधर पर शुक्ल जी ने मनोवैज्ञानिक प(ति से प्रस्तुत कर अपनी चिन्तन शैली का अच्छा परिचय दिया है।

''घृणा का भाव शान्त है, उसमें क्रियोत्पादिनी शकित नहीं होती। घृणा निवृत्ति का मार्ग दिखाती है और क्रोध् प्रवृत्ति का। घृणा विषय से दूर ले जाने वाली है और क्रोध् हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति उत्पन्न कर विषय के पास ले जाने वाली है।

(चिन्तामणि, पृ. 99)

इसी प्रकार लोभ और प्रीति का पार्थक्य सि( करते हुए दोनों शूल प्रवृत्तिपरक ध्र्मों का शुक्लजी ने मनोविज्ञान के आधर पर वर्णन किया है। यथार्थ में लोभ और प्रीति के बीच का अन्तर इतना सूक्ष्म और क्षणिक है कि उसका व्यावत्र्तन करना कभी-कभी कठिन हो जाता है। पिफर भी शुक्ल जी ने व्यकित और वस्तु के आधर पर उसका भेद सिथर करने की सपफल चेष्टा की है। ''मन की ललक यदि वस्तु के प्रति होती है तो लोभ और किसी प्राणी या मनुष्य के प्रति होती है तो प्रीति कहलाती है। लज्जा और ग्लानि के विषय में भी लेखक ने इसी शैली का अनुसरण करके उनके ध्र्म-पार्थक्य द्वारा दोनों की सीमाएँ निर्धरित की हंै। इस वर्णन में प्राय: गहन चिन्तनपूर्ण व्यास शैली का आश्रय लिया गया है। हां, अभिव्यंजना अवश्य तत्सम-प्रधन और सुगठित पदावली द्वारा हुर्इ है। साधरण पाठक को इस प्रकार के गंभीर चिन्तनपूर्ण स्थलों पर यदि कुछ किलष्टता प्रतीत हो तो यह लेखक का नहीं पाठक के ज्ञान की सीमा का ही दोष समझा जाएगा। विचारों में सघनता होने पर भी स्वच्छता और स्पष्टता का कहीं अभाव नहीं है।

शुक्ल जी गम्भीर प्रÑति के मननशील व्यकित थे। हास्य-विनोद उनकी सहज वृत्ति नहीं थी। अत: उनकी रचनाओं में विनोदपूर्ण हास्य की खोज करना व्यर्थ है। हाँ, किसी विषय का प्रतिपादन करते समय उस पर व्यंग्यमयी शैली से प्रकाश डालने के लिए शुक्ल जी हास्य का प्रयोग करते हैं किन्तु उनका हास्य प्राय: व्यंग्यात्मक और वस्तुपरक (आब्जेकिटव) होने के कारण पाठक के सिमत आनन तक ही सीमित न रह कर उसके अन्तर में पैनी लकीर नचता चला जाता है। उनका लक्ष्य विकच हास्य नहीं-विकल व्यंग्य होता है जो अपने उíेश्य तक पैने तौर की तरह पहुँचे बिना नहीं रुकता। व्यंग्यात्मक हास्य का प्रयोग टेढ़ी-खीर है ...सामान्य कोटि लेखक के लिए यह साèय नहीं। शुक्ल जी ने भी इसका प्रयोग बहुतायत से नहीं किया है। उनके निबन्धें में इसका प्रयोग विरल है। तीन-चार स्थलों पर उनका हास्य शु( सरल हास्य ही रहा है और किसी प्रखर व्यंग्य के बिना, मृदुल मोहक हँसी तक ही अपनी शकित को समेटे रहता है। हास्य और व्यंग्य का भेद यही है कि हास्य में छींटाकशी न होकर मनोरंजन ही प्रधन लक्ष्य रहता है किन्तु व्यंग्य में वण्र्य या अभिव्यंग्य को सन्मुख रखकर सोíेश्य प्रहार करना अभीष्ट होता है। व्यंग्य की प्रखरता उसके प्रहारजन्य प्रभाव से आंकी जाती है, हास्य की केवल मनोरंजन से। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के

निबन्धें में दोनों कोटि के हास्य-व्यंग्य मिलते हैं। पिफर भी इतना èयान रखना चाहिए कि शुक्ल जी ने तामस कोटि के पूफहड़ हास्य को कहीं भी स्थान नहीं दिया। हम उनके निबन्धें में से कुछ उदाहरण दोनों प्रकार के हास्य को प्रस्तुत करते हैं।

''संगीत के पेच-पांच देखकर हठयोग याद आता है। जिस समय कोर्इ कलावन्त पक्का गाना गाने के लिये, आठ अंगुल मुंह पफैलाता है और 'अ आ करके विकल होता हे उस समय बड़े-बड़े वीरों का ध्ैर्य छूट जाता है। दिन-दिन भर चुपचाप बैठे रहने वाले आलसियों का शासन डिग जाता है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 24)

''काव्य पर शब्दालंकार आदि का इतना बोझ लादा गया कि उसका सारा रूप ही छिप गया। यदि ये कलाएं मूर्तिमान रूप धरण करके सामने आतीं तो दिखार्इ पड़ता कि किसी को जलोदर हुआ है, किसी को पफीलपाँव। इनकी दशा सोने और रत्नों से जुड़ी गुठली धर की तलवार की सी हो गर्इ। (चिन्तामणि, पृ. 25)

''रसखान तो किसी की लकुटी और कमरिया पर तीनों पुरों का राज सिंहासन तक त्यागने को तैयार थे, पर देश-प्रेम की दुहार्इ देने वालों में से कितने अपने किसी थके मादे के पफटे-पुराने कपड़ों और ध्ूल भरे पैरों पर रोश कर-या कम से कम खीझकर बिना मन मैला किये कमरे की पफर्श भी मैली होने देंगे? मोटे आदमियों, तुम जरा सा दुबले हो जाते-अपने अंदेसे से ही सही-तो न जाने कितनी ठठरियों पर मांस चढ़ जाता।

(चिन्तामणि भाग 1, पृ. 77)

''इस जमाने में वीरता का प्रसंग उठाकर वाग्वीर का उल्लेख यदि न हो तो बात अध्ूरी ही समझी जाएगी। ये वाग्वीर आजकल बड़ी-बड़ी सभाओं के मंचों पर से लेकर सित्रायों के उठाए हुए पारिवारिक प्रपंचों तक में पाए जाते हैं और कापफी तादाद में। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 14)

उपरिलिखित चारों उदाहरणों में शुक्ल जी का हास्य पाठक को मोहक हास्य के वातावरण में ले जाने की पूरी शकित रखता है। पक्के गाने वाले कलावन्त का मुँह, काव्य कलाओं को जलोदर और पफीलपांव की बीमारी मोटे आदमियों का स्वार्थ वृत्ति तथा आध्ुनिक युग के वाग्वीरों की शूर वीरता किसे हँसी से परिपूर्ण नहीं करती।

मृदुल हास्य के साथ तीखा-व्यंग्य भी शुक्ल जी के निबन्धें में प्रचुर मात्राा में मिलता है। 'हिन्दी साहित्य के इतिहास में तो व्यंग्यात्मक हास्य के बहुत ही मार्मिक उदाहरण मिलते हैं। निबन्धें में इस कोटि के व्यंग्य का प्रयोग अन्ध्विश्वास, छल, दम्भ, कपट आदि भावों को स्पष्ट करने के लिए हुआ है, ऐसे स्थलों पर व्यंग्य की èवनि एक ओर जहाँ हास्य की सृषिट करती है वहाँ दूसरी ओर उन रूढि़यों और छलनाओं के-सामाजिक या धर्मिक असंगतियों-के प्रति मन में कुत्सा और वितृष्णा का भाव भी उत्पन्न करती है। इस प्रकार के हास्य मिश्रित व्यंग्य में हल्की-सी चोट रहती है जो पाठक की चेतना को जागरित कर उसे प्रस्तुत विषय पर विचार करने के लिए बाèय कर देती है। यह शैली काव्य के अप्रस्तुत विधन का ही रूप है जिसकी सराहना निबन्ध् पढ़ने पर प्रत्येक पाठक अवश्य करेगा। 'ह्राूमर और 'सेटायर में विट का पुट देकर शुक्ल जी ने व्यंग्यात्मक हास्य का जो मिश्रण तैयार किया है वह अपनी प्रभावोत्पादन में अद्वितीय है। इन उदाहरणों से हमारे इस कथन की पुषिट होगी।

''पर ..........श्र(ाकर्षण के लिए ढाेंगी व्यकितयों का वर्णन करते हुए शुक्ल जी ने बड़ी मीठी चुटकी लेते हुए लिखा है -

''आश्चर्य नहीं कि इसके लिए कुछ दिनों में एक अलग विधालय खुले। .....आजकल सार्वजनिक उधोगों की बड़ी ध्ूम रहा करती है और बहुत से लोग निराहार परोपकार व्रत करते सुने जाते हैं।     

 लज्जा और संकोच का भेद बताते हुए संकोच को लज्जा हल्का रूप ठहराते हुए कहते हैं कि प्राय: बहुत से लोगों में यह अनेक अवसरों पर देखा जाता है। आगे इसी संकोच की बात कहते हुए व्यंग्य किया है :

''सारांश यह है कि बेवकूपफी करने में लोग संकोच नहीं करते और सब बातों में करते हैं।

ध्न के लोभ का वर्णन करते हुए बड़ा ही सुन्दर व्यंग्य किया है-''रूपये के रूप, रस, गंध् आदि में कोर्इ आकर्षण नहीं होता, पर जिस वेग से मनुष्य उस पर टूटते हैं, उस वेग से भौंरे कमल पर और कौए मांस पर भी न टूटते होंगे। आगे लोभ की वृ(ि और लक्ष्य की एकता का उल्लेख करते हुए ध्न की लौलुपता पर बड़ी सटीक उकित है ....''लक्ष्मी की मूर्ति धतुमयी हो गर्इ, उपासक सब पत्थर हो गये। राज-ध्र्म, आचार्य-ध्र्म, वीर-ध्र्म सब पर पानी पिफर गया, सब टका ध्र्म हो गये .....केवल वणिग्ध्र्म रह गया।

प्रीति के स्वरूप पर और उसके ग्रहण करने के नाम पर बड़ी मार्मिक उकित देखिए ....मेल से क्या-क्या लाभ होते हैं, यह तो न जाने कितने झगड़ालू बताते हैं और न जाने कितने लोग मुनकर झगड़ा करते हैं।

लोभ में आपादमग्न Ñष्ण व्यकितयों का उपहास करते हुए शुक्ल जी ने जिस व्यंग्यमयी प्रखर शैली को स्वीकार किया है वह हास्यपूर्ण कठोर व्यंग्य का सुन्दर निर्देशन है ........''लोभियो ! तुम्हारा अक्रोध्, तुम्हारा इनिद्रयनिग्रह, तुम्हारी मानापमान-समता, तुम्हारा तप अनुकरणीय है। तुम्हारी निठुरता, तुम्हारी निर्लज्जता, तुम्हारा अविवेक, तुम्हारा अन्याय विगर्हणीय है। तुम ध्न्य हो तुम्हें धिक्कार है। इस संदर्भ में प्रत्येक शब्द का अभिध्ेयार्थ ही इतना अर्थ गर्भ पूर्ण है कि पाठक के समक्ष प्रत्येक पद-पदार्थ मूर्तिमान होता जाता है। शुक्ल जी के निबन्धें में इस तरह के चुटीले व्यंग्य अनेक स्थानों पर मिलते हैं। देश-प्रेम की बात करते हुए कहते हैं कि 'जो देश की प्रÑति और के स्वरूप का चिन्तन कर उसमें मग्न होता है वह सच्चा देश प्रेमी है। भले ही घूम-घूम कर वक्तृता दे या न दे, चन्दा इकटठा करे या न करे, देशवासियों की आमदनी का औसत, निकाल या न निकाले। इसी प्रकार आध्ुनिक युग के उपकरणों और सामाजिक कार्यों पर व्यंग्य करते हुए कहा है-'अनाथालय के लिए चैक काटना, सर्वस्व हरण के लिए जाली दस्तावेज बनाना, मोटर की चरखी घुमाना आदि द्वारा रसपरिपाक सम्भव नहीं है।

भाव और मनोविकार सम्बन्ध्ी निबन्धें के मूल मं कोर्इ न कोर्इ गम्भीर विचार रहता है जिसकी विवेचनात्मक शैली से निवृत्ति करना लेखक का अभीष्ट होता है। अत: निबन्ध् में अर्थ से इति तक एक ही प्रभाव का समंजस्य बनाये रखने पर भी विषय के स्पष्टीकरण के लिए विषयान्तर या प्रासंगिक सदभावनाएं स्वीकार करने पर लेखक को विवश होना पड़ता है। सपफल लेखक वह है जो विषय प्रतिपादन के लिए प्रसंग प्राप्त विषयान्तर ग्रहण करके भी मूल विचार की प्रभावानिवति में विघ्नबाध उपसिथत न होने दे। शुक्ल जी के निबन्ध् प्रभावानिवति की दृषिट से इतने सुसम्ब( और पुष्ट हैं कि उनकी आवान्तर उदभावनाएं उन्हें कहीं भी शिथिल या निर्जीव नहीं बनने देती। हाँ, विषयान्तर स्वीकार करने में शुक्ल जी ने एक दो स्थलों पर वैयकितक स्वतन्त्राता का पूरा-पूरा उपयोग किया है। उन्हीं दो एक स्थलों को लेकर कुछ लोगों ने यह आपत्ति उठार्इ थी कि शुक्ल जी अपनी मान्यताओं की स्थापना के लिए अप्रासंगिक रूप से विषयांतर ग्रहण कर लेते हैं। किन्तु उस स्थलों का भी यदि निष्पक्ष भाव से पारायण किया जाय। तो उनमें गम्भीर दोष-दर्शन का अवकाश न मिलेगा। उदाहरणार्थ श्र(ा और भकित के प्रसंग में क्षात्रा-ध्र्म की उत्Ñष्टता का प्रतिपादन करते हुए शुक्ल जी ने लम्बा प्रवचन प्रस्तुत कर दिया है। यह ठीक है कि श्र(ा भकित के प्रसंग में क्षात्रा-ध्र्म का यह उपदेश संदर्भ के साथ पूर्णतया अनिवत नहीं होता और पाठक को लगता है कि जैसे लेखक अपनी क्षात्रा-ध्र्म विषयक मान्यताओं को ऐसे अवसर पर सि(ान्त खंड के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जिसके लिए कदाचित यह उचित अवसर नहीं है। सबसे त्राुटिपूर्ण बात यह है कि यह निबन्ध् इसी क्षात्रा-ध्र्म सि(ान्त के प्रवचन में मूल विषय से उचिछन्न होकर एकदम (एवरप्टली) समाप्त हो जाता है।

विषयांतर का दूसरा उदाहरण 'लोभ और प्रीति निबन्ध् में द्रष्टव्य है। प्रीति के अन्तर्गत लेखक ने देशप्रेम को घसीटा है और उसका प्रतिपादन इस शैली से किया है कि पाठक की उसमें रुचि नहीं होती। देश प्रेम का वर्णन करते हुए इध्र-उध्र की बातें, जिनका साक्षात प्रीति से कोर्इ सम्बन्ध् नहीं है प्रस्तुत की गर्इ है और लिखने म वैयकितक अभिरुचि का भी पुट दे दिया गया है। देश प्रेम के भीतर ही प्रÑति प्रेम का भी ब्यौरेवार वर्णन है। कहीं-कहीं अवान्तर प्रसंग केवल विषय की सोदाहरण व्याख्या के लिए ही आये हैं उसमें प्रसंग-गर्भत्व तत्व भी रहता है। भारतीय इतिहास का पौराणिक आख्यान की कोर्इ मार्मिक घटना या व्यकित ऐसे अवसरों पर अंकित किया गया है। किन्तु ये अवान्तर प्रसंग प्रभावोत्पादन के साथ विषय की मूल विचारधरा में व्याघात उत्पन्न नहीं करते। पफलत: विचार का सतत प्रभाव रुकने पर भी मूल प्रभावासिथति का तारतम्य बना रहता है। इसके अतिरिक्त कहीं-कहीं अपने काव्य सि(ान्तों का भी भाव और मनोविकार-विषयक निबन्धें में वर्णन इन्हीं आयान्तर प्रसंगों या विषयान्तरों द्वारा लेखक ने किया है ऐसे स्थलों पर मूल उíेश्य तो विषयक की विवेचना ही है किन्तु उनका समर्थन किया गया है स्वमन्तव्यों द्वारा लेखक-संग्रह, शील और सौन्दर्य, काव्य में लोक मंगल की साध्नावस्था आदि को उच्च स्थान देने के लिए शुक्ल जी ने विषयान्तर किया है। इन निबन्धें में शुक्ल जी के काव्य सि(ांत खंड रूप में छिटके पड़े हैं।

शुक्ल जी के निबन्धें की भाषा अत्यधिक प्रौढ़, तत्सम प्रधन और प्रांजल है। गुमिपफत वाक्य रचना के लिए भावव्यंजक पदावली का जैसा सुन्दर चयन शुक्ल जी ने किया है वैसा हिन्दी निबन्ध् लेखकों में अन्यत्रा नहीं मिलता। कहीं-कहीं भाषा में कविता का लालित्य भी दृषिटगत होता है। तर्कपूर्ण वैज्ञानिक शैली के साहित्य निबन्धें की भाषा का मानदंड शुक्ल जी के इन्हीं भाव और मनोविकार-सम्बन्ध्ी निबन्धें से सिथर किया जा सकता है।

विषय-प्रतिपादन के अवसर पर व्याख्यात्मक शैली के साथ भाषा भी अपेक्षÑत सरल और प्रवाहमयी है वहाँ न तो गूढ़ भाव्य व्यंजक किलष्ट पदावली का प्रयोग है और न लाक्षणिक या शास्त्राीय शब्दों की भरमार। सीध्ी-सादी अभिव्यकित का ही लेखक ने आश्रय लिया है। वाक्य-योजना वार्तालाप शैली की होने से इतनी सहज है कि यह नहीं प्रतीत होता कि लेखक किसी भाव या मनोविकार का रहस्य समझाने का प्रयत्न कर रहा है। भाषा का रूप घरेलू बातचीत के समान जाना-पहचाना सा बना रहता है। जैसे-

''मान लीजिए कि एक ओर से हमारे गुरुजी और दूसरी ओर से एक दंडधरी दुष्ट दोनों आते दिखार्इ पड़े। ऐसी अवस्था में पहले हमें उस दुष्ट का सत्कार करके तब गुरुजी को दण्डवत करना चाहिए। इन दो वाक्यों में बात को समझाने की शैली घरेलू बातचीत की है। शब्द भी तदभव ही है। इस प्रकार की भाषा व्याख्यात्मक शैली से किसी विषय को स्पष्ट करने के लिए प्राय: प्रत्येक निबन्ध् में मिलेगी।

भाषा का दूसरा रूप तत्सम और किलष्ट-पद योजनापूर्ण है। ऐसे स्थलों पर सूक्ष्म भाव का साहितियक भाषा द्वारा विवेचन किया गया है।

''लोभ का प्रथम संवेदनात्मक अवयव है किसी वस्तु का बहुत अच्छा लगना, उससे बहुत सुख या आनन्द का अनुभव होना। अत: वह आनन्द स्वरूप है।

''भकित में किसी ऐसे सानिनèय की प्रवृत्ति होती है जिसके द्वारा हमारी महत्व के अनुकूल गति का प्रसार-और प्रतिकूल गति का संकोच होता है। इस प्रकार का सामीप्य लाभ करके हम अपने ऊपर पहरा बिठा देते हैं।

तत्सम पदावली से परिपूर्ण वाक्य-योजना से तो ये निबन्ध् आधोपान्त भरे पड़े हैं। अत: उदाहरण देकर विस्तार करना व्यर्थ है। अब काव्यमयी सरस भाषा वालें स्थलों का निर्देश करना हम आवश्यक समझते हैं। शुक्ल जी साहित्य में चमत्कार का सदा विरोध् करते रहे। उनकी मान्यता का कि कोरा शब्द चमत्कार न तो सुन्दर काव्य का स्रष्टा है और न वह उन्नत विचारशील भावुक का स्थायी मनोरंजन ही कर सकता है। अत: चमत्कार से बचना ही श्रेयस्कार है। किन्तु कहीं-कहीं वे स्वयं इस चमत्कार की सृषिट कर गये हैं। शुक्ल जी ने जिस समय साहित्य से परिचय प्राप्त करना प्रारम्भ किया था। उस समय बदरीनारायण चौध्री प्रेमध्न अपनी दीर्घ-समास-शैली से निबन्ध् लिखने में संलग्न थे। शुक्ल जी ने उनकी शैली से अव्यक्त रूप में प्रभाव ग्रहण किया। यधपि वे प्रेमध्न जी की शैली के समर्थक नहीं थे। किन्तु उनके प्रेमी पाठक अवश्य थे। चिन्तामणि के निबन्धें में तीन-चार ऐसे दीर्घ समास शैली वाले स्थल हैं जहाँ कविता की भाषा को शुक्ल जी ने गध का परिधन देकर प्रस्तुत किया है। कहना न होगा कि उन स्थलों पर 'प्रेमध्न जी की शैली का अव्यक्त प्रभाव है-

''जो केवल प्रपुफल्ल प्रसूर प्रसार के सौरभ संचार, मकरन्द लौलुप मध्ुप गुंजार, कौकिल कूजिन निकुंज और शीतल सुख-स्पर्श समीर इत्यादि की ही चर्चा करते हैं वे विषयी या भाग-लिप्सु हैं। इसी प्रकार जो केवल मुक्ताभास हिमबिन्दुपंडित मरकताभ शाद्वल-जाल, अत्यन्त विशाल गिरिशिखर से गिरते हुए जल प्रताप के गंभीर गर्त से उठी हुर्इ सीकर नीहारिका के बीच विविध् वर्ण स्पुफरण की विशालता, भव्यता और विचित्राता में ही अपने âदय के लिए सब कुछ पाते हैं .....तमाशबीन हैं।

''जैसा कि कहा जा चुका है, सौंदर्य का दर्शन मनुष्य में ही नहीं करता है प्रत्युक्त पल्लव-गुमिपफत पुष्पहास मेंऋ पक्षियों के पक्षजाल में, सिन्ध्ुराम सान्èय दिंगचल के हिरण्य मेखला-मंडित घनखंड में, तुषारावृत्त तुंग गिरि शिखर में, चन्द्रीकरण से झलझलाते निर्झर में और न जाने कितनी वस्तुओं में वह सौन्दर्य की झलक पाता है।

(चिन्तामणि भाग 1, पृ. 145)

उपयर्ुक्त दोनों उदाहरणों की भाषा अत्यन्त कवित्वपूर्ण एवं अनुप्रासमयी है। इसका कारण शुक्ल जी की प्रवृत्ति न होकर प्रसंग की अनिवार्यता ही समझना चाहिए। जिन संदर्भो में अन्य शैली को लेखक ने स्वीकार किया है वे काव्य का वातावरण प्रस्तुत करने वाले हैं अत: तदनुकूल अनुप्रासमयी कवित्वपूर्ण भाषा भी सहज ही में आ गर्इ है। पिफर भी निबन्धें में ऐसी भाषा के लिए विशेष अवकाश नहीं होता।

मुहावरे और लोकोकितयों का प्रयोग शुक्ल जी के निबन्धें में विरल है। दो तीन स्थलों को छोड़कर कहीं भी मुहावरे नहीं आये हैं। जिन स्थलों पर मुहावरों का प्रयोग हुआ है वह एक सुनिशिचत वाक्य योजना के साथ हैं। देखिए-

''यदि सब की ध्ड़क, एकबारगी खुल जाए तो एक ओर छोटे मुंहों से बड़ी-बड़ी बातें निकलने लगें, चार दिन के मेहमान तरह-तरह की पफरमाइशें करने लगें, उंगली का सहारा पाने वाले बांहु पकड़ कर खींचने लगें, दूसरी ओर बड़ों का बड़प्पन निकल जाए, गहरे-गहरे साथी बहरे हो जायें या सूखा जबाब देने लगें, जो हाथ सहारा देने के लिए बढ़ते हैं वे ढकेलने के लिए बढ़ने लगें-पिफर तो भलमनसाहत का भार उठाने वाले इतने कम रह जायें कि वे उसे लेकर चल ही न सकें। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 66)

''अनिष्ट से बचने-बचाने के लिए इष्ट यही है कि हम दुष्टों का हाथ थामें और ध्ृष्टों का मुंह। उनकी वन्दना करके हम पार नहीं पा सकते। इध्र हम हाथ जोड़ेंगे उध्र वे हाथ छोड़ेंगे। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 64)

''पर जब हम उस वस्तु की ओर हाथ बढ़ायेंगे या औरों को उसकी ओर हाथ बढ़ाने न देंगे तब बहुत से लोगों का èयान हमारे इस Ñत्य पर जाएगा जिनमें से कुछ हाथ थामने वाले और मुंह लटकाने वाले भी निकल

सकते हैं। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 72)

तत्सम और तदभव शब्दों के साथ उदर्ू पफारसी के कुछ गिने चुने शब्द तथा प्रान्तीय बोली के भी पांच-सात शब्द शुक्ल जी के निबन्धें में साभिप्राय प्रयुक्त हुए हैं। यह समझ रखना चाहिए कि उदर्ू, पफारसी या देशज शब्दों के स्थान पर उन्होंने तत्सम शब्दों का प्रयोग जान-बूझ कर बचाया है क्योंकि जिस विशिष्ट भाव की अभिव्यंजना उदर्ू-पफारसी या देशज शब्दों से सम्भव है वह तत्सम या तदभव शब्दों द्वारा नहीं। उदाहरणार्थ, हम पफारसी के 'इजारा काव्य का ही ले इसके स्थान पर हिन्दी का कोर्इ पर्यायवाची शब्द वैसी समर्थ और विशद व्यंजना नहीं कर सकता जो इस शब्द में समाविष्ट है। एकाधिपत्य के लिए 'इजारा का व्यवहार अंग्रेजी के 'मोनोपली से भी अधिक व्यंजक प्रतीत होता है। इसी प्रकार एक दूसरे स्थान पर पूरे वाक्य की योजना उदर्ू शैली में बहुत ही भावपूर्ण बन पड़ी है। ...इसी बात का विचार करके सलाम-साध्क लोग हाकिमों से मुलाकात करने से पहले अर्दलियों से उनका मिजाज पूछ लिया करते हैं। इस वाक्य में पाँच उदर्ू-पफारसी के शब्द हैं किन्तु उनका प्रयोग इतना व्यावहारिक और चालू शैली से हुआ है कि उनके लिए पर्यायवाची तलाश करना व्यर्थ है। झूठी कवायद, पिफजूल की शिकायत, दुरंगी झलक, आशिक-माशूक के किस्से, मुनादी होना, कठहुज्जती आदि इसी तरह के अन्य उदर्ू शब्दों के प्रयोग हैं जा  अपने प्रचलित रूप से वाक्य रचना के साथ ऐसे पिफट बैठते हैं कि उसकी जगह समानार्थ हिन्दी शब्दों को कोर्इ सâदय स्वीकार नहीं करेगा। अलवत, चुनांवे, गोया आदि भी कहीं दीख पड़ते हैं। प्रान्तीय देशज शब्दों में ढब, दुर्री, झोंक, परच, लहक आदि थोड़े से प्रयोग हैं। किन्तु इनका माध्ुर्य संदर्भ में ही सराहा जा सकता हैं। व्यावहारिक और प्रचलित शब्दों को भी शुक्ल जी ने स्वीकार किया है .... जैसे अटकल-पच्चू, पेफर-पफार, कलेजा चीरना, इध्र-उध्र पिफरना, तड़क-भड़क आदि।

शुक्ल जी की भाषा की सबसे उल्लेख्य विशेषता है समर्थ एवं भाव्यव्यंजक शब्दों का नूतन निर्माण। ऐसे भी अनेक शास्त्राीय शब्द हैं जिनका प्रयोग शुक्ल जी से पहले हिन्दी निबन्ध् या समालोचना में किसी ने नहीं किया था। संस्Ñत साहित्य-शास्त्रा के उन शब्दों का शुक्ल जी ने बेध्ड़क प्रयोग किया और उन्हें सर्वजन-सुलभ बनाया। अंग्रेंजी समीक्षा शास्त्रा के शब्दों को भी शुक्ल जी ने भावानुवाद के माèयम से हिन्दी में ग्रहण किया गया और उनका प्रचार करके परवर्ती लेखकों के लिए उपादेय बनाया। यदि ऐसे शब्दों की तालिका तैयार की जाए तो वे कर्इ सौ होंगे। अंग्रेजी शब्दों का अनुवाद यधपि सब जगह पूर्ण व्यंजक नहीं हुआ पिफर भी उसमें अर्थबोध् की पर्याप्त शकित है। कहीं-कहीं साधरण बोलचाल के रूप में प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी की तत्सम रूप में ही ग्रहण किया है जैसे, पैफशन, पास, सेक्चर आदि शब्द। कहीं-कहीं अंग्रेजी मुहावरों का हिन्दी रूपान्तर भी शुक्लजी ने स्वीकार किया है।

आचार्य शुक्ल के 'चिंतामणि में संकलित विचारात्मक मनोवैज्ञानिक निबन्धें के विषय में विवाद रहता है कि ये विषय प्रधन हैं अथवा व्यकित प्रधन। इस संबंध् में अपना निर्णय देने से पूर्व हम स्वयं लेखक के स्पष्टीकरण की ओर पाठक का èयान आÑष्ट करना चाहते हैं। चिन्तामणि के निवेदन में शुक्ल जी ने इन निबन्धें को अपनी अन्तयात्राा में पढ़ने वाले कुछ प्रदेश माना है। बु(ि और âदय के सहयोग से भावलोक की यह यात्राा सम्पन्न हुर्इ है। यात्राी तो बु(ि ही है पर एकाकी नहीं ....âदय उसका साथी है। यात्राा के मार्ग (विषय) का संधन बु(ि ने किया है किन्तु मार्मिक प्रदेशों में पहुंचने पर âदय उनमें रमा है। अर्थात बु(िपथ पर âदय भी अपने लिए कुछ न कुछ पाता रहा है। उक्त परिष्कार के बाद लेखक ने यह निर्णय नहीं दिया कि वह इन निबन्धें को व्यकित-प्रधन मानता है या विषय-प्रधन।

शुक्ल जी के निवेदन का यदि विश्लेषण किया जाए जो इतना तो स्पष्ट है कि इन निबन्धें का मुख्य संबंध् बु(ि (विषय) से रहा है। बु(ि पथ पर âदय (व्यकित) को भी कुछ न कुछ मिलता अवश्य रहा है किन्तु यात्राा बु(ि ने की है। अत: बु(ि के प्रमुख होने पर विषय की प्रमुखता तो अपने आप ही सि( हो जाती है। पिफर भी यह प्रश्न विवादस्पद क्यों बना, यह विचारणीय है।

व्यकित-प्रधन निबन्ध् (पर्सनल ऐसे) की सीमा मर्यादा पर विचार करने पर यह प्रश्न सुलझ जाता है। वैयकितक भावनाओं, विचारों, अनुभूतियों और मान्यताओं के आरोप से जो निबन्ध् लिखे जाते हैं जिनमें व्यकितगत सुख-दुख, रुचि-अरुचि, त्याग ग्रहण की ही चर्चा होती है वे व्यकित प्रधन कहे जाते हैं। अंग्रेजी में चाल्र्स लैम्ब, लीहंट हैजलिट और स्टीवेंसन प्रभृति लेखकों में इस कोटि के निबन्ध् लिखने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। हिन्दी में बालÑष्ण भटट और प्रतापनारायण मिश्र के निबंध् इस कोटि के हैं। वर्तमान युग में बाबू गुलाबराय ने उच्चकोटि के वैयकितक निबंध् लिखे हैं। बाबू जी के आत्मव्यंजक निबन्ध् हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ कोटि के हैं। उनके निबन्धें के विषय भी कही-कभी इतने आत्मनिष्ठ और वैयकितक होते हैं कि पाठक को रसानुभूति होने पर भी लेखक के निजी रूप के छाप से मुकित नहीं मिलती। उन निबन्धें में लेखक कभी-कभी ऐसी विलक्षण और वैयकितक अनुभूति और मान्यता का वर्णन प्रस्तुत करता है जो सामान्य पाठक की अनुभूति से तादात्मय नहीं रखती। पफलत: उनको विषय-प्रतिपादन और व्यकित के निकट पाकर हम व्यकित प्रधन कह देते हैं। व्यकित प्रधन निबन्धें के विषय का स्वरूप इतना क्षीण और दुर्बल रहता है कि उसकी ओर न तो लेखक का èयान जाता है और न पाठक ही पूरा निबन्ध् पढ़कर प्रतिपाध विषय से अवगत होता है। व्यकित प्रधन निबन्धें की जहां यह कमजोरी है वहां रोचकता और सरलता के कारण उनमें पाठक की चित्तवृत्ति को रमाए रखने की प्रबल शकित होती है। कभी-कभी तो पाठक गल्प, उपन्यास या आत्मकथा क सदृश रसानुभूति करने लगता है और उनमें लीन होकर यह विस्मृत कर बैठता है कि वह निबन्ध् पढ़ रहा था या लेखक के आत्मचरित का कोर्इ मोहक विवरण। इन निबन्धें में लेखक प्राय: प्रथम पुरुष में आत्माभिव्यकित करके किसी घटना या तथ्य का वर्णन प्रस्तुत करता है।

इसके विपरीत विषय-प्रधन निबन्ध् का आधर प्रतिपाध वस्तु होती है जिसकी रूप-संघटना के लिए लेखक को युकित, तर्क, प्रमाण, दृष्टान्त आदि प्रस्तुत करके उसका आकार बड़ा करना होता है। लेखक को अपने अध्ीन और अनुभूति ज्ञान की समस्त अर्जित सम्पत्ति विषय प्रतिपादन में लगानी होती है। लोक व्यवहार èयान में रखकर उसका भी अपने विषय की पुषिट में उपयोग करना पड़ता है। तात्पर्य यह कि प्रतिपाध विषय को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्राों में सामग्री चयन करके उसे ऐसा रूप देना अनिवार्य समझा जाता है कि जो पाठक के लिए सुपाठय होने के साथ-साथ बु(िग्राá हो सके। पफलत: विषय-प्रधन निबन्ध् की आत्मा का निर्माण व्यापक भाव सामग्री से होता है, केवल लेखक की आत्माभिव्यंजक उकितयों या अनुभूतियों के चित्राण से नहीं विषय-प्रधन निबन्ध् जब किसी विचार या भाव को केन्द्र बिन्दु मानकर लिखे जाते हैं तब लेखक उसमें उन्हीं आत्मानुभूतियों का पुट दे सकता है जो आत्म-सीमा का अतिक्रमण कर सहज ही परानुभूति भी बनने में समर्थ हों। दूसरे शब्दों में एक व्यकित की अनुभूति होने पर भी उनकी संवेदना अनेक की बन सके अर्थात वे व्यषिट सीमा से पूरे समषिट में समा सके। प्रतिपाध विषय काल की दृषिट से कालातीत, देश की दृषिट से सार्वदेशिक और व्यकित की दृषिट से सार्वजनिक होकर सबक बन सके। विषय-प्रधन निबन्धें में व्यकितत्व का आरोप केवल शैली में किया जा सकता है। समर्थ लेखक सदैव अपनी वैयकितक शैली को अक्षुण्ण रखते हुए विषय का प्रतिपादन करते हैं। उनके विषय-प्रधन निबन्ध् भी अभिव्यंजना में व्यकितत्व की ऐसी गहरी छाप लेकर सामने आते हैं कि उनका प्रत्येक वाक्य, प्रत्येक शब्द लेखक के नाम का जो बोध् करता सुनार्इ देता है।

व्यकित-प्रधन और विषय-प्रधन निबन्ध् की सीमाओं का संक्षेप में वर्णन करने के बाद शुक्ल जी के निबन्धें पर दृषिटपात करने से यह निष्कर्ष सहज ही में निकाला जा सकता है कि भाव या मनोविकार-सम्बन्ध्ी विषयों पर लिखते समय लेखक के समक्ष गंभीर तथ्य-निरूपण ही प्रमुख रहा है। लेखक का èयेय सूक्ष्म भाव या मनोविकार का वैज्ञानिक विवेचन करना है, उसका मनमाना अनर्गल वर्णन करना नहीं। लोकानुभव की-भित्ति पर लेखक ने अपने प्रतिपाध का भवन खड़ा किया है, केवल वैयकितक विचार या कल्पना के आधर पर मन की मौज या तरंग में बहक कर इन्हें नहीं लिखा है। सु Üाृंखल विचार-परम्परा की निहिति लेखक का जागरूक प्रयत्न है। अभीष्ट विषय को तर्क, युकित, प्रमाण और लोक दृष्टान्त द्वारा प्रस्तुत करने का तात्पर्य यही है कि ये निबन्ध् व्यकित सीमा (लेखक) को लांघकर समषिट-सीमा (सâदय पाठक) में समा सकें। अत: निबन्ध् की कसौटी पर कसने पर इन्हें विषय-प्रधन ही समझते हैं। हाँ, व्यकितत्व का स्पृहणीय संयोग इन निबन्धें में लेखक ने अभिव्यंजना-शैली और कहीं-कहीं विषय-प्रतिपादन के लिए दृष्टान्त आदि प्रस्तुत करने में किया है। उस स्पृहणीय संयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती और इसलिए इन निबन्धें के वैयकितक पक्ष पर विचार करते करते समय उसका उचित मूल्यांकन भी करना आवश्यक है।

शुक्ल जी के भाव मनोविकार-सम्बन्ध्ी निबंधें पर दृषिटपात करते समय मूलत: उनके प्रतिपाध पर ही èयान रखना चाहिए क्योंकि लेखक भावों और मनोविकारों का सामाजिक तथा साहितियक दृषिट से स्वरूप-निर्धरण करने में प्रवृत्त हुआ है, उसके सम्बन्ध् में अपनी वैयकितक रूचि या भावना का वर्णन करना उसका लक्ष्य नहीं है। अत: इस भ्रम के लिए कोर्इ अवकाश नहीं कि शुक्ल जी के निबन्ध् व्यकित प्रधन हैं और इनका मूल्यांकन वस्तु के आधर पर न करके व्यकित विचार के आधर पर होना चाहिए। उनके निबन्ध् अकेले लेखक के âदय से ही सम्बन्ध् नहीं रखते वरन मनुष्य मात्रा की भावात्मक सत्ता पर प्रभाव डालने वाले हैं।

शुक्ल जी समर्थ शैलीकार निबन्ध् लेखक हैं। उनकी शैली का वैशिष्टय शब्द-चयन पदयोजना, वाक्य-रचना-सादृश्य विधन आदि सभी क्षेत्राों में देखा जा सकता है। शैली को व्यकितत्व का प्रतिरूप कहा जाता है।-'स्टाइल इज द मैन इटसेल्पफ का प्रयोजन भी यह है कि समर्थ शैली निर्माता अपनी प्रत्येक रचना में अपने सम्पूर्ण व्यकितत्व के साथ प्रतिबिमिबत रहता है। व्यकितत्व की यह स्पष्ट छाप देख यदि कोर्इ पाठक उस रचना को व्यकित प्रधन समझ बैठे तो यह उसकी भूल है। शैलीगत व्यकितत्व तो प्रत्येक समर्थ लेखक की पहचान है। इसके अभाव से लेखक को साहित्य में स्थायित्व ही नहीं मिलता। अत: व्यकितत्व के स्वरूप का निर्धरण करते समय शैली से ही किसी रचना को व्यकित-प्रधन नहीं कहा जा सकता। 'पर्सनल एस्से का तात्पर्य है उसमें निहित भाव, विचार या वस्तु का वैयकितक रूप से वर्णन। कभी-कभी इस प्रकार के वर्णन व्यकितगत अनुभूति या कल्पना तक ही सीमित रहते हैं, पाठक का उनके साथ न तो तादात्म्य होता है और न साधरणीकरण द्वारा आनन्दोपलबिध् ही। किन्तु सभी व्यकितप्रधन निबन्धें में यह त्राुटि नहीं पार्इ जाती। सुन्दर निबन्ध् व्यकित प्रधन होने पर भी इतने रोचक और आकर्षक होते हैं कि पाठक का मन उनमें लीन होकर रसानुभूति करता है।

व्यकित-प्रधन निबन्धें की एक शैली प्रथम पुरुष का प्रयोग है। 'मैं सर्वनाश का प्रयोग लेकर स्थान-स्थान पर स्वानुभूतियों को उपन्यास करके निबन्ध् को कलेवर देता है। शुक्ल जी ने भी अपने निबन्धें में अनेक स्थलों पर 'मैं सर्वनाम द्वारा स्वानुभूति या स्वमत प्रकाशन की शैली स्वीकार की है। शु( आत्माभिव्यकित का स्वरूप विषय से दूर मन की तरंग में बहकर वर्णन करना मात्रा है जो शुक्ल जी को कभी ग्राá नहीं हुआ। अत: प्रथम पुरुष 'मैं शब्द के प्रयोग से इन निबन्धें को व्यकित प्रधन ठहरा देने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए। प्रथम पुरुष में वैयकितक घटनाओं का वर्णन या स्वमत प्रकाशन के कतिपय प्रसंगों का संकेत हम चिन्तामणि के निबन्धें में कर सकते हैं-

''एक दिन मैं काशी की एक गली से जा रहा था। एक ठठेरे की दुकान पर कुछ परदेसी यात्राी किसी बरतन का मोल भाव कर रहे थे और कह रहे थे कि इतना नहीं-इतना लो तो लें। इतने ही में सौभाग्यवश दुकानदार जी को ब्रह्राज्ञानियों के वाक्य याद आ गए और उन्होंने चट कहा-''गाया छोड़ो और इसे ले लो। सोचिए तो, काशी ऐसा पुण्य क्षेत्रा। यहां न माया छोड़ी जाएगी तो कहां छोड़ी जाएगी। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 28)

''एक बार मैंने देखा कि एक ब्राह्राण देवता चूल्हा पूंफकते-पंूफकते थक गये। जब आग न जली, तब उस पर कोप करके चूल्हे में पानी डाल किनारे हो गए। इस प्रकार का क्रोध् अपरिष्Ñत है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 135)

''मैं अपने एक लखनवी दोस्त के साथ सांची का स्तूप देखने गया। वसन्त का समय था। महुए चारों ओर टपक रहे थे। मेरे मुंह से निकला-'महुओं की कैसी मीठी महक आ रही है। इस पर लखनवी महाशय ने मुझे रोककर कहा, 'यहां महुए-सहुए का नाम न लीजिए, लोग देहाती समझेंगे। मैं चुप हो गया, समझ गया कि महुए का नाम जानने से बाबूपन में बड़ा भारी बटटा लगता है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 78)

''मिलकर कोर्इ कार्य करने से उसका साध्न अधिक या सुगम होता है, यह बताना 'पर उपदेश कुशल नीतिज्ञों का काम है, मेरे विचार का विषय नहीं। मेरा íेश्य तो मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों की छानबीन है जो निश्चयातिमक वृत्ति से भिन्न है। (चिन्तामणि भाग 1, पृ. 79)

उलिलखित चारों उ(रणों में लेखक ने प्रथम पुरुष एकवचन सर्वनाम 'मैं द्वारा भावाभिव्यकित की है। इन प्रसंगों में प्रथम पुरुष का प्रयोग किसी घटना विशेष की ओर पाठक का èयान आÑष्ट कर मूल विषय के प्रतिपाध के साथ उसे संयुक्त करना है। वे स्वानुभूतिपरक घटनायें केवल आत्माभिव्यंजन के उíेश्य से नहीं लिखी गर्इ हैं अत: इस प्रकार के पांच दस प्रसंगों के आधर पर निबन्धें को व्यकित-प्रधन नहीं ठहराया जा सकता है।

संक्षेप में, इन निबन्धें में विषय-प्राधन्य होने पर भी विद्वान लेखक ने व्यकितगत शैली और यथास्थान उदाहरण, दृष्टान्त आदि द्वारा व्यकितत्व का ऐसा सुन्दर समावेश किया है कि हम लेखक के व्यकितत्व का क्षण भर के लिए भी विसर्जन नहीं कर पाते। विषय और व्यकितत्व के समीचीन समन्वय से ही इन निबन्धें की रचना हुर्इ है किन्तु केवल व्यकितगत अनुभूति, मान्यता या अभिरुचि के आधर पर विषय-प्रतिपादन नहीं किया है। व्यकितत्व का समावेश विषय का सहायक और समर्थक है, स्वतन्त्रा रूप से निबन्ध् का अधिष्ठान उसमें नहीं है।

विवेचनात्मक शैली के माèयम से लेखक ने लोभ के मूल कारणों को सरल शब्दावली में व्यक्त किया है।

'कविता क्या है?

डा. मनीराम यादव

एसोसिएट प्रोपेफसर, मुक्त शिक्षा विधालय

दिल्ली विश्वविधालय

निबंध्-सार :

कविता का पर्याय काव्य है। काव्य के लक्षण संस्Ñत के आचार्यों ने अपने अपने दृषिटकोण से प्रस्तुत किए हैं। काव्य की आत्मा का निर्धरण भी विभिन्न सि(ान्तों के स्थापक आचार्यों ने अपने-अपने दृषिटकोण से किया है। कविता के लक्ष्य को èयान में रखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यह स्पष्ट किया है कि सृषिट के नाना रूपों के साथ मनुष्य भी भीतरी रागातिमका प्रÑति का सामंजस्य स्थापित करता है। इस मान्यता से काव्य-लक्षणों के मतभेद दूर हो जाते हैं जो विशेषत: रस आदि के भेद-प्रतिबंधें के कारण चल पड़े हैं। 'वाक्यं रसात्मक काव्यम में जो अव्यापित दिखार्इ पड़ी है वह नौ भेदों के कारण। प्राÑतिक दृश्यों के वर्णन में एक प्रकार का रस अवश्य है। 'षट)तु के अंतर्गत कुछ इनीगिनी वस्तुओं को लेकर कभी नायिका को हर्ष से पुलकित करके और कभी विरह से विकल करके कवि लोग चलते हुए।

कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। बु(ि की अपेक्षा मन ही सबको उत्साहित करता है। अत: मन में वेग का आना आवश्यक है। कविता के द्वारा हम संसार के सुख-दु:ख, आनंद और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव करने में अभ्यस्त होते हैं जिससे âदय की स्तब्ध्ता रहती है और मनुष्यता आती है। लोभी, क्रूर âदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक ध्र्म पर लाने का सामथ्र्य काव्य ही में है।

मनोरंजन करना कविता का वह प्रधन गुण है जिससे वह मनुष्य के चित्रा को अपना प्रभाव जमाने के लिए वश में किए रहती है। यही कारण है कि नीति और ध्र्म-संबंध्ी उपदेश चित्रा पर वैसा असर नहीं करते जैसाकि काव्य या उपन्यास से निकली हुर्इ शिक्षा असर करती है। मनोरंजन करना और सुख पहुंचना ही यदि कविता का ध्र्म माना जाय तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुर्इ। लेखक को खेद है कि हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने Üाृंगार रस को उन्मादकारिणी उसितयों से भर दिया है कि कविता भी विलास की एक सामग्री समझी जाने लगी है।

कविता का काम मनोरंजन ही नहीं, कुछ और भी है। चरित्रा चित्राण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं।

कवि का कार्य भकित, श्र(ा, दया, करुणा, क्रोध् और प्रेम आदि मनोवेगों को तीव्र और परिवर्तित करना है तथा सृषिट की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त संबंध् सिथर करना है।

कविता का उच्च आदर्श है। मनुष्य के âदय को उन्नत, उदात्त करती है और ऐसे-ऐसे उत्Ñष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है। कविता सृषिट सौंदर्य का अनुभव कराती है। कविता सौन्दर्य और सातिवकशीलता या कत्र्तव्य परायणता में भेद नहीं देखा चाहती। इसी से उत्कर्ष साध्न के लिए कवियों ने प्राय: रूप-सौंदर्य और अन्त:करण के सौंदर्य का मेल कराया है। अत: कविता उच्चाशष, उदार और नि:स्वार्थ âदय की उपज है। उसका दुरुपयोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद में नहीं करना चाहिए।

कविता की भाषाओं में पुराने शब्द आध्ुनिक और पुरातन कविता के बीच संबंध्-सूत्रा का काम देते हैं। कविता में कही गर्इ बात चित्रारूप में हमारे सामने आती है, संकेत रूप में नहीं। अत: उसमें गोचर रूपों का ही विधन अधिकतर होता है, उसमें प्रत्यक्ष और स्वभावसि( व्यापार-सूचक शब्दोें की संख्या अधिक रहती है। 'समय बीता जाता है कहने की अपेक्षा 'समय भाग जाता है कहना अधिक काव्य-संगत है। 'किसी काम से हाथ खींचना, किसी का रूपैया खा जाना, कोर्इ बात पी जाना, दिन ढलना या डूबना, मन मारना आदि ऐसी ही कवि 'समय सि( वाक्य हैं जो बोलचाल में आ गए हैं। शास्त्रा और व्यवहार की शब्दावली को छोड़कर शेष शब्दावली काव्यसम्मत है। कुछ शब्द ऐसे हैं जिससे कर्इ क्रियाओं का एक ही साथ बोध् होता है, जैसे 'वहाँ बड़ा अत्याचार हो रहा है। इस 'अत्याचार शब्द के अंतर्गत मारना, पीटना, डाटना, डपटना, लूटना-पाटना इत्यादि बहुत से व्यापार हो सकते हैं। इससे कल्पना में किसी एक व्यापार का स्पष्ट चित्रा अंकित नहीं होता जिससे यह शब्द कविता के काम का नहीं है। तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो किन्हीं संयुक्त व्यवहारों की सूचना देते हैं, कविता में वांछित नहीं। 'तुमने उससे विग्रह किया साधरण वाक्य है। 'तुमने उसका हाथ पकड़ा यह अर्थगर्भित काव्योचित वाक्य है।

नाद-सौंदर्य और भाव-सौंदर्य- दोनों के संयोग से कविता की सृषिट होती है। छंद और तुक दोनों नाद-सौंदर्य के उíेश्य से रखे गए हैं। नाद-सौंदर्य कविता को स्थायी बनाता है। यह कविता की आत्मा नहीं तो शरीर अवश्य है। आचार्य शुक्ल जी सचेत करते हैं कि केवल श्रुति-मध्ुर अक्षरों के पीछे दीवाने रहना और कविता को अन्याय गुणों से भूषित न करना सबसे बड़ा दोष है।

कहीं-कहीं व्यकितयों के नामों के स्थान पर उनके रूप, गुण, या कार्य-बोध्क शब्दों का व्यवहार किया जाता है। 'गिरिध्र, मुरारि, त्रिपुरारि, दीनबंध्ु, चकपाणि, दशमुख आदि शब्द ऐसे ही हैं। ऐसे शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का èयान अवश्य रखना चाहिए। Ñत्रिमता से बचाने के लिए ऐसा करना उचित है। यह कविता की अत्यतम विशेषता है।

कविता में अलंकार- भिन्न-भिन्न वर्णन प्रणालियों का नाम अलंकार है अर्थात वर्णन करने की प्रणाली या प(ति का नाम अलंकार है। इनका उपयोग काव्य में प्रसंगानुसार विशेष रूप से होता है। जहाँ किसी प्रकार की रस-व्यंजना होगी वहीं किसी वर्णन प्रणाली को अलंकरता प्राप्त हो सकती है। रस और भाव ही कविता के प्राण हैं। काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है। किन्तु बाद में अलंकारों के लिए आग्रह बढ़ने लगा। चन्द्रलोकवर ने लिख डाला कि ''जो अलंकार रहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अगिन को उष्णता रहित क्यों नहीं मानता। किन्तु आचार्य शुक्ल की स्पष्ट मान्यता है कि 'रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्मा है। वर्णन करने की प्रणाली का नाम अलंकार है, किसी वस्तु विशेष से उसका संबंध् न हो। वस्तुनिर्देश अलंकार का विषय नहीं, वह यथार्थ में रस का विषय है। अलंकार वर्णन-शैली मात्रा के कह सकते हैं। इस दृषिट से कर्इ अलंकार ऐसे हैं जिन्हें अलंकार नहीं कहना चाहिए, जैसे स्वाभावोकित, अत्युकित, स्मरण, अल्प, उदात्त। स्वभावोकित में वण्र्यवस्तु का निर्देश है, परन्तु वस्तुनिर्वाण अलंकार का काम नहीं, शब्द-कौशल के कारण वे चित्त को चमत्Ñत करती हैं, उनसे रस-संचार नहीं होता। वे चमत्Ñत भले ही करें पर मानव âदय के स्त्राोंतों से उनका विशेष संबंध् नहीं। अलंकारों को हठात लाने का उधोग नहीं होना चाहिए।

भाषा-शैली

आचार्य शुक्ल की भाषा तत्सम बहुला संस्Ñतनिष्ठ है। अपने निबंधें में उन्होंने समास और व्यास शैलियों के साथ उदाहरण शैलियों का प्रयोग किया है। अपनी बात को समझाने के लिए उन्होंने इन वाक्यों का बहुध प्रयोग किया है-सारांशत: कहा जा सकता है कि कहने का तात्पर्य यह है कि, कहने का अभिप्राय यह है कि, बात यह है कि, जो कुछ अब तक कहा गया उससे यह स्पष्ट है कि आदि। इन प्रयोगों के पीछे उनका शिक्षक स्वभाव रहा है। वे एक बात को अनेक तरह से समझाने का प्रयास करते हैं। निबंध् का प्रारंभ समास शैली या सूत्रा-शैली से करते हैं- ''कविता वह साध्न है जिसके द्वारा शेष सृषिट के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध् की रक्षा और निर्वाह होता है। आगे पंकितयों में 'राग की व्याख्या करते हैं। दूसरे अनुच्छेद की प्रारंभिक पंकितयों में कविता का कार्य स्पष्ट करते हैं-''रागों का वेगस्वरूप मनोशकितयों का सृषिट के साथ उचित सामंजस्य स्थापित करके कविता मानव जीवन के कायकत्व की अनुभूति उत्पन्न करने का प्रयास करती है। अन्यथा मनुष्य के जड़ हो जाने में कोर्इ संदेह नहीं, उदाहरण शैली का नमूना द्रष्टव्य है- ''एक साधरण-सा उदाहरण लीजिए। ''तुमने उससे विग्रह किया यह बहुत ही

साधरण वाक्य है। पर ''तुमने उसका हाथ पकड़ा यह एक विशेष अर्थगर्भित और काव्योचित वाक्य है।      


मान्यताएं :

1. सृषिट के नाना रूपों के साथ मनुष्य की भीतरी रागातिमक प्रÑति का सामंजस्य ही कविता का लक्ष्य है।

2. इस बात का निश्चय हो जाने पर वे सब मतभेद दूर हो जाते हैं जो काव्य के नाना लक्षणों और विशेषत: रस आदि के भेद प्रतिबंधें के कारण चल पड़े हैं। èवनि संप्रदाय वालों का नैयायिकों से उलझना, अलंकारियों का रस प्रतिपादनों से झगड़ना एक पतली गली में बहुत से लोगों का ध्क्कम-ध्क्का करने के समान है।

3. कार्यप्रवृत्ति के लिए मन में वेग का आना आवश्यक है।

4. लोभी, क्रूर âदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक ध्र्म पर लाने का सामथ्र्य काव्य ही में है।

5. कविता का काम मनोरंजन ही नहीं, कुछ और भी है। चरित्रा-चित्राण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं।

6. जीते जी मृतवत, हो जाने वाले मनुष्य की कविता ही दवा है।

7. नाद-सौंदर्य और भाव-सौंदर्य-दोनों के संयोग से कविता की सृषिट होती है।

8. लक्ष्य ग्रंथ पहले रचे जाते हैं और लक्षण ग्रंथ बाद में।

9. भिन्न-भिन्न वर्णन-प्रणालियों का नाम अलंकार हैं।

10. जब से इन अलंकारों को हठात लाने का उपयोग होने लगा तब से कविता कुछ बिगड़ चली।


व्याख्या-भाग

''कविता वह साध्न है जिसके द्वारा शेष सृषिट के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध् की रक्षा और निर्वाह होता है। राग से यहाँ अभिप्राय प्रवृत्ति और निवृत्ति के मूल में रहनेवाली अंत:करणवृत्ति से है। जिस प्रकार निश्चय के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का बाá या मानस प्रत्यक्ष अपेक्षित होता है। यही हमारे रागों या मनोवेगों के जिन्हें साहित्य में भाव कहते हैं- विषय हैं। कविता उन मूल और आदिम मनोवृत्तियों का व्यवसाय है जो सजीव सृषिट के बीच सुखदुख की अनुभूति से विरूप परिणाम द्वारा अत्यंत प्राचीन कल्प में प्रकट हुर्इ हैं और जिनके सूत्रा से शेष सृषिट के साथ तादात्म्य का अनुभव मनुष्य जाति आदि काल से करती चली आर्इ हैं।

प्रसंग

प्रस्तुत अवतरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित 'कविता रस है? नामक निबंध् से उदध्ृत है। इसके कविता की परिभाषा निरुपित है।

व्याख्या

कविता समस्त सृषिट के नाना रूपों के साथ मानव के रागात्मक संबंधें की रक्षा और उनके निर्वाह का ऐसा साध्न है जो मनुष्य की भीतरी रागातिमक प्रÑति का सामंजस्य स्थापित करती है। कविता जगत के नाना रूपों और व्यापारों के साथ उनका उचित संबंध् स्थापित करने का भी उधोग करती है। राग का अर्थ है प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात अनुकूल और प्रतिकूल या सुख और दु:ख के मूल में रहनेवाली अंत:करणवृत्ति जिसमें मन, बु(ि, चित्त और अहंकार की अन्त:करण चतुष्टय समिमलित हैं। किसी चीष के निश्चय करने के लिए जिस तरह प्रमाण की आवश्यकता होती है और प्रमाण-प्रमेय की एकता स्थापित हो जाती है, उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का बाá या मानस का प्रत्यक्ष होना आवश्यक है। ये ही भाव हमारे रागों या मनोवेगों के विषय हैं। ये भाव हमारे अंत:करण में आदिकाल से उदभूत होते आ रहे हैं जो सजीव सृषिट के बीच सुख-दुख की अनुभूति कराते हैं, इनके अभाव में व्यकित अपने को जड़ अनुभव करता है। भावों के संवेग और संवेदनाएँ सृषिट के प्रारंभ से हो चले आ रहे हैं। इन्ही  के द्वारा हमारा तादात्म्य सृषिट के साथ होता है। यह तादात्म्यावस्था आलंबन के सामान्यीकरण के बाद आश्रय से तादात्म्य स्थापित करने की अवस्था है जिसका अनुभव मानव-जाति सृषिट के आदिकाल से करती आ रही है। इन रागों या मनोवृत्तियों का सृषिट के साथ उचित सामंजस्य स्थापित करके कविता मानवजीवन के व्यापकत्व की अनुभूति उत्पन्न करने का प्रयास करती है। यही एकरसता की सिथति है जिसका कविगण अनुभव करते रहते हैं।

विशेष-

1. कविता की परिभाषा दी गर्इ है।

2. निबंध् की प्रारंभिक पंकितयों में समास शैली है, पिफर उसकी विश्लेषणात्मक प(ति में व्याख्या निरुपित है।

3. तुलनात्मक शैली द्वारा प्रमाण-प्रमेय की एकता स्थापित की गर्इ है।

4. साधरणीकरण सि(ान्त का परोक्ष रूप में निरूपण है जिससे तादात्म्य सिथति आती है, जो हिन्दी आलोचकों की चर्चा का विषय रहा है।