Sahayak Samagri

12 11. नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति

11. नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति

अमिष वर्मा

युवा समीक्षकजे.एन.यू. से शोधरत।

हिंदी भाषा के स्वरूप को लेकर पूरी उन्नीसवीं सदी में जो विवाद रहा है, वह सदी के लगभग अंत में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा के भीतर भी पूरी तरह से सुलझ नहीं पाया। हिंदी, उदर्ू और ब्रज का घालमेल इस तरह से हो चुका था कि इन तीनों को बिल्कुल अलग से पहचानना बड़ा मुशिकल था। उन्नीसवीं सदी में इन तीनों को अलगाने और सबकी पृथक पहचान बनाने का प्रयास हुआ। इसमें हिंदी और हिंदू तथा उदर्ू और मुसलमान का संबंध अनिवार्य रूप से जुड़ गया। ब्रजभाषा की परंपरा चूंकि हिंदुओं के यहाँ ज्यादा मिलती थी, अत: यह भी हिंदुओं के खाते में रही। ऐसे ही माहौल में नागरी प्रचारिणी सभा का जन्म हुआ। जाहिर है कि यह नागरी लिपि तथा हिंदी भाषा के उत्थान का उददेश्य ले कर चली थी और इसलिए यह भी जाहिर है कि यह उदर्ू के बरक्स हिंदी की माँग लेकर उठी थी, फलत: एक तरह से उदर्ू के विरोध में ही उठी थी और ठीक इसलिए यह भी जाहिर है कि प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप से यह हिंदुओं द्वारा मुसलमानों का विरोध करने के लिए खड़ी हुर्इ थी। आमतौर पर नागरी प्रचारिणी सभा पर विचार करते हुए इस सरलीकरण का शिकार होने से बचा नहीं जा सका है। यहाँ मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा कि उस हिंदी-उदर्ू के परस्पर विरोधी माहौल में नागरी प्रचारिणी सभा एकदम अनूठी थी और पूरी तरह 'सेक्युलर बनी रही। व्यवहार में नागरी प्रचारिणी सभा भी 'हिंदूपन की झलक दे देता है। लेकिन, मेरा निवेदन यह है कि उस पूरे दौर की निरंतरता में देखते हुए बिलकुल सरलीÑत ढंग से नागरी प्रचारिणी सभा और उसकी भाषा-नीति को 'सांप्रदायिक नहीं कहा जाना चाहिए। इस पर अभी पर्याप्त विचार किया जाना शेष है।

नागरी प्रचारिणी सभा का भाषा-संबंधी एक दृषिटकोण सभा के गृह-प्रवेश समारोह वाले प्रसंग में दिखार्इ पड़ता है। 18 फरवरी, 1904 को सभा के नवनिर्मित भवन का उदघाटन करने आए प्रदेश के लेफिटनेंट गवर्नर सर जेम्स लाटूश का स्वागत सभा के तत्कालीन सभापति सुधाकर द्विवेदी ने 'धनि भाग आज या भवन में नाथ तिहारे पग पड़ै कहकर किया। वहां मौजूद अयोध्या प्रसाद खत्राी ने इस 'गँवारू बोली में संबोधन किए जाने की शिकायत करते हुए चंद्रधर शर्मा गुलेरी से कहा कि यदि एड्रेस खड़ी बोली में किया जाता तो हम मुसलमानों को भी अनुकूल कर सकते थे। इस घटना का जिक्र करते हुए चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने खत्राी जी पर लिखे अपने संस्मरण में लिखा है-

''बाबू साहब को उन कठिनाइयों का ज्ञान न था जो खड़ी बोली में एड्रेस देने पर सभा को पड़ती, क्योंकि सबके सामने पालिसी में 'सरल भाषा के पक्षपाती बनने वालों को निखालिस उदर्ू शब्द काम में लाने पड़ते और काशी नाम को कुछ गौरव से रहित करना पड़ता।1

इस घटना से दो वर्ष पूर्व 1902 र्इ. में नागरी प्रचारिणी पत्रिका में छपे अपने निबंध 'भाषा कविता की भाषा में बाबू राधाÑष्ण दास ने ब्रजभाषा के संदर्भ में जो बातें लिखी थीं, वे मानो चंद्रधर शर्मा गुलेरी की टिप्पणी को एक प्रामाणिक आधार दे देती हैं। राधाÑष्ण दास लिखते हैं-

''खड़ी बोली को मुसलमान जाति ने अपनी उदर्ू बनाकर ग्रहण कर लिया इसलिए हिंदुओं ने विशेष आग्रह ब्रजभाषा की ओर किया। इसका दृढ़तर प्रमाण यह है कि श्री वल्लभाचार्य जी के संप्रदाय में अब तक यह प्रथा है कि भगवत्सेवा के समय ब्रजभाषा का बोला जाना ही उचित समझा जाता है, यावनी शब्दों का प्रयोग निषिद्ध है....।„                        

 स्पष्ट है कि भाषा का धर्म के साथ जो अनिवार्य संबंध जोड़ दिया गया, वह नागरी प्रचारिणी सभा में भी कमावेश बना रहा। 1927 र्इ. में स्थापित 'हिंदुस्तानी एकेडमी द्वारा हिंदी उदर्ू को मिलाकर एक हिंदुस्तानी भाषा के विकास के लिए किए जा रहे प्रयास तथा उसको मिलने वाले कांग्रेस के समर्थन का विरोध करते हुए बाबू श्यामसुंदर दास ने भी हिंदू संस्Ñति की दुहार्इ दे ही दी-

''कांग्रेस हिंदू-मुसिलम की एकता की मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ रही है और सब कुछ त्याग कर तथा हिंदू-हितों की आहुति देकर भी उसे प्राप्त करना चाहती है। इस भ्रम का फल अच्छा नहीं होगा। हिंदू-संस्Ñति पर यह सबसे बड़ा आक्रमण है।3

नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति को समझने के लिए सभा के भीतर भाषा के स्वरूप को लेकर चलने वाले विचार-विमर्श एवं विवादों को ढंग से समझना आवश्यक है। असल में सभा की कोर्इ एक निर्धारित नीति नहीं थी जिससे स्पष्ट रूप से उसकी भाषा-नीति सामने आ जाए। इस संस्था में भाषा मूलत: विचार और बहस के केंद्र में रही। बहुत मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि सभा की भाषा-नीति संस्Ñत की तरफ झुकी हुर्इ थी। पर इस पर भी विचार करने की जरूरत है जो आगे विस्तार से किया जाएगा। सभा में समय-समय पर हिंदी भाषा के स्वरूप पर विचार और बहसें होती रहीं और इसी बीच हिंदी का स्वरूप बनता रहा। बिल्कुल प्रारंभिक विवाद पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र और सभा के बीच हुआ जिसका जिक्र क्रिस्टोफर किंग ने भी अपने शोध प्रबंध में किया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जो 'नागरी प्रचारिणी सभा का संक्षिप्त इतिहास लिखा उसमें भी संक्षेप में इस प्रसंग का उल्लेख किया है।

1902 र्इ. में पशिचमोत्तर प्रांत की सरकार ने पाठय पुस्तक में अपनार्इ जाने वाली हिंदी की शैली के बारे में डायरेक्टर आफ पबिलक इंस्टीटयूशन को पत्रा भेजा। उस पत्रा का अंतिम अंश इस प्रकार था-

''इन परिसिथतियों में यह स्पष्ट है कि जब तक प्राथमिक विधालयों के पाठय-पुस्तकों मे हिंदी भाषा के स्वरूप के विषय में सिद्धांत निर्धारित कर निर्णय नहीं ले लिया जाता है तब तक कोर्इ्र प्रगति नहीं हो सकती है। अत: हमें यह सुझाव देना है कि नागरी प्रचारिणी सभा के सभापति और इसके द्वारा चयनित अन्य प्रतिनिधियों से परामर्श करके पाठय-पुस्तक समिति को इस बिंदु पर अंतिम निर्णय ले लेना चाहिए। यदि वे यह निर्णय लेते हैं कि पाठय-पुस्तकों की भाषा जनता द्वारा समझी जाने वाले देशी भाषा होनी चाहिए तो इस माँग की पूर्ति करने वाले लेखकों को ढंूूंढ़ने में कोर्इ कठिनार्इ नहीं होगी।4

इस पत्रा के आधार पर प्रांतीय पाठय-पुस्तक समिति ने सभा के सभापति के नाम संबोधित एक पत्रा में इस विषय पर सभा के विचार माँगे। सभा ने इस प्रस्ताव पर जो विचार तय किए उससे सभा के तत्कालीन सभापति पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र सहमत नहीं थे। हिंदी भाषा के स्वरूप के बारे में उनके विचार सभा के विचार से भिन्न थे। नतीजतन, इस प्रस्ताव पर सभा की ओर से दो अलग-अलग विचार पाठय-पुस्तक समिति को भेजे गए। पं. लख्मीशंकर मिश्र ने अपने विचार अलग भेजे और सभा ने अपने विचार सचिव के हस्ताक्षर के साथ भेजे। पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र ने एक चिटठी प्रांतीय पाठय-पुस्तक समिति के सचिव के पास भेजी, जिसमें उन्होंने हिंदी भाषा के संबंध में अपने विचार बताए। उन्होंने लिखा है-

-उदर्ू और हिंदी के व्याकरण में बहुत थोड़ा अंतर है। देशी भाषा के दोनों रूपों में लगभग सभी व्याकरणिक पदावलियां और संरचनाएँ समान हैं और मुख्य अंतर यह है कि उदर्ू लिखने वाले बड़ी मात्राा में फ़ारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग करते हैं और दूसरी तरफ हिंदी लिखने वाले संस्Ñत शब्दों का। लंबे समय से उदर्ू पुस्तकें लिखने वाले मौलवियों की आदत फ़ारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग करने की बन चुकी है और शुद्ध हिंदी साहित्य के निर्माण का विचार रखने वाले पंडितों की आदत संस्Ñत शब्दों के प्रयोग की बन चुकी है। इसका नतीजा है कि देशी भाषा की दो शैलियों के बीच की खार्इ लगातार बढ़ती जा रही है।        

चूंकि उदर्ू और हिंदी दोनों का व्याकरण एक ही है, इसलिए वे अलग-अलग भाषाएँ नहीं समझी जानी चाहिए और इसलिए साधारण उददेश्यों के लिए, ऐसी पुस्तकों के लिए जो तकनीकी नहीं हैं तथा जिन्हें आम जनता को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है, इन दोनों शैलियों को मिलाकर एक भाषा विकसित करने की कोशिश की जानी चाहिए जिसे 'हिंदुस्तानी कहा जा सकता है तथा जो फ़ारसी या नागरी किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है।5

पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र के उक्त भाषा संबंधी विचारों में से कर्इ विचार सभा के अन्य लोगों के भी विचार रहे हैं। हिंदी-उदर्ू को एक ही भाषा दो शैलियाँ पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र की ही तरह आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी मानते हैं। 19 अप्रैल, 1917 र्इ. के 'द लीडर में छपे अपने निबंध 'हिंदी और मुसलमान में शुक्ल जी ने लिखा है-

''हर विद्वान जानता है कि उदर्ू कोर्इ स्वतंत्रा भाषा नहीं है। यह पशिचमी हिंदी की एक शाखा मात्रा है जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया गया है। इस प्रकार हिंदी और उदर्ू एक ही भाषा के दो रूप हैं।6

1898 र्इ. में भाषा के स्वरूप पर विचार करने के लिए बनार्इ गर्इ उपसमिति की रिपोर्ट में बाबू श्यामसुंदर दास ने लगभग वही बातें लिखी हैं जो पं. लक्ष्मी शंकर मिश्र की चिटठी में हैं। श्यमासुंदर दास लिखते हैं-

''....व्यवहार संबंधी लेखों में अवश्य ही वही भाषा रहनी चाहिए जो सबकी समझ में आ सके, उसमें किसी भाषा के प्रचलित शब्द प्रयुक्त किए जा सकते हैं। अदालत के सब काम, नित्य की व्यवहार-संबंधी लिखा-पढ़ी, सर्वसाधारण में वितरण करने योग्य लेख या पुस्तकें, समाचार-पत्राादि जितने विषय कि सर्वसाधारण के साथ संबंध रखते हैंं, उनमें ऐसी सरल बोलचाल की भाषा आनी चाहिए जो सबकी समझ में आ जाए, उसके लिए उच्च हिंदी होनी आवश्यक नहीं है। वह ऐसी होनी चाहिए जिसे ऐसा मनुष्य भी जो केवल नागरी अक्षर पढ़ सकता हो, समझ ले।7

अब महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि सामान्य जनता के काम की भाषा के बारे में लगभग एक जैसे विचार रखने के बावजूद पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र के विचार और सभा के विचार में मतभेद का बिंदु कौन-सा है। असल में इस पूरे मतभेद की जड़ में है 'हिंदुस्तानी। पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र जिस 'हिंदुस्तानी भाषा के विकास की बात कर रहे हैं, सभा का विरोध उसी 'हिंदुस्तानी से है। भाषा के सहज, सरल और बोलचाल वाले रूप का विरोध सभा भी नहीं कर रही थी। हिंदुस्तानी का विरोध करने के पीछे सभा का रवैया बहुत हद तक हिंदी के प्रति 'डिफेंसिव होने के कारण है। उस समय हिंदुस्तानी के विरोध का सबसे बड़ा कारण यह था कि हिंदुस्तानी को बढ़ावा देने से हिंदी का असितत्व खतरे में पड़ जाएगा और अंतत: 'हिंदुस्तानी के नाम पर 'उदर्ू राज करने लगेगी। इसके अलावा यह भी जाना जाता रहा कि 'हिंदुस्तानी हल्के-फुल्के लेखन की ही भाषा हो सकती है, गंभीर लेखन इसमें संभव नहीं। हिंदुस्तानी के विरोध के पीछे यह धारणा कामनसेंस की तरह काम कर रही थी। इस कामनसेंस की झलक हमें बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि विद्वानों के यहाँ भी साफ दिखार्इ पड़ती है। बाबू श्यामसुंदर दास लिखते हैं-

''मैं समझता हूँ कि हिंदुस्तानी के प्रचार से हिंदी को बड़ी हानि पहुँचने की आशंका है, क्योंकि हिंदुस्तानी के पक्षपाती विशेषकर वे ही लोग हैं जो हिंदी से स्थूल रूप से परिचित या सर्वथा अपरिचित हैं और उदर्ू से विशेष परिचित हंै। इसके अतिरिक्त हिंदुस्तानी में उच्च कोटि के साहित्य की रचना नहीं हो सकती।

हिंदुस्तानी के बारे में ठीक इसी तरह के विचार आचार्य रामचंद्र शुक्ल के भी हैं। फैजाबाद के प्रांतीय साहित्य सम्मेलन के भाषण में, जो 1938 र्इ. की नागरी प्रचारिणी पत्रिका में छपा है तथा साथ ही 'हिंदुस्तानी का उदगम नाम से पुसितका रूप में भी नागरी प्रचारिणी सभा से 1939 र्इ. में छपा है, शुक्ल जी कहते हैं-

''हम भोली-भाली जनता को इस हिंदुस्तानी से सावधान करना अत्यंत आवश्यक समझते हैं। जो हिंदुस्तानी इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुर्इ उदर्ू के सिवा और कुछ नहीं है। उदर्ू के सब लक्षण, जैसे वाक्य रचना की फ़ारसी शैली, अरबी फ़ारसी के अप्रचलित मुंशी फहम शब्द, अरबी फ़ारसी के कायदे के बहुवचन उसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह 'हिंदुस्तानी कहलाएगी, अन्यथा नहीं।9

इसी भाषण में शुक्ल जी ने 'हिंदुस्तानी के स्वीकार्य स्वरूप की भी चर्चा की है जिसमें अरबी-फारसी के चलते शब्दों के साथ-साथ संस्Ñत के भी प्रचलित शब्द मौजूद हों।

'हिंदुस्तानी के बारे में बनने वाले कामनसेंस को उदर्ू के समर्थकों की ओर से भी कम हवा नहीं दी गर्इ। 'हिंदुस्तानी को उदर्ू समझे जाने के पीछे की परिसिथतियों पर गौर करें तो यह बात साफ हो जाती है। इस संदर्भ में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध 'क्या हिंदी नाम की कोर्इ भाषा ही नही में द्विवेदी जी के इन कथनों को देखा जा सकता है-

''श्रीयुत असगर अली खाँ के इस कथन से कि 'उदर्ू और हिंदुस्तानी इज द लिंगुआ फ्रैंका आव द कंट्री एक भेद की बात खुल गर्इ। वह यह कि आप लोगों की राय में यह हिदुस्तानी और कुछ नहीं, उदर्ू ही का एक दूसरा नाम है। अतएव समझना चाहिए कि जब हिंदुस्तानी भाषा के प्रयोग पर जोर दिया जाता है तब 'हिंदुस्तानी नाम की आड़ में उदर्ू ही का पक्ष लिया जाता है और बेचारी हिंदी के बहिष्कार की चेष्टा की जाती है।10

उपयर्ुक्त तमाम उद्धरणों से 'हिंदुस्तानी के बारे में उस समय की आम राय स्पष्ट हो जाती है। पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र उस 'हिंदुस्तानी भाषा के प्रबल समर्थक थे। यह बात सभा की स्थापना से भी कर्इ वर्ष पूर्व तब स्पष्ट हो चुकी थी, जब वे 'काशी पत्रिका के संपादक बने और उसमें शेक्सपीयर के नाटक 'मर्चेंट आफ वेनिस का भारतेंदु द्वारा किया गया अनुवाद 'वेनिस का सौदागर नाम से छपा। पत्रिका की बदली हुर्इ भाषा-नीति के कारण भारतेंदु ने अपने अनुवाद की भाषा में 'आवश्यक परिवर्तन करते हुए उसे अलग से पुस्तक रूप में प्रकाशित करवा दिया है।11 हिंदी-उदर्ू के बीच से इसी 'हिंदुस्तानी के विकास पर बल देने के कारण संभवत: मिश्र जी सभा से अलग हो गए। हालांकि, इस नीति के साथ वे 1895--96 से 1901-02 तक सभा के सभापति बने रहे, यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए।

सभा के 'हिंदुस्तानी विरोधी रवैये की चर्चा के सिलसिले में ही एक और प्रसंग पर विचार करने की जरूरत है जिसका हवाला नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति के संदर्भ में दिया जाता है। वह प्रसंग है बाबू देवकीनंदन खत्राी के उपन्यासों की भाषा और सभा का उसके प्रति रुख। क्रिस्टोफर किंग ने इस तरफ ध्यान दिलाया है कि खत्राी जी के उपन्यासों की कोर्इ चर्चा नागरी प्रचारिणी सभा के वार्षिक विवरणों में नहीं मिलती, जबकि खत्राी जी के उपन्यासों का पाठक वर्ग किसी भी दूसरे प्रांतीय भाषा की रचनाओं के पाठक वर्ग से बड़ा था। किंग ने इससे जो निष्कर्ष निकाला वह यह कि-

''देवकीनंदन खत्राी की भाषा सभा द्वारा निशिचत रूप से हिंदुस्तानी समझी गर्इ होगी जो सभा द्वारा हिंदी साहित्य के लिए तय की गर्इ मानक भाषा के स्तर से नीचे रही होगी।12

इस बात के अनुमान की कोर्इ जरूरत ही नहीं। ऐसा तो था ही। खत्राी जी की भाषा के बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास में लिखा ही है कि-

''कहना चाहें तो कह सकते हैं कि उन्होंने साहितियक हिंदी न लिखकर 'हिंदुस्तानी लिखी जो केवल इसी प्रकार की रचनाओं में काम दे सकती है।13

अन्यत्रा भी शुक्ल जी ने लिखा है-

''जब एक बार राजा शिवप्रसाद की मुसलमानी हिंदी को दबाकर भारतेंदु की हिंदी अग्रसर हुर्इ और आज तक बराबर निर्विवाद रूप से स्वीÑति होती आर्इ...। इसका दूसरा उत्थान फिर काशी (काशीनाथ खत्राी) के तिलस्मी उपन्यासों में देख पड़ा जिनकी रचना उदर्ूदाँ 'क ख पहिचानने वालों को भी फंसाने में समर्थ हुर्इ।14 सभा की भाषा-नीति साहितियक भाषा के लिए हमेशा से थोड़ी गंभीर भाषा को प्रश्रय देने की रही है। गंभीर का अर्थ निशिचत रूप से संस्Ñत की तरफ झुकाव ही है। इसलिए हिंदी-उदर्ू को एक भाषा मानने के बावजूद शुक्ल जी दोनों की अलग-अलग साहितियक परंपरा के पक्षधर थे। वे लिखते हैं-

''यदि वे अपनी भाषा और अपने साहित्य की एक अलग परंपरा रखना चाहते हैं तो हमारे लिए यह प्रसन्नता की बात है।15

हिंदी में संस्Ñत के शब्द और उदर्ू में अरबी-फ़ारसी के शब्द भाषा को गंभीर बनाने के लिए आवश्यक समझे जाते थे। फिर भी भाषा के स्वरूप के प्रति भिन्न नजरिया रखते हुए भी खत्राी जी सभा से जुड़े रहे और बिल्कुल प्रारंभिक वर्ष 1893-94 में सभा के सभासद तथा 1896-97 में प्रधानमंत्राी रहे। यहाँ एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि 'चंद्रकांता संतति का प्रकाशन वर्ष भी 1896 र्इ. है। सभा में पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र के सभापति और स्वयं देवकीनंदन खत्राी के प्रधानमंत्राी पद पर रहते हुए खत्राी जी के उपन्यास की चर्चा नहीं होने के पीछे का कारण क्या सचमुच भाषा-नीति संबंधी मतभेद था या कुछ और भी कारण थे। इस पर अलग से शोध करने की गुंजाइश है। बाबू श्यामसुंदर दास की 'मेरी आत्मकहानी में मेरी इस आशंका का आधार मौजूद है। व्यकितगत संबंधों की दाँव-पेंच भी कर्इ बार महत्त्वपूर्ण हो जाया करती हैं। श्यामसुंदर दास के इस कथन से यह बात ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी-

''सभा की उन्नति और विशेषकर मेरी ख्याति से चंद्रकांता उपन्यास के लेखक बाबू देवकीनंदन खत्राी को विशेष र्इष्र्या उत्पन्न हुर्इ। वे पंडित रामनारायण मिश्र को शिखंडी बनाकर भांति-भांति के आक्रमण तथा दोषारोपण मुझ पर करने लगे। इससे मैं बहुत खिन्न हुआ। चौथे वर्ष के आरंभ में जो कार्यकत्र्ताओं का चुनाव हुआ, उसके लिए बाबू देवकीनंदन ने बहुत उधोग किया और मैं उदासीन था। अतएव वे मंत्राी चुने गए।... सच बात तो यह है कि मंत्रित्व पाने का उधोग सभा की शुभ कामना से प्रेरित नहीं था। वह तो र्इष्र्या-द्वेष के भावों से प्रभावित था। कुछ महीनों तक यह क्रम चला। पर जब सभा के टूट जाने की आशंका हुर्इ तो बाबू राधाÑष्ण दास, बाबू कार्तिक प्रसाद, पंडित जगन्नाथ मेहता आदि ने मिलकर बाबू देवकीनंदन से कहलाया कि या तो आप मंत्रित्व पद से त्याग-पत्रा दे दीजिए या हम लोग सभा करके दूसरा मंत्राी चुनेंगे। बाबू देवकीनंदन खत्राी ने त्याग-पत्रा देने में ही अपनी प्रतिष्ठा समझी।16

भाषा-नीति संबंधी मतभेद को एकमात्रा कारण नहीं मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि एक वर्ष पहले 1895 र्इ. में ही नागरी प्रचारिणी सभा ने खत्राी जी का उपन्यास 'वीरेंद्र वीर प्रकाशित किया था। यहाँ पर ध्यान में रखना जरूरी है कि 'वीरेंद्र वीर की भाषा भी वही थी जो खत्राी जी के अन्य उपन्यासों की भाषा थी, यानी 'हिंदुस्तानी।

यहीं पर एक और प्रसंग की तरफ ध्यान देना जरूरी है। नागरी प्रचारिणी पत्रिका के प्रथम अंक से ही उसमें छपने के लिए भेजे गए लेखों पर बड़ी बारीकी और गंभीरता से विचार किए जाते थे। लेख पहले सभा में पढ़े जाते थे फिर एक परीक्षक समिति के पास भेजे-जाते थे, जो उन पर विचार करती थी और तब वह संपादक की देख-रेख में पत्रिका में छपते थे।17 पत्रिका की भाषा आदि के बारे में सभा के काशी से बाहर के सभासद भी अपने विचार भेजते थे। पहले वर्ष ही कानपुर के श्री रामनारायण सिंह ने 8 प्रस्ताव भेजे थे जिनमें से तीसरा प्रस्ताव पत्रिका की भाषा के बारे में था। वह प्रस्ताव था-'लेखों में अरबी-फारसी आदि के शब्द न आने पाएँ इस प्रस्ताव पर विचार करते हुए 3 अगस्त, 1896 को सभा ने जो निश्चय किया, वह इस प्रकार है-

''सभा की ओर से लिखे हुए जो लेख या रिपोर्ट आदि प्रकाशित हो उनमें ठेठ हिंदी के शब्द रहा करें, अर्थात न बड़े संस्Ñत के शब्द हों और न अरबी-फारसी भाषाओं के हों। जो लेख सभा द्वारा प्रकाशित होने के लिए कहीं से आएँ उनमें यदि फ़ारसी अरबी के शब्द भरे रहें तो परीक्षक कमेटी उन्हें स्वीÑत न करें।18

यहाँं ध्यान में रखने की बात यह है कि पत्रिका में छपे लेखों पर विचार करने वाली 'परीक्षक कमेटी में राधाÑष्णदास, कार्तिक प्रसाद, जगन्नाथ दास 'रत्नाकर के साथ-साथ पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र और देवकीनंदन खत्राी भी थे।         

 'साहितियक भाषा गंभीर होनी चाहिए तथा 'गंभीर विषयों के लेखन के लिए भाषा भी गुरू-गंभीर होनी चाहिए यह बहुत बाद तक भी सभा का विचार रहा है। सभा के कर्इ सभासदों के विचार थे कि गंभीर विषयों पर यदि हल्की-फुल्की सरल भाषा में लिखा जाए तो वह अपना पूरा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। किंतु साथ ही प्रारंभ से लेकर बाद तक हमेशा ऐसे लोग भी सभा के सदस्य रहे हैं जो भाषा के सहज, सरल रूप को महत्त्व देते रहे। सन 1958 में प्रकाशित पं. किशोरीदास वाजपेयी की प्रसिद्ध पुस्तक 'हिंदी शब्दानुशासन के लिए भी वाजपेयी जी को सभा द्वारा भाषा-संबंधी कुछ ऐसे ही निर्देश दिए गए थेे जिसे उन्होंने मानने से इनकार कर दिया। पं. किशोरीदास वाजपेयी ने इस बारे में साफ-साफ लिखा है-

''सभा का निर्देश मैंने नहीं माना था कि ग्रंथ की भाषा ऐसी गुरु-गंभीर होनी चाहिए जैसी कि शास्त्राों की होती है। कठिन विषय के नवीन तत्त्व यदि वैसी गुरु (बोझिल) भाषा में प्रकट किए जाएँ तो समझने वालों पर आफत! सरल भाषा में कठिन तत्त्व भी अच्छी तरह झलकते हैं। इसीलिए 'सभा का निर्देश (भाषा तथा शैली के संबंध में) मैंने नहीं माना था। मेरी प्रसन्न शैली की जगह 'सभा गंभीर शैली चाहती थी। मैंने अपनी ही शैली रखी। 'सभा की 'वर्तनी भी मैंने स्वीकार न की थी। मेरी ही वर्तनी में मेरा ग्रंथ तब छपा।19

उपयर्ुक्त तमाम बातों का उल्लेख इसलिए जरूरी था कि सभा के संबंध में यह धारणा बनाने से बचा जा सके कि वह अपनी भाषा-नीति को लेकर अडि़यल रही। सभा की भाषा-नीति के संबंध में यह बात निशिचत रूप से सच है कि वह संस्Ñत की ओर स्वाभाविक रूप से झुकी हुर्इ थी। लेकिन एक दूसरी बात भी उतनी ही सच है कि भाषा संबंधी भिन्न मत रखने वाले लोग भी सभा से जुड़े रहे। मतलब सभा का रवैया ऐसा नहीं था कि भाषा संबंधी उसकी 'पंच लाइन से बाहर जैसे ही कोर्इ गया, वह सभा के लिए त्याज्य हो गया। सभा ने हिंदी आंदोलन के नेताओं की तरह इन्हें 'आर्य खून और 'हिंदू मानने से भी इनकार नहीं किया।

पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र के 'हिंदुस्तानी भाषा के विकास के प्रयास की बात करने पर सभा से अलग हो जाने की घटना का जिक्र करते हुए क्रिस्टोफर किंग लगभग निर्णयात्मक स्वर में कहते हैं कि-

''चूंकि सभा का वजूद ही हिंदी-उदर्ू के अलगाव पर टिका है इसलिए उनहें (हिंदी-उदर्ू को) परस्पर मिलाने या उनके अलगाव को कम करने का कोर्इ भी प्रयास सभा की बुनियाद को कमजोर करता था।20

किंग के इस कथन का सीधा मतलब यह निकलता है कि सभा हिंदी-उदर्ू के अलगाव का उददेश्य लेकर ही चली थी। जबकि ऐसा नहीं है। सभा के उददेश्यों तथा उसके तमाम प्रयासों और कार्यों को देखा जाए तो वह बहुत हद तक शुद्ध रूप से साहितियक और अकादमिक रहे हैं। हां, इतना जरूर है कि साहितियक भाषा के स्तर पर सभा हिंदी और उदर्ू की अलग-अलग परंपराओं को मानती थी और यह निराधार और बेतुका भी नहीं था। एक ही प्रदेश और एक ही भाषा की दो अलग-अलग शैलियाँ होने के बावजूद हिंदी और उदर्ू की साहितियक-सांस्Ñतिक परंपरा बिलकुल अलग-अलग थी। हिंदी जहां संस्Ñत से लेकर हिंदी क्षेत्रा की विभिन्न बोलियों की साहितियक-सांस्Ñतिक परंपरा से अपने को जोड़ती है, वहीं उदर्ू मूलत: फ़ारसी और फ़ारसी के अरबी से जुड़े होने के कारण परोक्ष रूप से अरबी साहित्य और संस्Ñति से जुड़ती है। उदर्ू की अपनी अलग साहित्यक परंपरा के बारे में उदर्ू कविता के मशहूर आलोचक प्रो. कलीमुददीन अहमद अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'उदर्ू कविता पर एक दृषिट में कहते हैं-

''उदर्ू कविता का पालन-पोषण फ़ारसी की छत्रा-छाया में हुआ और यह कुछ आश्चर्य की बात नहीं और कोर्इ बुरी बात भी नहीं।.... यदि उदर्ू कविता अपने प्रारंभिक सोपानों को तय कर लेने के बाद फारसी के प्रभाव से मुक्त हो जाती है और स्वतंत्रा होकर अपनी दुनिया अलग बनाती तो कुछ शिकवा-शिकायत की गुंजाइश न थी। किंतु यह आजादी उसके भाग्य में न थी।21

नागरी प्रचारिणी सभा ने 1898 में हिंदी भाषा तथा उसकी लिपि प्रणाली पर विचार करने के लिए एक उपसमिति बनार्इ थी। इसमें ग्यारह सभासद थे तथा उसके संयोजक बाबू श्यामसुंदर दास थे। इस समिति के आठ प्रश्नों पर 49 विद्वानों के विचार आए। आठ प्रश्नों में एक प्रश्न यह भी था-''हिंदी किस प्रणाली की लिखी जानी चाहिए अर्थात संस्Ñत-मिश्रित या ठेठ हिंदी या फ़ारसी मिश्रित और यदि भिन्न-भिन्न प्रकार की हिंदी होनी उचित है तो किन-किन विषयों के लिए कैसी भाषा उपयुक्त होगी।22

प्रश्नों पर विद्वानों की संम्पत्तियाँ आ जाने पर उनके आधार पर बाबू श्यामसुंदर दास ने सभा के लिए एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें इन प्रश्नों पर विचार किया गया। उपयर्ुक्त प्रश्न के संबंध में जो महत्त्वपूर्ण बातें उस रिपोर्ट में कही गर्इं उन्हें जानना आवश्यक है।

भाषा की कोर्इ प्रणाली विकसित किए जाने के बारे में बाबू श्यामसुंदर दास ने जो विचार दिए वे यहाँ उद्धृत किए जा रहे हैं-

''किसी भाषा के लिखने की प्रणाली एक-सी नहीं हो सकती। विषय भेद तथा रुचि भेद से भाषा का भेद है। पृथ्वी पर जितनी भाषाएँ हैं, सभी में कठिन और सरल लेख लिखने की रीति चली आती है। कहाँ कैसी भाषा लिखनी चाहिए यह लेखक और विषय पर निर्भर है। इसके लिए कोर्इ नियम नहीं बन सकता। यदि लेखक की यह इच्छा है कि भाषा कठिन हो तो उसे निस्संदेह संस्Ñत के शब्दों का प्रयोग करना होगा और यदि उसकी यह इच्छा है कि भाग सबके समझने योग्य हो तो उसे हिंदी के सीधे शब्दों को काम में लाना पड़ेगा। परंतु यह बात केवल लेखक पर निर्भर नहीं है, विषय पर भी बहुत कुछ निर्भर है। यदि कोर्इ महाशय संस्Ñत-दर्शनशास्त्रा पर कोर्इ लेख या ग्रंथ लिख रहे हैं तो निश्चय उनकी भाषा में संस्Ñत के शब्द भरे रहेंगे और भाषा कठिन होगी। वैसे ही यदि कोर्इ महाशय रेल या अन्य ऐसी बातों का वर्णन करें जिनका यूरोपीय लोगों के कारण इस देश में प्रचार हुआ हो तो उन्हें अवश्यमेव यूरोपीय भाषाओं के शब्दों से कुछ-न-कुछ लेना पड़ेगा और यदि उनको विदेशी शब्दों से चिढ़ है तो उनकी भाषा ऐसी होगी कि जिसे समझने के लिए पाठकों को उन्हीं से पूछना होगा।23

बाबू श्यामसुंदर दास के उपयर्ुक्त कथन को ध्यान से देखें तो उससे यह बात तो साफ-साफ जाहिर है कि एक समझ यह थी कि भाषा की कोर्इ एक निशिचत प्रणाली निर्मित नहीं की जा सकती। लेकिन इस कथन में कुछ और महत्त्वपूर्ण संकेत हैं जिन्हें समझना जरूरी है। श्यामसुंदर दास जी ने लिखा है कि यदि भाषा को सबके लिए बोधगम्य बनाना है तो उसमें हिंदी के सीधे शब्दों को काम में लाना होगा। संस्Ñत के शब्दों के प्रयोग से भाषा कठिन होगी, इसे श्यामसुंदर दास स्वीकार करते हैं। साथ ही विदेशी शब्दों को भाषा अपनाए जाने का भी श्यामसुंदर दास विरोध नहीं करते बलिक विषय के अनुसार विदेशी शब्दों के प्रयोग को वे भाषा ही सहजता के लिए जरूरी मानते हैं।

दरअसल, भाषा में विदेशी शब्दों के प्रयोग को लेकर जो विवाद था वह मूलत: अरबी-फ़ारसी शब्दों को लेकर था। अरबी-फारसी शब्दों में भाषा में आने का विरोध करने वाले ऐसे लोग की कमी नहीं थी जो स्वयं लिखते हुए अंग्रेजी के शब्दों को धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। इस भाषार्इ प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए श्यामसुंदर दास ने लिखा है-

''इसलिए जो लोग यह कहते हैं कि हिंदी में अरबी-फ़ारसी के किसी शब्द का प्रयोग न हो उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि क्यों अरबी-फ़ारसी पर ही यह रोक लगार्इ जाए। क्यों न यह नियम कर दिया जाए कि जितने शब्द संस्Ñत के अतिरिक्त किसी दूसरी भाषा से आ गए हैं वे सब निकाल दिए जाएँ? हम लोगों का यह मत है कि जो शब्द अरबी-फ़ारसी या अन्य भाषाओं के हिंदीवत हो गए हैं तथा जिनका पूर्ण प्रचार है वे हिंदी के ही शब्द माने जाएँ और उनका प्रयोग दूषित न समझा जाएँ।24

हिंदी भाषा में संस्Ñत तथा अरबी-फ़ारसी शब्दों के प्रयोग के संबंध में और स्पष्टता से यह कहा है कि-

''कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि संस्Ñत के शब्दों का ही अधिक प्रयोग हो। विदेशी भाषा के सरल शब्द के स्थान पर भी यदि संस्Ñत के एक कठिन शब्द से काम चल सके तो संस्Ñत शब्द ही काम में लाया जाए, विदेशी भाषा के शब्द निकाल दिए जाएँ। इन महाशयों के मत से भाषा ऐसी कठिन हो जाएगी कि उसका समझना सब लोगा का काम न होगा। हिंदी भाषा में विशेष गुण यह है कि वह सरलता और सुगमता से समझ में आती है और इसीलिए वह भारतवासी मात्रा की मातृभाषा मानी जाती है। संस्Ñत शब्दों के अधिक प्रचार से यह गुण जाता रहेगा। हां, यह बात बहुत आवश्यक है कि भाषा सब श्रेणी के लोगों के पढ़ने योग्य हो। पर क्या संस्Ñत के कठिन शब्दों के बिना यह नहीं हो सकता?25

एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात श्यामसुंदर दास इस संदर्भ में कहते हैं कि-

''विदेशी भाषा के शब्दों के विषय में इतना कहना और रह गया है कि जिन शब्दों का भाषा में प्रचार हो गया है उनके छोड़ने या निकालने का उधोग अब निष्फल, निष्प्रयोजन और असंभव है।26

उपयर्ुक्त तमाम कथनों को उद्धृत करने का उददेश्य नागरी प्रचारिणी सभा के भाषा संबंधी विचारों को विस्तार से जानना-समझना तो है ही, साथ ही सभा की भाषा-नीति के बारे में क्रिस्टोफर किंग के अपने शोध प्रबंध में दिए गए विचारों का मूल्यांकन करना भी है। क्रिस्टोफर किंग अपने शोध प्रबंध में सभा की भाषा-नीति का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि सभा के चाहे जो भी सिद्धांत रहे हों पर कर्इ स्थानों पर उसकी भाषा अत्यंत ही संस्Ñतनिष्ठ है। किंग सवाल उठाते हैं कि रिपोर्ट में दिए गए सिद्धांतों का यदि सभा पालन करती थी तब ऐसी संस्Ñतनिष्ठ भाषा में लेखन संभव कैसे हुआ? यह सवाल उठाया जाना बिल्कुल ठीक है लेकिन किंग इस सवाल का जवाब जहां ढूंढ़ते हैं वह बहुत तर्कपूर्ण नहीं लगता। किंग रिपोर्ट की एक पंकित का बारीक विश्लेषण करते हुए यह बताने की कोशिश करते हैं कि किस प्रकार अत्यंत प्रचलित विदेशी भाषा के शब्दों को भी हिंदी से बाहर निकाला गया। उन्होंने रिपोर्ट से जिस वाक्यांश को अंग्रेजी में उद्धृत किया है वह भी उद्धृत कर रहा हूँ-

ृृण्ण्ण्ण्इनज जीवेमूवतके वितमपहद संदहनंहमेूीपबी ींअम इमबवउम निससल बनततमदजए ंदक वितूीपबी दव भ्पदकपूवतक मगपेजेण्ण्ण्वनहीज जव इम नेमकण्ष्27

इस वाक्यांश को उद्धृत करते हुए उन्होंने भाषा-संबंधी इस षडयंत्रा का पर्दाफाश करने की कोशिश की है कि कोर्इ विदेशी भाषा का पूर्ण प्रचलित शब्द भी तभी प्रयोग किया जा सकेगा यदि उसके लिए हिंदी का कोर्इ शब्द मौजूद नहीं हो। यदि हिंदी या संस्Ñत का कोर्इ भी शब्द, वह कठिन ही क्यों न हो, मौजूद है तो अरबी-फारसी के प्रचलित शब्द को हटाया जा सकता है। भाषा के छÉ को पहचानने और उसके असली निहितार्थ को पकड़ने का अच्छा प्रयास किंग ने किया है किंतु यदि महज वाक्यांश का परीक्षण करने तक अपने को सीमित न रखकर उस पूरे उद्धरण और उसके आगे-पीछे के उद्धरणों को भी उन्होंने ध्यान में रखा होता तो संभव है सभा के प्रकाशनों की भाषा के संस्Ñतनिष्ठ होने का कारण कहीं और ढूंढ़ने की कोशिश करते। सभा की रिपोर्ट में व्यक्त विचार और किंग के विचारों की तुलना एवं परीक्षा के लिए मैं पूरा उद्धरण उद्धृत कर रहा हूंँ-

''सब पक्षों पर ध्यान देकर हम लोगों का सिद्धांत यह है कि हिंदी लिखने में जहाँ तक हो सके फ़ारसी, अरबी तथा विदेशी भाषाओं के ऐसे शब्दों का प्रयोग न किया जाए जिनके स्थान पर हिंदी के अथवा संस्Ñत के सुगम और प्रचलित शब्द उपसिथत हैं पर विदेशी भाषाओं के ऐसे शब्द जो पूर्णतया प्रचलित हो गए हैं और जिनके स्थान पर हिंदी के शब्द नहीं हैं अथवा जिनके स्थान पर संस्Ñत के शब्द रखने से कष्टार्थ दूषण की संभावना है, उनका प्रयोग होना चाहिए। सारांश यह कि सबसे पहला स्थान शुद्ध हिंदी के शब्दों को, उसके पीछे संस्Ñत के सुगम और प्रचलित शब्दों को, इसके पीछे फ़ारसी आदि विदेशी भाषाओं के साधारण और प्रचलित शब्दों को और सबसे पीछे संस्Ñत के अनप्रचलित शब्दों को स्थान दिया जाए। फ़ारसी आदि विदेशी भाषाओं के कठिन शब्दों का प्रयोग कदापि न हो।28

स्पष्ट है कि उपयर्ुक्त कथन में मुख्य बल भाषा में कठिन अप्रचलित शब्दों की जगह आसान, प्रचलित शब्दों पर, भले ही प्रचलित शब्द विदेशी भाषा के ही क्यों न हों। यदि कठिन शब्द का ही चुनाव करना मजबूरी हो तब संस्Ñत के कठिन शब्दों को स्थान दिया जाए अब ऐसे से पूरे उद्धरण से केवल एक वाक्यांश उठाकर उसमें भाषार्इ षडयंत्रा के संकेत ढूंढ़ना ठीक नहीं लगता। कठिन संस्Ñत शब्दों को लेने के बारे में भी उक्त रिपोर्ट में श्यामसुंदर दास ने अपने तर्क दिए हैं जो विचारणीय हैं। वे लिखते हैं-                       

 ''हिंदी-लेखकों और हितैषियों में एक दल ऐसा है जो इस मत का पोषक है कि हिंदी में हिंदी के शब्द रहें, संस्Ñत के शब्दों का प्रयोग न हो। यह सम्मति युकितसंगत नहीं जान पड़ती। हिंदी का जन्म संस्Ñत से हुआ है, इसलिए वह उसकी माता के स्थान पर हुर्इ। अब यदि आवश्यकता पड़ने पर हिंदी अपनी माता से सहायता न ले तो और कहांँ से ले सकती है। अतएव यह उधोग कि हिंदी से संस्Ñत के वे सब शब्द निकाल दिए जाएं जो हिंदीवत नहीं हो गए हैं, सर्वथा निष्फल और असंभव है। संस्Ñत के शब्दों से अवश्यमेव सहायता ली जाएगी, पर इस बात पर अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि जहाँ शुद्ध हिंदी के शब्द से काम चल जाए और भाषा में किसी प्रकार दोष न आता हो, वहां संस्Ñत के शब्दों की वृथा भरती न की जाए।29

बाबू श्यामसुंदर दास ने भाषा के दो नमूने दिए हैं और उनमें से अपनी भाषा के आदर्श का चुनाव किया है। भाषा के उन दोनों नमूनों और उस पर श्यामसुंदर दास की टिप्पणी देखी जा सकती है-

1. ''अहा! यह कैसी अपूर्व और विचित्रा वर्षा-ऋतु सांप्रत प्राप्त हुर्इ और चतुर्दिक कुझटिकापात से नेत्रा की गति स्तंभित हो गर्इ है, प्रतिक्षण अभ्र में चंचला पुंश्चली स्त्राी की भांति नर्तन करती है और वैसे ही वकावली उडडीयमाना होकर इतस्तत: भ्रमण कर रही है। मयूरादि अनेक पक्षीगण प्रफुलिलत चित्त से रव कर रहे हैं और वैसे ही ददर्ुरगण भी पंकाभिषेक करके कुकवियों की भांति कर्णवेधक टक्काझंकार-सा भयानक शब्द करते हैं।

(श्यामसुंदर दास की टिप्पणी)

इसमें संस्Ñत के शब्द कूट-कूट कर भर दिए गए हैं। चाहे कैसा ही ग्रंथ क्यों न लिखा जाए उसमें इस प्रकार की भाषा न लिखनी चाहिए।

2. सब विदेशी लोग घर फिर आए और व्यापारियों ने नौका लादना छोड़ दिया, पुल टूट गए, बांध खुल गए, पंक से पृथ्वी भर गर्इ, पहाड़ी नदियों ने अपने बल दिखलाए, बहुत-से वृक्ष कूल-समेत तोड़ गिराए, सर्प बिलों से बाहर निकले, महानदियों ने मर्यादा भंग कर दी और स्वतंत्रा सित्रायों की भांति उमड़ चलीं।

(श्यामसुंदर दास की टिप्पणी)

इसमें भी संस्Ñत के शब्द हैं पर वे इतने सामान्य और सरल हैं कि उनका प्रयोग अग्राá नहीं। ऐसी ही भाषा हम लोगों का आदर्श होनी चाहिए।30

हालांकि, यहाँ भी श्यामसुंदर दास संस्Ñत शब्दों की वृथा भरती से बचने की बात करते हैं लेकिन यहाँ मेरी मूल आपत्ति श्यामसुंदर दास और उस दौरे के लगभग तमाम लोगों की भाषा की उत्पत्ति-संबंधी समझदारी पर है। हिंदी को संस्Ñत से निकली हुर्इ बताना, दोनों के बीच जननी और पुत्राी का संबंध बताना और हिंदी को अनिवार्य रूप से संस्Ñत से जोड़कर देखना उस समय के 'कामनसेंस का हिस्सा था। भाषा के बारे में हुए आधुनिक चिंतन इस बात को साफ करते हैं कि भाषाओं के बीच माता-पुत्राी का संबंध नहीं होता। हां, भाषाओं में परस्पर प्रभाव ग्रहण अवश्य होता है। ऊपर मैंने जिस कामनसेंस की बात कही है, उस 'कामनसेंस पर भी विचार करने की जरूरत है। भाषा की उत्पत्ति के विषय में यह कामनसेंस युगीन विचारों की सीमा के कारण है या जान-बूझकर इसे निर्मित किया गया है, इस बात को तब ज्यादा ठीक समझा जा सकता है जब हम यह मालूम कर पाते हैं कि उस समय आधुनिक भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति के संबंध में 'संस्Ñत माता की पुत्रियों वाले सिद्धांत से अलग कोर्इ संकल्पना या सिद्धांत दिए गए थे अथवा नहीं। हम देखते हैं कि जार्ज गि्रयर्सन अपने 'लिंगिवसिटक सर्वे आफ इंडिया में आधुनिक भारतीय भाषाओं के संस्Ñत से निकली होने का विरोध करते हैं। उक्त ग्रंथ की भूमिका में ही उन्होंने लिखा है-

''भारत में बोलचाल की आर्य-भाषा शताबिदयों से आर्य कहलाती रही है। प्राÑत का अर्थ है संस्Ñत, समस्Ñत, संवारी हुर्इ, नकली भाषा से भिन्न सहज, अÑत्रिम भाषा। प्राÑति की इस व्याख्या से यह परिणाम निकलता है कि वेदमंत्राों के संकलनकत्र्ता ब्राह्राणों ने इन मंत्राों में अपेक्षाÑत Ñत्रिम संस्Ñत भाषा सुरक्षित रखी है। वेदमंत्राों के समय की बोलचाल की भाषाएँ वास्तव में प्राÑत थीं।31                     

गि्रयर्सन के अतिरिक्त पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध पुस्तक 'पुरानी हिंदी 1920 र्इ. में नागरी प्रचारिणी पत्रिका के नवीन संस्करण, भाग 2 में प्रकाशित हो चुकी थी। उस पुस्तक में बिल्कुल प्रारंभ में ही गुलेरी जी ने संस्Ñत को आर्यों की मूल भाषा मानने से इन्कार किया है तथा संस्Ñत से अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध को एक रूपक के माध्यम से स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं-

''यह (संस्Ñत) मानो गंगा की नहर है....। ....सदा इस संस्Ñत नहर को देखते, देखते हम असंस्Ñत या स्वाभाविक, प्राÑतिक नदियों को भूल गए और फिर जब नहर का पानी आगे स्वच्छंद होकर समतल और सूत से नपे हुए किनारों को छोड़कर जल-स्वभाव से कहीं टेढ़ा कहीं सीधा, कहीं गंदला, कहीं निखरा, कहीं पथरीली, कहीं रेतीली भूमि पर और कहीं पुराने सूखे मार्गों पर प्राÑतिक रीति से बहने लगा तब हम यह कहने लगे कि नहर से नदी बनी है, नहर प्रÑति है और नदी विÑति, यह नहीं कि नदी अब सुधारकों के पंजे से छूटकर फिर सनातन मार्ग पर आर्इ है।32

जाहिर है तत्कालीन भाषा विषयक विमर्श इस बात की ओर संकेत कर रहे थे कि हिंदी या अन्य आधुनिक भारतीय भाषाएँ से निकली हुर्इ भाषाएँ नहीं हैं। हालांकि इस चिंतन की भी अपनी सीमा है। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को संस्Ñत की पुत्राी न मानने की बात तो इन लोगों ने की, किंतु उसे प्राÑत से निकली हुर्इ भाषा बताया। असल में भाषा की उत्पत्ति के संबंध में आधुनिक क्रांतिकारी चिंतन यह है कि किसी भी भाषा के बीच जननी-पुत्राी का संबंध नहीं होता। रामविलास शर्मा इसी बात को स्पष्ट करते हुए 'भाषा और समाज में लिखते हैं कि-

''संस्Ñत-प्राÑत-अपभ्रंश की नसेनी छोड़ देने पर आधुनिक भाषा के मूल तत्त्व काफी प्राचीन सिद्ध होते हैं।33

बहरहाल, तत्कालीन चिंतन इतना क्रांतिकारी न होते हुए भी इतना तो स्पष्ट कर ही रहा था कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का संबंध सीधे-सीधे संस्Ñत से नहीं था। फिर भी ऐसा 'कामनसेंस क्यों और कैसे निर्मित हो सका? यहाँ पर इसे एक षडयंत्रा के बतौर देखने की अपेक्षा उस पूरी परिसिथति को मानवीय संदर्भों के साथ देखने की जरूरत है। यदि नागरी प्रचारिणी सभा के संघटन पर दृषिट डाले तो हम पाते हैं कि इसके अधिकांश सदस्य 'द्विज जाति से आते हैं। ये अधिकांश सदस्य मूलत: संस्Ñत के विद्वान थे। इनमें से बहुत कम लोग थे जो उदर्ू और फ़ारसी जानते थे। ऐसे में यह बिल्कुल स्वाभाविक बात थी कि वे हिंदी के जिस किसी भी स्वरूप के निर्माण की कोशिश करते उसमें अरबी-फारसी की तुलना में संस्Ñत के शब्द ज्यादा आते। यहाँ पर पूरे प्रसंग को इस तरह से देखना कि चूंकि सभा के अधिकांश सदस्य ब्राह्राण अथवा 'द्विज थे, इसलिए उन लोगों ने जानबूझ कर भाषा को बनाने के लिए उसमें संस्Ñत के शब्द ठूँस दिए, एक दिन पूर्व निर्धारित आग्रह के साथ अपने निष्कर्ष तक पहँंचने की कवायद होगी।

यहाँ हमें इस बात को जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि उन ब्राह्राण-द्विज सदस्यों में से कुछेक जो उदर्ू और फ़ारसी के भी विद्वान थे उनकी भाषा वैसी संस्Ñतनिष्ठ नहीं होती थी, जैसी उनकी जो उदर्ू-फ़ारसी नहीं जानते थे। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि सभा में सदस्यों में से जिसने भी भाषा पर गंभीर रूप से विचार किया उसने भाषा-विषयक युगीन 'कामनसेंस को तोड़ा भी, भले ही वह ब्राह्राण की कयों न हो।

इसे पूरे प्रसंग में यह बात बिल्कुल स्पष्ट तौर पर समझने की जरूरत है कि आखिर सभा भाषा के जिस स्वरूप को गढ़ने का प्रयास कर रही थी उसका उददेश्य क्या था। असल में हिंदी के स्वरूप निर्धारण को लेकर जो बहसें और टकराहट हैं उसका सबसे महत्त्वपूर्ण कारण इसे राष्ट्रभाषा के रूप में गढ़ने की कोशिश है। भारत की किसी दूसरी भाषा, चाहे वह बंगला, मराठी, तमिल, तेलुगु आदि कोर्इ भी हो, के स्वरूप निर्धारण का ऐसा प्रयास कहीं दिखार्इ नहीं पड़ता। साहितियक विकास के साथ-साथ भाषा अपना स्वरूप स्वयं निर्धारित करती चलती है। हिंदी के साथ सिथतियाँ दूसरी थीं। हिंदी में संस्Ñत शब्दों की भरती के पीछे के कारणों में से एक यह भी था कि भारत की लगभग सभी भाषाओं में यदि किसी एक कामन भाषा के शब्द सबसे ज्यादा मिलते हैं तो वह है संस्Ñत। बंगला, मराठी, तमिल आदि सभी भाषाओं में संस्Ñत के शब्द मिलते हैं। इन सब भाषाओं से एक संबंध बनाए रखने तथा हिंदी का अखिल भारतीय स्वरूप निर्मित करने के लिए हिंदी में संस्Ñत के शब्दों को जगह देने की वकालत की जाती रही। श्यामसुंदर दास ने इस बात को स्पष्ट करते हुए लिखा है-

''देश के एक कोने से दूसरे कोने तक संस्Ñत शब्दों का प्रचार है। हमारे सब धर्म Ñत्य इसी भाषा में संपादित होते हैं। यदि भारतवर्ष में कोर्इ ऐसी भाषा हो सकती है जो एकता के सूत्रा में यहाँ की जनता को बाँध सकती है तो वह वही भाषा होगी जो संस्Ñतप्राय होगी। हमारी हिंदी से चुन-चुनकर संस्Ñत के साधारण से साधारण तत्सम शब्दों को निकालना और उनके स्थान में उदर्ू के शब्दों को भरना मानो हिंदी की जड़ में कुठाराघात करना है। यदि हिंदुस्तानी का प्रचार हो गया तो देश के अन्य भागों से बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि से हमारा संबंध विचिछन्न हो जाएगा।34

यधपि यहीं पर यह भी समझना चाहिए कि हिंदी को अखिल भारतीय स्वरूप देने के चक्कर में एक ऐतिहासिक भूल यह हुर्इ कि स्वयं हिंदी प्रदेश का ही एक वर्ग हिंदी के इस स्वरूप से अलग-थलग पड़ गया और एक ही भाषा को लेकर दो अलग-अलग खेमों की रस्साकशी तेज होती गर्इ।

यहीं पर मेरा एक निवेदन यह भी है कि नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति पर विचार करते समय इसे उन्नीसवीं सदी के हिंदी आंदोलन के सातत्य में देखने के साथ-साथ कहीं-कहीं उससे अलगाने का विवेक भी रखना चाहिए। उन्नीसवीं सदी की तमाम प्रवृत्तियों को यदि उसकी निरंतरता में हम देखेंगे तो कर्इ भूले होने की संभावनाएँ बढ़ जाएँगी। नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति संस्Ñत की ओर झुकी हुर्इ थी, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह झुकाव सांप्रदायिक था, यह कहना शायद ज्यादती होगी। दरअसल मैं इसी सांप्रदायिकता के मुददे पर नागरी प्रचारिणी सभा को 19वंी सदी के हिंदी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए भी उससे अलगाने का विवेक रखने की बात कर रहा हूँ।

उन्नीसवीं सदी का हिंदी आंदोलन मूलत: धार्मिक संस्थाओं द्वारा हिंदी और खासकर हिंदुओं के लिए चलाया जाने वाला आंदोलन था। इस आंदोलन से जुड़ी प्रारंभिक लगभग सभी संस्थाएँ धार्मिक थीं या धर्म से घनिष्ठ रूप से जुड़ी थीं। हमें यहाँ इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि 1882 में हंटर आयोग को हिंदी के पक्ष में मेमोरियल देने वाली संस्थाओं में धर्म निरपेक्ष या साहितियक संस्थाएँ नहीं के बराबर थीं। हंटर आयोग की रिपोर्ट के परिशिष्ट से पता चलता है कि पशिचमोत्तर और अवध प्रांत में आयोग को हिंदी के पक्ष में कुल 118 शहरों से मेमोरियल भेजे गए जिनमें से दो-तिहार्इ मेमोरियल अकेले आर्य समाज की शाखाओं ने भेजे थेे। उसके बाद अलीगढ़ की सतधर्मावलंबिनी सभा, बनारस के सनातनी पंडितों की सभा और नैनीताल की सत्यधर्म प्रचारिणी सभा ने भेजे।35

इसके अलावा उन्नीसवीं सदी के हिंदी आंदोलन में हिंदुओं को जिस प्रकार गोलबंद करने और हिंदू हितों को मुसिलम हितों से अलगाने की जैसी कोशिश 'हिंदी को प्रतीक बनाकर की गर्इ वैसी सांप्रदायिक कोशिशें नागरी प्रचारिणी सभा के कामों में कहीं दिखार्इ नहीं पड़ती।

जाहिर है उन्नीसवीं सदी का हिंदी आंदोलन मूलत: हिंदी भाषा की श्रीवृद्धि के लिए चलाया गया आंदोलन नहीं था, बलिक यह हिंदुओं को एकजुट करने के लिए चलाया गया आंदोलन था जिसमें 'गऊ की तरह 'हिंदी भी एक पवित्रा प्रतीक थी जिससे हिंदू मानस को भड़काया जा सकता था।

अब उपयर्ुक्त बातों को ध्यान में रखते हुए यदि नागरी प्रचारिणी सभा के स्वरूप एवं उसके प्रयासों को देखा जाए तो उन्नीसवीं सदी के हिंदी आंदोलन के सांप्रदायिक चरित्रा से इसके चरित्रा के अंतर को समझा जा सकता है। पहली बात तो यह कि नागरी प्रचारिणी सभा, आर्य समाज, प्रयाग हिंदू समाज या उन्नीसवीं सदी में हिंदी का आंदोलन करने वाली अन्य संस्थाओं की तरह कोर्इ धार्मिक संस्था नहीं थी। यह एक धर्मनिरपेक्ष संस्था थी, हाँलाकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके सदस्यों का संबंध धार्मिक संस्थाओं से था। नागरी प्रचारिणी सभा का घनिष्ठ संबंध सनातनधर्म आंदोलन से था। नागरी लिपि को सरकारी मान्यता मिल जाने के तुरंत बाद 1902 में मथुरा म श्रीभारत धर्म महामंडल का अधिवेशन हुआ तो उसमें राधाÑष्णदास और श्यामसुंदर दास को बाकायदा सभा के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने के लिए भेजा गया।36 किंतु अपने मूल संगठनात्मक स्वरूप में यह एक धमनिरपेक्ष संस्था थी। मतलब यह कि हिंदुओं को एकजुट करना इस सभा का बुनियादी मकसद नहीं था। यह संस्था मूलत: नागरी लिपि और हिंदी भाषा की प्रगति का उददेश्य लेकर चली। सभा के कार्यों और प्रयासों को भी देखा जाए तो वह मूलत: हिंदी भाषा, नागरी लिपि और हिंदी साहित्य के विकास पर ही केंदि्रत है। सभा के नियमानुसार हिंदी भाषा और नागरी लिपि के अलावा धार्मिक विषयों पर कोर्इ बहस नहीं होती थी, साथ ही पत्रिका में भी धार्मिक विषय पर कोर्इ लेख प्रकाशित नहीं होता था।37 हाँ, इतना जरूर है कि विभिन्न विषयों पर लिखे गए लेखों में प्राचीन धार्मिक पुस्तकों, मान्यताओं आदि के उल्लेख एवं साक्ष्य मिलते हैं। फिर भी इनका तेवर उस तरह से सांप्रदायिक नहीं लगता। अत: उन्नीसवीं सदी के हिंदी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ देखते हुए भी उसके सांप्रदायिक चरित्रा के सभा के चरित्रा के अंतर को समझ कर ही हम सभा की भाषा-नीति को ज्यादा अच्छे से समझ सकते हैं।

संदर्भ :

1. चंद्रधर शर्मा गुलेरी : प्रतिनिधि संकलन, एन.बी.टी., पृ. 138-39।

2. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, छठा भाग, पृ. 176।

3. श्यामसुंदर दास, मेरी आत्मकहानी, पृ. 242।

4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ग्रंथावली-4, पृ. 249।

5. क्रिस्टोफर आर. किंग, नागरी प्रचारिणी सभा (सोसाइटी फार द प्रोमोशन आ द नागरी सिक्रप्ट एंड लैंग्वेज), आफ बनारस, 1893-1914 : अ स्टडी इन द सोशल एंड पालिटिकल हिस्ट्री आफ द हिंदी लैंग्वेज (शोध-प्रबंध), पृ. 311 पर उद्धत (अंग्रेजी में), (अनुवाद लेखक द्वारा)

6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ग्रंथावली-4, पृ. 56।

7. मेरी आत्मकहानी, पृ. 74।

8. मेरी आत्मकहानी, पृ. 241।

9. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ग्रंथावली-4, पृ. 73।

10. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 278।

11. देखें-वीर भारत तलवार रस्साकशी, पृ.88।

13. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 273।

14. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ग्रंथावली-4, पृ. 16।

15. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ग्रंथावली-4, पृ. 64

16. मेरी आत्मकहानी, पृ. 32।

17. नागरी प्रचारिणी सभा का अद्र्धशताब्दी इतिहास, पृ. 176-77।

18. नागरी प्रचारिणी सभा का अद्र्धशताब्दी इतिहास, पृ. 177।

19. पं. किशोरीदास वाजपेयी, हिंदी शब्दानुशासन, लेखक का निवेदन, पृ. 35।

20. वन लैंग्वेज टू सिक्रप्टस, पृ. 148 पर उद्धृत (अंग्रेज़ी में), (अनुवाद लेखक द्वारा)

21. कलीमुददीन अहमद, उदर्ू कविता पर एक दृषिट, प्रस्तावना, पृ. 17।

22. मेरी आत्मकहानी, पृ. 63।

23. मेरी आत्मकहानी, पृ. 67-68।

24. मेरी आत्मकहानी, पृ.70

25. मेरी आत्मकहानी, पृ. 71।

26. मेरी आत्मकहानी, पृ. 71।

27. किंग, शोध-प्रबंध, पृ. 310।

28. मेरी आत्मकहानी, पृ. 72।

29. मेरी आत्मकहानी, पृ. 71

30. मेरी आत्मकहानी, पृ. 73-74।

31. रामवलिस शर्मा, भाषा और समाज, पृ. 191-92।

32. चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पुरानी हिंदी, पृ.1।

33. भाषा और समाज, भूमिका, पृ. 11।

34. मेरी आत्मकहानी, पृ. 242।

35. रस्साकशी, पृ. 328।

36. रस्साकशी, पृ. 326।

37. नागरी प्रचारिणी सभा का अद्र्धशताब्दी इतिहास, पृ. 11 एवं 17।

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***पक्षधर, वर्ष 4, अंक 9, सं. दूधनाथ सिंह, विनोद तिवारी

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