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4 3. भारतेंदु-युग और राष्ट्रीय नवजागरण

3. भारतेंदु-युग और राष्ट्रीय नवजागरण

-मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

पूर्व रीडर, मुक्त शिक्षा विधालय,

दिल्ली विश्वविधालय, दिल्ली

अनेक समालोचक और हिंदी साहित्य के इतिहासकार 1850 र्इ. से 1900 र्इ. तक के काल को भारतेंदु-युग के नाम से अभिहित करते हैं। डा. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने भी यही माना है, पर यह विचित्रा बात प्रतीत होती है। 1850 र्इ. में भारतेंदु का जन्म होता है। साहितियक Ñतिकार के रूप में उनकी रचनाओं का प्रकाशन 1868 र्इ. के बाद से आरंभ होता है। अत: 1850 र्इ. से भारतेंदु-युग का आरंभ मानना युकितसंगत प्रतीत नहीं होता। जन्म ग्रहण करते ही अपनी युग-निर्माणकारी प्रतिभा से उन्होंने नवयुग का निर्माण कर दिया, इस बात में कहीं-न-कहीं इतिहास लेखन के क्षेत्रा में मौजूद अवतारवादी धारणाओं की प्रतिध्वनि मौजूद है। जब से भारतेंदु की रचनाओं का प्रकाशन आरंभ होता है, तब से भारतेंदु-युग का आरंभ मानने में कोर्इ अनौचित्य नहीं है। अत: 1868 र्इ. से 1900 र्इ. तक के काल को भारतेंदु-युग माना जा सकता है। इस दौर को भारतेंदु-युग नाम क्यों दिया गया है, इस प्रश्न पर सभी इतिहासकारों की दलीलें प्राय: एक जैसी हैं। यह कि भारतेंदु का व्यकितत्व प्रभावशाली था, वे संपादक और संगठनकत्र्ता थे, वे साहित्यकारों के नेता और समाज को दिशा देने वाले सुधारवादी विचारक थे, उनके आसपास तरुण और उत्साही साहित्यकारों की पूरी जमात तैयार हुर्इ, अत: इस युग को भारतेंदु-युग की संज्ञा देना उचित है। डा. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने लिखा है कि 'प्राचीन से नवीन के संक्रमण काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र भारतवासियों की नवोदित आकांक्षाओं और राष्ट्रीयता के प्रतीक थे; वे भारतीय नवोत्थान के अग्रदूत थे। प्रश्न यह है कि भारतेंदु को हिंदी-भाषी जातीयता के नवोत्थान का अग्रदूत कहा जाए या भारतीय नवोत्थान का अग्रदूत कहा जाए। भारतेंदु ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि तब तक हिंदी-भाषी जनसमूह पिछड़ा हुआ था और उसकी तुलना में बंगला-भाषी जातीयता अथवा मराठी-भाषी जातीयता काफी विकास हो चुका था। जातीय नवोत्थान की प्रेरणा भारतेंदु को बंगला आदि का साहित्य पढ़कर मिली थी। इसलिए भारतेंदु को इतने अतिरंजनापूर्ण ढंग से भारतीय नवोत्थान का अग्रदूत सिद्ध करने के बजाय अगर हम उन्हें हिंदी-भाषी जनसमूह की जातीय चेतना के नवोत्थान का अग्रदूत कहें तो ऐतिहासिक वास्तविकता के अधिक निकट होगा। भारत की अन्य भाषाओं में जातीय नवचेतना के अंकुर दिखार्इ देने लगे थे। सन 1870 र्इ. में 'लेवी प्राण लेवी नामक अपने निबंध में भारतेंदु ने लिखा था-'हाय-पशिचमोत्तर देशवासी कब कायरपन छोड़ेंगे और कब इनकी उन्नति होगी और इनको परमेश्वर यह सभ्यता देगा जो हिंदुस्तान के और खंड के वासियों ने पार्इ है।

भारत की अन्य जातियों की तुलना में हिंदी-भाषी जाति (पशिचमोत्तर देशवासी) के पिछड़ेपन के संबंध में भारतेंदु की उपयर्ुक्त टिप्पणी से भी यही पता चलता है। जातीय स्वत्व की पहचान और उसकी सम्मान-रक्षा के बोध से प्रेरित भारतेंदु का नवजागरणवादी आàान यह बतलाता है कि वह जातीय नवचेतना के उदघोषक थे। खड़ी बोली भाषा के माध्यम से साहित्य को मध्यकालीन पौराणिक परिवेश से बाहर निकालकर उसे आधुनिक रूप प्रदान करने का प्रयत्न ही उन्हें युगांतकारी साहित्यकार के रूप में प्रतिषिठत करता है। तत्त्कालीन हिंदी-भाषी समाज को भाव, विचार और भाषा-तीनों दृषिटयों से उन्होंने जिस दिशा में अग्रसर किया, उसी दिशा में हिंदी-भाषी जनता ने विकास की अनेक मंजिलें पार कीं। यही कारण है कि भारतेंदु के व्यकितत्व की छाप, उनके मनोभाव और विचार-जगत का प्रतिबिंब तत्कालीन अनेक कवियों और लेखकों की रचनाओं में बराबर मिलता रहा। अत: इस काल का नामकरण यदि भारतेंदु के नाम पर किया जाता है तो इसमें कोर्इ अत्युकित नहीं होगी, बलिक प्रतीकात्मक रूप में भारतेंदु के निजी वैशिष्टय के माध्यम से पूरे युग को समझने की अंतदर्ृषिट प्राप्त होती है।            

भारतेंदु-युग के अंतर्गत जिन लेखकों और कवियों का Ñतित्व समेटा जाता है उनमें प्रमुख ये हैं :

(1) श्री निवास दास (1851-1877)

(2) बालÑष्ण भटट (1844-1914)

(3) प्रताप नारायण मिश्र (1856-1894)

(4) राधाÑष्ण दास (1865-1807)

(5) बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन (1855-1923)

(6) तोता राम वर्मा (1847-1902)

(7) किशोरीलाल गोस्वामी (1865-1932)

(8) देवकीनंदन खत्राी (1861-1913)

इन उपयुक्त नामों के अलावा राधाचरण गोस्वामी, गदाधर सिंह, लज्जाराम शर्मा, श्रद्धाराम फुल्लौैरी, स्वामी दयानंद, काशीनाथ, कार्तिक प्रसाद खत्राी आदि भी उल्लेखनीय हैं।

भारतेंदुकालीन गध-साहित्य क्या, उस युग की संपूर्ण सृजन चेतना ही पूर्ववर्ती साहित्य से अलग है। हिंदी-भाषी जनसमूह के जातीय स्वत्व की पहचान और बि्रटिश दासता से मुकित के लिए छटपटाती देशभकितपूर्ण आंतरिकता के इस नए संदर्भ में हिंदी का सर्वथा नया साहित्य लिखा जाने लगा। इसके अलावा हिंदी-भाषी क्षेत्रा की सभी बोलियों के बीच खड़ी बोली जातीय भाषा के रूप में प्रतिषिठत हुर्इ, अत: हिंदी के प्रचार-प्रसार और उसे समुचित स्थान दिलाने के संघर्ष की पृष्ठभूमि में नया आàान भी सुनार्इ पड़ने लगा। भारतेंदु ने ही सबसे पहले कहा :

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

बिन निज भाषा ज्ञान कै, मिटत न हिय को सूल।

निज भाषा की उन्नति का यह आàान क्या मात्रा एक साहित्य-सेवी की दृषिट से था। मातृभाषा और जातीय भाषा के प्रति गहरे लगाव की ऐसी भावना इतनी प्रखरता से पहली बार मुखरित हुर्इ। यही जातीय उत्थान का प्रथम लक्षण बनकर प्रकट हुआ। जातीय उत्थान की विकलता की यह भावना अन्य प्रश्नों पर भी उतनी ही तीव्र है, जितनी भाषा के प्रश्न पर। अत: जिस व्यापक फलक पर भारतेंदु का मूल्यांकन किया जाना चाहिए, वह है राष्ट्रीयता। स्वदेशी की भावना और जातीय नवोत्थान की व्याकुलता भाषा और साहित्य की उन्नति तो उसका अंग मात्रा है। डा. रामविलास शर्मा ने ठीक ही कहा है कि 'उनका भाषा संबंधी आंदोलन उनके स्वदेशी आंदोलन का अंग बन गया। भारतेंदु ने इसी स्वदेशी आंदोलन का सूत्रापात करने के लिए 23 मार्च 1874 की कवि वचन सुधा में एक प्रतिज्ञा पत्रा प्रकाशित कराया, जो इस प्रकार है :

हम लोग सर्वांतर्यामी सब स्थल में वर्तमान सर्वद्रष्टा और नित्य सत्य परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोर्इ विलायती कपड़ा न पहिरेंगे और जो कपड़ा पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की मिति तक हमारे पास हैं उनको तो उनके जीर्ण होने तक काम में लावेंगे, पर नवीन मोल लेकर किसी भांति का भी विलायती कपड़ा न पहिरेंगे, हिंदुस्तान का ही बना कपड़ा पहिरेंगे। हम आशा रखते हैं कि इसको बहुत ही क्या प्राय: सब लोग स्वीकार करेंगे और अपना नाम इस श्रेणी में होने के लिए श्रीयुत बाबू हरिश्चंद्र को अपनी मनीषा प्रकाशित करेंगे और सब देशी हितैषी इस उपाय के वृद्धि में अवश्य उधोग करेंगे।

स्वदेशी के व्यवहार की यह गंभीर प्रतिज्ञा ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। यह ध्यान देने की बात है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो स्वदेशी आंदोलन चला, वह अपने प्रारंभिक रूप में भारतेंदु के नेतृत्व में आरंभ हो चुका था।        

भारतेंदु ने इस प्रतिज्ञा पत्रा पर हस्ताक्षर करने के लिए नवशिक्षितों, व्यापारी वर्गों और साधारण जनता से व्यापक अपील की थी। इस पर काफी हस्ताक्षर भी हुए थे। इस प्रसंग में डा. रामविलास शर्मा ने स्वदेशी के व्यवहार की प्रतिज्ञा का ऐतिहासिक महत्त्व बतलाते हुए जो व्याख्या की है, वह भारतेंदु-युग का अनुशीलन करने वाले आज के बुद्धिजीवी समुदाय के लिए ध्यान देने योग्य है :

हिंदी-भाषी जनता इस बात पर गर्व कर सकती है कि उसके नवजागरण के वैतालिक हरिश्चंद्र ने चौबीस वर्ष की अवस्था में स्वदेशी के व्यवहार की यह गंभीर प्रतिज्ञा की थी। उस दिन तरुण हरिश्चंद्र ने न केवल हिंदी प्रदेश के लिए वरन समूचे भारत के लिए एक नए युग का द्वार खोल दिया था। उस दिन राष्ट्रीय स्वाधीनता के पावन उददेश्य से हिंदी साहित्य का अटूट गठबंधन हो गया था। उस दिन हरिश्चंद्र की कलम से भारतीय जनता ने अंग्रेजी राज्य के नाश का वारंट लिख दिया था।

स्वदेशी उधोग-धंधों की उन्नति के लिए विदेशी कपड़ों और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के इस आंदोलन के मूल में कहीं-न-कहीं उभरते हुए स्वदेशी पूंजीवाद के रास्ते को निर्विघ्न बनाने की भावना भी रही होगी। भारतेंदु तो चाहते थे कि विज्ञान, कला-कौशल, शिल्प और टेक्नालाजी का भी देश की उन्नति के लिए देश में ही विकास हो। यहाँ तक कि देश के पूंजीपतियों का उन्होंने आàान किया था कि वे भारत में भी विलायत में प्रचलित मशीनें मंगवाएँ और स्वदेशी उधोग का प्रसार कर विदेशी पूंजी के द्वारा हो रही लूट-खसोंट बंद करवाएँ। 9 मार्च 1874 को कवि वचन सुधा में उन्होंने लिखा था :

इसलिए अब जो-जो विद्वान और विचारी मनुष्य हों उनको उचित है कि अपने द्रव्य की वृद्धि के निमित्त जितने भाप के यंत्रा मंगा सकें, मंगाएं और यहां भी धातु आदि खान कर्इ हैं उनका शोध करेंं।

इसके एक वर्ष पहले स्वदेशी पूंजीपति वर्ग की असमर्थता बतलाते हुए भारतेंदु यह लिख चुके थे कि सबको मिलकर इस चुनौती का सामना करना चाहिए। उनका कहना था, 'जब तक देश भर के व्यापारी इस विषय में उधोग न करेंगे तब तक कार्य सिद्ध भली-भांति नहीं हो सकता जिस लिए केवल इतने ही से एतदेशीय वस्त्रा आदि की वृद्धि होनी कठिन है और अंग्रेजों के समान वस्तु तैयार करना सबों की सहायता के बिना नहीं हो सकता।

बि्रटिश औपनिवेशिक शोषण बंद कराने का यह मूल मंत्रा अपने आप में एक दूसरे पहलू से भी मूल्यवान है। वह यह कि भारतेंदु स्वदेशी पूंजीपति वर्ग के हितों के प्रति सहानुभूति रखते थे और उन्हीें हितों से जोड़कर देश की औधोगिक प्रगति का सपना संजो रहे थे। इस तरह उस समय अंकुर रूप में उभरते हुए स्वदेशी पूंजीपति वर्ग की भावभूमि पर भारतेंदु के साहित्य का विकास हुआ। अगर हम इसे समझेंगे, तभी हम भारतेंदु के व्यकितत्व और Ñतित्व में निहित विभिन्न अंतर्विरोधों को भी समझ सकते हैं। स्वदेशी पूंजीपति वर्ग ढुलमुल होता है। कभी वह साम्राज्यवाद से समझौता करता है और कभी-कभी अपने हितों की वजह से उससे लड़ता भी है। भारतेंदु की रचनाओं में ही नहीं, बलिक भारतेंदु मंडल के तमाम लेखकों की रचनाओं में बि्रटिश हुकूमत के प्रति आशा भरी दृषिट से देखने की राजभकित का जो स्वर है, और उसके साथ-साथ देशभकित की प्रखर भावना भी है-इस असंगति के मूल में यही स्वदेशी वर्ग का दृषिटकोण है। प्राचीन भारत के अतीत के प्रति मोहासक्त दृषिट की अनेक रचनाओं को देखकर आज यह प्रतीत होता है कि भारतेंदु मंडल के लेखक हिंदू पुनरुत्थानवाद के समर्थक थे। मुगलों के शासनकाल के मूल्यांकन के प्रश्न पर भारतेंदु मंडल के लेखकों ने भी उस पूरे दौर में हिंदू-मुसलिम धार्मिक विद्वेष के सांप्रदायिक आग्रह को बल पहुँचाया है। पर दूसरी तरफ यह भी कहा है कि हिंदू या मुसलमान किसी भी सामंत, राजा-महाराजा अथवा रर्इस से कुछ भी आशा करना व्यर्थ है। इतना ही नहीं, बलिक 'लेवी प्राणी लेवी नामक निबंध में भारतेंदु ने बनारस के बि्रटिश भक्त रर्इसों को कठपुतली की तरह नाच नाचते हुए दिखाया। 'प्रेम जोगिनी में अमीरों को झूठा, निंदक और विश्वासघाती कहा गया है। 'भारत-दुर्दशा में वैतालिक कहता है, 'सामंतों से पराक्रम की आस लगाना व्यर्थ है। वे तो बि्रटिश हुकूमत के दास बन जाने के बाद सोचने की सामथ्र्य भी खो बैठे हैं। 'विषस्व विषमैघधम नामक रचना में भारतेंदु ने बहुत ही उपयुक्त चुटकुले का इस्तेमाल किया है-'कलकत्ता के प्रसिद्ध राजा अपूर्व Ñष्ण से किसी ने पूछा था कि आप लोग कैसे राजा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया जैसे शतरंज के राजा, जहां चलाइए वहां चलें। इस तरह भारतेंदु मंडल के लेखकों का सामंतों पर कहीं कोर्इ भरोसा, पूर्ण न था। इतिहास को बदलने वाली क्रांतिकारी शकित जनता पर पूरा भरोसा, आस्था और दृढ़ निष्ठा के अनेक दृष्टांत मिलते हैं। जैसे बलिया के अपने व्याख्यान में ही भारतेंदु ने साफ-साफ कहा, 'राजा-महाराजा पर कोर्इ भरोसा न करो-तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो, कब तक अपने को जंगली हूस मूर्ख बोदे डरपोकने पुकरवाओगे। निरक्षर, अनपढ़ और अंधकार में डूबी जनता का आàान करते हुए भारतेंदु ने धर्म-निरपेक्ष और वर्ण-निरपेक्ष एकता की भी बात की, यह समय इन झगड़ों का नहीं, हिंदू, जैन, मुसलमान-सब आपस में मिलिए। जाति में कोर्इ चाहे ऊंचा हो, चाहे नीचा हो, सबका आदर कीजिए जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए। छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोडि़ए। उस युग की सीमा में ध्यान देने की बात है बि्रटिश हुकूमत से निबटने के लिए विभिन्न धर्मावलंबियों की एकता की पुकार।

भारतेंदु मंडल के सभी लेखक और पत्राकार न तो नासितक थे न और धर्म को अफीम समझने वाले वैज्ञानिक चिंतक। पर अधिकांश ने पुरोहितों के रूढ़ और धर्म के नाम पर प्रचलित गलत रिवाजों का विरोध किया। दूसरी तरफ इन्हीें लेखकों ने र्इश्वर-भकित और वैष्णव उपासना-पद्धति का समर्थन किया। भारतेंदु द्वारा गठित 'तदीय समाज नाम की संस्था का प्रचारक मंत्रा था-'निश्चय रखें कि परमेश्वर को पाने का पक्ष केवल प्रेम है।

विधवा विवाह, बाल विवाह, सती प्रथा, विदेश गमन, जातिगत भेदभाव, स्त्राी-शिक्षा आदि अनेक प्रश्नों पर भारतेंदु और उनके सहयोगी सुधारवादी और उदार विचारों को मानने वाले थे, पर वैष्णव भकित की प्रेमपिपासा को भी बरकरार रखे हुए थे। इस तरह हम देखते हैं कि प्राय: सभी प्रश्नों पर भारतेंदु मंडल के लेखकों के Ñतित्व में वे असंगतियां मौजूद हैं जो उस युग के स्वदेशी पूंजीपति वर्ग की भी असंगतियां थीं। इन असंगतियों पर परदा डालने के लिए इतिहास में एक शब्द चलता है 'समन्वय। आचार्य शुक्ल इन असंगतियों के प्रति इतिहासकार के नाते सचेत हैं। भाववादी इतिहास-दृषिट की अपनी सीमा के कारण वे भी 'समन्वय की ही बात करते हैं :

अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो वे पदमाकर और द्विजदेव की परंपरा में दिखार्इ पड़ते थे, दूसरी ओर बंगदेश के माइकेल और हेमचंद्र की श्रेणी में। एक ओर तो राधाÑष्ण की भकित में झूमते हुए नर्इ भक्तमाल गूंथते दिखार्इ देते, दूसरी ओर मंदिरों के अधिकारियों और टीकाधारी भक्तों के चरित्रा की हंसी उड़ाते और स्त्राी-शिक्षा, समाज सुधार आदि पर व्याख्यान देते पाए जाते थे। प्राचीन और नवीन का यही सुंदर सामंजस्य भारतेंदु की कला का विशेष माधुर्य है।

ध्यान देने की बात है कि परस्पर-विरोधी असंगतियों के विधमान होने को आचार्य शुक्ल प्राचीन और नवीन का सामंजस्य कहते हैं। पर शिवदान सिंह चौहान इन असंगतियों को भारतेंदु की व्यकितगत दुर्बलता मानकर उनका ऐतिहासिक मूल्यांकन करना चाहते हैं।

इस संबंध में डा. रामविलास शर्मा का ही निष्कर्ष सही है। उनके विचार से 'भारतेंदु की असंगतियाँ उनके युग की सीमाओं से पैदा नहीं हुर्इ। वे उनके वर्ग की असंगतियाँ हैं, उस काजल की कोठरी की स्याही हैं, जिसमें भारतेंदु का जन्म हुआ था। यह ध्यान रखने की बात है कि इन असंगतियों के मूल में पूरा-का-पूरा स्वदेशी पूंजीपति वर्ग है, जिसके अंतर्गत राजनेता, विद्वान और रर्इस लोग भी समिमलित हैं।

भारतेंदु युग के साथ जिस नवजागरण का अभ्युदय होता है, उसके प्रेरक कारणों की छानबीन करना आवश्यक है। इस संबंध में हिंदी के साहित्येतिहास ग्रंथों में गंभीर मतभेद है। कुछ विद्वानों की यह मान्यता है कि समाज सुधार की भावना से लेकर बि्रटिश हुकूमत के विरोध के मूल में निहित राष्ट्रीयाता की भावना तक सब कुछ पशिचम की नइ सभ्यता, ज्ञान-विधान और नर्इ शिक्षा से संपर्क के कारण ही एक नर्इ प्रवृत्ति का रूप ले सकी थी। जातीय स्वत्व का बोध, राष्ट्रीय संपदा और रम शकित के शोषण की पहचान, विदेशी हुकूमत के जुए के नीचे पिसती हुर्इ भारतीय जनता के उत्पीड़न का अभिज्ञान-क्या पशिचम की नर्इ सभ्यता के संपर्क से उत्पन्न हुआ था? यह विचित्रा बात है कि जो लोग शोषण और उत्पीड़न कर रहे थे, उन्हीें लोगों को हम अपनी जागृति का प्रेरक मान बैठे हैं। इतिहास को वस्तुनिष्ठ ढंग से न देखने के कारण ही ऐसी भ्रांतियाँ होती हैं। कार्य-कारण की Üाृंखला की कडि़याँ और एक-दूसरे से टकराती ऐतिहासिक शकितयों के अंतर्विरोध को ठीक से न समझने का मूल कारण है इतिइास के प्रति भाववादी अथवा अध्यात्मवादी दृषिटकोण। इतिहास के किसी विशेष कालखंड में जो द्वंद्व मौजूद होता है, उसे देखने और वस्तुगत ढंग से उसका विश्लेषण करने से ऐसी भ्रांतियाँ नहीं होगी।

कुछ इतिहासकार और समालोचक भारतेंदुकालीन नवजागरण की पृष्ठभूमि में 1857 की जनक्रांति को नहीं देखते, बलिक 1857 में बंबर्इ, कलकत्ता और मद्रास में स्थापित अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के विश्वविधालय, कंपनी राज्य में फैलाए गए तथाकथित ज्ञान-विज्ञान और अंतत: भारत-यूरोप संपर्क को ही नवजागरण का मूल प्रेरक मानते हैं। भारत में राष्ट्रीयता के उदभव के सवाल पर अंग्रेज जो बड़े-बड़े दावे करते हैं, उन्हीें दावों के बहकावे में कुछ भारतीय बुद्धिजीवी भी आ गए हैं। डा. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय और डा. श्रीÑष्ण लाल दोनों ने यूरोप के संपर्क से, खास तौर पर बि्रटिश जाति द्वारा फैलार्इ गर्इ नवचेतना की देन के रूप में हिंदी नवजागरण को परिभाषित करने का प्रयत्न किया है। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहासकारों में भी कुछ अंग्रेज भक्त हैं जो भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के उदभव के मूल में अंग्रेज विद्वानों द्वारा लिखित ज्ञान-विज्ञान के साहित्य को ही प्रमुख रूप से देखा करते हैं। 'संस्Ñति के चार अध्याय नामक पुस्तक में दिनकर जी ने भी इसी मत की पुषिट करते हुए यह कहा कि 'वर्तमान भारत का जन्म ही अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की गोद में हुआ है। सवाल यह है कि क्या भारत में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन इसलिए आरंभ हुआ कि यहाँ के शिक्षित जन समुदाय को उसके शासकों ने बर्क, मिल और मैकाले की रचनाओं को पढ़ना और ग्लैडस्टन तथा ब्राइट जैसे धुरंधर वक्ताओं की संसदीय भाषण-शैली में रस लेना सिखा दिया था? खुद अंग्रेजों ने और उनके भक्तों ने तो खास तौर पर यही कहानी गढ़ी है। वस्तुनिष्ठ दृषिटकोण से देखा जाए तो साफ पता चलता है कि भारत में स्वाधीनता की भावना यहाँ की अपनी सामाजिक परिसिथतियों से पैदा हुर्इ। वह बि्रटिश औपनिवेशिक शासन की परिसिथतियों और उनकी शोषण की व्यवस्था से उत्पन्न हुर्इ। रजनी पामदत्त ने इस प्रसंग में ठीक ही लिखा है कि हमारा स्वाधीनता आंदोलन उन सामाजिक तथा आर्थिक शकितयों से पैदा हुआ जो इस शोषण के कारण भारतीय समाज में उत्पन्न हो गर्इ थीं। वह इस कारण पैदा हुआ कि भारत में पूंजीपति वर्ग जन्म ले चुका था और शिक्षा की शैली की जैसी भी व्यवस्था होती, बि्रटिश पूंजीपति वर्ग के प्रभुत्व के साथ उसका टकराव अवश्य ही होता।

जब मैकाले ने भारत की सदियों से चली आ रही पुरानी शिक्षा व्यवस्था नष्ट कर नए ढंग की साम्राज्यवादी अंग्रेजी शिक्षा शुरुआत की तो उसका लक्ष्य भारत की जनता में राष्ट्रीय भावना पैदा करना न था, बलिक उसकी जड़ें खोदना था। रजनी पामदत्त के शब्दों में कहें तो कहा जा सकता है कि, 'यह साम्राज्यवाद की पूरी व्यवस्था में निहित अंतर्विरोधों का परिणाम था। शिक्षा की जो पद्धति साम्राज्यवाद के हितों की रक्षा करने के लिए जारी की गर्इ थी, उसी ने भारत के लोगों के लिए इंग्लैंड के जनवादी जन-आंदोलनों और जन संघर्षों से, मिल्टन, शैली तथा बायरन जैसे कवियों से प्रेरणा प्राप्त करने का भी रास्ता खोल दिया। इंग्लैंड की यह महान जनवादी धारा उसी प्रकार की निरंकुशता से लड़ रही थी, जिस प्रकार की निरंकुशता भारत में कायम थी। विचित्रा बात यह है कि भारतेंदु की विचारधारा नामक अपनी पुस्तक में डा. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने राष्ट्रीय भावना के नवोत्थान का सारा श्रेय अंग्रेज शासकों को दिया है।

बि्रटिश साम्राज्यवादी शासक वर्ग की प्रशसित में उन्होंने लिखा, 'उसके बाद 1833 तक बाá और आंतरिक शांति के फलस्वरूप शिक्षा का, प्रधानत: र्इसार्इ मिशनरियों के प्रयत्नों से, खूब प्रचार हुआ। इन नवीन परिसिथतियों का देश के जीवन पर प्रभाव पड़े बिना न रह सका। साथ ही नवीन शासकों ने भी भारतवासियों के प्रति अपना नैतिक उत्तरदायित्व निभाने का प्रयत्न किया। इतना ही नहीं, बलिक डा. वाष्र्णेय यह भी मानते हैं कि, '1833 तक देश में शांति और व्यवस्था के फलस्वरूप नवीन शकितयों का पूर्ण रूप से प्रस्फुटन हुआ। भारतेंदुकालीन सांस्Ñतिक नवजागरण के मूल में अंग्रेज शासकों द्वारा 'नैतिक उत्तरदायित्व की भावना से किए गए उदार कार्य, 'शांति, 'सुव्यवस्था आदि की पोल खोलते हुए खुद लार्ड मैटकाफ गवर्नर जनरल की हैसियत से 1835-1836 के पहले ही यह रिपोर्ट भेज चुके थे, 'पूरा भारत हर घड़ी यही मनाया करता है कि हमारा तख्ता उलट जाए। हमारे नाश पर हर जगह लोग खुशियाँ मनाएंगे या कम-से-कम सोचते हैं कि वे खुशियाँ मनाएंगे और ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो उस घड़ी को नजदीक लाने मे ंअपनी पूरी ताकत लगा देंगे।

अंग्रेज गवर्नर जनरल हिंदुस्तान को जनता के जातीय नवोत्थान और क्रांतिकारी प्रतिरोध से डरा हुआ था। इससे पता चलता है कि हमारे देश में राष्ट्रीय भावना का उभार कब और क्यों उत्पन्न हुआ। डा. रामविलास शर्मा ने भारतेंदुकालीन नवजागरण की व्याख्या इसी पृष्ठभूमि में की है, 'हिंदुस्तान की राष्ट्रीय चेतना सीधे अंग्रेज डाकुओं के कारनामों का विरोध करके बढ़ी। इसलिए हिंदुस्तान की राष्ट्रीय भावनाओं का तमाम नया साहित्य अंग्रेजी राज्य का विरोधी साहित्य है। अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भारतीय जनता को गुलामी की शिक्षा दी, भरसक उसके राष्ट्रीय सम्मान और उसकी प्रतिरोध भावना को कुचलने की कोशिश की। इसके बावजूद जनता के समर्थक लेखक देश की संस्Ñति की रक्षा और विकास के लिए आगे बढ़े।

भारतेंदु ने अंग्रेज हाकिमों की खुशामद करने वाले सज्जनों की खिल्ली उड़ाने के उददेश्य से ऐसे स्रोतों की रचना की जो कंठस्थ करने लायक थे। ऐसे ही एक स्वोत्रा में अंग्रेजों का विलक्षण नख-शिख वर्णन है :

चुंगी और पुलिस तुम्हारी दोनों भुजा हैं, अमले तुम्हारे नख हैं, अंधेर तुम्हारा पृष्ठ है और आमदनी तुम्हारा âदय है, अतएवँ हे अंग्रेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।

खजाना तुम्हारा पेट है, लालच तुम्हारी क्षुधा है, सेना तुम्हारा चरण है, खेताब तुम्हारा प्रसाद है, अतएवँ हे विराट रूप अंग्रेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।

और अगर ऐसा भयंकर राक्षस वपुधारी अंग्रेज हमारे पवित्रा घर में व्यभिचारी के रूप में घुस आए तो देशवासियों को क्या करना चाहिए? इस संबंध में भी भारतेंदु का आàान बहुत स्पष्ट और खरा है :

हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोर्इ पुरुष व्यभिचार करने आवे तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शकित होगी उसका सत्यानाश करोगे उसी तरह इस समय जो-जो बातें तुम्हारे उन्नति पथ का काँटा हों उनकी जड़ खोदकर फेंक दो। कुछ मत डरो। जब तक सौ-दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बहार न निकाले जाएँगे, दरिद्र न हो जाएँगे, कैद न होंगे वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोर्इ देश न सुधरेगा।

विदेशी आततायियों के विरुद्ध मुकित संघर्ष का आàान करते हुए कैसा घरेलू रूपक और कितना सटीक उत्पीड़नकारी चित्रा खींचा गया है। फिर भी शिवदान सिंह चौहान का आरोप है कि उदर्ू लेखकों की तुलना में भारतेंदु-युग के लेखकों में 'ऐसी कोर्इ व्यापक राष्ट्रीय भावना नहीं मिलती। अपने अतीत के प्रति इस प्रकार के निषेधवादी आग्रह से इतिहास नहीं लिखा जा सकता और न वस्तुपरक मूल्यांकन ही संभव है।

भारतेंदुकालीन जातीय जनवजागरण के चरित्रा का विश्लेषण करना आवश्यक है। इस संबंध में काफी मतभेद की गुंजाइश है और एक हद तक इस विषय पर गंभीर वाद-विवाद हुए भी हैं। इसे नवजागरण कहा जाए अथवा पुनरुत्थान, नामकरण की पदावली की ओट में ही यह वैचारिक संघर्ष छिपा हुआ है। श्री रामधारी सिंह 'दिनकर भारतेंदु के समय से लेकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी तक के काल को हिंदी का पुनरुत्थानवादी युग कहते हैं। पुनरुत्थान का मूल तत्त्व है भारत के अतीत गौरव का आख्यान, भारत के प्राचीन भाववादी अथवा अध्यात्मकवादी दर्शन के बल पर नवयुग की पुनर्रचना, आर्य संस्Ñति के शुद्धतावादी आग्रहों से नए युग की भाव-संवेदना का विकास अर्थात हिंदू पुनरुत्थानवाद। इसी अर्थ में दिनकर जी भारतेंदु को भी पुनरुत्थानवादी मानते हैं। उनकी मान्यता है : 'हिंदी में पुनरुत्थान के भाव भारतेंदु तथा उनके समकालीन कवियों के साथ ही प्रकट होने लगे थे और तभी से हिंदी-भाषी जनता के बीच एक नर्इ रुचि भी उदित होने लगी थी और इस पुनरुत्थान के नेता के रूप में दिनकर जी ने स्वामी दयानंद को प्रतिषिठत किया है।

प्रसंगवश यह उल्लेखनीय है कि भारतेंदु और स्वामी दयानंद लगभग समकालीन थे। भारतेंदु का लेखन 1868 र्इ. से आरंभ होता है और 1884 र्इ. में उनका देहावसान होता है। एक आर्यसमाजी विचारक के रूप में स्वामी दयानंद का सार्वजनिक व्याख्यान और परिपक्व लेखन 1863 र्इ. से आरंभ होता है और देहत्याग 1883 र्इ. में होता है। भारतेंदु की पत्रिका के संपादक मंडल में एक नाम स्वामी दयानंद का भी मुदि्रत रहता था। इस समकालीनता और सामीप्य संबंध के बावजूद दोनों की विचारधाराओं के अलग-अलग वैशिष्टय की पहचान न होने के कारण भ्रांति होना स्वाभाविक है।

इधर अनेक शोधग्रंथों में उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में आरंभ हुए हिंदी नवजागरण की अनेक प्रकार की व्याख्याएँ हुर्इ हैं। इन व्याख्याओं में एक धारा उन शोधार्थियों की है जो नवजागरण के बजाय पुनर्जागरण कहना अधिक पसंद करते हैं और इस पुनर्जागरण के नेता के रूप में स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रतिषिठत किया जाता है। यह भी कहा जा रहा है कि हिंदी-भाषी क्षेत्रा में यूरोपीय ढंग के रेनांसा की शुरुआत आर्य समाज के दर्शन और उसके सामाजिक-धार्मिक आंदोलन से हुर्इ। इसी प्रतिज्ञा की सिद्धि डा. चंद्रभानु सीताराम सोनवर्ण के शोधग्रंथ हिंदी गध साहित्य में दिखार्इ देती है। यह ठीक है कि हिंदी-भाषी जनसमुदाय पर 1862 र्इ. के बाद से स्वामी दयानंद के व्याख्यानों का बहुत प्रभाव पड़ा है। 1875 र्इ. में संगठित रूप में चलाए गए आर्य समाज आंदोलन के प्रभाव से समाज की कुरीतियों और सड़े हुए रिवाजों को नर्इ दृषिट से देखने की प्रेरणा मिली, राष्ट्रीय मुकित और स्वाधीनता की भावना बलवती हुर्इ, पर यह मान लेना कि इस नवजागरण का मूल प्रेरक आर्य समाज था,इतिहास के साथ अनाचार होगा। अगर हम आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती की उपेक्षा कर तत्कालीन साहितियक इतिहास लिखने का प्रयत्न करें तो यह भी इतिहास-विरोधी दृषिटकोण होगा। हिंदी साहित्य : उनका उदभव और विकास नामक अपने इतिहास ग्रंथ में डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी काफी हद तक इस प्रसंग में सचेत और वस्तुनिष्ठ हैं। उनका कहना है कि 1857 के बाद आर्य समाज ने अपने युगांतकारी नेता महर्षि दयानंद के नेतृत्व में अनेक समस्याओं पर उग्र विवाद का आरंभ कर दिया। 'उन दिनों शास्त्राार्थों की धूम मच गर्इ। उत्तर-प्रत्युत्तर से, कटाक्षों और व्यंग्यों से सामयिक पत्रा भरे रहते थे और हिंदी का भावी गध नवीन शकितयों से सुसजिजत हो रहा था। इन वाद-विवादों ने भाषा को बहुत समृद्ध किया है और प्रौढ़ता प्रदान करने में बड़ी सहायता पहुंचार्इ। (पृ. 253) ध्यान देने की बात है कि नवजागरण के धार्मिक और सामाजिक वाहन के रूप में डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ब्रह्रा समाज, सनातन धर्म आदि संगठनों की भूमिका को भी दिखाने का प्रयत्न किया है। पंजाब में नवीनचंद्र राय ब्रह्रा समाज के हिंदी प्रचारक की हैसियत से और श्रद्धाराम फुल्लौरी सनातन धर्म के समर्थक के रूप में प्राचीन संस्Ñति की जो नर्इ व्याख्या कर रहे थे, उसे भी कम करके न देखा जाए, यह आग्रह काफी हद तक वैज्ञानिक दृषिट से इतिहास लिखने में सहायक हो सकता है।

नवजागरण की ऐतिहासिक व्याख्याओं के कुछ ऐसे प्रवक्ता हैं जो 1857 के गदर अथवा भारत के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन की उपेक्षा करते हैं। इससे एक भटकाव तो यह होता है कि कुछ लोग भारत-यूरोप संपर्क की शब्दावली की आड़ में अंग्र्रेजों को ही अपने नवजागरण का प्रेरक मान बैठते हैं। दूसरा यह कि धार्मिक आंदोलनों अथवा आर्य समाज जैसे संगठन को नवजागरण का वाहक बतलाने की कोशिश की जाती है। भारतेंदुकालीन हिंदी नवजागरण सन 1857 के गदर के प्रभाव से उत्पन्न हुआ। इस नवजागरण की अनेक धाराएँ हैं, जिनमें एक हिंदू पुनरुत्थानवाद अथवा वैदिक एकेश्वरवाद से आवृत्त तथाकथित आर्य संस्Ñति के आग्रह के लिए खंडन-मंडन पर आधारित आर्य समाजी आंदोलन भी है। दूसरी धारा वैष्णव प्रेमभकित और नवजात पूंजीवादी उदारतावाद की है। ये दो प्रमुख धाराएँ ऐतिहासिक दृषिट से काफी महत्त्वपूर्ण हैं, चूंकि इन दोनों की टकराहट और संघर्ष से ही हिंदी नवजागरण का द्वंद्वपूर्ण विकास होता है।

यह आकसिमक नहीं है कि स्वामी दयानंद और उनके समर्थक अवतारवाद का विरोध करने की ओट में तुलसी के रामचरितमानस का पठन-पाठन निषिद्ध करते हैं जबकि भारतेंदु मंडल के प्राय: सभी लेखक सूर-तुलसी से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। हिंदी की जातीय संस्Ñति की उपलबिधयों के प्रति नकारात्मक दृषिटकोण आर्य समाज के पुनरुत्थानवादी आंदोलन की सीमा का बोध कराता है। पुनरुत्थान की यह ऐसी वैचारिक दृषिट है जो सुदूर अतीत अर्थात वैदिक संस्Ñति को पुनर्जीवित करना चाहती है, पर उसके बाद के सांस्Ñतिक विकास के विभिन्न युगों की उथल-पुथल को पूरी तरह नकारना चाहती है। इसे ही आजकल मूल तत्त्ववाद या 'फंडोमेंटलिज्म की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। डा. चंद्रभानु सीताराम सोनवणे ने अपने शोधग्रंथ में लिखा है कि स्वामी दयानंद ने 'अवतारवाद, जातिवाद आदि की अवैदिक विचारधारा के कारण तुलसीदास Ñत भाषा रामायण आदि ग्रंथों को भी 'कपोलकलिपत मिथ्या ग्रंथ मानकर अपाठय माना है। यह विचित्रा बात है कि वैदिक कल्पना के समाज की शुद्धता की रक्षा के लिए अथवा आज के समाज को वेदानुकूल बनाने के लिए तुलसी के रामचरितमानस को अपाठय बताना हमारे नवजागरण के लिए कैसे सहायक हो सकता था।

हिंदी को स्तरीय स्वरूप देने की जो प्रक्रिया तत्कालीन भारतेंदु युगीन साहित्य में चल रही थी, उसमें हिंदी क्षेत्रा की विभिन्न बोलियों के शब्द भंडार और हिंदी की जातीय सांस्Ñतिक निधियों से बहुत कुछ ग्रहण करने का रुझान स्पष्ट था। पर 'आर्य भाषा हिंदी के नाम पर दयानंद सरवती और आर्य समाज के तमाम लेखक और सुधारक भाषा का जो, जातीय आदर्श रख रहे थे, उसमें हिंदी क्षेत्रा की बोलियों के शब्द भंडार, लोक साहित्य, ग्रामगीत तथा जातीय सांस्Ñतिक विरासत की विविधताओं का निषेध था। आर्य भाषा हिंदी की तत्समप्रधान शुद्धता का आग्रह आर्य समाज की ओर से आया था, जबकि हिंदी-उदूर्ू-भाषियों की एक जातीयता के विकास को ध्यान में रखकर भारतेंदु-युग के अधिकांश लेखकों ने जनप्रचलित अरबी-फारसी के शब्दों का न तो बहिष्कार किया और न उदू में पढ़ना-लिखना ही बंद किया।

सबसे बड़ी बात तो यह थी कि भारतेंदु-युग के सभी लेखक हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास से अनेक प्रकार से जुड़े हुए थे। यहां तक कि प्रहसन का इस्तेमाल कर धार्मिक आडंबरों, नौकरशाहों, बि्रटिश भक्तों, सामंतों और अंग्रेजों पर व्यंग्य बाण छोड़े गए हैंं, जनता को राजनीतिक और सामाजिक दृषिट से शिक्षित करने के लिए नाटक को एक जीवंत साहितियक विधा बनाने का भरपूर प्रयत्न हुआ है। स्वामी दयानंद सरस्वती नाटक मात्रा से ही चिढ़ते दिखार्इ पड़ते हैं। आर्य समाज के मुखपत्रा के संपादक को नाटक छापने से मना करते हुए उन्होंने लिखा, 'तुम समाज के पत्रा में नाटक का विषय मत छापो। यह अनुचित बात है। यह आर्य समाज है, भड़ुआ समाज नहीं। जो तुम नाटक का विषय छापते हो, ऐसा करना भड़ुआपन है। (ऋषि दयानंद सरस्वती के पत्रा और विज्ञापन, संपादक श्री भगवतददत्त, पृ. 366)

भारतेंदुकालीन हिंदी नवजागरण के मूलतत्त्व हैं: सामंत-विरोधी और साम्राज्य-विरोधी दृषिट, जनसंस्Ñति से लगाव, प्रेमभकित और उदारतावाद, स्वदेशप्रेम और स्वदेशी का आंदोलन, साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का अस्त्रा समझकर जनजीवन के सानिनध्य में साहित्य रचना, विज्ञान, शिल्प और उधोग-धंधों के विकास से देश की प्रगति का स्वप्न तथा अध्यात्म और रहस्यवाद का विरोध। भारतेंदु-मंडल के लेखकों के इन आदर्शों से आर्य समाज अनेक प्रश्नों पर गंभीर रूप से टकराता है। इसीलिए भारतेंदु ने स्वामी दयानंद की निंदा करते हुए 'दूषण मालिका कविता लिखी। 'स्वग में विचारसभा का अधिवेशन नामक निबंध में स्वामी दयानंद और उनके अंधभक्तों के विज्ञान विरोधी अतीतोन्मुख दृषिटकोण पर कैसा जोरदार व्यंग्य है, 'धन्य दयानंद, जिसने वेद में रेल, डाक, तार, कमेटी, कचहरी आदि दिखाकर आर्यों की कटती हुर्इ नाक बचा ली।

उपयर्ुक्त विवेचन के आलोक में जो नतीजा निकलता है, वह स्पष्ट है। भारतेंदुकालीन नवजागरण हिंदू पुनरुत्थानवाद का विरोध करता है, सामंतों और उनकी संस्Ñति के भरोसे औपनिवेशिक शासन से मुुकित की आशा छोड़ने की सीख देता है और जनसंस्Ñति के जीवंत उपादानों से नर्इ जातीय संस्Ñति को सुसजिजत करने की प्रेरणा देता है।