SM-1

8 2. रीति-सिद्धांत

8.3 5. औचित्य-सिद्धांत


5. औचित्य-सिद्धांत

अभिनवगुप्त के शिष्य एवम औचित्य-सिद्धांत के प्रवत्र्तक आचार्य क्षेमेंद्र (सिथति-काल अनुमानत: र्इ. सन 990 से लेकर 1090 तक) थे। इनके गुरुजनों में अभिनवगुप्त, गंगक और सोमपात प्रमुख थेे। औचित्य की सबसे पहले चर्चा करने वाले आचार्य भरत हैं। उन्होंने 'उचित के पर्यायवाची 'अनुरूप शब्द का व्यवहार करते हुए लिखा है कि वय के अनुरूप वेश, वेश के अनुरूप चलना-फिरना, चलने-फिरने के अनुरूप पाठय और पाठय के अनुरूप अभिनय होना चाहिए-आचार्य भरत के उपरांत दंडी ने अपने ग्रंथ 'काव्यादर्श में उपमा अलंकार के विवेचन में, स्पष्ट शब्दों में न सही, प्रकारांतर से औचित्य के महत्त्व का प्रतिपादन किया है।

आचार्य आनंदवर्èान ने औचित्य की उत्Ñष्टता का गान किया है। 'èवन्यालोक के तृतीय अèयाय में इसकी सविस्तार चर्चा है। उन्होंने तो औचित्य की प्रशसित में यहां तक कहा है कि अनौचित्य के अतिरिक्त रस-भंग का और कोर्इ कारण नहीं है। ख्यातिलब्èा औचित्य का आèाान ही रस का परम रहस्य है।

औचित्य का लक्षण प्रस्तुत करते हुए वक्रोकितकार ने लिखा है कि जहां वक्ता और श्रोता स्वभाव के कारण विवेच्य वस्तु कुछ-से-कुछ हो उठती है उसे भी औचित्य कहा जाता है उन्होंने औचित्य को वक्रोकित का गुण माना है।

क्षेमेंद्र नेे èवनि-सिद्धांत पर प्रश्नचिद्द लगाते हुए औचित्य को काव्य का प्राणतत्त्व प्रमाणित किया। उनके अनुसार-

यदि काव्य के जीवितभूत तत्त्व औचित्य को जान-बूझकर भी अनदेखा कर दिया जाता है तो उसके (काव्य के) अलंकार और गुणों को गिनाना व्यर्थ ही है-ये काव्य के शोभाèाायक तत्त्व ही माने जा सकते हैं, जीवनाèाायक नहीं। रससि) काव्य के प्राणभूत तत्त्व होने का स्थायी स्थान तो औचित्य को ही प्राप्त है।

औचित्य ही काव्य का सिथर जीवन है( इसके अभाव में गुणों तथा अलंकारों से युक्त होने पर भी वह (काव्य) निर्जीव है। अपनी इसी धारणा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा है कि उचित स्थान पर विन्यस्त होने से ही अलंकार अलंकार हैं तथा औचित्य से संपन्न होने पर ही गुण गुण कहलाते हैं। क्षेमेंद्र का मत है कि उचित विन्यास के बिना न तो अलंकार ही शोभा की वृद्धि कर सकते हैं और न गुण ही।

इस औचित्य का लक्षण क्या है? इस विषय में आचार्य क्षेमेंद्र का कथन है कि जो जिसके अनुरूप है आचार्य उसे उचित कहते हैं और उचित के भाव को ही औचित्य कहा जाता है-

औचित्य के भेद- औचित्य के इस महत्त्व-प्रतिपादन एवं स्वरूप-निèर्ाारण के उपरांत क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ 'औचित्यविचारचर्चा में उसके मुख्यत: सत्तार्इस भेदों का निरूपण किया है। ये सत्तार्इस भेद हैं-1. शब्दौचित्य,

2. वाक्यौचित्य, 3. प्रबन्èाार्थोचित्य, 4. गुणौचित्य, 5. अलंकारौचित्य, 6. रसौचित्य, 7. क्रियौचित्य, 8. कारकौचित्य,

10. वचनौचित्य, 11. विशेषणौचित्य, 12. उपसर्गोचित्य, 13. निपातौचित्य, 14. समयौचित्य,

15. देशौचित्य, 16. कुलौचित्य, 17. व्रतौचित्य, 18. तत्त्वौचित्य, 19. सत्त्वौचित्य, 20. अभिपप्रायौचित्य,

21. स्वभावौचित्य, 22. सारसंग्रहौचित्य, 23. प्रतिमौचित्य, 24. अवस्थौचित्य, 25. विचारौचित्य, 26. नानौचित्य,

27. आशीर्वादौचित्य। यों तो औचित्य काव्य के समस्त शरीर में व्याप्त रहता है। तथापि उक्त पदादि उसके मर्म के समान हैं, अत: इन स्थानों में औचित्य की स्पष्ट प्रतीति होती है। दूसरे शब्दों में, औचित्य के ये भेद औचित्य की इयत्ता के ही परिचायक हैं।

1. शब्दौचित्य- काव्य में उचित शब्द के प्रयोग से सारी सूकित शोभामंडित हो उठती है। अत: काव्य में शब्द का उचित प्रयोग आवश्यक है। जैसे-  ''अविश्वास मत करना

प्रत्येक पगडंडी से मानुस-गंèा-आती है।

किसी भी मंत्रा को सूंघो

किसी भी स्तोत्रा को छुओ

मानुष की गंèा और जयकार दिखार्इ देगी।

-('उत्सवा -श्री नरेश मेहता)

-मनुष्य को पहचानना और उसे श्रेष्ठ मनुष्य के रूप में प्रतिषिठत करना आèाुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि श्री नरेश मेहता जी का मुख्य मंतव्य है। यही है उनकी केंद्रीय प्रेरणा जो मनुष्य की मनुष्यता की जययात्राा का उदघोष करती है। रास्ते के भी मनुष्य के लिए 'पगडंडी और उसकी पहचान में निष्ठा और आस्था के लिए 'मानुष-गंèा -शब्द में निहित स्वस्थ व्यंजना इसी औचित्य को पुष्ट करती है।

2. वाक्यौचित्य- त्याग से उन्नत बने उत्कर्ष तथा शील से उज्ज्वल बने शास्त्राज्ञान की भांति आौचित्य के साथ रचा गया वाक्य सज्जनों के लिए निरंतर अभीष्ट है। यथा-

''राम-

'हमारी सबकी शकित

केवल सदंर्भ की शकित है, सीता-

संदर्भ की पहचान खोकर

हमारे पास

केवल साèाारणता बचती है।

-('प्रवाद पर्व-'समिèाा-श्री नरेश मेहता, पृ. 390)

यहां 'हमारे संदर्भ हमारी वास्तविक पहचान का आèाार हैं-यह वाक्य शास्त्राज्ञान या सूकित की भांति तथ्यपरक औचित्य के साथ 'हमारे संदर्भ और 'साèाारणता के शाश्वत अंतर या भिन्नता को स्पष्ट कर देता है।

3. प्रबन्èाार्थोचित्य- जिस प्रकार गुणों के प्रभाव से भव्य बनेे कोर्इ सत्पुरुष शोभा पाता है उसी प्रकार विशेष अर्थ के उचित विनिवेश से सारा प्रबंèाार्थ जगमगा उठता है। जैसे-

मुनि èाीर जोगी सि)संतत बिमल मन जेहि èयावहीं।

कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीÏ

सोइ रामु व्यापक ब्रह्रा भुवन निकाय पति माया èानी।

अवतरेउ, अपने भगत हित निजतंत्रा नित रघुकुलमनीÏ -तुलसी

'रामचरितमानस के आरंभ में भगवान शंकर द्वारा राम की महिमा का यह बखान सारे प्रबंèा को आलोकित कर रहा है( क्योंकि आगे चलकर इस महाकाव्य में राम की इसी महिमा का ही तो गान है।

4. गुणौचित्य- प्रस्तुत अर्थ के अनुरूप काव्य में सनिनविष्ट भव्य एवं सुंदर गुण (माèाुर्यादि) आनंद प्रदान करते हैं।

5. अलंकारौचित्य- प्रतिपाध अर्थ के अनुरूप अलंकार के प्रयोग से समग्र सूकित सुशोभित हो उठती है।

''हम का यह विस्तार       

 हम की यह प्रभुता

आसुरी भाव हैं

रावणत्व है।

-(संशय की एक रात)

यहां समूह के अनुचित या अति विस्तार के अर्थ में 'हम और 'रावणत्व शब्द का श्लेष पूरी पंकित की भाव-व्यंजना को प्रभावी बना रहा है।

6. रसौचित्य- औचित्य के कारण रुचिर बना रस सभी के âदयों में व्याप्त होकर उनके मन को उसी प्रकार अंकुरित कर देता है जिस प्रकार अशोक वृक्ष को बसंत।

रसौचित्य के प्रसंग में क्षेमेंद्र ने सभी रसों के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जिससे रस के प्रति उनका विशेष मोह व्यक्त होता है।

7. क्रियापदौचित्य- सज्जन की भांति काव्य के गुण, वृत्त (छंद अथवा आचरण) और साèाुता तभी अच्छे लगते हैं जबकि उसकी क्रिया उचित हो। जैसे-

राम भालु कपि कटकु बटोरा।

सेतु हेतु श्रम कीन्ह न थोराÏ

नाम लेत भवसिन्èाु सुखाही।

करहु बिचारु सुजन मनमाहींÏ

यहां 'बटोरा क्रिया में निहित व्यंग्यार्थ दर्शनीय है। राम की अपेक्षा नाम की महत्ता सि) करने में इस क्रियापद का अदभुत योगदान है।

8. वचनौचित्य- अभिèोयार्थ के अनुरूप वचनों (एकवचन, बहुवचन) के प्रयोग से काव्य उसी प्रकार सौंदर्यमंडित हो उठता है जिस प्रकार दैन्यरहित एवं èान्य मन वाले विद्वानों का मुख कांतिमान होता है। निदर्शनार्थ, निम्नांकित सवैया द्रष्टव्य है-

रजनीचर-मत्तगयंद-घटा बिघटै मृगराज के साज लरै।

झपटै भट कोटि मही पटकै, गरजै, रघुबीर की सौंह करैÏ

'तुलसी उत हांक दसाननु देत, अचेत भेबीर, कौ èाीर èारै।

बिरुझो रन मारुत को बिरुदैत, जौ कालहु काल सो बूझि परैÏ -तुलसी

सवैया का भावार्थ है कि अकेले हनुमान राक्षसों की विशाल सेना पर भारी पड़ रहे हैं। यहाँ हनुमान का प्रयोग एकवचन में है और राक्षसों का बहुवचन में। इस वचन-प्रयोग से हनुमान की उस अतिशय वीरता की व्यंजना है जो इस सवैया का प्राण है।

9. विशेषणौचित्य- समुचित विशेषणों के प्रयोग से विशिष्ट अर्थ उसी प्रकार सजिजत होता है जैसे गुणी मित्राों के द्वारा गुणवान सत्पुरुष।

10. उपसगर्ौचित्य- उपयुक्त उपसर्गों के योग से सूकित उचित गुणों से युक्त होकर उसी प्रकार वृद्धि को प्राप्त करती है जिस प्रकार सन्मार्ग पर चलने से संपत्ति। उदाहरण प्रस्तुत है-

सिव अपमानु न जाइ सहि âदयं न हौइ प्रबोèा।          

सकल सभहि हठि हटकि तब बौलीं वचन सक्रोèाÏ -तुलसी

क्रोèा में व्यकित को सामान्य बोèा तक नहीं रहता, फिर 'प्रबोèा तो बहुत दूर की बात है। यहाँ पर 'बोèा से पूर्व 'प्र उपसर्ग का प्रयोग सती के क्रोèा की अतिशयता की व्यंजना बड़ी खूबी से कर रहा है।

11. निपातौचित्य- उचित स्थानों पर प्रयुक्त निपातों से अर्थ की संगति उसी प्रकार निभ्रांत हो जाती है जिस प्रकार उपयर्ुक्त मंत्रियों से राज्यलक्ष्मी सिथर हो जाती है।

उन शब्दों को निपात कहा जाता है जो व्याकरण के नियमों के अनुसार निष्पन्न न होने पर भी प्राय: शु) माने जाते हैं। ऐसे शब्दों की गिनती अव्यय के अंतर्गत की जाती है।

12. समयौचित्य- समयोचित अर्थ के प्रयोग से वाक्य ऐसा सुंदर जान पड़ता है जैसा समयानुरूप वेष से सत्पुरुषों का शरीर। उदाहरण के लिए, यह समय का ही तो हेर-फेर है कि जिन प्रभु राम के चरण कमल से गंगा प्रकट हुर्इ है। आज वे ही इस नदी को पार करने के लिए तट पर खड़े होकर नाव की याचना कर रहे हैं-

नाम अजामिल-से खल कोटि अपार नदी भव बूड़त काढ़े।

जो सुमिरे गिरि मेरु सिलाकन होत, अजासुर बारिèाि बाढ़ेÏ

तुलसी जेहि के पद-पंकज तें प्रगटी तटिनी, जो हरै अघ गाढ़ेÏ

ते प्रभु या सरिता तरिबे कहुं मांगत नाव करारे àै ठाढे़Ï -तुलसी

13. देशौचित्य- âदयसंवादी देशौचित्य सज्जनों के पारस्परिक परिचय बढ़ाने वाले व्यवहार के समान, काव्यार्थ की शोभा बढ़ाती है। उदाहरणार्थ लंका का निम्नांकित वर्णन द्रष्टव्य है जो 'रामचरितमानस-जैसे महाकाव्य की गरिमा के नितांत उपयुक्त है-

कनक कोट बिचित्रा मनि Ñत सुंदरायतना घना।

चउहटट हटट सुबटट बीथीं चारु पुर बहु बिèाि बनाÏ -तुलसी

14. कुलौचित्य- सâदयों के लिए, पुरुष के समान काव्य का भी कुलोचित औचित्य विशेष उत्कर्ष का कारण बनता है। अर्थात जिस प्रकार किसी पुरुष का उन्नत कुल उसके प्रति लोगों के आकर्षण का कारण होता है उसी प्रकार उन्नत कुल के वर्णन से काव्य भी मनोहारी हो उठता है। उदाहरण दृष्टव्य है-

रघुकुल रीति सदा चलि आइ। प्रान जाहुं बरु बचनु न जार्इ। -तुलसी

महाराज दशरथ की यह उकित लोगों का कंठहार बन गर्इ है( क्याेंकि इसमें विश्वविश्रुत रघुकुल की परंपरा का उल्लेख है।

15. व्रतौचित्य- अनुरूप व्रताचरण के वर्णन से काव्यार्थ प्रशंसनीय होकर सâदयों के मन को अपूर्व आËाद प्रदान करता है। राम के प्रति सीता की निम्नांकित उकित पातिव्रतोचित्य का सुंदर निदर्शन है-

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तेसिअ नाथ पुरुष बिनु नारीÏ

नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे। सरद बिमल बिèाु बदनु निहारेÏ -तुलसी

16. तत्त्वौचित्य- कवि यदि अपनी Ñति में किसी सार्वकालिक सत्य का वर्णन कर उसके प्रति सâदयों की èाारणा दृढ़ बना देता है तो वह Ñति पुष्ट और ग्राá हो जाती है। जैसे- श्री नरेश मेहता की 'घर की ओर कविता की निम्नांकित पंकितयों में एक शाश्वत सत्य का उदघाटन है और इसीलिए ये पंकितयाँ सâदयÐदयग्राá बन गर्इ हैं-                     

''बशर्ते उस सिरे पर

सूर्य की ही तरह

उसका भी घर हो

बच्चे हों और....

इसलिए घर जाते व्यकित में

और सूर्य में

काफी कुछ समानता है।

पुकारो नहीं

उसे जाने दो

हमारी ओर पीठ होगी

तभी न घर की ओर उसका मुंह होगा!

सूर्य को पुकारा नहीं जाता

उसे जाने दिया जाता है।

-('देखना एक दिन-श्री नरेश मेहता, पृ.12)

17. सत्त्वौचित्य- कवि का सत्त्वोचित वचन उसी प्रकार चमत्कार की सर्जना करता है जिस प्रकार बुद्धिमान व्यकित का विवेक से सुंदर बना उदार चरित्रा। यहां सत्त्व से अभिप्राय है आंतरिक बल।

उदाहरण के लिए-

''क्या तुम प्रतीक्षा नहीं कर सकते?

अभी चैत्रा-हवा आएगी

और देखना-

धरती पर

अपने खिलखिलाने की भाषा लिखते हुए

ये पत्ते स्वयं

मैदानों-चरागाहों तक दौड़ जाएंगे।

-('चैत्या-श्री नरेश मेहता, पृ. 183)

18. अभिप्रायौचित्य- कवि का वाक्य जब बिना किसी कठिनार्इ के अपने अभिप्राय को व्यक्त करता है तब वह सज्जनों की निर्मल ऋुजुता के समान चित्त को आनंदित करता है।

19. स्वभावौचित्य- अÑत्रिम तथा असाधारण लावण्य की भांति स्वभाव के अनुरूप वर्णन काव्योकितयों का आभूषण है। उदाहरण के लिए-

''कौन विश्वास करेगा कि

फूल भी मंत्रा होता है?

मैं अपने चारों ओर

एक भाषा का अनुभव करता हूँ

जो ग्रंथों में नहीं होती       

पर जिसमें फूलों की सी गंध

और बिल्वपत्रा की पवित्राता है।

(-''जहां-जहां क्षितिज होता है-(श्री नरेश मेहता, पृ.127)

20. सारसंग्रहौचित्य- सार के संग्रह को प्रस्तुत करने वाले वाक्य के द्वारा काव्यार्थ का फल निशिचत हो जाता है और वह शीघ्र समाप्त होनेवाले कार्य की भांति सभी को प्रिय लगता है। जैसे-

सुनहू भरत भावी प्रबल, बिलखि कहैउ मुनिनाथ।

हानि-लाभ, जीवन-मरन, जस-अपजस बिèाि हाथÏ -तुलसी

दोहे की अंतिम पंकित में जीवन के सार का संग्रह करके रख दिया गया है और इसीलिए यह दोहा अत्यèािक लोकप्रिय हुआ है।

21. प्रतिभौचित्य- नैपुण्य से अलंÑत कवि का काव्य उसी प्रकार सुशोभित होता है जैसे गुणवान मनुष्य का व्यकितत्व निर्मल कुल से विभूषित होता है। प्रतिभौचित्य के लिए निम्नांकित पंकितयों को देखा जा सकता है-

''èारती को कहीं से छुओ

एक ऋचा की प्रतीति होती है।

देवदारुओं की देह-यषिट

क्या उपनिषदीय नहीं लगती?

तुम्हें नहीं लगता कि

इन भोजपत्राों में

एक वैदिकता है। (-उत्सवा -श्री नरेश मेहता)

प्रÑति को अपनी सारी सांस्Ñतिक अनुभूति का आविभाज्य अंश बनाकर स्वीकार करने और उसे उसी में अभिव्यकित देने में श्री नरेश मेहता की बौद्धिक क्षमता का उत्कर्ष दिखता है।

22. अवस्थौचित्य- अवस्था का उचित चित्राण करने वाला काव्य, बुद्धिमानों के विचारपूर्वक किए गए कार्य के समान, संसार में पूज्य होता है।

23. विचारौचित्य- जिस प्रकार मनीषियों की विधा वेद तत्त्व के ज्ञान से और अèािक शोभायुक्त हो जाती है उसी प्रकार उचित विचार के आèाान से काव्य में अèािक सुंदरता आ जाती है। निम्नांकित पंकितयाँ विचारौचित्य का बड़ा सटीक प्रतिनिèाित्व करती हैं-

''उनके मत से राजनीति से

सदा बड़ी नैतिकता,

साèय नहीं रह सकता पावन

बिन साèान की शुचिता।

('प्रार्थना पुरुष-(समिèाा)-श्री नरेश मेहता)

24. नामौचित्य-जैसे कार्य के अनुरूप नाम से पुरुषों के गुण-दोषों का पता चल जाता है वैसे ही कर्म के अनुरूप नाम के प्रयोग से काव्य के गुण-दोषों की ठीक-ठीक अभिव्यकित हो जाती है।

25. आशीर्वादौचित्य- पूर्ण अर्थ की प्रतीति कराने वाले तथा मनीषियों को संतुष्ट करनेवाले काव्य में व्यवâत आशीर्वचन नागर और अभीष्ट होते हैं। इस औचित्य का एक स्वस्थ उदाहरण प्रस्तुत है-                    

 ''मेरे हाथों में

यह कविता नहीं, शब्दास्त्रा हैं।

देवताओं के लिए भी काम्य

यह संकल्पपूत अमोघ शकित संपन्न

काव्य आयुèा।

×××

काव्य जब भी

मनुष्य या इतिहास

नदी या आकाश कुछ भी लिखता है

वे मानवीय नेत्रा हो जाते हैं

जिनकी भाषा को शताबिदयाँ भी

अस्वीकार नहीं कर पाती हैं।

-('अरण्या -श्री नरेश मेहता)

काव्य की अक्षुण्णता या अक्षरता की निशिचतता को स्पष्ट करने वाली ये पंकितयाँ 'काव्य और उसके प्रणेता के लिए आशीर्वचन के समान अभीष्ट हैं।

पशिचम में औचित्य पर विचार प्राय: प्राचीन आचार्यों ने ही किया है, आèाुनिक युग में उस पर प्रत्यक्ष रूप में चर्चा सामान्यत: नहीं हुर्इ है। प्लेटो ने शैली-विवेचन के प्रसंग में औचित्य की ओर संकेत-भर किया है। उन्होंने मिश्र शैली को समुचित ठहराया है। औचित्य पर पहली बार खुलकर चर्चा करने वाले आचार्य अरस्तू हैं। कला-विवेचन से संब) उनके दो ग्रंथ उपलब्èा हुए हैं-'काव्यशास्त्रा (पेरिपोइतिकस) और 'भाषणशास्त्रा (तेखनेरितोरिकस)। अपने इन दोनों ही ग्रंथों में उन्होंने औचित्य पर विचार किया है। 'काव्यशास्त्रा में उन्होंने औचित्य के चार भेद बताए हैं-घटनौचित्य, रूपकौचित्य, विशेषणौचित्य और विषयौचित्य। उनके मतानुसार घटनाओं में संभाव्यता का गुण अवश्य होना चाहिए। यही घटनौचित्य है। रूपकौचित्य के विषय में उनका कथन है कि वस्तु का उत्कर्ष दिखाने के लिए उत्Ñष्ट गुणों से युक्त विशेषण का प्रयोग करना चाहिए। रूपक में उपमान और उपमेय के बीच अभेद स्थापित किया जाता है अत: इसकी योजना में इस बात का èयान रखना चाहिए कि उपमान और उपमेय की समान कोटि, समान जाति और समान èार्म हो। उपयुक्त विशेषण का प्रयोग ही विशेषणौचित्य है। विषयौचित्य का संबंèा भावानुसारी भाषा के प्रयोग से है। 'भाषणशास्त्रा में औचित्य का विशद विवेचन है( किंतु यहां मुख्यत: भाषौचित्य पर ही केंदि्रत रखा है।

लोजाइनस के अपने ग्रंथ 'पेरिइप्सुस में औदात्य-विवेचन के प्रसंग में औचित्य के दो प्रकारो-अलंकारौचित्य एवं शब्दौचित्य-पर विचार किया है। अलंकारों के विषय में उनका कहना है कि यदि उनकी समुचित योजना की जाए तो वे वक्ता के कथन को एक विशिष्ट आवेग से आपूरित कर देते हैं जिससे उस कथन में अभूतपूर्व चमत्कार उत्पन्न हो जाता है। विषयानुकूल शब्द-प्रयोग ही शब्दौचित्य है। उन्होंने उदात्त विषयों के लिए भव्य तथा महिमामंडित शब्दों के प्रयोग की बात कही है।

होरेस के तो काव्य-चिंतन का विषय ही औचित्य है। उन्होंने अपने लक्षण-ग्रंथ 'काव्यकला (आर्ट पोएतिका) में इस पर जमकर विचार किया है। औचित्य के जिन रूपों को उन्होंने अपने चिंतन के केंद्र में रखा है उनमें प्रमुख हैं-विषयौचित्य, चरित्राौचित्य, अभिनयौचित्य, घटनौचित्य, शब्द-चयन-औचित्य तथा छन्दौचित्य।

औचित्य के स्थान पर 'डिकोरम शब्द का प्रयोग करते हुए कहा गया कि काव्य की शैली वक्ता, चारित्रय, विषय तथा परिसिथति के अनुरूप होनी चाहिए।        

यधपि स्वच्छन्दतावादी होने के कारण वर्डसवर्थ एवं कोलरिज की चिंताèाारा क्लासिकी प्रवृत्ति के विपरीत पड़ती है तथापि भाषा, छंद, अलंकार आदि से संबंèाित औचित्य पर उनकी दृषिट निरंतर टिकी रही है। उत्तम विषय और उसकी समुचित अभिव्यकित की निरंतर बात करते हैं। आवेग संतुलन पर आèाारित आर्इ.ए. रिचर्डस के मूल्य-सिद्धांत और टी.एस. इलियट के परंपराविषयक मोह में इन दोनों समीक्षकों की औचित्य-दृषिट ही काम कर रही है।

औचित्य-सिद्धांत की समीक्षा : शकितयाँ :

1. औचित्य की व्यापकता सर्वविदित है। वह जीवन का अत्यंत उपयोगी गुण है। जीवन का प्रतिरूप होने के कारण साहित्य में भी उसकी महत्ता असंदिग्èा है। औचित्य-सिद्धांत की प्रतिष्ठा करके क्षेमेंद्र काव्य-कला को जीवन के निकट ले आए हैं। अन्य पाँच सिद्धांतों में से ऐसा एक भी तो नहीं है जो जीवन के इतने समीप हो-वे सभी सामान्यत: आदर्शवाद से प्रेरित हैं। अपनी व्यापक और उदार दृषिट के ही कारण आचार्य क्षेमेंद्र ने गुण, दोष, अलंकार, èवनि, रस, वक्रता आदि सभी का औचित्य में अंतर्भाव कर लिया है।

2. काव्य के दो पक्ष होते हैं भाव और रूप। औचित्य को छोड़कर अन्य सभी सिद्धांत या तो भावगत हैं या फिर रूपगत-रस और èवनि का संबंèा भाव से है जबकि अलंकार, रीति और वक्रोकित सामान्यत: रचना के रूप से संब) हैं। इस दृषिट से ये सभी सिद्धांत लगभग एकपक्षीय हैं। केवल औचित्य ही ऐसा सिद्धांत है जो काव्य के भाव और रूप, दोनों का केवल विवेचन ही नहीं करता, वरन विविèा काव्य-तत्त्वों में सामजस्यविèाान का भी कार्य करता है।

3. औचित्य एकदम वस्तुनिष्ठ समीक्षा-प्रतिमान है-इसमें आलोचक के रुचिवैचित्रय के लिए कोर्इ स्थान नहीं है। इसीलिए इसके आèाार पर काव्य के गुण-दोषों का सर्वथा निष्पक्ष विवेचन किया जा सकता है। इसके विपरीत रस-जैसा आलोचना का सशक्त मानदंड भी व्यकितगत रुचि पर निर्भर है-रस के आèाार पर एक ही रचना एक व्यकित को बहुत अच्छी लग सकती है और दूसरे को दोषपूर्ण।

4. नीति-तत्त्व के समावेश ने औचित्य को पर्याप्त उपयोगी सिद्धांत बना दिया है। इसके विविèा भेदों के निरूपण में क्षेमेंद्र ने कारिका की प्रथम पंकित में भेद-विशेष का लक्षण दिया है और द्वितीय पंकित में सामान्यत: नीति-कथन किया है।

5. औचित्य में काव्य के सूक्ष्मतम अवयव वर्ण (उपसर्ग), पद आदि से लेकर उसके महत्तम रूप प्रबंèा तक का विवेचन है। इस विवेचन से इस सिद्धांत की पूर्णता का पता चलता है।

6. प्रतिपादन-शैली की प्रांजलता औचित्य-सिद्धांत का अन्यतम वैशिष्टय है।

7. औचित्य एक प)ति है और प)ति कभी जीवितस्थानीय नहीं बन सकती जिस प्रकार औचित्य मनुष्य-जीवन के लिए-दैनिंदिन व्यवहार के लिए-आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है उसी प्रकार वह काव्य का अनिवार्यत: विèाायक तत्त्व है।

8. औचित्य तत्त्व केवल काव्य से ही संब) नहीं है-जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा में भी उसका समान महत्त्व है।

इस प्रकार औचित्य काव्य का अत्यंत सशक्त तत्त्व है-काव्य से उसकी निष्Ñति कथमपि संभव नहीं है। साहित्य में उसकी इसी अपरिहार्यता के कारण रसवादी भी उसे आदर-मान देते हुए दृषिटगत होते हैं।

संभावित प्रश्न

1. औचित्य सिद्धांत को समझाकर उसके प्रमुख भेदों पर विस्तार से विचार कीजिए।

2. औचित्य सिद्धांत की शकित को समझाकर लिखिए।            

सहायक-ग्रंथ

1. 'समिèाा भाग-एक और भाग-दो -(संपूर्ण काव्य-संकलन)-श्री नरेश मेहता

(लोकभारती प्रकाशन)

2. काव्यांंग-प्रक्रिया-डा. शंकरदेव अवतरे

3. 'चैत्या-श्री नेरश मेहता

(भारतीय ज्ञानपीठ)

4. 'जहां-जहां क्षितिज है (संकलनकर्ता)- आलो श्रीवास्तव (श्री नरेश मेहता की श्रेष्ठ कविताओं का संकलन)

(संवाद प्रकाशन)