SM-1

6 इकार्इ - 2 सूरदास

इकार्इ - 2   
सूरदास

1. सूरदास की भकित-भावना

डा. श्रीनिवास शर्मा

पूर्व रीडर, हिन्दी-विभाग

पत्राचार पाठयक्रम मुक्त शिक्षा, विधालय

दिल्ली विश्वविधालय

वृ+ष्ण भकित भागवत धर्म वे+ अन्तर्गत आती है। भागवत धर्म को पाचरात्रा, वैष्णव, नारायण, सात्वत आदि नामों से पुकारा गया है। वासुदेव वे+ नाम से प्रसिद्ध परमेश्वर को भगवान कहा गया है। उस भगवान की भकित करने वाले भागवत कहलाते हैं। भागतव धर्म में पाचरात्रा संहिताओं का बहुत महत्त्व है। इनमें वैष्णव मनिदरों की पूजा करने की पद्धतियाँ हैं। इनवे+ पाँच तत्त्व होते हैं-अभिगमन (ध्यान वे+निद्रत करना), उत्पादन (धूप, दीप नैवेध का संचयन), इज्या (मनिदर में इष्ट की सेवा), स्वाध्याय (इष्ट मन्त्रा का जप), योग (मुर्ति का ध्यान एवं उसमें तन्मय होना)। इन पांच तत्त्वों वे+ कारण पांचरात्रा संहिताएं कहलाती हैं। इनमें सात प्रकार वे+ पंचरात्रा हैं, जिसमें 'नारदीय पंचरात्रा सबसे प्रसिद्ध है। इन संहिताओं में भकित एवं उपासना द्वारा भगवान की सेवा को बहुत उत्तम बतलाया गया है। पुषिट मार्गीय भकित पर इनका बहुत प्रभाव है।

पुषिट मार्गीय भकित वे+ सन्दर्भ में दक्षिण वे+ आलवार सन्तों को नहीं भुलाया जा सकता। 'आलवार तमिल भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'जो गहरे जाता है। यह शब्द तमिल वे+ वैष्णव भक्तों वे+ लिए आता है। ये आलवार दूसरी शताब्दी से 9वीं शताब्दी तक अधिक सक्रिय रहे है। इन भक्तों ने कान्ता, वात्सल्य एवं दास्य भाव की भकित को अपनाया था। इन भक्तों ने परवर्ती वैष्णवाचायो± को बहुत प्रभावित किया है। इस तरह की भकित को दक्षिण भारत में बढ़ने का अवसर मिला और बाद में उत्तर में आर्इ।

वृ+ष्ण भकित वे+ प्रचार में जो बाल गोपाल की उपासना पद्धति चली उसपर आभीर जाति से प्रभाव ग्रहण करने वे+ प्रमाण मिलते है। द्रविड़ भाषा में 'आभीर शब्द आया है और वहां उसका अर्थ 'गोपाल है। विद्वानों ने माना है कि बाल गोपाल की पूजा और राधा तथा गोपियों की लीला आभीर जाति की देन है। भागवत में भकित का जन्म द्रविड़ देश में कहा गया है। 'भकित द्राविडि़ उ+पजी लाये रामानन्द आदि कथन भी इसीलिए सारपूर्ण लगते हैं। वैसे भी वैष्णव धर्म वे+ सभी आचार्य दक्षिण वे+ थे। वु+छ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि वृ+ष्ण का काला रंग भी दक्षिण प्रभाव वे+ कारण माना गया है। बंगाल में निम्बार्व+ वे+ प्रभाव से चैतन्य और चंडीदास ने भकित को आगे बढ़ाया। गुजरात में मघ्व भटट और वृन्दावन में वल्लभाचार्य ने भकित-मार्ग को प्रशस्त किया। ये दक्षिण से वृन्दावन आये और वहाँ बाल वृ+ष्ण की भकित एवं सेवा को महत्त्व दिया। सूरदास केे काव्य में वल्लभाचार्य द्वारा मान्य वृ+ष्ण-स्वरूप की प्रतिष्ठा हुर्इ।

सूरदास वे+ काव्य में अभिव्यक्त भकित-भावना वे+ दो चरण है। प्रथम चरण में वल्लभचार्य से भेंट वे+ पूर्व वे+

इकार्इ - 2                           

भकितपूर्ण भावोदगार हंै। उनमें सूरदास ने भगवान वे+ सामने तरह-तरह की विनय की है। अपने को तुच्छ समझकर दैन्य प्रकट किया है। अपने को र्इश्वर का अति तुच्छ सेवक माना है। यह भकित मूलत: दास्य भाव की भकित है। दूसरा चरण वल्लभाचार्य से भेंट वे+ पश्चात का है। कहते हंै कि सूरदास जी गउ+घाट पर रहते थे। वहाँ उनको वल्लभाचार्य वे+ आने का पता चला। वे उचित समय पर वल्लभाचार्य जी से मिलने गये और उन्हें दो पद गाकर सुनाये। एक पद है- ''हौं हरि सब पतितन को नायक और दूसरा है- ''प्रभु! हौ सब पतितनि को टीको। इन पदों को सुनकर और सूरदास वे+ दैन्य को देखकर बल्लभाचार्य ने उनसे कहा- ''जो सूर àै वे+ ऐसो घिघियात काहे को हो? कछु भगवल्लीला को गान करो। इस पर सूरदास ने उसने कहा कि महाराज तुझे भगवान की लालओं का ज्ञान नहीं है। तब वल्लभाचार्य जी न उन्हें अपने सम्प्रदाय पुषिट मार्ग में दीक्षित किया और भागवत वे+ दशम स्कन्ध की अपनी बनार्इ इुर्इ अनुकमणिका सुनार्इ। उसवे+ पश्चात सूरदास ने विनय वे+ पदों को एकदम छोड़ दिया और पुषिट-मार्ग की रीति वे+ अनुसार भगवान की भकित का वर्णन किया।

भकित भावना वे+ प्रथम चरण में सूरदास ने इस संसार वे+ भय-ताप से दग्घ स्वयं को, भगवान की भकित द्वारा छुड़ाने का आख्यान किया है। भगवान वे+ प्रति अनुराग रखने वे+ कारण सूरदास ने संसार से और सबसे विराग व्यक्त किया है। उन्हें संसार वे+ सभी कार्यो, सभी सम्बन्धों और सभी अवस्थाओं में दोष दिखलार्इ दिया। वस्तुमात्रा में दोष न होकर वस्तु दर्शन वे+ कोण में होता है। भक्त की दृषिट संसार वे+ विषयों वे+ दुष्परिणाम पर ही जाती है। सूर ने इसलिए सांसारिक सुखों वे+ निन्दा की। उन्होंने स्वयं अपनी भी निन्दा की। निष्पक्ष आँखों से देखने पर अपने कल्मष अच्छी प्रकार सूर वे+ सामने आये। यही र्इमानदारी भक्त वे+ âदय में दैन्य भाव को जगाती है। सूरदास ने जो विनय वर्णित की है उसमें दैन्य ही बहुत अधिक निहित है। भगवान वे+ गुणों की अधिकता और अपनी लघुता वे+ भाव सूरसागर वे+ आरम्भ में बार-बार दुहराये गये मिलते हैं। अगर सूर ने भगवान की भकित नहीं की तो उसका जन्म इस संसार में व्यर्थ है। वे कहते हैं-''सूरदास भगवन्त भजन बिनु धरनी जननी बोझ कत मारी (34), सूरदास प्रभु तुम्हरे भजन बिनु जैसे सूकर स्वान-सियार (41) ''कहत सूर विरधा यह देही, ऐतौ कत इतरात (313)। भगवान की वृ+पा का वर्णन सूरदास ने अच्छी प्रकार किया है। उसवे+ सामने अहल्या, गणिका, अजामिल, गज, गीध, व्याध, द्रौपदी, प्रहलाद आदि वे+ उद्धार करने वे+ अनेक उदाहरण है। उनका स्मरण करवे+ सूर का भक्त âदय अपने को सन्तुष्ट करता है-

गज गनिका गौतम तिय तारी। सूरदास सठ सरन तुम्हारी।। (28)

उन्हें भगवान की भक्तवत्सलता और हितकारकता पर दृढ़ विश्वास है। इसे वह भक्त-समाज पर प्रभु की असीम वृ+पा मानते हैं। उनवे+ मुख से बार-बार यह निकलता है।-''ऐसे कान्ह भक्त हितकारी, ßप्रभु तेरो वचन भरोसौ सांचौ, ''कहा कमी जावे+ राम धनी। सूरदास ने अपने मन को बार-बार समझाकर भगवान वे+ चरणों में जाने की भावना व्यक्त की है। इस क्रम में अपनी दुर्दशा का भी खूब वर्णन किया है। ''अब वे+ं राखि लेहु भगवान, ''अब वे+ नाथ मौहिं उधारि, ''अब मोहि भीजत क्यों न उधारो आदि पदों में सूरदास ने अपनी दुर्दशा का अच्छी प्रकार वर्णन किया है। सारांश यह है कि संसार से विराग और प्रभु से राग-यह भावना सूर ने बहुत अधिक तल्लीनता वे+ साथ व्यक्त की है।

भकित निरूपण में सूरदास ने योगियों की तो निंदा की है। पर सन्त कवियों की वाणी का प्रभाव ग्रहण किया है। उन्होंने माया से सम्बन्ध रखने वाले अनेक पद लिखे हैं। माया की निंदा उसी प्रकार की है जिस प्रकार सन्त कविया की है। माया से सावधान रहने का आख्यान किया है। सूरदास की वु+छ अभिव्यकित निश्चय ही सन्त कवियों की तरह की है-

चलि सखि तिहिं सरोवर जाहिं जिहिं सरोवर कमल कमला, रवि बिना विकसाहिं।

सूरदास ने आगे चलकर निगर्ुण भकित पर तीव्र प्रहार किए थे पर भकित वे+ इस आरमिभक वर्णन में सूरदास पर संतों का प्रभाव लगता है।

सूरदास की दैन्य प्रदर्शित करने वाली भकित दास्य भाव की भकित है। कवि उसवे+ निरूपण में गहरार्इ तक गया है। दास्य भाव की भकित में विनय की प्रधानता होती है। सूरदास वे+ वाक्य में विनय की सातों भूमिकाएँ- दीनता, मानमर्षता, भत्र्सना, भय दर्शन, आश्वासन, मनोराज, विचारणा मिल जाती है। इस तरह उनवे+ द्वारा प्रदर्शित दास्य भकित में तन्मयता और गम्भीरता से युक्त उदगार है। उनको जैसी आंतरिक पे्ररणा हुर्इ, उसी अनुभूति को निव्र्याज रूप में प्रस्तुत कर दिया।

सूरदास द्वारा निरूपति भकित का दूसरा चरण पुषिटमार्गी भकित है। भगवान का अनुग्रह पुषिट कहलाता है। भागवत में 'पोषणं तदनुग्रह कहकर यही विचार व्यक्त किया गया है। देवताओं द्वारा पोषण या पुषिटवर्धन की मान्यता वैदिक कालीन है। ऋग्वेद में ''यो रेवान यो अमीवहा वसुवित पुषिटवर्धन: अर्थात- जो देव सम्पत्ति वाला, रोगों का नाश करने वाला, धनदाता और पुषिटवर्धन करने वाला- कथन मिलता है। यजुर्वेद वे+ परम प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्रा में भी 'पुषिट-वर्धन शब्द इसी अर्थ में आया है। ''त्रयंम्बवं+ यजामहें सुगनिध पुषिटवर्धनम उर्वारुकमि: वन्धनामृत्योमर्ुक्षीय मामृतात। इस मंत्रा में 'पुषिटवर्धन का अर्थ रुद्र द्वारा पोषण करने वे+ रूप में किया जाता है। यह पोषण लौकिक और पारमार्थिक दोनों है। वल्लभाचार्य ने अणुभाष्य में- ''स्वरूप वलेन स्वप्रापंण पुषिट रुच्यये अर्थात स्वरूप बल से जो प्रभु की प्रापित होती है, उसे पुषिट कहा है। पुषिटमार्ग को समझाने की अनेक परिभाषाएँ हैं पर आचार्य हरिराम ने मुक्तावली में पुषिटमार्ग की जो परिभाषा दी है वह बहुत सटीक है।

समस्त विषय त्याग: सर्वभावेन यत्रा हि। समर्पण च देहोदे: पुषिटमार्ग स कथयते।।

अर्थात जहां समस्त विषयों का सब प्रकार से त्याग हो, देहादि का पूर्ण-समर्पण हो, वह पुषिटमार्ग कहलाता है।

पुषिट, भक्त वे+ चित्त में उध्र्वास्था है। भगवान वे+ साथ भक्त का सुखद सम्पर्व+ है। भगवान की लीलाओं में भक्त का सब प्रकार से लीन हो जाना है। यही कारण है कि पुषिट मार्ग की भकित में, भक्त, भगवान वे+ प्रत्येक कार्य में सेवा भाव से दिखलार्इ देता है। यह सेवा दो प्रकार की होती है- एक तो नित्य सेवा और दूसरी वर्षोत्सव सेवा यानी विभिन्न उत्सवों वे+ समय की सेवा। नित्य सेवा आठोंधाम की सेवा कहलाती है। इसमें मुख्य रूप से भगवान वृ+ष्ण का बाल रूप सम्बन्धी सेवा भाव व्यक्त होता है। वात्सल्य-भकित से युक्त इस नित्य सेवा का सूरदास वे+ काव्य में अच्छी प्रकार वर्णन हुआ है। इन भक्तों की मान्यता यह है कि ब्रह्रा सत्य है, उसका बनाया हुआ जगत सत्य है। उस जगत में प्रभु का विग्रह यानी प्रभु का रूप उतना ही सत्य है। उस प्रभु रूप की सेवा करने में भक्त को आध्यातिमक सुख मिलता है। इसलिए सूरदास ने विभिन्न समय की नित्य की सेवा का वर्णन किया है। आठोंधाम वे+ संवे+त इस प्रकार हैं-

1. मंगला - भगवान वे+ जगाने वे+ पद - जागिए ब्रजराज वु+वर, कमल वु+सुम पू+ले।

2. Üाृंगार - Üाृंगार करने वे+ पद - करत Üाृंगार मैया मन भावत।       

3. ग्वाल - कीड़ा वे+ पद - खेलन जाहु ग्वाल सब टैरत।

4. राजभोग - छाक वे+ पद - जेंवत नन्द कान्ह इक ठौरे।

5. उत्थापन - वन्य लीला वे+ पद - गिरी पर चढि़ गिरिवर घर टेरे

6. भोग - गोपी-लीला - घट भरि देहु लवु+ट तब दैहों।

हौं हूं बडे़ महर की बेटी तुम सौं नहीं डरैहौं।

7. संध्या आरती- वन से आगमन - सांझ भर्इ घर आवहु प्यारे।

8. शयन - सोते समय वे+ पद - पोढि़ऐं मैं रचि सेज बिछार्इ।

अति उज्जवल है सेज तुम्हारी, सोवत में सुखदार्इ।।

नित्य सेवा में भगवान वे+ सुख का ध्यान रखा जाता है। इसलिए इस सेवा वे+ समय में ऋतुओं वे+ अनुसार परिवर्तन होता रहता है। यशोदा की गोद में लालित वृ+ष्ण, बाल वृ+ष्ण, नवनीत प्रिय वृ+ष्ण, पुषिटमार्ग की भकित वे+ आलम्बन हैं, इसलिए उनकी सेवा वात्सल्य भाव की है।

वर्षोत्सवों वे+ समय की सेवा दूसरे प्रकार की सेवा है। इसमें वर्ष भर में आने वाले पर्व और उत्सवों पर सेवा की व्यवस्था की जाती है। भगवान वे+ मुख्य अवतारों की जयनितयाँ भी इसमें आ जाती हैं। दोनों ही प्रकार की सेवाओं में भोग Üाृंगार-प्रसाधन और राग इन तीन बातों का èयान विशेष रूप से रखा जाता है।

भगवान को विभिन्न भोग लगवाने और समय वे+ अनुसार Üाृंगार करने वे+ साथ राग यानी कीर्तन का इस सेवा में बहुत महत्त्व है। वल्लभाचार्य ने 'अष्टछाप वे+ आठ भक्तों को कीर्तनकार वे+ रूप में ही नियुक्त किया था सूरदास ने विभिन्न पदों की रचनाएँ कीर्तन करते समय ही की थीं। भगवान ने इस सम्बन्ध में स्वयं भी कहा है कि मैं और कहीं नहीं रहता, मैं तो वहाँ रहता हूँ जहाँ भक्त मेरा गान करते हैं-

नाहं वसामि बैवुं+ठे, योगिना âदय न च।

मदभक्ता यत्रा गायनित, तत्रा तिष्ठामि नारद:।।

सूरदास वे+ विषय में तो यह प्रसिद्ध था कि वे भगवान का जैसा स्वरूप होता था वैसा ही वर्णन अपने कीर्तन में, अपने भीतरी ज्ञान से कर दिया करते थे। 'अष्टसखान की वार्ता में इस बात का वर्णन दिया गया है कि सूरदास श्रीनाथ की कीर्तन सेवा करवे+ गोवु+ल नवनीतप्रिय (बाल वृ+ष्ण) वे+ दर्शन करने आए। गोस्वामी विटठलनाथ वे+ पुत्राों ने उनकी परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने बालवृ+ष्ण का ऐसा Üाृंगार किया कि कोर्इ वस्त्रा नहीं पहनाया, मोतियों की माला लटकाकर Üाृंगार कर दिया। सूरदास जी ने दर्शन खुलने वे+ समय कीर्तन गाना आरम्भ किया-

देखे री हरि नंगम नंगा।

जल सुत भूषन अंग विराजत बसन हीन छवि उठत तरंगा।।

गोस्वामी जी वे+ पुत्रा सूरदास की अदभुत शकित देखकर बहुत लजिजत हुए।

पुषिटमार्ग की सेवा भकित वे+ अनेक भेद हैं। यह सेवा तीन प्रकार की होती है-तनुजा, वित्तजा, मानसी। इनमें मानसी सेवा श्रेष्ठ होती है। आचार्यो ने पुषिट वे+ चार प्रकार माने हैं- 1. प्रवाह पुषिट 2. मर्यादा पुषिट 3. पुषिट-पुषिट 4. शुद्ध पुषिट।      

प्रवाह पुषिट भक्त की वह सिथति है जब वह संसार में रहते हुए ही भगवान की भकित करता है। मर्यादा पुषिट वह सिथति है जब वह सांसारिक लगावों को छोड़कर भगवान वे+ गुणगान में लीन रहता है। पुषिट-पुषिट वे+ प्राप्त होने पर भक्त को भगवान का अनुग्रह मिल जाता है और वह भगवान की भकित में लीन रहता है। मर्यादा से आगे उसी दिशा में वह बढ़ जाता है। शुद्ध पुषिट भक्त की सबसे उँ+ची सिथति है। उसका भगवान वे+ साथ मानसिक तादात्मय हो जाता है। उसकी सेवा मानसी सेवा बन जाती है। वल्लाभाचार्य वे+ मत से शुद्ध पुषिट को प्राप्त भक्त भगवान की अधीनता में भी नहीं रहता। उसका पे्रम अमर्यादित हो जाता है। सूरदास ने गोपियों में जहाँ स्वच्छन्द प्रेम दिखलाया है, वह शुद्ध पुषिट को प्राप्त मानना चाहिए। सूर ने लिखा है-''जब मोहन मुरली अधर धरी। गृह व्यौहार तजे आरज पथ बसत न संक करी। गोपियाँ सांसारिक आर्य-पथ या मर्यादा से उ+पर उठ गयी थीं। लोक लाज, वु+ल कान, मर्यादा आदि वे+ त्याग वे+ सैकड़ों पद सूरदास ने लिखे हैं। वे उनकी पुषिटमार्ग की भकित की उच्चता वे+ उदाहरण हैं। कहते हैं जिनको भकित का ज्ञान नहीं है, उन्हें वे प्रसंग अश्लील भी लगते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भकित वे+ दोनों चरण-वल्लभाचार्य से भेंट होने वे+ पूर्व और पुषिटमार्ग में दीक्षित होने वे+ बाद, सुरदास ने भावेषिटत विस्तार वे+ साथ प्रस्तुत किये हैं। पुषिटमार्ग की भकित की विशदता और आèाारपरकता देखकर गोस्वामी विटठलनाथ ने उन्हें 'पुषिटमार्ग का जहाज कहा था।

सूरदास वे+ काव्य में अभिव्यक्त भकित की भकित शास्त्रा-सम्मत पर्यालोचना करने पर प्रतीत होता है कि सूरदास की भकित भावना गुर+-गम्भीर है। भकित वे+ दो प्रकार बतलाए गये हैं- रागानुगा और बैधी। इनमें से सूरदास वे+ काव्य में रागानुगा भकित की प्रधानता है। उन्होंने भगवान वे+ प्रति अपनी परानुभकित तथा परम पे्रम की बार-बार अभिव्यंजना की है। भकित वे+ प्रसिद्ध गन्थ 'हरिभकितरसामृतसिंधु में भकित वे+ पाँच विशिष्ट भाव माने गए हैं- Üाृंगार, वात्सल्य, दास्य, सख्य और शान्त। सूरदास वे+ काव्य में पांचों प्रकार की भकित का निरूपण मिलता है। गोपियों वे+ साथ की गर्इ विभिन्न लीलाओं में Üाृंगार, वृ+ष्ण वे+ बाल-वर्णन में वात्सल्य, विनय वे+ पदों में दास्य, ग्वाल-बाल प्रसंगों में सख्य और सांसारिकता से विरक्त वे+ भावों में शान्त भाव की भकित को समझना चाहिए।

भकित वे+ क्षेत्रा में नवधा भकित का बड़ा महत्त्व है। नवधा भकित वे+ नौ प्रकार हैं-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन। सूरदास ने नवधा भकित वे+ सभी प्रकारों को अपनाया है। भगवान की लीला वे+ सुनने का आग्रह जहांँ कवि करता है वहां श्रवण, भगवान वे+ गुणगान में कीर्तन, हरिनाम लेने की बात कहता है वहाँ स्मरण, पाद सेवन, अर्चन और वन्दन सूरदास वे+ काव्य में अपेक्षावृ+त अधिक मिलते हैं। पुषिटमार्ग की सेवा भावना में मूर्ति पूजा की यानी पाद सेवन की और अर्चना की आवश्यकता होती है। वन्दना सूरदास ने सूरसागर के पहले पद 'चरण कमल वन्दौ हरि रार्इ में ही की है। दास्य भकित सूरदास वे+ विनय पदों में सर्वत्रा है। सख्य भकित बाल-लीला, गोचारण लीला आदि में और सुदामा प्रसंग में मिलती है। डा. हरवंशलाल शर्मा वे+ शब्दों में ''सूर का सख्य वर्णन विश्व साहित्य में बेजोड़ है। सूरसागर वे+ आरम्भ वे+ पदों में सूरदास का आत्मनिवेदन भगवान वे+ समक्ष प्रस्तुत हुआ है। सूर साहित्य वे+ पारखी विद्वानों ने माना है कि सूरदास द्वारा अभिव्यक्त नवधा भकित तो साधन रूप है। उनकी साध्य तो प्रेमस्वरूप भकित है। गोपियों का विरह प्रेमस्वरूपा भकित की चरमावस्था का धोतक है।            

 'नारदभकित-सूत्रा भकित का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। उसमें भकित वे+ क्षेत्रा में ग्यारह आसकितयों का आख्यान किया गया है। वे ग्यारह आसकितयां ये हैं-गुण माहात्मयासकित, रूपसकित, पूजासकित, स्मरणासकित, दास्यासकित, साख्यासकित, वात्सल्यासकित, आत्मनिवेदनासकित तन्मयासकित, परमविरहासकित। ये सभी आसकितयाँ सूरदास द्वारा निरूपित भकित में मिल जाती हंै। इनमें से वात्सल्यासकित और कान्तासकित की सूर में प्रधानता है। वृ+ष्ण वे+ शिशु रूप, बाल रूप, किशोर रूप वे+ जो रसमय और भावभीने चित्रा सूर ने उरेहे हैं उनमें वात्सल्य आसकित है। गोपियों वे+ अनुराग से परिपूूर्ण सूरसागर कान्तासकित का उदाहरण है ही।

इस प्रकार सूरदास वे+ काव्य में भकित भावना का सांगोपाँग निरूपण देखने में आता है। सूरदास भक्त होने वे+ साथ एक कवि भी हैं। काव्य और भकित का ऐसा व्यामिश्रण अन्यत्रा दुर्लभ है। इसवे+ साथ उनमें संगीत की अदभुत कला थी। इसलिए तो ''किधैं सूर को पद लगयौ तन मन धुनत सरीर कहकर उनकी प्रशंशा की गर्इ है।